प्रत्येक वर्ष की भांति दशहरे का त्योहार आ गया. सब लोग विशेष रूप से रावण के जलने का इंतजार कर रहे हैं . सभी मर्यादा पुरुषोतम श्री रामचन्द्र जी महाराज को याद करते हैं की किस प्रकार उन्होंने राक्षस रावण का वध कर धरती को पापी से मुक्त किया था. आज उनके उस पवित्र तप की स्मृति में रावण के पुतले का दहन किया जाता हैं ताकि जनमानस को प्रेरणा मिल सके की बुराई पर किस प्रकार अच्छे की जीत होती हैं.एक प्रश्न मेरे मन में सदा आता हैं की क्या आज भी समाज में रावण फिर से जीवित हो उठा हैं? उत्तर हैं हाँ. रावण न केवल आज फिर से जीवित हो उठा हैं अपितु पहले से भी शक्तिशाली हो उठा हैं. वह रावण कौन हैं और कहाँ रहता हैं?
उत्तर हैं वह रावण हैं हमारी आतंरिक बुराइयाँ जो हमारे भीतर ही हैं और हमें दिन प्रतिदिन धर्म मार्ग से विचलित करती हैं.उसके दस सिर हैं जिन पर यम-नियम रुपी दस तलवारों से विजय प्राप्त करी जा सकती हैं.अब पाठकगण सोच रहे होगे की यह दस तलवारे कौन सी हैं और उनसे किन बुराइयों पर विजय प्राप्त करी जा सकती हैं.
इस आंतरिक रावण से लड़ने की दस तलवारे हैं यम और नियम. यम पांच हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रहमचर्य और अपरिग्रह . नियम भी पांच हैं शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान. यम-नियम के पालन करने से हम अपनी आंतरिक बुराईयों को जो की रावण के दस सिर के समान हैं का सामना कर सकते हैं.
१. अहिंसा
सर्वदा सभी प्राणियों के साथ वैरभाव को छोड़कर प्रीति से वर्तना अहिंसा हैं. सभी प्राणियों में मनुष्य के साथ साथ पशु आदि की भी आते हैं. जहाँ अपनी जिह्वा के स्वाद अथवा उदर की भूख की पूर्ति के लिए निरीह प्राणियों की हत्या करना निश्चित रूप से हिंसा हैं वहीँ विचार मात्र से किसी व्यक्ति विशेष की हानी करने की इच्छा करना भी हिंसा हैं. यदि किसी व्यक्ति को चोरी आदि करने पर उसके सुधार के लिए दंड दिया जाये तो वह कर्म अहिंसा कहलाता हैं, हिंसा नहीं कहलाता हैं क्यूंकि वह कर्म प्राणिमात्र के उद्धार के लिए किया जा रहा हैं.इसी प्रकार किसी आदमखोर जानवर को मारना भी हिंसा नहीं कहलाता क्यूंकि वह जन कल्याण के लिए हैं. आज धर्म के नाम पर विश्व भर में दंगे फसाद, लूट, बलात्कार क़त्ल आदि सुनने को मिलते हैं. हर कोई अपने अपने मजहब, अपने अपने मत,अपनी अपनी विचारधारा,अपने अपने गुरु को श्रेष्ठ और दूसरे को नीचा समझने लगा हैं जिसके कारण चारों तरफ असुरक्षा. अविश्वास और डर का माहोल बन गया हैं.अगर मनुष्य अहिंसा के इस पाठ को समझ जाये तो और सभी के साथ प्रीतिपूर्वक वर्तने लगे तो इस हिंसा रुपी रावण का नाश किया जा सकता हैं.
