इस श्रृंखला में  प्रकाशित अब तक के लेखों में हम आक्रमणकारी आर्यों के भारतवर्ष में आकर यहाँ के आदि निवासियों को पराजित कर दास बना उनसे नीचा काम करवाने की मनघडंत कहानियों द्वारा गुमराह करने का षड़यंत्र देख चुके हैं | इसके विपरीत हम वेदों में श्रम का सर्वोच्च महत्त्व पाते हैं | हमने देखा कि आर्यों के चाकर या आदि निवासी समझे गए दास दस्यु या राक्षस वस्तुतः अपराधियों के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पर्यायवाची शब्द हैं | प्रत्येक सभ्य समाज ऐसे अपराधियों पर अंकुश लगाता है |
हम यह भी देख चुके हैं कि वेदों में सभी चार वर्णों को जिनमें शूद्र भी शामिल हैं, आर्य माना गया है और अत्यंत सम्मान दिया गया है | यह हमारा दुर्भाग्य है कि वेदों की इन मौलिक शिक्षाओं को हमने विस्मृत कर दिया है, जो कि हमारी संस्कृति की आधारशिला हैं | और जन्म-आधारित जाति व्यवस्था को मानने तथा कतिपय शूद्र समझी जाने वाली जातियों में जन्में व्यक्तियों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार आदि  करने की गलत अवधारणाओं में हम फँस गए हैं |
कम्युनिस्ट और पूर्वाग्रह ग्रस्त भारतीय चिंतकों की भ्रामक कपोल कल्पनाओं ने पहले ही समाज में अलगाव के बीज बो कर अत्यंत क्षति पहुंचाई है | अभाग्यवश दलित कहे जाने वाले लोग खुद को समाज की मुख्य धारा से कटा हुआ महसूस करते हैं, फलतः हम समृद्ध और सुरक्षित सामाजिक संगठन में नाकाम रहे हैं | इस का केवल मात्र समाधान यही है कि हमें अपने मूल, वेदों की ओर लौटना होगा और हमारी पारस्परिक (एक-दूसरे के प्रति) समझ को पुनः स्थापित करना होगा | इस लेख में हम वेदों में जाति व्यवस्था की वास्तविकता और शूद्र के यथार्थ अर्थ का आकलन करेंगे |
१. जैसे कि हम पहले लेख “vedas and shudra” में चर्चा कर चुके हैं  कि  वेदों में मूलतः ब्राहमण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र पुरुष या स्त्री के लिए कहीं कोई बैरभाव या भेदभाव का स्थान नहीं है |
२. जाति (caste) की अवधारणा यदि देखा जाए तो काफ़ी नई है | जाति (caste) के पर्याय के रूप में स्वीकार किया जा सके या अपनाया जा सके ऐसा एक भी शब्द वेदों में नहीं है | जाति (caste) के नाम पर साधारणतया स्वीकृत दो शब्द हैं — जाति और वर्ण | किन्तु सच यह है कि तीनों ही पूर्णतया भिन्न अर्थ रखते हैं |
जाति (caste) की अवधारणा यूरोपियन दिमाग की उपज है जिसका तनिक अंश भी वैदिक संस्कृति में नहीं  मिलता |
जाति – जाति का अर्थ है उद्भव के आधार पर किया गया वर्गीकरण | न्याय सूत्र यही कहता है “समानप्रसवात्मिका जाति:” अथवा जिनके जन्म का मूल स्त्रोत सामान हो (उत्पत्ति का प्रकार एक जैसा हो) वह एक जाति बनाते हैं | ऋषियों द्वारा प्राथमिक तौर पर जन्म-जातियों को चार स्थूल विभागों में बांटा गया है – उद्भिज(धरती में से उगने वाले जैसे पेड़, पौधे,लता आदि), अंडज(अंडे से निकलने वाले जैसे पक्षी, सरीसृप आदि), पिंडज (स्तनधारी- मनुष्य और पशु आदि), उष्मज (तापमान तथा परिवेशीय स्थितियों की अनुकूलता के योग से उत्त्पन्न होने वाले – जैसे सूक्ष्म जिवाणू वायरस, बैक्टेरिया आदि) |
हर जाति विशेष के प्राणियों में शारीरिक अंगों की समानता पाई जाती है | एक जन्म-जाति दूसरी जाति में कभी भी परिवर्तित नहीं हो सकती है और न ही भिन्न जातियां आपस में संतान उत्त्पन्न कर सकती हैं | अतः जाति ईश्वर निर्मित है |
जैसे विविध प्राणी हाथी, सिंह, खरगोश इत्यादि भिन्न-भिन्न जातियां हैं | इसी प्रकार संपूर्ण मानव समाज एक जाति है | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र किसी भी तरह भिन्न जातियां नहीं हो सकती हैं क्योंकि न तो उनमें परस्पर शारीरिक बनावट (इन्द्रियादी) का भेद है और न ही उनके जन्म स्त्रोत  में भिन्नता पाई जाती है |
बहुत समय बाद जाति शब्द का प्रयोग किसी भी प्रकार के वर्गीकरण के लिए प्रयुक्त होने लगा | और इसीलिए हम सामान्यतया विभिन्न समुदायों को ही अलग जाति कहने लगे | जबकि यह मात्र व्यवहार में सहूलियत के लिए हो सकता है | सनातन सत्य यह है कि सभी मनुष्य एक ही जाति हैं |
वर्ण – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए प्रयुक्त किया गया सही शब्द – वर्ण है – जाति नहीं | सिर्फ यह चारों ही नहीं बल्कि आर्य और दस्यु भी वर्ण कहे गए हैं | वर्ण का मतलब है जिसे वरण किया जाए (चुना जाए) | अतः जाति ईश्वर प्रदत्त है जबकि वर्ण अपनी रूचि से अपनाया जाता है | जिन्होंने आर्यत्व को  अपनाया वे आर्य वर्ण कहलाए और जिन लोगों ने दस्यु कर्म को स्वीकारा वे दस्यु वर्ण कहलाए | इसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण कहे जाते हैं | इसी कारण वैदिक धर्म  ‘वर्णाश्रम धर्म’ कहलाता है | वर्ण शब्द का तात्पर्य ही यह है कि वह चयन की पूर्ण स्वतंत्रता व गुणवत्ता पर आधारित है |

