लृङ् लकार

नमः संस्कृताय!

लृङ् लकार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लकार है। कारण और फल के विवेचन के सम्बन्ध में जब किसी क्रिया की असिद्धि हो गई हो अर्थात् क्रिया न हो सकी हो तो ऐसे भूतकाल में लृङ् लकार का प्रयोग होता है। “यदि ऐसा होता तो वैसा होता” -इस प्रकार के भविष्यत् के अर्थ में भी इस लकार का प्रयोग होता है।

जैसे –
“यदि तू विद्वान् बनता तो सुख पाता।”
= यदि त्वं विद्वान् अभविष्यः तर्हि सुखं प्राप्स्यः।
यदि अच्छी वर्षा होती तो अच्छा अन्न होता।
= सुवृष्टिः चेत् अभविष्यत् तर्हि सुभिक्षः अभविष्यत्।

लृङ् लकार भूत या भविष्यत् अर्थ में प्रयुक्त होता है। चन्द्र ऋषि द्वारा बनाये गये व्याकरण को मानने वाले वैयाकरण भविष्यत् काल के लिए लृङ् का प्रयोग नहीं करते अपितु लृट् का ही प्रयोग करते हैं।

भू धातु , लृङ् लकार
अभविष्यत् अभविष्यताम् अभविष्यन्
अभविष्यः अभविष्यतम् अभविष्यत
अभविष्यम् अभविष्याव अभविष्याम

यदि आप ध्यानपूर्वक देखेंगे तो पायेंगे कि ये रूप लङ् लकार की भाँति ही हैं, केवल ‘इष्य’ अधिक जुड़ गया है। तुलना करके देखिए –

अभवत् अभवताम् अभवन्
अभवः अभवतम् अभवत
अभवम् अभवाव अभवाम

भक्ष् (खाना) धातु, लृङ् लकार
अभक्षयिष्यत् अभक्षयिष्यताम् अभक्षयिष्यन्
अभक्षयिष्यः अभक्षयिष्यतम् अभक्षयिष्यत
अभक्षयिष्यम् अभक्षयिष्याव अभक्षयिष्याम
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शब्दकोश :
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फलों के नाम
कैथा-
१] कपित्थः
२] ग्राही
३] मन्मथः
४] दधिफलः
५] पुष्पफलः
६] दन्तशठः
७] दधित्थः

गूलर-
१] उदुम्बरः
२] हेमदुग्धः
३] जन्तुफलः
४] यज्ञाङ्गः
५] यज्ञयोग्यः

नींबू-
१] दन्तशठः
२] जम्भः
३] जम्भीरः
४] जम्भलः
५] जम्भी
६] रोचनकः
७] शोधी
८] जाड्यारिः
९] दन्तहर्षणः
१०] गम्भीरः
११] जम्बिरः
१२] दन्तकर्षणः
१३] रेवतः
१४] वक्त्रशोधी
१५] दन्तहर्षकः
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वाक्य अभ्यास :
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यदि वह कच्चा कैथा खाता तो कफ न होता।
= यदि असौ आम-कपित्थम् अभक्षयिष्यत् तर्हि कफः न अभविष्यत्।
यदि तुम कैथा खाते तो हिचकी ठीक हो जाती।
= यदि त्वं दधित्थम् अभक्षयिष्यः तर्हि हिक्का सुष्ठु अभविष्यत्।
यदि वे पके गूलर खाते तो उनका दाह ठीक हो जाता।
= यदि अमी पक्वान् उदुम्बरान् अभक्षयिष्यन् तर्हि तेषां दाहः सुष्ठु अभविष्यत्।
यदि तुम गूलर खाते तो पुष्ट हो जाते।
= यदि त्वं हेमदुग्धान् अभक्षयिष्यः तर्हि पुष्टः अभविष्यः।
तुम सब यदि नींबू खाते तो मुँह में दुर्गन्ध न होती।
= यूयं यदि जम्भलम् अभक्षयिष्यत तर्हि मुखे दुर्गन्धः न अभविष्यत्।
यदि मैं नींबू खाता तो मन्दाग्नि न होती।
= यदि अहं जम्बीरम् अभक्षयिष्यम् तर्हि मन्दाग्निः न अभविष्यत्।
यदि तुम दोनों भी नींबू खाते तो हृदयशूल न होता।
= यदि युवाम् अपि रेवतम् अभक्षयिष्यतम् तर्हि हृदयशूलः न अभविष्यत्।
यदि हम दोनों खेत में होते तो कैथे खाते।
= यदि आवां क्षेत्रे अभविष्याव तर्हि दधिफलान् अभक्षयिष्याव।
हम सब वहाँ होते तो गूलर खाते।
= वयं तत्र अभविष्याम तर्हि जन्तुफलान् अभक्षयिष्याम।
तुम होते तो तुम भी खाते।
= त्वम् अभविष्यः तर्हि त्वम् अपि अभक्षयिष्यः।
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श्लोक :
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अभक्षयिष्यं यदि दुग्धदाधिकं
घृतं रसालं ह्यपि हेमभस्मकम्।
बताभविष्यं न कदापि दुर्बलः
यथा त्विदानीं तनुविग्रहोऽभवम्॥
यदि मैंने दूध-लस्सी, घी, रसीले आम और सुवर्णभस्म खाया होता तो हाय ! मैं कभी दुर्बल न होता जैसे आज सुखड़े शरीर वाला मैं हो गया हूँ।

॥ शिवोऽवतु ॥
#अग्निवीर #Agniveer #অগ্নিবীর #અગ્નિવીર #Agniveersanskrit #Revivingsanskrit
– श्यामकिशोर मिश्र

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