२. सत्य
जैसा देखा हो, अनुमान से जाना हो और सुना हो, वैसा ही मन और वाणी में होना सत्य हैं अर्थात जो पथार्थ जैसा हैं, उसको वैसा ही जानना, मानना, बोलना और शरीर से उसको आचरण में लाना सत्य हैं. सत्य को परीक्षा पूर्वक जानना और उसका सर्व हितार्थ बोलना और आचरण में लाना सत्य हैं. वस्तु के स्वरुप के विपरीत जानना, मानना, बोलना, आचरण में लाना असत्य हैं. परन्तु हित के नाम से सत्य के स्थान में असत्य का आचरण करना सत्य नहीं हैं.इतिहास इस बात का गवाह हैं की जो भी व्यक्ति सत्य बोलते हैं वे विश्व में श्रेष्ठ कहलाया हैं जबकि जो भी व्यक्ति असत्य के मार्ग पर चलते हैं वे अप्रसिद्धि का पात्र बने हैं.आज मनुष्य मनुष्य पर विश्वास नहीं करता क्यूंकि असत्य वचन के कारण विश्वास के स्थान पर कुटिलता ही कुटिलता दिखती हैं. एक दूसरे से घृणा का कारण भी यहीं असत्य वचन हैं. सत्य बोलने से व्यक्ति न केवल निडर, शक्तिशाली और दृढ बनता हैं अपितु सभी के द्वारा सम्मान का पात्र भी बनता हैं जबकि असत्य वचन करने वाला क्षणिक सफलता और तात्कालिक सुख का भोग तो कर सकता हैं पर कालांतर में भय, आशंका और रोग उसे अपना शिकार बना लेते हैं जिससे उसका नाश हो जाता हैं. इसलिए असत्य रुपी इस रावण का नाश सत्य से किया जा सकता हैं.
३. अस्तेय
मन, वाणी और शरीर से चोरी का परित्याग करके उत्तम कार्यों में तन, मन, धन से सहायता करना अस्तेय हैं. आज देश की सबसे बड़ी समस्या भ्रस्ताचार हैं.बड़े बड़े नेताओं से लेकर दफ्तर के छोटे कर्मचारी तक अपवाद रूप किसी किसी को छोड़कर सब इस पाप से धीरे धीरे ग्रसित हो गए हैं. यह भी एक प्रकार की चोरी ही हैं. किसी दूसरे के धन, संपत्ति आदि की इच्छा रखने से सबसे बड़ी हानि हमारी आंतरिक शांति का समाप्त हो जाना हैं.मनुष्य जीवन अनेक योनियों में जन्म लेने के बाद मिलता हैं और इस अमूल्य जीवन को हम इतनी अशांति में गुजार दे क्यूंकि हम सदा दूसरे के धन की इच्छा रकते रहे अथवा प्रयास करते रहे अथवा चोरी करते रहे, ऐसे करने वाले व्यक्ति को आप अज्ञानी नहीं कहेगे तो फिर क्या कहेगे.इसलिए मन, वचन और शरीर से चोरी का परित्याग करके हम इस रावण का नाश कर सकते हैं.
४. ब्रह्मचर्य
वेदों का पढना , ईश्वर की उपासना करना और वीर्य की रक्षा करना ब्रह्मचर्य कहलाता हैं. जब योगी मन, वचन और शरीर से ब्रह्मचर्य का दृढ पालन बना लेता हैं तब बौधिक और शारीरिक बल की प्राप्ति होती हैं. उससे वह अपनी तथा अन्यों की रक्षा करने में, विद्या प्राप्ति तथा विद्या दान में समर्थ हो जाता हैं. ब्रह्मचर्य के पालन से शारीरिक और बौधिक बल की प्राप्ति होती हैं. शरीर का बल बढ़ने से शरीर निरोग एवं दीर्घ आयु होता हैं और उत्तम स्वास्थ्य को प्राप्त करता हैं. बौद्धिक बल के बढ़ने से वह अति सूक्षम विषयों को जानने में और अन्यों को विद्या पढ़ाने में सफल हो जाता हैं.
अथर्ववेद ११/५/१९ में कहा भी गया हैं की ब्रह्मचर्य के तप से देव मृत्यु को जीत लेते हैं. महाभारत में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं – हे राजन. तू ब्रह्मचर्य के गुण सुन. जो मनुष्य इस संसार में जन्म से लेकर मरण पर्यंत ब्रह्मचर्य होता हैं. उसको कोई शुभ अशुभ अप्राय नहीं रहता ऐसा तू जान की जिसके प्रताप से अनेक करोड़ो ऋषि ब्रह्मलोक अर्थात सर्वानन्द स्वरुप परमात्मा में वास करते और इस लोक में भी अनेक सुखों को प्राप्त होते हैं. जो निरंतर सत्य में रमण, जितेन्द्रिय, शांत आत्मा, उत्कृष्ट, शुभ गुण स्वाभाव युक्त और रोग रहित पराकर्मयुक्त शरीर, ब्रह्मचर्य अर्थात वेदादि सत्य शस्त्र और परमात्मा की उपासना का अभ्यास कर्मादी करते हैं वे सब बुरे काम और दुखों को नष्ट कर सर्वोत्तम धर्मयुक्त कर्म और सब सुखों की प्राप्ति कराने हारे होते और इन्हीं के सेवन से मनुष्य उत्तम अध्यापक और उत्तम विद्यार्थी हो सकते हैं.
