Save Education to Save Nation!!

Save-Education-to-Save-Nation!!

To save Nation, save Education!! An excellent documentary by Shiksha Sanskriti Utthan Nyas (SSUN), our Educational partner and soulmate of Agniveer that works towards Educational Reforms and removing distortions from existing syllabus. It sums up our Educational Vision.

SSUN has been instrumental in forcing government and universities to remove controversial material denigrating historical role models and Vedas. It led the Shiksha Bachao Andolan ( Save Education Movement) under whose leadership we all relentlessly worked to force NCERT to remove a large number of objectionable portions that denigrated Vedas, freedom fighters and saints. Similarly Delhi University was forced to withdraw texts insulting Vedas and Ramayan characters like Ram, Sita, Hanuman and Lakshman.

Under SSUN, we propose a 6 point educational vision that includes:

- Moral Development

- Personality Development

- Value Education

- Environmental Education

- Primary Education in Vernacular Language

- Autonomous Education (independent of political agendas)

A great focus is put on Vedic Mathematics to sharpen minds.

Please watch this video to know more. Its a must watch.

http://www.youtube.com/watch?v=Eltiwfss1po

To join our Educational Mission, please contact Shiksha Sanskriti Utthan Nyas (SSUN), please visit http://www.bharatiyashiksha.com/ or contact atulssun@gmail.com

 

The 4 Vedas Complete (English)

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Comments

  1. Siddarth says

    Wonderful initiative by Agniveer. Would like to suggest that Agniveer also take into account the ideas/suggestions given by Shri Rajiv Dixit ji. Attaching the related video below which gives the history of Indian Education System before the British rule. A very enlightening video and an eye-opener for all Indians:

    http://www.youtube.com/watch?v=1SVh5I5d4Ts

    • says

      Untimely death of Sri Rajiv Dixitji is a great loss for the nation. SSUN has created a complete panel of educationists to plan and implement an ideal educational framework embedded in our cultural values and is autonomous (not influenced by political agendas). We strongly recommend bright minds to join it and spearhead the cause of educational revolution.

    • Siddarth Rai says

      Dear Agniveerji,
      I think, it is of paramount importance that we Indians give up studying in English and start schools, colleges and universities that teach all the topics (be it Science, Engineering, technology or social sciences) in the regional languages of India like: Hindi, Telugu, Tamil, Malyalam, Punjabi, Odiya, Kannada, Assami, etc.
      Language in fact defines the expression of the emotions of a civilization which can never be truly translated into any other language other than the native language.
      A recent book written by Shri Rajiv Malhotra ji, “Being Different” clearly describes the inherent difference in the Abrahamic and the Dharmic traditions (Link: http://beingdifferentbook.com/)
      But, to be able to make the education in our languages relevant, we need to have people who can take the initiative to build companies and institutions where the work is also done in the native language only, so that people who pass out of universities teaching in the regional languages can rightfully find jobs of their interests also.
      For Example: All the Far-East Asian countries (like Singapore, Taiwan, Korea, China, Japan) speak and work in their own language. Even the study of Modern Technology and Sciences is done in their own language. And any book that gets published anywhere in the world gets translated to their languages in less than a month if not weeks!!! That is because they have strong translation agencies built and supported by their respective governments. It is also an important point to note here that, their translation is not just blind transliteration of words, but detail analysis is done as to how the word as expressed in the foreign language can be equivalently expressed in a similar emotion of the native language. Only in the worst case if there is no such equivalent emotion existing in the native language is the new foreign word then adopted into their language.
      However, we should firstly give up this fear that we do not have any growth if we study and work in our mother tongue (as rightly…

      • Siddarth Rai says

        However, we should firstly give up this fear that we do not have any growth if we study and work in our mother tongue (as rightly suggested by Shri Rajiv Dixit ji in one of his speeches – हमें सबसे पहले अंग्रेजी भाषा द्वारा थोपी गयी मानसिक गुलामी से बाहर आना है ।). For this, we need to work hard to make companies and other such organizations/institutes which have all the work going on in the regional language and can also pay the employees and themselves make profits as well. A whole new environment has to be created for this to happen because, I think it is the birth-right of every individual in this world to speak and work in his/her mother tongue.

        • says

          These systems can only evolve over a period of time. However having Primary Education in mother-tongue is a natural and essential first step.

    • says

      Interesting, PYPT and BST should work with SSUN who has been spearheading education revolution embedded in cultural values and has an impeccable track record of bringing ground level changes – be it in NCERT syllabus, or DU or Sex education proposal and many other initiatives.

  2. Kruti Trivedi says

    Great Great work. I was searching for such institute who works for education revolution and many many thanks to Agniveer for sharing this. It will be great pleasure for me to join them in nearer future.

