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कई गुरुओ को और उनके शिष्यो को देखा है सबके अलग अलग कारण हो सकते है गुरु बनाने के, लेकिन ज्यादातर लोगों से सुना है की हम जन्म मरण के चक्र से बाहर आना चाहते है इसलिये गुरूजी से मन्त्र या विधि ले रहे है जिससे हम मुक्त हो जाये।परंतु अगर इन्हें किसी ने ये बताया ही ना होता की आप बंधन में है तो मुक्त होने यानी solution की भी आवयश्कता ना रहती।ये वैसे ही है जैसे कोई डॉक्टर अपनी दवाई बेचने के लिये जबरदस्ती किसी व्यक्ति को बीमार घोषित कर दे।और पाखंडी गुरु ये भी कहते है या अपने नजदीकी शिष्यो से प्रचारित करवाते है की सिर्फ हमारी विधि से और हमारी पूजा से ही कल्याण होगा और लोग अपना समय ख़राब करते है।

गुरु गीता के 30 वे श्लोक में कहा गया है की अपना शरीर भी अपने गुरु को सोपदो, ये व्यभिचारी गुरुओ ने इसमें जोड़ी होगी ताकि महिला भक्तो का शोषण कर सके।स्कंध पुराण में कोई गुरु गीता है ही नहीं ये अपने आपसे बाद में बनाई गयी है।लोगो को बेवकूफ बनाने के लिये।

जब हम किसी टीचर से स्कूल में कोई विद्या पाते है तो उसकी फोटो घर में लगा के उसकी पूजा करना शुरू नहीं कर देते, ऐसे ही अगर किसी संत या गुरु ने अध्यात्म विद्या सिखाई तो उसे सम्मान दे, कुछ दान दक्षिणा दे, फीस यथायोग्य दे दे पर परमात्मा की जगह उसी की पूजा शुरू कर देना या ध्यान को छोड़ कर उस गुरु या संत को ही याद करना या ध्यान करना उचित नहीं।

 

अगर गुरु के बिना मुक्ति होती ही नहीं तो सबसे पहले जो व्यक्ति मुक्त हुआ होगा वो कैसे हुआ होगा? अगर एक आदमी बिना गुरु के मुक्त हो सकता है तो सब हो सकते है।और गुरु तो हर वह व्यक्ति या वस्तु है जो हमारा अज्ञान अंधकार से ज्ञान प्रकाश की और ले जाये।

 

अगर आपके गुरु ब्रह्मा विष्णु शिव से ऊपर या उनके समान है या परमात्मा के समान है तो उनको बोलिये जरा एक धरती अलग से बना कर हमे देदे यहाँ प्रदुषण बहुत बढ़ गया है।जब ये तथाकथित गुरु आपकी मुलभुत समस्याये जैसे कोई बीमारी या, आर्थिक समस्याये,अशांति,झगड़े आदि दूर नहीं कर पाते तो बड़ी समस्या आध्यात्मिक अज्ञान या आत्मा का जन्म मरण चक्र में फसने को कैसे सुलझाएंगे?

निर्भयता (यानी किसी से भय ना करना) fearlessness ऐसा गुण है जो आपको सभी बंधनो मुक्त कर देता है

अपनी कमजोरी या कमी/दोष स्वीकार करना भी निर्भयता की निशानी है।

जब तक हम किसी फायदे या नुक्सान के या किसी भी डर के कारण परमात्मा को मानते या पूजते है तब तक सत्य बहुत बहुत दूर है।

 

पाखंडी गुरु एक किताब का प्रचार भी करते है -गुरु गीता इसमें लिखा है कोई तुमहारे गुरु के बारे में कुछ गलत बोले तो उसे मार दो/जीभ काटलो या उस जगह को छोड़ दो और गुरु ही ब्रह्मा विष्णु और शिव है उसे सब कुछ दे दो अपना आदि आदि।और भी बहुत पाखंड बनाते है गुरु की चरण धूलि और चरणों का पानी को अमृत समझ कर पियो और सिर पर धारण करो आदि।

 

बंधन है कहाँ आत्मा तो सदा अमर है गीता और उपनिषद कहते है आत्मा को ना कोई मार सकता ना बाँध सकता ना गीला कर सकता ना जला सकता ना काट सकता आत्मा सदा मुक्त और अमर है।रही बात शरीर की इसका जन्म लेना बढ़ना घटना और मृत्यु निष्चित है पञ्च तत्व(five elements)पञ्च तत्वों में मिल जाते है।रही बात मन की मन विचारो से जीवित रहता है,विचार ना हो तो मन है ही नहीं।तो मुक्त किसको होना है किससे होना है क्यों होना है ये पहले स्पष्ट करले।

 

जब मैंने किसी का बुरा करने का सोचा भी नहीं(सोचना इसलिये क्योंकि करने से पहले उस कार्य के बारे में सोचा जाता है) तो नरक में जाने से डरना क्या! अगर गलत ना करने पर भी कोई डराता है की हमारे गुट/मजहब में शामिल ना हुए या हमारी मान्यता को ना माना तो नर्क/जहन्नुम में जाओगे तो वो पाखंडी है या गलत धारणा का शिकार है।

सबसे बड़ा बंधन अज्ञान का होता है जो ज्ञान द्वारा ही तोडा जाता है।

 

परम मुक्ति पानी है परम भक्ति पानी है परम ज्ञान पाना है परम वैभव पाना है परमात्मा को पाना है ये भी स्वार्थ ही है इच्छा ही है।जब तक इच्छाये/स्वार्थ/लालच है सत्य बहुत दूर है।

 

योग, ध्यान, प्राणायाम, व्यायाम,यम नियम का पालन,विचार/अध्ययन,सत्संग,मन्त्र,सेवा,memory enhancing herbs,नम्रता/भक्ति और पौष्टिक भोजन द्वारा अपनी बौद्धिक क्षमता(इंटेलिजेंस) और समझ को किसी भी हद तक बढ़ाया जा सकता है,जितनी ज्यादा इंटेलिजेंस होगी उतना ज्यादा और जल्दी ज्ञान ग्रहण होगा और अज्ञान रूपी बंधन जल्दी कट जाएगा।

भजन का मतलब सिर्फ भगवान् का स्मरण ध्यान ही नहीं सेवा भी है क्योंकि सबके भीतर भी परमात्मा है तो किसी को ऊचा उठाने के लिये शिक्षा/ज्ञान आदि द्वारा सेवा करना या दान करना भी भजन है।

 

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