ब्रह्मचर्य के विपरीत कर्म व्यभिचार कहलाता हैं. आज समाज में यह रावण विकराल रूप धारण कर समाज में अनैतिकता फैला रहा हैं जिसके दुष्कर परिणामों से सभी परिचित हैं. भोगवाद की व्यभिचार रुपी लहर में बहकर युवक युवती अपना पूरा जीवन बर्बाद कर लेते हैं. आदि कच्ची उम्र में बलात्कार जैसा घृणित पाप कर डालते हैं जिसके कारण पूरा जीवन अंधकारमय हो जाता हैं. मीडिया इस अपराध में सबसे बड़ा जिम्मेदार हैं क्यूंकि अपरिपक्व मानसिक अवस्था में सही या गलत की पहचान कम ही को होती हैं.इस व्यभिचार रुपी रावण के कारण न जाने कितनो का जीवन बर्बाद हो रहा हैं और कितनो का होगा इसलिए ब्रह्मचर्य रुपी उत्तम नियम के पालन से इस रावण का नाश किया जा सकता हैं.
५. अपरिग्रह
विषयों में उपार्जन, रक्षण, क्षय, संग, हिंसा दोष देखकर विषय भोग की दृष्टी से उनका संग्रह न करना अपरिग्रह हैं. अर्थात हानिकारक अनावश्यक वस्तु और अभिमान आदि हानिकारक, अनावश्यक अशुभ विचारों को त्याग देना अपरिग्रह हैं. जो जो वस्तु अथवा विचार ईश्वर प्राप्ति में बाधक हैं उन सबका परित्याग और जो जो वस्तु , विचार ईश्वर प्राप्ति में साधन हैं उनका ग्रहण करना अपरिग्रह हैं. आज के समाज में अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह करने की होड़ सी लगी हुई हैं . हर कोई अपने जीवन के उद्देश्य को भूलकर एक मशीन की भांति संग्रह करने के पीछे भाग रहा हैं, जिससे व्यक्ति मानसिक तनाव, दुःख, भय आदि का शिकार होकर अपने जीवन को साक्षात् नरक बनाये हुए हैं. भोगवाद की लहर में बहकर हम जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूल गए हैं. हमारे चारों ओर इसके अनेक उदहारण मिलेगे कोई काला बाजारी करता हैं ताकि सुख मिले, क्या सुख मिलेगा? कोई धोखे से किसी की संपत्ति पर कब्ज़ा कर रहा हैं, क्या सुख मिलेगा? बिलकुल नहीं. कोई दिन रात एक कर धन इकट्ठा करने में लगा हुआ हैं पर उसे यह नहीं मालूम की एक सीमा के पश्चात यह धन एक एक प्रकार का भोझ ही हैं. हमारे देश के नेता ओर बड़े व्यापारी इसके साक्षात् उदहारण हैं की इतनी धन-संपत्ति को इकठ्ठा करने के बावजूद घोटाले पर घोटाले किये जा रहे हैं. अंत में सब कुछ छोड़कर मृत्यु को ही तो प्राप्त होना हैं. अगर समाज अपरिग्रह के सन्देश को समझ ले तो सभी सुखी हो सकते हैं.अपरिग्रह के इस सन्देश को अगर जनमानस समझ ले तो भटक रहे समाज को अज्ञानता रुपी रावण से मुक्ति मिल जाएगी.