३. बौद्धिक कार्यों में संलग्न व्यक्तियों ने ब्राहमण वर्ण को अपनाया है | समाज में रक्षा कार्य व  युद्धशास्त्र में रूचि योग्यता रखने वाले क्षत्रिय वर्ण के हैं |  व्यापार-वाणिज्य और पशु-पालन आदि का कार्य करने वाले वैश्य तथा जिन्होंने इतर सहयोगात्मक कार्यों का चयन किया है वे शूद्र वर्ण कहलाते हैं | ये मात्र आजीविका के लिए अपनाये जाने वाले व्यवसायों को दर्शाते हैं, इनका जाति या जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है |

४. वर्णों को जन्म आधारित बताने के लिए ब्राह्मण का जन्म ईश्वर के मुख से हुआ, क्षत्रिय ईश्वर की भुजाओं से जन्में, वैश्य जंघा से तथा शूद्र ईश्वर के पैरों से उत्पन्न हुए यह सिद्ध करने के लिए पुरुष सूक्त के मंत्र प्रस्तुत किये जाते हैं | इस से बड़ा छल नहीं हो सकता, क्योंकि –

(a) वेद ईश्वर को निराकार और अपरिवर्तनीय वर्णित करते हैं | जब परमात्मा निराकार है तो इतने महाकाय व्यक्ति का आकार कैसे ले सकता है ? (देखें यजुर्वेद ४०.८)

(b) यदि इसे सच मान भी लें तो इससे वेदों के कर्म सिद्धांत की अवमानना होती है | जिसके अनुसार शूद्र परिवार का व्यक्ति भी अपने कर्मों से अगला जन्म किसी राजपरिवार में पा सकता है | परन्तु यदि शूद्रों को पैरों से जन्मा माना जाए तो वही शूद्र पुनः ईश्वर के हाथों से कैसे उत्त्पन्न होगा?
(c) आत्मा अजन्मा है और समय से बद्ध नहीं (नित्य है) इसलिए आत्मा का कोई वर्ण नहीं होता | यह तो आत्मा द्वारा मनुष्य शरीर धारण किये जाने पर ही वर्ण चुनने का अवसर मिलता है | तो क्या वर्ण ईश्वर के शरीर के किसी हिस्से से आता है? आत्मा कभी ईश्वर के शरीर से जन्म तो लेता नहीं तो क्या ऐसा कहा जा सकता है कि आत्मा का शरीर ईश्वर के शरीर के हिस्सों से बनाया गया? किन्तु वेदों की साक्षी से प्रकृति भी शाश्वत है और कुछ अणु पुनः विभिन्न मानव शरीरों में प्रवाहित होते हैं | अतः यदि परमात्मा सशरीर मान ही लें तो भी यह असंभव है किसी भी व्यक्ति के लिए की वह परमात्मा के शरीर से जन्म ले |
(d) जिस पुरुष सूक्त का हवाला दिया जाता है वह यजुर्वेद के ३१ वें अध्याय में है साथ ही कुछ भेद से ऋग्वेद और अथर्ववेद में भी उपस्थित है | यजुर्वेद में यह ३१ वें अध्याय का ११ वां मंत्र है | इसका वास्तविक अर्थ जानने के लिए  इससे पहले मंत्र ३१.१० पर गौर करना जरूरी है | वहां सवाल पूछा गया है – मुख कौन है?, हाथ कौन है?, जंघा कौन है? और पाँव कौन है? तुरंत बाद का मंत्र जवाब देता है – ब्राहमण मुख है, क्षत्रिय हाथ हैं, वैश्य जंघा हैं तथा शूद्र पैर हैं |
यह ध्यान रखें की मंत्र यह नहीं कहता की ब्राह्मण मुख से “जन्म लेता” है … मंत्र यह कह रहा है की ब्राह्मण ही मुख है | क्योंकि अगर मंत्र में “जन्म लेता” यह भाव अभिप्रेत होता तो “मुख कौन है?” इत्यादि प्रश्नों का उत्तर देने की आवश्यकता ही नहीं थी |
उदाहरणतः यह पूछा जाए, “दशरथ कौन हैं?” और जवाब मिले “राम ने दशरथ से जन्म लिया”, तो यह निरर्थक जवाब है |
इसका सत्य अर्थ है – समाज में ब्राह्मण या बुद्धिजीवी लोग समाज का मस्तिष्क, सिर या मुख बनाते हैं जो सोचने का और बोलने का काम करे | बाहुओं के तुल्य रक्षा करने वाले क्षत्रिय हैं, वैश्य या उत्पादक और व्यापारीगण जंघा के सामान हैं जो समाज में सहयोग और पोषण प्रदान करते हैं  (ध्यान दें ऊरू अस्थि या फिमर हड्डी शरीर में रक्तकोशिकाओं का निर्माण करती हैं और सबसे सुदृढ़ हड्डी होती है ) | अथर्ववेद में ऊरू या जंघा के स्थान पर ‘मध्य’ शब्द का प्रयोग हुआ है | जो शरीर के मध्य भाग और उदर का द्योतक है | जिस तरह पैर शरीर के आधार हैं जिन पर शरीर टिक सके और दौड़ सके उसी तरह शूद्र या श्रमिक बल समाज को आधार देकर गति प्रदान करते हैं |
इससे अगले मंत्र इस शरीर के अन्य भागों जैसे मन, आंखें इत्यादि का वर्णन करते हैं | पुरुष सूक्त में मानव समाज की उत्पत्ति और संतुलित समाज के लिए आवश्यक मूल तत्वों का वर्णन है |
यह अत्यंत खेदजनक है कि सामाजिक रचना के इतने अप्रतिम अलंकारिक वर्णन का गलत अर्थ लगाकर वैदिक परिपाटी से सर्वथा विरुद्ध विकृत स्वरुप में प्रस्तुत किया गया है |
ब्राह्मण ग्रंथ, मनुस्मृति, महाभारत, रामायण और भागवत में भी कहीं परमात्मा ने ब्राह्मणों को अपने मुख से मांस नोंचकर पैदा किया और क्षत्रियों को हाथ के मांस से इत्यादि ऊलजूलूल कल्पना  नहीं पाई जाती है |
५. जैसा कि आधुनिक युग में विद्वान और विशेषज्ञ सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक होने के कारण हम से सम्मान पाते हैं इसीलिए यह सीधी सी बात है कि क्यों ब्राह्मणों को वेदों में उच्च सम्मान दिया गया है | अपने पूर्व लेखों में हम देख चुके हैं कि वेदों में श्रम का भी समान रूप से महत्वपूर्ण स्थान है | अतः किसी प्रकार के (वर्ण व्यवस्था में) भेदभाव के तत्वों की गुंजाइश नहीं है |६. वैदिक संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति जन्मतः शूद्र ही माना जाता है | उसके द्वारा प्राप्त शिक्षा के आधार पर ही ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य वर्ण निर्धारित किया जाता है | शिक्षा पूर्ण करके योग्य बनने को दूसरा जन्म माना जाता है | ये तीनों वर्ण ‘द्विज’ कहलाते हैं क्योंकि इनका दूसरा जन्म (विद्या जन्म) होता है | किसी भी कारणवश अशिक्षित रहे मनुष्य शूद्र ही रहते हुए अन्य वर्णों के सहयोगात्मक कार्यों को अपनाकर समाज का हिस्सा बने रहते हैं |
७. यदि ब्राह्मण का पुत्र विद्या प्राप्ति में असफल रह जाए तो शूद्र बन जाता है | इसी तरह शूद्र या दस्यु का पुत्र भी विद्या प्राप्ति के उपरांत ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण को प्राप्त कर सकता है |यह सम्पूर्ण व्यवस्था विशुद्ध रूप से गुणवत्ता पर आधारित है | जिस प्रकार शिक्षा पूरी करने के बाद आज उपाधियाँ दी जाती हैं उसी प्रकार वैदिक व्यवस्था में यज्ञोपवीत दिया जाता था | प्रत्येक वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्यकर्म का पालन व निर्वहन न करने पर यज्ञोपवीत वापस लेने का भी प्रावधान था |८. वैदिक इतिहास में वर्ण परिवर्तन के अनेक प्रमाण उपस्थित हैं, जैसे –
(a) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की | ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है |
(b) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये |ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन  किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)
(c) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए  |
(d) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४)
अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए?
(e) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३)
(f) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(g) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(h) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |
(i) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |
(j) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)
(k) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं |
(l) मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |
(m) ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना |
(n) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |
(o) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |
(p) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |
(q) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया |

