बाबरी मस्जिद क्या है? केवल हिन्दुओं के भगवान राम के मन्दिर को तोड़ कर बनाई जाने वाली हराम इबादतगाह? नहीं। अग्निवीर ने सन 2010 में ही तथ्यों और प्रमाणों से साबित किया था कि बात बस इतनी नहीं है। बाबर केवल भगवान राम या हिन्दुओं से ही नफरत नहीं करता था। उसकी नफरत अल्लाह और मुहम्मद से भी उतनी ही थी। हिंदुस्तान के मुसलमानों ने ऐसे शैतान को अपना खैरख्वाह माने रखा। अग्निवीर आज हिंदुस्तान के करोड़ों मुसलमानों को इस गुनाह से आज़ाद कराएगा।

कौन कहता है कि ताज महल मुगलिया मुहब्बत की पहली निशानी है? बाबरी मस्जिद, जिसे मुसलमान अल्लाह का घर समझते रहे, वो असल में बाबर के हवस की निशानी थी। बाबर और उसके मुन्ने की उम्र के बालक-मित्र बाबरी के सम्भोग की निशानी।

हिंदुस्तान के मुसलमान शुक्रगुज़ार हैं उन रामभक्तों के, जिन्होंने इस्लाम के नाम पर लगी लौंडेबाजी की इस कालिख को अपने खून से धो दिया। इस तरह एक लौंडेबाज हत्यारे की निशानी मिट्टी में दफ़न हुई और साथ ही सदियों की निदामत भी जिसने मुसलमानों को कहीं का नहीं छोड़ा था। दिन में हिन्दुओं के कटे सरों की मीनारें बनाने वाला बाबर रात को जब अपने पुरुष-मित्र (मर्द आशिक़) बाबरी के साथ रूमानी पल बिताने जाता था तब ना जाने कितने फ़रिश्ते आसमान में आंसू बहाते होंगे! पैगम्बरों का नाजुक दिल भी इस्लाम के इस जवाल पर दो लख्त हो जाता होगा।

बात चल ही निकली है तो बताते चलें, बाबरी 14 साल का एक लड़का था।जिसकी मर्दानगी ने बाबर के कली समान कोमल दिल को खिला कर फूल बना दिया था।

दिक्कत थी तो बस ये कि जब यह कोमल कली अफीम और गाँजे के कुछ दम लगा लेती थी तो फिर ये अंगारा बन जाती। आस पास के बच्चों के लिए उसकी ये हालत दर्दनाक रात लेकर आती थी। बच्चों को देख कर इस लौण्डेबाज की हवस बेकाबू हो जाती थी और फिर किसी मासूम की जिंदगी खराब करके ही ठण्डी होती थी।

हैरानगी इस बात की है कि जिस आदमी को शरीयत की रूह से संगसार (पत्थरों से कुचल कर मारना) कर देना चाहिए था, उसको सदियों हिंदुस्तानी मुसलमानों ने अपना वली (हीरो) बनाए रखा।

जिनको इस बात यकीन नहीं, अल्लाह का नाम लें और चलें सच की खोज में! आओ देखें कि खुद बाबर अपने बाबरनामा में अपनी कैसी तारीफ़ लिखता है। इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद इस लिंक से देखा जा सकता है http://www.archive.org/details/baburnama017152mbp

बाबर – एक समलैंगिक लौंडेबाज और अफीमची

बाबर की खुद की लिखी बाबरनामा का हर पन्ना उसकी लौंडेबाजी और उसकी ऐय्याशी का नमूना है। इस पर भी अगर किसी को बाबरी मस्जिद वापस चाहिए तो पहले साफ़ करें, क्या इस्लाम की नजर में समलैंगिकता और लौंडेबाजी जायज है? अगर नहीं तो एक लौण्डेबाज के साथी के नाम पर बनी किसी चारदीवारी का नाम मस्जिद कैसे हुआ?

