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फूल नहीं धधकता अंगार हूँ मैं।
थके स्वाभिमान को झकझोरती ललकार हूँ मैं।

सो‍ई भारत की वर्षों से अन्तरात्मा
नवजागरण की पुकार हूँ मैं।

ग़ुलामी बस चु्की है ख़ून में
पर क्रांति की टंकार हूँ मैं।

सर अब हमारा कभी न झुकेगा
विजयमाला का शृंगार हूँ मैं।

भस्म होगी सब दासता मानस की
सच्चे स्वाधीनता की चिंगार हूँ मैं।

बुझेगा न ये दीपक चाहे कितना ज़ोर लगा लो
हर आँधी तूफ़ान की बेबस हार हूँ मैं।

अग्निमय हूँ अग्निरूप हूँ अग्नि का उपासक हूँ
अग्नि मेरी आत्मा सत्याग्नि का ही विस्तार हूँ मैं।

अग्निवीर

फूल-नहीं-धधकता-अंगार-हूँ

अग्निसंकल्प

अग्निसंकल्प

राष्ट्रभक्ति और धर्मरक्षा के लिए प्रेरित करती कविताओं का संग्रह

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  • बुझेगा न ये दीपक चाहे कितना ज़ोर लगा लो
    हर आँधी तूफ़ान की बेबस हार हूँ मैं।

    agar pratyek bharatvasi ka hraday is kavita ki bhavna ko samjhta
    to kitna shrestha hota.