९. वेदों में ‘शूद्र’ शब्द लगभग बीस बार आया है | कहीं भी उसका अपमानजनक अर्थों में प्रयोग नहीं हुआ है | और वेदों में किसी भी स्थान पर शूद्र के जन्म से अछूत होने ,उन्हें वेदाध्ययन से वंचित रखने, अन्य वर्णों से उनका दर्जा कम होने या उन्हें यज्ञादि से अलग रखने का उल्लेख नहीं है |

१०. वेदों में अति परिश्रमी कठिन कार्य करने वाले को शूद्र कहा है (“तपसे शूद्रम”-यजु .३०.५), और इसीलिए पुरुष सूक्त शूद्र को सम्पूर्ण मानव समाज का आधार स्तंभ कहता है |
११. चार वर्णों से अभिप्राय यही है कि मनुष्य द्वारा चार प्रकार के कर्मों को रूचि पूर्वक अपनाया जाना | वेदों के अनुसार एक ही व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों में चारों वर्णों के गुणों को प्रदर्शित करता है | अतः प्रत्येक व्यक्ति चारों वर्णों से युक्त है | तथापि हमने अपनी सुविधा के लिए मनुष्य के प्रधान व्यवसाय को वर्ण शब्द से सूचित किया है |
अतः वैदिक ज्ञान के अनुसार सभी मनुष्यों को चारों वर्णों के गुणों को धारण करने का पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए | यही पुरुष सूक्त का मूल तत्व है | वेद के वशिष्ठ, विश्वामित्र, अंगीरा, गौतम, वामदेव और कण्व आदि ऋषि चारों वर्णों के गुणों को प्रदर्शित करते हैं | यह सभी ऋषि वेद मंत्रों के द्रष्टा थे (वेद मंत्रों के अर्थ का प्रकाश किया) दस्युओं के संहारक थे | इन्होंने शारीरिक श्रम भी किया तथा हम इन्हें समाज के हितार्थ अर्थ व्यवस्था का प्रबंधन करते हुए भी पाते हैं | हमें भी इनका अनुकरण करना चाहिए |
सार रूप में, वैदिक समाज मानव मात्र को एक ही जाति, एक ही नस्ल मानता है | वैदिक समाज में श्रम का गौरव पूर्ण स्थान है और प्रत्येक व्यक्ति अपनी रूचि से वर्ण चुनने का समान अवसर पाता है | किसी भी किस्म के जन्म आधारित भेद मूलक तत्व वेदों में नहीं मिलते |
अतः हम भी समाज में व्याप्त जन्म आधारित भेदभाव को ठुकरा कर, एक दूसरे को भाई-बहन के रूप में स्वीकारें और अखंड समाज की रचना करें |
हमें गुमराह करने के लिए वेदों में जातिवाद के आधारहीन दावे करनेवालों की मंशा को हम सफल न होने दें और समाज के अपराधी बनाम दस्युदासराक्षसों का भी सफ़ाया कर दें |
हम सभी वेदों की छत्र-छाया में एक परिवार की तरह आएं और मानवता को बल प्रदान करें |
वेदों में कोई जाति व्यवस्था नहीं है |
अनुवादक – सुश्री मृदुला

This article is also available in English at http://agniveer.com/888/caste-system/

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45 COMMENTS

  1. Great Article. Religion never teach us to hurt to anyone. It means religion count every human is equal no-one is lower or upper based on birth or work.