1. पेज 120-121, बाबर लिखता है कि उसकी अपनी बीवी में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसके दिलो दिमाग पर तो बस 14 साल का चिकना लड़का बाबरी ही छाया था। वो लिखता है कि उसने किसी से टूट कर ऐसी मुहब्बत नहीं की जैसी बाबरी के साथ किया। उसने लौंडे बाबरी हुस्न की शान में शायरी भी फ़रमाई। गौर कीजिये

करते हो बेइज्जत तुम मुझ अकेले आशिक़ को
हाय बेदर्दी सैंयां होगा मुझ सा आशिक भी कहीं?

2. वो आगे लिखता है कि जब जब बाबरी उसके करीब आता था तब तब उत्तेजना के दौर ऐसे बढ़ते थे कि मुँह से आवाज भी नहीं निकलती थी! उस पर अफीम के दम ऐसे कि लौण्डे आशिक़ बाबरी को रंगीन रात के लिए शुक्रिया भी नहीं दे पता था!

3. वो आगे लिखता है – एक बार यार दोस्तों के साथ घूमते घूमते लौंडा बाबरी अचानक सामने आ गया। ऐसा समां बंधा कि जबान हलक में अटक गयी। खून के ऐसे दौर बहे कि आँख में आँख डालने की हिम्मत ना हुई! ऊपर-नीचे बस नमी और गीलापन । और उस पल एकदम एक शेर छूटा

नम कर जाता है तू अपनी निगाहों से ऐ आशिक़
निगाहें मुझ पर हैं सब और मेरी मगर हैं तुझ पर

खुलासा ये है कि बाबर और उसके हवसी भेड़िये दलबंदी करके कई बच्चों के बचपन से खेलते थे। उन्हीं मासूम बच्चों में से एक बाबरी था जिसके यौन-शोषण के नाम की मस्जिद बाबर ने बनवाई।

4. लौंडे बाबरी की चाहत इसकी खोपड़ी में इस तरह तारी थी कि उसकी याद में वो ऊद बिलाव की तरह कूदता था। नंगे सर, नंगे पैर, नंगे धड़ वो लौंडे बाबरी के ही सपने देखा करता था।

5. बाबरी की याद में वो लिखता है –

तेरी तमन्ना मुझे कहीं का ना छोड़ेगी
हाय आशिक़ों की यही तक़दीर क्यों है
ना दूर तुझे कर सकूँ ना पास तेरे आ सकूँ
कैसी ये हवस है या है मुहब्बत तेरी
पागल मुझे क्यों किया ऐ मेरे मर्द-महबूब

क. इन शेरों के लफ्ज़ लफ्ज़ बाबर की हवस, लौंडेबाजी, बच्चों के लिए उसके घिनौने इरादों की कहानी बयां करते हैं। क्या बच्चे, क्या बड़े, क्या मर्द क्या औरत! इस नामर्द नीच से कोई नहीं बचा। किसी भी इस्लामिक मुल्क में इन सब कारनामों के लिए बोटी बोटी काटने की सजा के दावे किये जाते हैं।

सबसे बड़ा लतीफ़ा ये है कि जो इस्लामिक स्टेट हिंदुस्तान से बाबरी मस्जिद का बदला लेगा वही इराक में लोगों को छतों से फेंक रहा है क्योंकि वो समलैंगिक हैं!

ख. बाबरी मस्जिद कोई मस्जिद थी ही नहीं। वो हुस्न, हवस और हरामखोरी की एक मण्डी थी जिसने बच्चों, औरतों, मानवता और इस्लाम सबको शर्मसार किया। नेक थे वो बन्दे जिन्होंने इसे नेस्तोनाबूत किया और इंसानियत का परचम फिर से बुलन्द किया।

ग. जिसे अभी भी बाबरी मस्जिद का गम है, वो जवाब दे, क्या इस्लाम किसी लौंडेबाज के नाम में बनाई गई इमारत को मस्जिद मान सकता है? अगर कोई कहे कि जो कुछ भी हो, बाबर था तो मुसलमान, फिर ऐसा कौन है जो मुसलमान नहीं है? बच्चों के साथ घिनौने काम करने वाला, औरतों पर जबर करने वाला, गैर मुसलमानों के गले काटकर उनके सिरों की मीनारें बनाने वाला सूवर अगर मुसलमान है तो ऐसा इस्लाम हमें क़ुबूल नहीं। अयोध्या में नहीं। हिन्दुस्तान में नहीं। दुनिया में कहीं नहीं।