६. शौच
शौच का एक अर्थ शुद्धि भी हैं. शुद्धि दो प्रकार की होती हैं एक बाह्य ओर एक आन्तरिक. जल आदि से, पवित्र भोजन से शरीर की बाह्य शुद्धि होती हैं जबकि चित की मलिनताओं को दूर करने से शरीर की आन्तरिक शुद्धि होती हैं.मनुष्य अपने शरीर की बाह्य शुद्धता पर हर प्रकार से ध्यान देता हैं ताकि वो सुन्दर दीख सके. इस सुन्दरता के कारण वो भ्रमित होकर अपने शरीर पर अभिमान कर बैठता हैं और दुसरे के शरीर को घृणा की दृष्टी से देखता हैं. इस अभिमान से मनुष्य सत्य से दूर चला जाता हैं और अपना बहुत सारा बहुमूल्य समय शरीर को सुन्दर बनाने में लगा देता हैं. सत्संग, स्वाध्याय, ईश्वर उपासना, आत्म निरिक्षण के लिए उसके पास समय ही नहीं रहता. आन्तरिक मलिनता की शुद्धि इन्हीं कर्मों से होती हैं.कोई कोई मनुष्य दुसरे के शरीर की सुन्दरता पर मोहित हो जाता हैं जिससे काम वासना की उत्पत्ति होती हैं. अभिमान और काम वासना दोनों व्यक्ति को आन्तरिक रूप से असुद्ध कर देती हैं.आन्तरिक शुद्धि से बुद्धि की शुद्धि होती हैं जिससे मन में प्रसन्नता और एकाग्रता आती हैं, जिससे इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती हैं, उससे बुद्धि ईश्वर की उपासना में लीन होती हैं जिससे ईश्वरीय सुख की प्राप्ति होती हैं.आज के समाज में मांसाहार से भोजन की अपवित्रता होती हैं जिससे न केवल शरीर अशूद्ध होता हैं अपितु विचारों में भी मलिनता आती हैं. अभिमान और काम वासना से मनुष्य जाति का जितना नाश हुआ हैं उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. समाज में फैल रही अराजकता को मांसाहार, अभिमान, काम वासना रुपी रावण से मुक्ति तभी मिल सकती हैं जब शौच (शुद्धि) के मार्ग पर चला जाये.
७. संतोष
संपूर्ण प्रयास के पश्चात जो भी उपलब्ध हो, उसी में संतुष्ट रहना, उससे अधिक की इच्छा न करना संतोष हैं. जो व्यक्ति अपने पूर्ण पुरुषार्थ के पश्चात अपने उपलब्ध साधनों से अधिक पदार्थों की इच्छा नहीं करता तो उसको अनुपम सुख की प्राप्ति होती हैं. जब व्यक्ति इन्द्रियों के भोगों में आसक्त रहता हैं तो उसकी विषय भोग की तृष्णा बढती जाती हैं और वो उस तृष्णा की पूर्ती के लिए प्रयासशील रहता हैं. प्रयास में परिणाम पाने के लिए या तो वह अपराध कर बैठता हैं अथवा विफल होने पर दुखों का भोगी बनता हैं.इसलिए संतोष का पालन करने चाहोये जिससे सात्विक सुख की प्राप्ति होती हैं नाकि क्षणिक सुखों की प्राप्ति होती हैं. संतोष का पालन करने से व्यवहार में भी सुख की प्राप्ति होती हैं और दुखों की निवृति होती हैं. जब कोई हानिकारक घटना घट जाती हैं तो संतोषी व्यक्ति को नयून दुःख होता हैं इसलिए संतोष जीवन में सुख प्राप्ति का उपयोगी मार्ग हैं. आज समाज में हर कोई दुखी हैं उसका एक कारण संतोष का नहीं होना हैं इसलिए असंतोष रुपी रावण को त्याग कर संतोष का पालन करने से अनुपम सुख की प्राप्ति करी जाये.
८. तप
धर्म आचरण करते हुए हानि लाभ, सुख दुःख, मान अपमान , सर्दी गर्मी, भूख प्यास आदि को शांत चित से सहन करना तप हैं. जिन जिन उत्तम कार्यों के करने में स्वयं का और अन्यों का दुःख दूर होता हैं और सुख की प्राप्ति होती हैं उनको करते रहना और न छोड़ना धर्म आचरण हैं . धर्म आचरण करने में जो जो दुःख व्यक्ति को सहना पड़ता हैं उसको तप कहते हैं. आज समाज में अराजकता का एक कारण सज्जन व्यक्तियों द्वारा तप न करना हैं और दुर्जन व्यक्तियों द्वारा करे जा रहे दुष्ट कार्यों को न रोकना हैं.श्री राम सतयुग के विशेष उदहारण हैं जिन्होंने अपने तप से राक्षस रावण को समाप्त किया.उनसे प्रेरणा पाकर आज हमे भी समाज में फैल रही बुराइयों को समाप्त करने के लिए तप करना चाहिए जिससे अधर्म रुपी रावण का नाश किया जा सके.