    Thank you Agniveer. You are doing great work. I will pray God always be with you in this work.

  2. Namste ji

    mera nam Dilip Sharma hai mein yeh janna chahta hu ki jaatviwad khatam karne ka koi upay hai kya aapke pass
    waise mein bhi ek OBC caste se hu magar mein jatiwad par bilkul vishwas nahi karta

    • adarniy dilip ji shambhavt: aap vishvkarma honge
      kuch vishv karma llog sharma likh liya karte hai vaise sharma, singh, gupta adi bahut se log likh lete hai fir bhi koi bhi janmana jati suchak bodh ka istemal mat kariye
      apni mata ji pita ji ya janm sthan gram nagar adi athva koi gunvachak nam apene naam ke saath joda ja sakta hai !
      apne vikhyat purvaj bhi apne naam ke saath koi janmana jati suchak “tamanaga “nahi lagaya karte the !
      jaise aj dilip raghu dashrath, lakshaman bahrat shatrughn, kaikeyi manthara sulochna raavan meghnath kumbhkaran vibhishan surpnakha janki janak sita sushila parashuram dhritrashtr duryodhan shakni, sushsan bhim arjun yudhishthir, nakul sahadev balram abhimanyu kunti yashoda rukmani subhadra lakshmi baai surdas tulsi das kabir das hariyana ke devi lala bhajanlal vanshi lala adi !

  3. Satyam ji vidvanose bolte ho kripya ye bataye. Dronacharya ko bramhan kahe. Ya kshatriya .vishavamitra ko bramhan kahe ya kshatriya .
    Gita me charo varno k lakshan diye hai yadi vo llakshan janmaja bramhan me nahi to use kya kahe.kshatat trayte kil kshatriya arthat kshan me kashton se mukti dene vala kshatriya .ye gun kisi janmaja kshatriya me na ho to.?
    Apke Mat nusar koi krur karmi. Rakshas hota hai to yadi. Janma se bramhan vyakti krur karmi ho to vah bramhan hai ya rakshas ?
    Jati apka prakritik adhikar hai aur Apke purva karmose mila hai to janmaja jatiya pathabhrashta kyon hoti hai.Gita me bhagwan ne kaha hai is janma ka sakrut agle janm me continuous hota hai to uchi jatiyonme janm lekar pathabhrashta hote hai.
    Jati ka vyart abhiman nakaro .ucha kam karo .
    Bhagwan kisi varno vishesh ke nahi hai .Jo unko bhajta hai unko milte hai .

  4. Puran,smrtiyan aur tathakathit swarno ke dimag me jatiwad koot-2 kar bhara hai.ved Maine nahi padhe hain parantu itna janta hoon ki swarthsidhi hetu Hindu swarna awshyaktanusar shabdon ka arth apne swarthsiddhi hetu Pryog karke girgit ki tarah vatawaran bana lene mein perfect hain.ghrna ke beej samaj mein bote aye hain .
    bachpan me hi jatiwadi shreshtta ka jhoota bhramit ahnkar apni agli peedhi KO sikha dete hain,jabki vastavikta KO ve bhi jante hain ki janm se koi uncha neecha nahi hota, phir bhi swarthlolupta aur Sajish ke tahat Awshykta roop we ghrna phailane ka koi mauka nahi chhodte, chahe shiksha,nyay,rojgar ya Samaj ka koi bhi xhetra ho,Kahin bhi dekho aaj ikkiswi sadi mein bhi ye tathakathit dwij duniya mein jhahn bhi jate hain wahin daliton ke sath doyam darje ka vyvhar karne se nahin chookte .tathakathit swarna buddhijivi sarvjanik manchon par dalit atyachaar par ghadiyali ansoo bahakar tariff batorte hain .lekin saccha prayas kabhi nahin karte.Jab inhe dharma sankat deekhta hai to ye daliton KO Hindu bhai batane ka dhakosla karne lagte hain .lekin aaj bhi dalit samaj sabse Soft targetDalit hamesha janwar samjha gaya hai “Dhol ganwar shudra aur nari ye sab tadan ke adhikari” ka bhi accha sa anuwd bata dijiye Kya yah hindu samaj ki disha nirdhatit nahin karta hai,kya dwij nari bhi doyam nahin mani jati thi kya unhe sex slave tak nahi simit kya gaya tha. kya dalit stri purushon par badhte atyachar balatkar iske pratyaksh praman nahin hain , kyon aaj bhi inko chun chun kar target banaya jata hai? Sirf daliton ka manobal swabhiman atmwishvas rondne ke liye ya aajbhi inhe janwar hi mana jata hai.kitni dalit betiyon ke sath roj rape murder hote hain parantu virodh me media ya Delhi aur pure desh mein kitne virodh pradarshan hote hain. Sansad mein charcha kyo nahi hoti MP bahishkar kyon nahi karte ?
    Yadi imandari se aap jatiwad mitana chahate to jaatiwad kab ka khatm ho gaya hota parantu jab tak apne dimag se jaatiwad ki gandgi nahi nikaloge bharat ka uddhar nahi

  5. AAP KE SARE Q. KA JAWAB HAI MERE PASS AAP KEWAL ITNA BATA DE KI JATI KI VYAWASTHA KAB SE LAGOO HUI AGAR NAHI MALOOM HAI .. RAJA BHOJ KE KAAL SE LAGU HUI..GITA KO THIK SE PATHIYE..BHAVISHYA PURAN KO THIK SE PATHIYE…..RAHI BAAT JATI KI TO MAI EK UDAHARN DETA HU.

