योगी के मुख्य तीन लक्षण होते हैं । (१) विवेक, अर्थात सत्य का ज्ञान (२) वैराग्य, अर्थात संसार के प्रति विरक्ति, और (३) ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति

योगी न्यायकारी और सर्वव्यापी ईश्वर को सर्वत्र उपस्थित मानता है, और इसलिए वह पापकर्मो से सदा बच कर रहता है।

योगी का ईश्वर के साथ हमेशा सबंध स्थापित रहेता है। योग दर्शन की भाषा में इसे “ईश्वर प्रणिधान” कहते है।

योगी का उद्देश्य अविद्या का विनाश तथा सत्य, धर्म, न्याय आदि की स्थापना करना है।

योगी निष्काम सेवक होता है। वह अपने सभी कर्मो निष्काम भावना से करता है।

योगी मान-अपमान, हानि-लाभ, आरोप आदि से मन का संतुलन बनाए रहता है और उससे दु:खी नहीं होता।

योगी सदा संतुष्ट, प्रसन्न और निर्भय विचरण करता है।

योगी कभी किसी के साथ बुद्धिपूर्वक, योजनाबद्ध तरीके से अन्याय या कपट नहीं करता।

योगी कभी अहित की भावना के साथ प्रतिकार या प्रतिशोध नहीं करता।

योगी मन, इन्द्रियों, शरीर आदि को जड़ मानकर और आत्मा को चेतन मानकर ही समस्त कर्मो नियंत्रणपूर्वक करता है।

योगी कभी भी हानिकारक संस्कारों को उठने नहीं देता, और सर्वदा सुभ संस्कारों का प्रयोग करता रहेता है।

योगी किसी भी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थिति में और अपने शत्रु की उपस्थिति में भी अपने मन को शांत रखता है।

योगी मानता है कि वह उसके सभी सत्कर्म ईश्वर की प्रेरणा से और इश्वरप्रदत्त बल से ही कर रहा है।

योगी अपनी भूल को अपने हदय में तुरंत ही स्वीकार कर लेता है।

योगी अपने सुख की इच्छा न करते हुए दूसरों को सुख देने के लिए सदा कार्यरत रहता है।

योगी किसी भी प्रकार की सामाजिक सुविधाओं के अभाव में अशांत नहीं होता।

योगी अपने ज्ञान को पूरी प्रमाणिकता के साथ व्यवहार में प्रयोग में लाता है।

योगी सुख्पदेश द्वारा लोक कल्याण में प्रयत्नशील रहता है।

योगी यम-नियम का सदा पालन करता है।

योगी कर्तव्य कर्मों का ग्रहण और अकर्तव्य कर्मों का त्याग जैसे सभी काम विचारपूर्वक ही करता है।

योगी सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक के सभी कर्मो का हिसाब रखता है।

योगी अहंकारपूर्वक लौकिक सुख का भोग नहीं करता किन्तु विनम्रता से कभी भोगता है कभी ठुकरा देता है।

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