९ . स्वाध्याय
वेद आदि धर्म शास्त्रों को पढ़कर ईश्वर के स्वरुप को जानना और ईश्वर का चिंतन मनन करना, अपने दैनिक कार्यों का मानसिक अवलोकन कर अपनी गलतियों को पहचानना और उनको भविष्य में दोबारा न करने की प्रतिज्ञा करना स्वाध्याय कहलाता हैं. धर्म शास्त्रों के अध्ययन से और उनका पालन करने से व्यक्ति के आचरण में इतनी योग्यता आ जाती हैं की वह अन्यों को भी धर्म मार्ग पर चला सकता हैं.समाज में सदा श्रेष्ठ मनुष्यों की कीर्ति हुई हैं. सर्व प्रथम व्यक्ति को अपना ही स्वाध्याय करना चाहिए की उसमे क्या क्या बुराइयाँ समाहित हैं फिर उन पर विजय प्राप्त करनी चाहिए. इस कार्य में ईश्वर ही केवल सहाय हैं और उन ईश्वर को जानने के लिए वेदादि धर्म शास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिए.आज समाज में हर व्यक्ति अपने आपको सबसे सही और दुसरे को सबसे गलत मान रहा हैं. इसका कारण हैं वह अपने आपको न जानना. अगर व्यक्ति अपनी वास्तविकता को समझे और धर्म ग्रंथों का स्वाध्याय कर उसी अनुसार वर्ते तो वह किसी को कष्ट नहीं देगा. ऐसा व्यक्ति न केवल बुद्धिमान कहलायगा अपितु समाज का मार्ग दर्शन भी करेगा. स्वाध्यायशील ज्ञानी व्यक्ति ही समाज का नेतृत्व कर सकते हैं. आज समाज का नेतृत्व अज्ञानी भोगी व्यक्ति कर रहे हैं जिसके कारण समाज गर्त में जा रहा हैं.अपने आपको स्वाध्यायशील और ईश्वर प्रेमी बनाकर समाज का नेतृत्व योग्य व्यक्ति द्वारा होने से समाज में अज्ञान रुपी रावण का नाश होगा.
१०. ईश्वर प्रणिधान
समस्त विद्याओं को देने वाले परम गुरु ईश्वर में समस्त कर्मों को समर्पित कर देना, उसकी भक्ति करना, व्यवहार में उसके आदेशों का पालन करना, शरीर आदि पदार्थों को उसके मानकर धर्माचरण करना, कर्मों का लौकिक फल न चाहना, ईश्वर को ही लक्ष्य बनाकर कार्यों को करना ईश्वर प्रणिधान हैं. कोई भी मनुष्य गलत कार्य तभी करता हैं जब वह ईश्वर को सर्वथा भूल जाता हैं. अगर मनुष्य किसी भी कार्य को करने से पहले ईश्वर के अनुकूल अथवा प्रतिकूल की परीक्षा करे तो वह पाप कार्य से अपने आपको बचा सकता हैं. समाज में पाप कर्म को रोकने यह सबसे कारगर तरीका हैं. इससे न केवल पाप आचरण कम होगा अपितु सात्विक वातावरण का माहौल भी बनेगा.पाप रुपी रावण का नाश करने का यह सबसे कारगर तरीका हैं.
आशा हैं की यम नियम की अहिंसा, सत्य, अस्तेय , ब्रहमचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष,तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान रुपी तलवारों से हिंसा, असत्य, चोरी, व्यभिचार, भ्रष्ट आचार, अशुद्धि, असंतोष,अकर्मयता, अज्ञान और पाप आचरण रुपी रावण के दस सिरों का नाश होगा. अपने जीवन को योगी लोग इन्हीं सीढियों पर चलकर श्रेष्ठ बनाते हैं और अपने भीतर छिपे हुए आन्तरिक रावण का नाश करते हैं. आशा हैं की जिज्ञासु भी योग मार्ग का अनुसरण कर अपने जीवन को यथार्थ करेगे.



