    KUTTE PAR..JINKA HEAD KEWAL PARIVARTIT HAI JAISE..1- DESHI KUTTA 2- LEBRADOR.. 3. PAMOLIAN..ETC HAI TO SAB EK HI JATI KE LEKIN ANTAR KITNA HAI. SHAYAD AAP KO ABSAMJHANE KI JARURAT NAHI PAREGI..WASE ..GUN KEWAL TIN PRAKAR KE HOTE HAI .1- SATO GUN. 2. RAJOGUN 3. TAMOGUN.. KEWAL DO JATI THI MANUSHYA AUR RAKSHAS..KOI YONI NAHI HAI RAKSHAS KEWAL GUN KE ADHAR PAR PARIVARTAN HUA HAI.

    • adarniy dilip ji, ap bhi to yahi svikar kar rhe hai ki raja bhoj ke bad jati bani , iske pahale jaati kyo nahi thi? raja bhoj ne bhi singh, bhadauriya, chauhaan adi nahi likha. dekhe parchinkaal me naam kaise hote the — aj, dilip, raghu,dashrath, lakshaman bharat,shtrughn, kaikeyi sulochna raavan vibhishan meghnaath, kumbhkarn, sugriv janak sita balraam yudhishthirm bheem arjun duryodhan, dhrtrashtr, kunti, karn bhishm abhimanyu shakun, vidhur jhansi ki rani lkshami baai,sur daas tulsi daas, meera baai , shakntla hariyana ke devilaal bhajanlaal vanshilaal bhutprv pradhanmantri chandr shekhara adi batlaiyebkya inke naamke saathjanmana jativachak chinho ke “darshan” bhi hote hai ? fir aapbhiapne naam ke saath “tiwari ” kyo lagaana pasand karte hai ?

    • तिवारी सबसे पहले तो आपको जाती व्यवस्था और वर्णव्यवस्था मैं अंतर समझना पड़ेगा क्या है कुछ दस्यो लोगो की चाल के कारन ये स्थिति पैदा हो गयी थी जिनोहोने बड़ी चालाकी से वर्णव्यवस्था को जातिव्यवस्था के साथ जोड़ दिया और ये सब उन्होंने भारतीय सभ्यता समाज को तोड़ने के लिए किया . और आज हम सब उनकी चाल मैं फंस चुके और अपनी सोच को हम अपनी प्राक्रतिक व्यवस्था से नहीं जोड़ पाते . सनातन धर्म का ज्ञान पड़ने से नहीं होता की आप ने वेद पड़ लय ग्रन्थ पड़ तो आप ज्ञानी हो गए इसको समझने के आध्यत्मिक ज्ञान होना जरुरी है तत्त्वों को शब्द की शक्ति को जानना जरुरी हे हमारे यहाँ किसी शब्द की परिभाषा बनायीं नहीं जाती बल्कि परिभाषित है परन्तु आज सब वेदों को ग्रंथो को अपने शब्दों मैं परिभाषित कर रहे हैं ……. पूर्ण भारतीय व्यवस्था का ज्ञान जानने के इच्छुक है तो संपर्क कर सकते मेरा लक्ष्य भारतीय संस्कृति मैं जो भटकाव आ गया वो दूर करना क्योकि की भारतीय है जो अपने संस्कृति पर ऊँगली उठाता और विधार्मो मैं ये दिखाई नहीं देता .. विधर्म से अर्थ है जेन , बोध , मुस्लिम , यहूदी , इसाई आदि ….

      • aap age badh k ar samne kyo nahi ate hai ?
        apaka vishesh paricha kya hai
        aapne abtak kya kya kaam kiye hai !
        vah bhi saath me batlaiye

      • आप सब मुझसे फेसबुक के जरिये जुड़ सकते हैं …
        पृथ्वी भूतत्त्व प्रधान पंचीकृत भूत है। इस पृथ्वी में आकाश तत्त्व प्रधान भूखंड भारतवर्ष है। इसके वायव्य कोण का भूखंड याने वर्तमान यूरोप वायुतत्त्व प्रधान भूखंड है, आग्नेय कोणीय भूखंड वर्तमान एशिया अग्नि तत्त्व प्रधान, नैऋत्य कोणीय भूखंड याने आस्ट्रलिया-अमेरिका ये जल तत्त्व प्रधान और पाताल वाला भूखंड याने वर्तमान अफ्रिका पृथ्वी तत्त्व प्रधान भूखंड ह®। इस भारतवर्ष का केन्द्रीय भाग ब्रह्मखंड है इसे ही इन्दुद्वीप कहा जाता है। इसका दक्षिण का भाग ईशान खंड और उत्तर का ब्रह्मखंड कहा जाता है। इसके चारों ओर जिसमें दक्षिण का भाग भी आता है आर्यावर्त कहा जाता है। इस प्रकार हमारी धरती पंच भूतों के अनुसार पांच भागों में विभक्त है।

        ये कुछ गुड रहस्य है जिनको पड़ कर समझा नहीं जा सकता इसके लिए भारतीय अध्यातम को गहराई से समझने की जरुरत होती हे i आज भी ऐसे महापुरुष आपको मिल जायेगे जो इसका पूर्ण ज्ञान हे …

      • aapneapni fes book se judne ka tarika to batlaya nahi hai ! sari dhati ek saaman lagti hai kuch khanij padarth alag alag sthano me jarur hote hai kahi sona hota hai kahi hire adi hote hai

  6. आपकी साइट मुझे बेहद पसन्द है क्योंकि यह वेद पर आधारित है । वेद ईश्वरीय वाणी है जो पूर्णत: वैज्ञानिक है । वेद में कहीं भी जन्मगत जाति व्यवस्था का विधान नहीं है । यह कर्म पर ही आधारित है ॥