घ. अगर इस्लाम अमन शान्ति का मजहब है तो मुसलमानों को फ़ौरन ही ऐसे दहशतगर्द गुंडों से अपना पीछा छुड़ाना होगा। अब दोगली बात नहीं चलेंगी। बाबर अगर आपका है तो हिंदुस्तान आपका नहीं है। बाबर अगर आपका नहीं है तो, बाबर अगर इस्लाम का नहीं है तो उसकी निशानी पर आँसू बहाने का सिलसिला अब बंद होना पड़ेगा। सीधी बात – या तो रगों में राम, कृष्ण, प्रताप, शिवाजी, गुरु गोबिंद का खून है, या फिर बाबर का। और बाबर का खून अगर उबाल मारेगा तो ठंडा कर दिया जाएगा।

च. मुसलमान दोस्तों को सड़क पर आना होगा। कमलेश तिवारी की मौत माँगने नहीं बल्कि खुद को बाबर से अलग करने के लिए। इस लौंडेबाज का नाम इतिहास की किताबों में खूनी के तौर पर लिखवाने के लिए। इसका नाम इस्लाम से अलग करवाने के लिए। इसकी बनाई गयी लौंडेबाजी की निशानी को मसजिद कहने पर रोक लगवाने के लिए। इसके तोड़े हुए राम मंदिर को फिर से बनवाने के लिए। इसमें और देरी ठीक नहीं। जिस तरह मुम्बई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल्स का नाम अजमल कसाब टर्मिनल्स नहीं हो सकता उसी तरह राम जन्मभूमि पर, हिंदुस्तान में कहीं भी बाबर के नाम की मस्जिद नहीं हो सकती।

छ. मुसलमानों को अपने हाथों से इस दहशतगर्द लौण्डेबाज की बची खुची निशानी तोड़नी चाहिए। और फिर राम जन्मभूमि मंदिर के नींव का पत्थर खुद ही रखना चाहिए।

ज. 6 दिसंबर को राम भक्तों के साथ मिलकर शौर्य दिवस या यौम ए फख्र मनाना चाहिए। क्योंकि इसी दिन रामलला के भक्तों ने इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन की निशानी को जमींदोज़ किया था। साथ ही, हिन्दू भगवान् राम के जनम स्थान पर दोबारा इंसानियत का परचम फैलाया, इस वजह से इस दिन को सांप्रदायिक सौहार्द दिवस या यौम ए भाईचारा मनाना चाहिए।

अगले कदम

1. अब बारी मथुरा और काशी की होनी चाहिए। जितनी भी मस्जिद मंदिरों को तोड़ कर बनाई गयी हैं, उन सबको हिन्दू-मुसलमान साथ मिलकर जमीन में दफ़न करें। हर एक वो जगह जो दूसरे के मंदिर तोड़ कर बनाई गयी है, उसे इस्लाम के शांतिप्रिय सिद्धांत के उलट होने की वजह से गैर इस्लामिक करार दिया जाए और फिर ख़तम किया जाए।

2. अब वक़्त आ गया है कि अयोध्या मुद्दे को सदा सदा के लिए बंद कर दिया जाए। मसला ये नहीं कि किसके कितने मानने वाले हैं। सवाल तो अब इस बात पर होना है कि बच्चों से बलात्कार करने वाले दरिंदे की निशानी सरकारी खर्चे पर नेस्तोनाबूत क्यों नहीं हुई? हिंदू भगवान् राम और इस्लाम दोनों के अपमान को इतने वक़्त क्यों बर्दाश्त किया गया?

इस्लाम और हिंदू दोनों धर्मों की रक्षा करने के लिए अग्निवीर 1992 के रामभक्तों का शुक्रगुजार है। उम्मीद है कि अग्निवीर के इस खुलासे के बाद सब हिंदू, मुसलमान और कोर्ट मिलकर एक भव्य राम मंदिर का निर्माण करेंगे।

जय श्री राम!

Original post in English is available here.

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