Vivekji kindly send a pdf file of this article for further use.
thanks
ajay
You can create Pdf file using option on the site. Please check Print Pdf button at end of article.
दुसरे के साथ वही व्यवहार करो, जो अपने लिए भी पसंद आये ” जब सभी मनुष्य इस एक मात्र सूत्र को अपना लेंगे तब काफी समस्याए दूर हो जाएँगी १ मनुस्मृति का ६/९२ वाला श्लोक जिसमे धर्म के लक्षण कहे गए है , उसको भी अपनाना चाहिए धृति, क्षमा, शौचं, इन्द्रिय निग्रह ,दमोअस्तेयम धी ,विद्या ,सत्यम, अक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं १ इसको भी मनुष्यों को अपनाना चाहिए !केवल पूजा पाठ, नमाज़ पढना आदि से काम नहीं चलने वाला ?
Ati uttam Agniveer ji,
Ravan ne bahut vikral roop le liya hai…..isse parast krna kafi kathin ho gaya hai….aapsi ekta,sauhard ki sakht avshyakta hai!
अति उत्तम लेख डॉ विवेक जी ! प्रशंसनीय !
dhanyavad
what happen with B.N shrama.why i can not open bhandafodu.blogspot.com in UAE from last 4 days.
ॐ
कोई धर्म एवं ग्रन्थ नैतिकता तथा वैज्ञानिकता की दृष्टि से भी खरा होना चाहिए अतः श्री अग्निवीर जी से यथोचित उत्तर की आशा है……
(1)राम ने बाली को छिपकर क्योँ मारा?
(2)राम ने शम्बूक नामक शूद्र को क्योँ मारा?
(3)वनवास के दौरान श्रीराम ने माँसाहार का प्रयोग क्योँ किया?
(4)रामजन्म के लिए कौशल्या ने यज्ञ मेँ घोड़े की बली क्योँ दी?
(5)राम ने सिता को राज्य निकाला देकर उनके साथ अमानवीय व्यवहार क्योँ किया?
(6)यदि संसार मेँ “जादू” नाम की कोई चीज नहीँ तो वीर हनुमान बिना विमान के समुद्र कैसे पार कर गये?
(7)राम और लक्ष्मण ने आत्महत्यायेँ क्योँ की?
(8)जब रीछ, वानरोँ आदि जंगली जीवोँ के पास मानवीय स्वरयन्त्र नहीँ थे तो वे कैसे मानवोँ की तरह बातचीत कर सके?
(9)रावण चारोँ वेदोँ का ज्ञाता होने के बावजूद कुमति का शिकार हुआ, क्या ये वेदोँ की गलती नहीँ है?
(10)सिता जी के महाप्रस्थान के समय धरती कैसे फट गयी, क्या यह एक अवैज्ञानिक घटना नहीँ है?
(11)वाल्मिकीय रामायण के अनुसार स्वर्ग मेँ स्थि देवता कहीँ-कहीँ आकाश से पुष्पवर्षा करते नजर आते हैँ, तो वास्तव मेँ आकाश मेँ स्वर्ग कहाँ पर है?
(12)श्रीराम के द्वारा चरणस्पर्श से अहिल्या तर गयी, वैज्ञानिक दृष्टि से पत्थर कभी मनुष्य भी बन सकता है भला?
(13)आर्य समाज के अनुसार विष्णु-शिव दोनोँ एक आर्य पूर्णयोगी थे, परन्तु वाल्मिकी रामायण के धनुष भंग के समय शिव तथा विष्णु का आपसी युद्ध का वृतान्त मिलता है। क्या यहीँ उनकी आर्यता(श्रेष्ठता) है? क्या ये घटना यह चीज नहीँ सिद्ध करती की ये दोनोँ अपने-अपने औचित्य स्थापित करने के लिए एक महान जनादर्श का हनन कर रहे थे?
(14)यदि लक्ष्मण-भरत इत्यादि महावीर थे तो ये लवकुश युद्ध के दौरान दो छोटे बच्चोँ से हारे क्योँ?