  7. सभी दोस्तोंको सप्रेम प्रणामजी !!
    AgniVeer-को बहुत बहुत धन्यवाद। आपका कार्य बहुत सराहनीय है। थोडा बहुत धर्मग्रन्थोंको पढ्नेका मेरा सौभाग्य है। लेकिन मेरा विवेक हमेशा यही कहता है कि वर्ण व्यवस्था और जाति भेद दो अलग-अलग बातें हैं। और यहाँ आपके युक्तिपूर्ण बातोंको पढकर तो मेरी समझको शक्ति मिला।
    हमारे मनुष्य समाजको अपने विशुद्ध हिन्दू धर्म और धर्मग्रन्थोंके मौलिक “सर्वजन हीतार्थाय, सर्वजन सुखाय च”, “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया” आदि ज्ञानकी बातोंको सबमें सम्प्रसारित करना चाहिये।
    कुछ स्वार्थी लोगोंने आपसमें प्रेम, सदभावना, समुन्नतिको बढावा देनेके बजाय जातिभेदका कटू बीज बोकर समग्र हिन्दू धर्मको और वेदादि अति प्राचिनतम धर्मग्रन्थोंको विश्वमें निन्दाका विषय बनाया दिया है। इस बात पर मुझे बहुत दु:ख होता है।
    हम सबको मिलकर व्यवहारिक रूपसे इस जाति-भेदकी वेवेकहीन प्रथाका जडसे उन्मूलन करना चाहिये।
    मैने तो अपना धर्म (कर्तव्य) पालन करना शुरु कर दिया है। धन्यवाद !!

  8. Varana vayavastha to shuru se chali aa rahi hai. kakantar mein ise dekhen. Aaj ek doctor dentist, physician, TB specialist, surgeon, Neurosurgeon ityadi ek ke baad ek dotors ki
    zaat badalti jaa rahi hai. Caste system to sirf political milage gather karaney ka ek bahana hai.
    Politicians ya doosre dharma ke thekedaar is bharanti ko phaila rahe hain. Aur khas taur se Amaerca aur european jab ke un mein itni jaat paat hai jo chhotey chhotey kabilon mein ya deshon me bati hui hai. Is vishya ko kewal samjhanae ke liye hi badhava de to acchcha hai.
    Pandit Vats. California.

  9. JAI shree RAM.
    bahut acha karye kar rahe hain aap log
    Hindu dharm ke bare main FB per jankari share karte rahiye
    mujhe aap ko ya aap ki sanstha ko join karna hain………………….

    dhanyawad

  10. sathyaerth parkesh me to dharm ,jatti ,varan., yahan tak ki naam ka bhi bhadbhav likha h . yahan tak ki ma bhi apne bachhe ko 6 din se jayada doodh na pilaye .ap arye samaj ki bhante ki karte h kuch samajh me nahi aya. Jagjit singh rohilla

    • Namaste Jagjit Singhji, Dharma mein kabhi bhi koi bhedbhav nahi hota hai. Dharma pehle se hai aur ant tak rahenga. Jati bhedbhav to svabhavik hai, hum manushyo mein nar aur nari jaati do vibhinna hoti hai! to kya yeah kaha jayenga ki isko bananewala racist hai? Evan Sajeevonmein bhi kai jaatiyan jaise ki ghoda, kutta, ghadha , bakri ityadi payi jati hai.Yeh Sab Jaati Bhed Hai. Varna Bhed bhi utna hi swabhavik hai. Ek reference dekh lo: Naanaanam vaa u no dhiyO vi vrataani janaanam | Taksha rishtam bhisak brahma sunvantamicchanthindrayendo pari srava || (Rig 9.112.1)

      (Naah dihyah) Our intellectual capacities, (naanaanam u) are indeed diverse and different, (vrataani) spiritual resolves and austeries too, (janaanaam) of the people, (vi) are various and divergent, (taksha) among us the carpenter, (icchati) likes to have, (rishtam) a saw, (bhisak) the doctor, (rutam) an ailing person and (brahmaa) the one well versed in Vedas, (sunvantam) a performer of a yajna, (indo) O Supreme moistener, (parisrava) shower thy mercy, (indraaya) for the sake of the soul endowed with perceptive faculties. Recognizing these natural differences, the Vedas describe four spheres of activities and provide each individual with the scope to develop himself or herself according to his/her choice.
      Each sphere of activity based on the solid ground of individual choice, is styled VARNA.
      The Varnas are 4 in number and they are termed
      1> Brahmana or Intellectual.
      2> Kshatriya or Martial.
      3> Vaishya or Commercial.
      4> Shudra or Manual.
      These varnas are not invariably based on birth; and as such , they cannot be equated with the present day castes which run into thousands. The Varnas are scientific and rational divisions of mankind, aimed at progress of the individual as well as of the society. Infact Third Chapter of Satyarth Prakash, Maharshi Dayanand Saraswatiji has quoted that every human regardless to his gender or varna is sactioned to study Vedas according to YajurVeda 26.2 “Yathemam Vancham KalyanimaVadani Janebhya:” = this…

      • YajurVeda 26.2 “Yathemam Vancham KalyanimaVadani Janebhya:” = this knowledge of Vedas is for welfare & benefits of every human.

  11. .
    बहुत अच्छा….धन्यवाद ! विचार क्रान्ति घर-घर फैलाए !
    .

  12. अग्निवीर जी, आपकी यह वेबसाइट मेरी पसंदीदा साइटों में से एक है। ऐसे ही कार्य करते रहें। मेरी ओर से आपको ढेर सारी शुभकामनाएं।

  13. Agniver ji Namaskar..Hum iska prachar aour prachar karna chate hai…aour aapka yah kadam sarahneey hai…but Printing & PDF format is not working…

  14. manniy shankar ji, geeta ke kiss slok se janmana jati vyvastha pratipadit hoti hai , jara yah bhi to batlaiye ?

