नमः संस्कृताय !!
सुधी मित्रों ! पिछले पाठ में मैंने क्रियाओं के विषय में थोड़ी चर्चा की थी। मैंने बताया था कि “कर्त्ता की चेष्टा या अस्तित्व को ‘क्रिया’ कहते हैं।” यह भी बताया था कि ‘अकर्मक’ और ‘सकर्मक’ भेद से क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं। अब बताएँगे कि कौन सी क्रियाएँ ‘अकर्मक’ होती हैं और कौन सी ‘सकर्मक’।

१) पहले तो यह जान लीजिए कि इन दोनों प्रकार की क्रियाओं को बताने के लिए या इनका वर्णन करने के लिए जिन ( पठति, खादति, हसति, खेलति आदि ) शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उनके मूल अंश को ‘धातु’ कहते हैं।

२) ये धातुएँ लगभग द्विसहस्र हैं। बहुत से आचार्यों ने इनका अर्थसहित संग्रह किया था। किन्तु सबसे प्रसिद्ध संग्रह महर्षि पाणिनि का ‘धातुपाठ’ है। यह ‘धातुपाठ’ उन्हीं के महान् ग्रन्थ ‘अष्टाध्यायी’ का परिशिष्ट है। यह ग्रंथ आपको अपने पास अवश्य रखना चाहिए।

३) जब क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं तो उनका वर्णन करने वाली धातुएँ भी दो प्रकार की हुईं- अकर्मक और सकर्मक। अकर्मक क्रियाएँ बहुत थोड़ी ही हैं, जबकि सकर्मक बहुत सी हैं। इसलिए अकर्मक धातुओं को स्मरण रखने के लिए एक श्लोक में इकट्ठा कर दिया गया है-

लज्जा-सत्ता-स्थिति-जागरणं
वृद्धि-क्षय-भय-जीवित-मरणम्।
शयन-क्रीडा-रुचि-दीप्त्यर्थं
धातुगणं तेऽकर्मकम् आहुः ॥

४) उपर्युक्त श्लोक में जितने अर्थ गिनाए गये हैं, उन अर्थों वाली धातुएँ ‘अकर्मक’ होती हैं। देखिए-
लज्जा अर्थ वाली—- लज्ज् , ह्री
सत्ता अर्थ वाली—– भू , अस् , विद् , वृतु
स्थिति अर्थ वाली—- स्था
जागरण अर्थ वाली— जागृ
वृद्धि अर्थ वाली—— वृध् , एध् , प्याय्
क्षय अर्थ वाली—— क्षि
भय अर्थ वाली——- भी
जीवन अर्थ वाली—– जीव् , अन्
मरण अर्थ वाली—— मृङ्
शयन अर्थ वाली—— शीङ् , स्वप् , सस्
क्रीडा अर्थ वाली—— क्रीड् , खेल् , रम्
रुचि अर्थ वाली——- रुच्
दीप्ति अर्थ वाली——- दीप् , ज्वल्

आगामी पाठों में इनका प्रयोग भी आपको करवायेंगे । केवल इस श्लोक में गिनाए गये अर्थों वाली धातुएँ ही अकर्मक नहीं हैं अपितु कुछ अन्य अकर्मक धातुएँ भी हैं, जिनका ज्ञान आपको यथास्थान होता रहेगा।

५) ध्यातव्य : यदि आपसे कहा जाए कि “महेन्द्र फुटबॉल खेलता है” इस वाक्य में खेलता है क्रिया सकर्मक है अथवा अकर्मक ? तो आप यह सोचकर भ्रमित न होइयेगा कि ‘फुटबॉल को खेलता है’ इसलिए यह सकर्मक क्रिया है। वास्तव में वह फुटबॉल “से” खेलता है। फुटबॉल “खेलना” क्रिया का करण (साधन) है।

६) उपर्युक्त धातुओं के अतिरिक्त धातुओं को सकर्मक समझना चाहिए।

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वाक्य अभ्यास :
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“तुम गड्डमड्ड वाक्यों से मेरी बुद्धि को मोहित कर रहे हो।”
‘तुम’ कर्त्ता, ‘गड्डमड्ड वाक्य’ करण, ‘मेरी’ सम्बन्ध, ‘बुद्धि’ कर्म, ‘मोहित कर रहे हो’ सकर्मक क्रिया।
= त्वं व्यामिश्रैः वाक्यैः मम बुद्धिं मोहयसि।

“हे केशव ! तुम मुझे घोर कर्म में क्यों लगाते हो ?”
‘हे केशव’ सम्बोधन, ‘तुम’ कर्त्ता, ‘मुझे’ कर्म, ‘घोर कर्म’ अधिकरण, ‘क्यों’ अव्यय, ‘लगाते हो’ सकर्मक क्रिया।
हे केशव ! त्वं माम् घोरे कर्मणि कथं नियोजयसि ?

“बन्दर पैरों से चलता है और दो हाथों से फल खाता है।”
‘बन्दर’ कर्त्ता, ‘पैर’ करण, ‘चलता है’ अकर्मक क्रिया, ‘और’ अव्यय, ‘दो हाथ’ करण, ‘फल’ कर्म, ‘खाता है’ सकर्मक क्रिया।
वानरः पादाभ्यां चलति हस्ताभ्यां च फलानि खादति।

“धूर्तों के हृदय में दया नहीं होती है।”
‘धूर्त’ सम्बन्ध, ‘हृदय’ अधिकरण, ‘दया’ कर्त्ता, ‘होती है’ अकर्मक क्रिया।
धूर्तानां हृदये दया न भवति।

विद्यालय के अध्यापकों को मैं जानता हूँ ।
‘विद्यालय’ सम्बन्ध, ‘अध्यापकों को’ कर्म, ‘मैं’ कर्त्ता, ‘जानता हूँ’ सकर्मक क्रिया।
विद्यालयस्य अध्यापकान् अहं जानामि।

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श्लोक :

यत् करोषि* यत् अश्नासि*
यत् जुहोषि* ददासि* यत्।
यत् तपस्यसि* कौन्तेय
तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ९।२७॥)

इस श्लोक में * चिह्न वाली क्रियाएँ लट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन की हैं। अर्थ पुस्तक में ढूँढकर देखें।

॥शिवोऽवतु॥

– श्यामकिशोर मिश्र

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