(15)रावण वध के पश्चात् माता सिता को अग्नि परिक्षा देनी पड़ी थी, क्या ये नारी जाति के साथ सरासर अन्याय नहीँ है?
उपरोक्त विवरण यदि सत्य है तो इसमेँ कोई सन्देह नहीँ की श्रीराम अत्याचारी थे, और वाल्मिकीय रामायण स्वतन्त्र-दृष्टि से एक मिथ्या ग्रन्थ है एवं श्रीराम के द्वारा रावण का वध अनुचित था क्योँकि श्रीराम भी इन अनुचित कार्योँ मेँ लिप्त थे।
आशा है स्वयं श्री अग्निवीर जी इन प्रश्नोँ के क्रमागत प्रत्युत्तर देँ…..
वेदोँ की ओर लौटो
back to vedas
ॐ
“AGNIVEER JI” ye jo prashn aapse ek arya jiggyasu ne pooche hai, “RAMAYAD” ke sandarbh me, uska uttar aap kripya jaroor dijiye……..ye vakayi me gambheer prashn hai, aur hume iske javab ka intejar rahega….
I am completely tormented.Who said that Ram ate meat?Who told you that Ram and Lakshman suicided?Are these pakhandis who have sent you by giving some chanda?Who said that Ram killed a shudra?Why don’t you search the site about the answer?Why don’t you see “No beef in Vedas” topic on Agniveer site?Why don’t you search the site for all your answers?
Agniveer has replied to all of these stupid questions previously.Only dumb man will again ask the same question instead of rebuttals which is not possible by their moortipoojaka buddhi.
Back to Vedas”
Wow!
I am again tormented.This is a questionoer who is a student of some great 1857 Rishi.Why doesn’t he read the main book written about Rishi?Why don’t they see the lines written by Agniveer which says that many shlokas are false in Valmiki Ramayan and are latter on false additions by some dhurt pakahnadis
अहल्या उद्धार का रहस्य
एक कथा प्रचलित कर दी गयी हैं की त्रेता युग में श्री राम ने जब पत्थर बनी अहिल्या को अपने चरणों से छुआ तब वह पत्थर से मानव बन गई और उसका उद्धार हो गया।
प्रथम तो तर्क शास्त्र से किसी भी प्रकार से यह संभव ही नहीं हैं की मानव शरीर पहले पत्थर बन जाये और फिर चरण छूने से वापिस शरीर रूप में आ जाये।
दूसरा वाल्मीकि रामायण में अहिल्या का वन में गौतम ऋषि के साथ तप करने का वर्णन हैं कहीं भी वाल्मीकि मुनि ने पत्थर वाली कथा का वर्णन नहीं किया हैं। वाल्मीकि रामायण की रचना के बहुत बाद की रचना तुलसीदास रचित रामचरितमानस में इसका वर्णन हैं।
तीसरे दो विषयों पर विरोधाभास हैं एक की क्या अहिल्या इन्द्र द्वारा छली गयी थी अथवा दूसरा अहिल्या चरित्रवान नहीं थी?