    • पद्भ्याम् शूद्रो “अजायत्”।
      यजुर्वेद मेँ शूद्र को पैर से उत्पन्न कहा है।अजायत=पैदा हुआ।अधिक जानकारी हेतु सम्पर्क करेँ-8439341437

      • kya koi manushy pair se paida hota hai ? isliye vyakhya galat hai ! brahmanmukh ke samanhai kyoki nak jib kan tvach ankh dimag adinsabhi chehare me hai ! hath sharir ki raksha karte hai isliye inko samaj ki raksha karne cvale kshatriy kahagaya hai pet mebhojan jata hai aur va sare sharir ko urja dene me sahayak hai isliye pet ko vaishy kaha gaya hai ,pair sareshari ko uthaye huye hai shramsadhy hai isliyenisjko shudr kaha gaya hai koi chehare se hath se pet se pair se janm nahi liya karta hai! shudr kaunhai hai jo sabhi vargo ki shram ke madhyam se seva kary kare jaise aj ke samay me chaprasi majduraur shariri shram jo jyada karta ho ! vah duniya ke kisi bhi samuday ka vyakti kyo b housko shudr kaha jayega ! brahman kaun hai jo doctor, hai injiniyar hai afsar hai adi jo apna jyada kary buddhi yukt rup se karta hai usko brahman kaha jata hai sena pulis adi ko kshatriy kaha jayega jo vyapar karta haia vah vaishy kahalatya jayega !

    • गीता के चातुर्वण्यम् मया॰,सहजं कर्म कौन्तेय॰,स्वधर्ममपिचावेक्ष्य॰,वर्णसंकरनरकायैव आदि अनेकोँ जगह जाति व्यवस्था प्रतिपादित हुई है।
      जन्म होना ही कर्म का फल हैःगीता 6/42अतः पैदा करना ही भगवान का सृजन कार्य है। सृष्टं=सृजित किये।
      कैसे?गुणकर्मविभागशः=जीव के पूर्व गुणकर्मोँ के आधार पर।
      ज्यादा जानकारी के लिये गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित गीतातत्वविवेचनी पढेँ!
      अतः चातुर्वण्यं मया सृष्टम् का यही अर्थ सुसंगत है।
      स्वयं अर्जुन महाराज युद्ध रुपी क्षत्रिय कर्म नहीँ करना चाहते थे।शान्ति,समभाव जैसे ब्राह्मणीयता से युक्त गुण उनमेँ थे परन्तु उनको भी भगवान ने क्षत्रिय कर्म मेँ लगाया!
      जाति का विरोध वो करते हैँ जिनकी खुद जाति नहीँ होती।जाति हमारे पूर्वकर्मोँ का फल है। अतः जाति पर हमारा प्राकृतिकअधिकार है।मानवता हम अपनायेँ परन्तु वैदिक नियमोँ को कुचलने का हमेँ हक नहीँ।

      • साक्षात्कार हो जाए स्वयं बस इतना हि काफी है ईश्वर के शरण में जाने के लिए धन्यवाद।

    • कवष ऐलुश को जो दास्या पुत्रो कितवः कहा गया है वह दास्यापुत्रः निन्दार्थ मेँ है क्योँकि कितव =जुआरी होना निन्दित कर्म है। पाणिनि के व्याकरणानुसार दासी का पुत्र कहना निन्दार्थक होता है।
      अग्निवीर ने जो विष्णुपुराण का आश्रय लेकर जातिवयवसथा को गलत बताने का असफल प्रयास किया है वो वहीँ असफल हो चुकी थी जहाँ इसने पुराण पकडा। क्योँकि पुराण तो एक स्वर से जातिव्यवस्था बताते हैँ।क्या अग्निवीर पुराण के प्रमाण मानेगा तो मैँ उसे जातिगत पौराणिकप्रमाणोँ का प्रबल समुद्र दिखा सकता हूँ।अगर नहीँ मानना चाहता तो एकाक्षि और अर्द्धकुक्कुटी न्याय का सहारा न ले! ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य तथा शूद्र चारोँ का महत्त्व हैँ।
      एक शूद्र एक ब्राह्मण का आधार होता है। जो एक मानव पर अत्याचार करता है वो न ब्राहमण है, न क्षत्रिय, न वैश्य, न शूद्र अपितु वह राक्षस है।एक मछली सारा तालाब गंदा कर देती है।

      • puraan ka udaharanisliye diya hoga ki puraan me bhi janmana jati suchak tatva nahi aye honge ! vaise bahut se puraan janmana jati pati mante bhi honge ! brahman kshatriy vaishy shudradi janm se nahi apitu karm se hai isliye nam ke sath jati suchak chinho ka upyog nahi kiyajaye to jyada achha rahega ! apne purvaj pahale janmana jati suchak chinho ka upyog nahi kiya kartethe jaise aj dilip, dasharath , bharat shatrughan, lakshaman sita kaikeyi manthra raavan, vibhishan kumbhkarn meghnath mandodri supnakha sulochna kaushalya sumatra ! gandhari kunti karn yudhishthir bhim balram shakuni arjun duryodhan mira bai tulsidas kabeer das sur das shakuntla adi n jane kitne nam apne purvjo ke the jo janmana jati suchak chinho ka pryog nahi kartethe ! aj bhi sabhi manushyo koapni janmana jati suchak chinho ka parityag kar dena chahiye ek vyarth ka ahanakar kyo rakha jaye nam ke sath apne pita mata ka nam joda ja sakta hai janm sthan apna gyan [uplabdhi ] apne kary adi nam ke sath jode ja sakte hai vah jyada achhe rahenge koi nam ke sath jati suchak chinh dekhkarke ek mansikta nahi bana sakega !

