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( लुङ् लकार )

नमस्कार मित्रों !

पिछले पाठ में आपने लट् लकार के प्रयोग सम्बन्धी नियम जाने। ‘भू’ धातु के लट् लकार में बनने वाले रूपों को जाना और उनका वाक्यों में अभ्यास भी किया। स्मरण करा दूँ कि “अनभ्यासे विषं विद्या” अभ्यास न करने पर विद्या विष का काम करती है। आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों ? मान लीजिये कि आप किसी सभा या गोष्ठी में बैठे हैं और सम्बन्धित विद्या का प्रसंग चल गया और आप अनभ्यास के कारण उसमें भ्रमित हो गये, तो बिना अपमानित हुए न बचेंगे। और “सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।” अकीर्ति या अपमान मरण से भी बढ़कर है। अतः अनभ्यास में विद्या हो गयी न विष के समान ! अतः अभ्यास बहुत आवश्यक है। मैंने एक श्लोक आपको बताया था-

लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा ।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥
इस श्लोक को आप ठीक से स्मरण रखिए। वर्तमान काल के लिए प्रयुक्त होने वाले लट् लकार के विषय में बता दिया गया। लेट् लकार केवल और केवल वेद में ही पाया जाता है अतः उसके विषय में नहीं बतायेंगे। जब कभी वैदिक व्याकरण सिखायेंगे तब उसके विषय में विस्तार से समझायेंगे। अब भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लकारों के विषय में समझाते हैं। भूतकाल के लिए तीन लकार प्रयुक्त होते हैं- “भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा” सबसे पहला है लुङ् लकार, इसी के विषय में आज चर्चा करते हैं। सामान्य रूप से आप भूतकाल के लिए इन तीनों में से किसी का भी प्रयोग कर सकते हैं किन्तु कुछ विशेष नियम जान लीजिए जिससे भाषा में उत्कृष्टता आ जाएगी। संस्कृत में हलन्त, अनुस्वार और विसर्ग पर विशेष ध्यान देना है।

भू (होना), लुङ् लकार
अभूत् (वह हुआ)/ अभूताम् (वे दो हुए) /अभूवन् (वे सब हुए)
अभूः (तू हुआ)/ अभूतम् ( तुम दो हुए)/ अभूत (तुम सब हुए)
अभूवम् (मैं हुआ)/ अभूव (हम दो हुए)/ अभूम (हम सब हुए)

लुङ् लकार के विषय में निम्नलिखित नियम स्मरण रखिए –

१) सबसे पहली बात तो यह स्मरण रखिए कि लुङ् लकार का प्रयोग ‘सामान्य भूतकाल’ के लिए होता है। ‘सामान्य भूतकाल’ का अर्थ है कि जब भूतकाल के साथ ‘कल’ ‘परसों’ आदि विशेषण न लगे हों। बोलने वाला व्यक्ति चाहे अपना अनुभव बता रहा हो अथवा किसी अन्य व्यक्ति का, अभी बीते हुए का वर्णन हो या पहले बीते हुए का, सभी जगह लुङ् लकार का ही प्रयोग करना है। भले ही घटना साल भर पहले की हो किन्तु यदि कोई विशेषण नहीं लगा है तो लुङ् लकार का ही प्रयोग होगा।

२) ‘आज गया’ , ‘आज पढ़ा’ , ‘आज हुआ’ आदि अद्यतन (आज वाले) भूतकाल के लिए भी लुङ् लकार का ही प्रयोग करना है, लङ् या लिट् का नहीं।

३) लुङ् लकार के रूप के साथ यदि ‘माङ्’ अव्यय ( मा शब्द ) लगा दें तो उसका अर्थ निषेधात्मक हो जाता है और तब इसका प्रयोग भूतकाल के लिए नहीं अपितु ‘आज्ञा’ या ‘विधि’ अर्थ हो जाता है, जैसे – ” दुःखी मत होओ” = “खिन्नः मा भूः” । एक बात ध्यान रखनी है कि जब माङ् का प्रयोग करेंगे तो लुङ् लकार के रूप के अकार का लोप हो जाएगा। अभूत् – मा भूत्, अभूः – मा भूः ।
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शब्दकोश :
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‘सन्तान’ के पर्यायवाची शब्द –
१) सन्तानः ( पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग में)
२) अपत्यम् ( नपुंसकलिंग )
३) तोकम् ( नपुंसकलिंग )
‘देह’ (शरीर) के पर्यायवाची शब्द –
१) कलेवरम् ( नपुंसकलिंग )
२) गात्रम् ( नपुंसकलिंग )
३) वपुष् ( नपुंसकलिंग )
४) संहननम् ( नपुंसकलिंग )
५) शरीरम् ( नपुंसकलिंग )
६) वर्ष्मन् ( नपुंसकलिंग )
७) विग्रहः ( पुँल्लिंग )
८) कायः ( पुँल्लिंग )
९) देहः ( पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग (देहम्) )
१०) मूर्तिः ( स्त्रीलिंग )
११) तनुः ( स्त्रीलिंग )
१२) तनूः ( स्त्रीलिंग )
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वाक्य अभ्यास :
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तुम्हारे घर सन्तान हुई।
= तव गृहे सन्तानः अभूत्।
महान् उत्सव हुआ।
= महान् उत्सवः अभूत्।
तुम्हारे माता और पिता आनन्दित हुए।
= तव माता च पिता च आनन्दितौ अभूताम्।
सभी आनन्दमग्न हो गए।
= सर्वे आनन्दमग्नाः अभूवन्।
तुम भी प्रसन्न हुए।
= त्वम् अपि प्रसन्नः अभूः।
तुम दोनों बहुत आनन्दित हुए।
= युवां भूरि आनन्दितौ अभूतम्।
तुम सब थकित हो गये थे।
= यूयं श्रान्ताः अभूत ।
मैं भी थकित हो गया था।
= अहम् अपि श्रान्तः अभूवम्।
हम दोनों उत्सव से हर्षित हुए।
= आवाम् उत्सवेन हर्षितौ अभूव।
हम सब आनन्दित हुए।
= वयम् आनन्दिताः अभूम।
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श्लोक :
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गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ॥
चलती हुई चींटी सैकड़ों योजन चली जाती है, न चलता हुआ गरुड भी एक पग नहीं जाता । इसलिए चलते रहो।
॥ शिवोऽवतु ॥
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– श्यामकिशोर मिश्र

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Agniveer aims to establish a culture of enlightened living that aims to maximize bliss for maximum. To achieve this, Agniveer believes in certain principles: 1. Entire humanity is one single family irrespective of religion, region, caste, gender or any other artificial discriminant. 2. All our actions must be conducted with utmost responsibility towards the world. 3. Human beings are not chemical reactions that will extinguish one day. More than wealth, they need respect, dignity and justice. 4. One must constantly strive to strengthen the good and decimate the bad. 5. Principles and values far exceed any other wealth in world 6. Love all, hate none