इसका हल भी बालकाण्ड सर्ग 51 में गौतम के पुत्र शतानंद अपनी माता को यशस्विनी तथा देवों में आतिथ्य पाने योग्य कहा हैं।
49/19 में लिखा हैं की राम और लक्ष्मण ने अहिल्या के पैर छुए। यही नहीं राम और लक्ष्मण को अहिल्या ने अतिथि रूप में स्वीकार किया और पाद्य तथा अधर्य से उनका स्वागत किया। यदि अहिल्या का चरित्र सदिग्ध होता तो क्या राम और लक्ष्मण उनका आतिथ्य स्वीकार करते।
सत्य क्या हैं ।
विश्वामित्र ऋषि से तपोनिष्ठ अहिल्या का वर्णन सुनकर जब राम और लक्ष्मण ने गौतम मुनि के आश्रम में प्रवेश किया तब उन्होंने अहिल्या को जिस रूप में वर्णन किया हैं उसका वर्णन वाल्मीकि ऋषि ने बाल कांड 49/15-17 में इस प्रकार किया हैं
स तुषार आवृताम् स अभ्राम् पूर्ण चन्द्र प्रभाम् इव |
मध्ये अंभसो दुराधर्षाम् दीप्ताम् सूर्य प्रभाम् इव || ४९-१५
सस् हि गौतम वाक्येन दुर्निरीक्ष्या बभूव ह |
त्रयाणाम् अपि लोकानाम् यावत् रामस्य दर्शनम् |४९-१६
तप से देदियमान रूप वाली, बादलों से मुक्त पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा के समान तथा प्रदीप्त अग्नि शिखा और सूर्य से तेज के समान अहिल्या तपस्या में लीन थी।
सत्य यह हैं की देवी अहिल्या महान तपस्वी थी जिनके तप की महिमा को सुनकर राम और लक्ष्मण उनके दर्शन करने गए थे। विश्वामित्र जैसे ऋषि राम और लक्ष्मण को शिक्षा देने के लिए और शत्रुयों का संहार करने के लिए वन जैसे कठिन प्रदेश में लाये थे।
किसी सामान्य महिला के दर्शन कराने हेतु नहीं लाये थे।
कालांतर में कुछ अज्ञानी लोगो ने ब्राह्मण ग्रंथों में इन्द्र के लिए प्रयुक्त शब्द “अहल्यायैजार” के रहस्य को न समझ कर इन्द्र द्वारा अहिल्या से व्यभिचार की कथा गढ़ ली। प्रथम इन्द्र को जिसे हम देवता कहते हैं व्यभिचारी बना दिया। भला जो व्यभिचारी होता हैं वह देवता कहाँ से हुआ?
द्वितीय अहिल्या को गौतम मुनि से शापित करवा कर उस पत्थर का बना दिया जो असंभव हैं।
तीसरे उस शाप से मुक्ति का साधन श्री राम जी के चरणों से उस शिला को छुना बना दिया।
मध्यकाल को पतन काल भी कहा जाता हैं क्यूंकि उससे पहले नारी जाति को जहाँ सर्वश्रेष्ठ और पूजा के योग्य समझा जाता था वही मध्यकाल में वही ताड़न की अधिकारी और अधम समझी जाने लगी।
इसी विकृत मानसिकता का परिणाम अहिल्या इन्द्र की कथा का विकृत रूप हैं।
सत्य रूप को स्वामी दयानंद ने ऋग्वेदादीभाष्य भूमिका में लिखा हैं की यहाँ इन्द्र सूर्य हैं, अहिल्या रात्रि हैं और गौतम चंद्रमा हैं. चंद्रमा रूपी गौतम रात्रि अहिल्या के साथ मिलकर प्राणियो को सुख पहुचातें हैं. इन्द्र यानि सूर्य के प्रकाश से रात्रि अहिल्या निवृत हो जाती हैं अर्थात गौतम और अहिल्या का सम्बन्ध समाप्त हो जाता हैं.
इन सब तर्कों और प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं की अहिल्या उद्धार की कथा काल्पनिक हैं। अहिल्या न तो व्यभिचारिणी थी न ही उसके साथ किसी ने छल किया था। सत्य यह हैं की वह महान तपस्विनी थी जिनके दर्शनों के लिए , जिनसे ज्ञान प्राप्ति के लिए ऋषि विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण को वन में गए थे।
नमस्ते अग्निवीर, मै जानना चाहता हु की हिन्दुओमे मांसाहार का चलन क्यों और कबसे चालू हुवा, क्या पहले कोई भी हिन्दू मांसाहार नहीं करता था ? आजकल अधिकांश हिन्दू मांसाहारी क्यों हुवे है ! विशेषतः ब्राह्मण भी मांसाहार करते है और उसका समर्थन भी करते है , क्या वजह है इनके धर्मसे भ्रष्ट होने की ? धन्यवाद
I think Ramayan, Mahabharat are not Vedas, Second thing is I believe that stories in Ramayana or Mahabharata are real persons stories but they have representation of terms or elements which can we find in modern science but mid time there original meaning had lost and only fantasy has remained. Their is need of deep research on it.
beta tum jante nahi ho ravana kon the. unka name tamiz se lo. jab treta yug me koi ravana ke samne sir nahi jhukata tha to rakchash raaj uske dimag me ghus ke use itna dard dete the ki sikar khud ghutno par jhuk ke mout ki bhikh magta tha. tab daya karke dark lord use uski jindagi se aajad karte the.