      • साक्षात्कार हो जाए स्वयं बस इतना हि काफी है ईश्वर के शरण में जाने के लिए धन्यवाद।

  15. 40th chapter is Ishopanishad that is available in Downloads section of Agniveer site.

    The Aryasamaj Jamnagar site is not having full Yajurveda. You can order from vedicbooks.com

  16. Namaste Agniveer

    You have given in article reference of Yajurved 40th & 32nd Chapter’s Mantra. Where I can find this Mantra. I visited Aryasamaj JamNagar web site but there is only one book of Yajurved in which only 30 chaper contain. Please guide me. where i can find these mantra.

  17. mahamahim shri agniveer , sadar saprem namaste ! jaise apne yahan par hindi me apne vichar rakhe hai vaise hi angreji me likhit “sare vichar ” hindi bhasha me bhi dal dijiye sath me logo9 ki pesh ki hui “tippadi bhi hindi me dal dijiye jisse hindi bhashi bhi usko thik se samajh sake v usme bhi hindi bhashi shamil ho sake usse apka yah manch bhi jyada lok priy bhi ho jayega va anek log aur bhi is anch se jud sakenge ! ASHA HAI KI AP HAMARI BAT PAR “VISHESH DHYAN DENGE “H bhi angreji n janne ke karan us e bhag nahi le pate ! apko agar hamari BAT SE KASHT HUA HO TO USKE LIYE HAM ASANKHYBAR KSHAMa chahenge ! uttar ki asha me !

    • Namaste Raj Ji

      Yathasambhav hum hindi ke lekh anuvaad karaa kar daalte hi jaa rahe hain aur kuchh maheno mein achchhi khaasi sankhya mein bhi ho jaayenge. Comments ko hindi mein anuvaad karna sambhav nahi hai. Parantu aap jis lekh par chaahen wahaan apne hindi ke comments de sakte hain aur anya mitron se vichaar vinimay kar sakte hain.

      Aapke liye ek sujhaav hai. Aap apni tippaniyon ko devnaagri lipi mein bhi preshit kar sakte hain, vah padhne mein adhik anukool hoti hai. http://www.google.com/transliterate/ par jaa kar aap jo kuchh angrezi lipi mein likhenge wo devnaagri mein aataa jaayega.

      Aapke sujhaav ke liye bahut bahut dhanyawad

      • Sadar namaskaar….agniveer ji..mujhhe lagta hai aap rigved ke..dasve mandal..me upsthit..PURUSH SUKT ko samjhane me thodi galti kar rahe hai……….yaha yah dhyan dena chahiye..ki purush sukt me varnit purush ko akaal purush kaha gaya hai…aur vah kada..standing position..me hai na ki leta hua…aur na hi dhyan magna….manushyo ke sandarbh me vo akaal purush yaha…society ko aur economy ko dikhate hai…yah economy ek villege..se lekar ek desh aur pure vishva ki ho sakti hai…aur yah akaal purush universal truth hai…yah kisi bhi kaal me nahi badalta…..ab yaha gour kare akal purush ke khade rahne ke liye sabse aavasyak hai SHUDRA…Jiski sabse badi requirement hai..seva bhav ka hona…aaj ke parivesh me shudra= collector..engineer..doctor..babu..sweeper..aur social worker…. isi tarah vaishya..=business class…chatriya= pulish, army..etc…aur bramhan= policy maker, scientist..teacher etc….har yug me aur har samaj me har desh me aur har dharm me yaha tak ki har manav sabhyata me…ye char varn satya the,hai, aur rahenge,,,,,..ab purush shukt yah kabhi nahi kahta ki bramhan ka putra bramhan hoga..kyoki bramhan je liye jo tyag aur daya ki prathmikta hai..jarori nahi ki vidhata ne use bhi vi gun diye ho…isi tarah purush sukta yah kabhi nahi kahta ki chatriya ka putra,ya vaishya ka putra, ya shudra ka putra bhi usi varn se hoga jis varn se unka pita hai.,,nahi yah purush sukt kabhi nahi kahta…….AGAR AAP KISI BHI BADE SE BADE SADHU DHARMATMA SE PONCHE KI ISHWAR KE SAMAKCHH TUMHE KOUN SA STHAN CHAHIYE TO WO BINA CHHAN GAVAYE HI KAHEGA KI MUJHE ISHWAR KE CHARNO ME JAGAH CHAHIYE….Wah kabhi nahi kahta ki mujhe ishwar ke pet me..ya hath me,.,ya uske sar me jagah.,chahiye…..purush sukta me khade huye akaal purush ke pair se shudra ki utpatti ki tulna keval uski sabse jyada mahtta batane ke liye ki gayi hai…jaise ek building me sabse imp neev hoti hai….

      • Dhirendra ji, main aapki baaton se sehmat hu. Inhi baaton ko aaj ki jativaadi samaj ko bhi samajhane ki jarurat hai. Pata nahi log kyu aaj bhi aise vichaardhara ke sath jee rahe hain ki jati sarvopari hai. Bhavishya me main Bharat ke liye kuch aisa karna chahungi ki ye jati vadi vichardharayen aur logo ke pran leti ye paramparaon ka khandan ho. Bhagwan Shree Krishn ne bhi Gwalo ke sath apna bachpan beetaya tha, aur Bhagwan Ram ne Sabri ke hath se uske joothe fal bhi khaye the, toh fir kyu log unki puja karte hain? Logo ke anusaar, ye toh chote jati ke the. Aur toh aur Bhagwan Shree Krishn ne khud kaha hai ki samay ke sath paramparaon aur vichaaron ko badalna bahut jaruri hai. Toh hamare vichaar kab badlenge ya hum bhi isi maansikta ke sath jivan ko jeete rahenge?

  18. fir jati ka jan kaise hua ? log itne akarmandya kaise huye isko roka kyo nahi gaya ? j bhi ary samaj isk9o thik kyo nahi kar pa rahi hai 1 is janmana jativad ke viruddh andolan kyo nahi kiye ja rahe hain ?

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