Arise Bharat

Mir Baqi is commonly held as the governor of Babur responsible for construction of the Babri Masjid at Ayodhya but no such name exists in the Baburnama or the memoirs of Babur. The only persons with having “Baqi” in their name are Baqi Shaghwal who was the governor of Dipalpur and not the erstwhile Oudh. Apart from him, there is one Baqi Ming-Bashi who is supposedly a junior master of a 1000 men under Chin-Timur Sultan. Then there is one Baqi Tashkandi who is again described as a subordinate of Chin-Timur Sultan. So anyone with the name of Baqi was never the governor or even the commander of the forces at Ayodhya. So there is no possibility of a Mir Baqi constructing a Mosque.

After going through the translation of the Baburnama by Beveridge, one can establish that all these persons are one and the same given the year of reference has been 934 AH which is 1527 AD as per the Gregorian calender. The subordinate status of Baqi is reconfirmed by Babur when he is supposedly sent by him on 16th June 1529 on a reconnaissance mission in search of the Afghan rebels Shaikh Bayazid and Biban. On learning that the two had fled to Mahoba, Baqi is asked by Babur to move to Mahoba on the 20th June 1529. The sudden on setting of the monsoon rains forced Babur to ask his men to halt their movements for the next 4-5 months. On learning this, this fellow Baqi Tashkandi or Baqi Shaghwal asked for Babur’s permission to head back to his home in Uzbekistan which Babur happily obliged. This was attested in the Erskine’s translations of Babarnama as well as the translations by Wheeler M.Thackston as published by Oxford University Press, New York. So this Baqi never visited Ayodhya in all portability. This Baqi Shaghwal was a Mir and a petty commander who was sent on a voluntary retirement from active services after he failed in the assignment against Bayazid Sheikh and Biban in the crucial battle of Lucknow. The disgrace with which Bayazid is dismissed can be gauged from the fact that he was not even given a horse nor was he allowed to appropriate a single penny while Musa, the Afghan warlord and nephew of Bayazid was allowed an allowance of Rupees 30 lakhs when he was asked to retire. The lack of application of common sense when it comes to decipher the existence of Mir Baqi can be gauged from that a ‘Mir’ was a person who lorded around 5000 men while this Baqi Tashkandi or Baqi Shaghwal is a Ming-Bashi i.e. one who commands 1000 men. After his forced forced cum voluntary dismissal from the services, he is nowhere mentioned again in his memoirs.

Now, coming to the people who have the prefix of ‘Mir’ attached to their names in Baburnama are :
1. Mir Ahmed Beg Itaraji Mughal
2.Mir Ali Beg Turk
3.Mir Azu
4.Mir Ali
5.Mir Murtaza
6.Mir Mohammed-i-Yusuf
7.Mir Mohammed-i-Mahdi Khwaja
8.Mir Khurd Bakawal
9.Mir Ali Mir Akhwari

There is no such person with the name of Mir Baqi in the entire book of Babaunama leave alone him being the Governor of Oudh which was a very important province considering its very high revenues that it offered to the state treasury. This is now established that the Mir Baqi mentioned in the civil suit lingering in the Supreme Court is a mere figment of imagination. Now when there is no such person with this name, how can he be credited with creating a Masjid at Ayodhya leave alone demolishing it. So there was no Masjid at the site during the 16th century. The claims of the Muslims hence do not stand any merit. It is a pure figment of imagination that should be disregarded during the trials.

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2 COMMENTS

  1. तुलसी दास ने भी राम मंदिर की जगह बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया है

    गोस्वामी श्री तुलसीदास रचित “तुलसी शतक” का भावार्थ प्रस्तुत है।

    हमारे वामपन्थी इतिहासकारों ने यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया था “रामचरितमानस” रचयिता ने राम मंदिर विध्वंस का रामायण में कहीं नही उल्लेख किया जबकि उन्हें यह पता ही नही की गोस्वामी जी की बहुत सी रचनायें रही हैं जिनमे एक “तुलसी शतक” भी है ।

    (1) राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय ।
    जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी किन्ही हाय ॥

    जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई । साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।

    (2) दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज ।
    तुलसी रोवत ह्रदय हति हति त्राहि त्राहि रघुराज ॥

    मीरबकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदिर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।

    (3) राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच ।
    तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खाल नीच ॥

    तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीरबकी ने मस्जिद बनाई ।

    (4) रामायन घरि घट जँह, श्रुति पुरान उपखान ।
    तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान ॥

    श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।

    (5) मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास ।
    जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास ॥

    श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।

    (6) सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग ।
    भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग ॥

    श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवित से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।

    (7) बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल ।
    हने पचारि पचारि जन जन तुलसी काल कराल ॥

    श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।

    (8) सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि ।
    तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि ॥

    (इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है ।)

    श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये । (वर्णन न करने योग्य) ।

    अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया है।

  2. राम मंदिर विध्वंस का रामायण मे उल्लेख नही किया।उन्होंने अलग लिखा है। बाबा तुलसी के तुलसी शतक में इसका विस्तार से उल्लेख है।

    गोस्वामी श्री तुलसीदास रचित “तुलसी शतक” का भावार्थ प्रस्तुत है।
    हमारे वामपन्थी इतिहासकारों ने यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया था “रामचरितमानस” रचयिता ने राम मंदिर विध्वंस का रामायण में कहीं नही उल्लेख किया जबकि उन्हें यह पता ही नही की गोस्वामी जी की बहुत सी रचनायें रही हैं जिनमे एक “तुलसी शतक” भी है ।
    (1) राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय ।
    जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी किन्ही हाय ॥
    जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई । साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।
    (2) दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज ।
    तुलसी रोवत ह्रदय हति हति त्राहि त्राहि रघुराज ॥
    मीरबकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदिर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।
    (3) राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच ।
    तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खाल नीच ॥
    तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीरबकी ने मस्जिद बनाई ।
    (4) रामायन घरि घट जँह, श्रुति पुरान उपखान ।
    तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान ॥
    श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।
    (5) मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास ।
    जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास ॥
    श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।
    (6) सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग ।
    भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग ॥
    श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवित से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।
    (7) बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल ।
    हने पचारि पचारि जन जन तुलसी काल कराल ॥
    श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।
    (8) सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि ।
    तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि ॥
    (इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है ।)
    श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये । (वर्णन न करने योग्य) ।
    अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया है।

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