  3. says

    http://agniveerfans.wordpress.com/2011/12/12/ramayan/

    ‘थ्री हंडरेड रामायण’ (300 Ramayan) बनाम ‘रंगीला रसूल’

    मीडिया में विशेषकर अंग्रेजी मीडिया में रामानुजम द्वारा लिखित ‘थ्री हंडरेड रामायण’ नामक एक लेख की विशेष चर्चा जोरों पर हैं. कारण है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर एवं अन्य अनेक बुद्धिजीवी केवल रामायण के भिन्न कथन (Many Ramayan) पढ़ाने की जिद कर रहे हैं? रामानुजम नामक एक प्रोफेसर जो न संस्कृत के विद्वान थे और न ही इतिहासकार थे ने रामायण के बारे में सुनी-सुनाई बातों पर ‘थ्री हंडरेड रामायण’ नामक एक लेख लिखा था जिसे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस ने प्रकाशित किया था और जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यकर्म में शामिल किया गया था. सदियों से रामायण महाग्रंथ के माध्यम से हिन्दू समाज के पुरोधा मर्यादापुरुषोत्तम रामचंद्र जी महाराज का जीवन संपूर्ण विश्व को बुराई पर अच्छाई की जीत, पिता के आदेश का सम्मान,भाइयों में आपसी प्रेम और त्याग का उदहारण प्रकट कर समाज को उचित मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता आ रहा हैं. यही कारण हैं की रामायण की प्रसिद्धि भारतभर में ही नहीं अपितु विश्व के प्रत्येक देश में हैं. भारत के बाहर जावा सुमात्रा, मलेशिया, थाईलैंड , श्री लंका आदि देशों में तो भारत के समान रामलीला का आयोजन हर वर्ष विशेष रूप से स्थानीय निवासियों द्वारा ही किया जाता हैं.

    रामायण इतनी ज्यादा प्राचीन हैं की समय समय पर उसमें कई परिवर्तन होते रहे.वाल्मीकि रामायण का आज जो स्वरुप विद्यमान हैं वह पहले ऐसा नहीं था. जैसे उत्तर रामायण में तो सीता की अग्नि परीक्षा आदि को स्वयं अनेकों विद्वानों ने प्रक्षिप्त माना हैं.

    रामायण में परिवर्तन के पीछे एक कुत्सित उद्देश्य था वह था श्री राम चन्द्र जी महाराज के पावन चरित्र को मलिन करना जिससे की वे हिंदुयों के आदर्श न रहे और विधर्मियों को हिंदुयों को अपने मत में शामिल करने का सुयोग्य अवसर मिल जाये.

    ऐसा प्रयास कुछ अज्ञानी पंडितों से लेकर चार्वाक, वाम मार्गियों, बुद्ध और जैन मत को मानने वालों द्वारा विशेष रूप से किये गए थे. जैसे वाममार्ग को मानने वालों ने रामायण में अनेक प्रसंगों को मिला दिया जिसमे श्री रामचंद्र जी महाराज को मांसाहारी दिखाया गया था जबकि वाल्मीकि रामायण में ही अनेक प्रसंग मांस भक्षण और जीव हत्या के विरुद्ध मिलते हैं.

    ऐसा ही एक प्रयास शम्बूक को लेकर…

  4. says

    ऐसा ही एक प्रयास शम्बूक को लेकर किया गया जिसमे यह दिखाया गया की एक तपस्वी शुद्र की हत्या श्री रामचंद्र जी महाराज द्वारा हुई जोकि अत्याचार था. इस असत्य और घटना को आज अपने आपको दलित विशेष कहने वाले वर्ग द्वारा बार बार उछाल कर श्री राम चन्द्र जी महाराज को बदनाम किया जाता हैं.

    चारों वेदों के ज्ञाता श्री राम वेदानुयाई थे , वेद में स्पष्ट रूप से शुद्र जन्म से नहीं अपितु गुणों से रहित व्यक्ति को कहा गया हैं और शुद्र को वेद पड़ने का पूरा अधिकार भी दिया गया हैं .इसलिए शम्बूक का वध एक काल्पनिक घटना के अलावा ओर कुछ भी नहीं हैं.कालांतर में रामायण में अनेक परिवर्तन हुए जैसे तमिलनाडु में करीब ७०० वर्ष पूर्व रचित कम्ब रामायण में श्री राम को मांसाहारी बताया गया हैं.

    मांसाहार का पूरजोर समर्थन करने वाले विशेष रूप से इस्लाम को मानने वाले कम्ब रामायण के आधार पर मांसाहार का समर्थन करते हैं.

    आगे श्री लंका और आंध्र प्रदेश में पाने वाले परिवर्तित संस्करणों में दर्शाया गया की सीता रावण की बेटी थी. ऐसा लिखने का एक ही मंतव्य हमारे समझ में आता हैं श्री राम ने अपने ही ससुर पर बेवजह आक्रमण कर शांति प्रिय असुर जाति की राजधानी श्री लंका को तबाह कर दिया. यह एक दलित राजा पर आर्य आक्रमण का प्रमाण हैं. आर्य द्रविड़ युद्ध का आज तक कोई प्रमाण नहीं मिला हैं. इस तथाकथित परिवर्तन के कितने दुष्परिणाम हो सकते हैं पाठक स्वयं समझ गए होगे.

    एक ओर परिवर्तन जो अत्यंत चिंताजनक हैं हमारे प्रकाश में आया हैं वह हैं की श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण की सीता पर कुदृष्टि थी. सबसे पहले तो यह हमारे आदर्श चरित्रों को बदनाम करने का एक कुत्सित प्रयास हैं दुसरे स्वछंद सम्बन्ध को आधुनिकता के नाम पर समर्थन करने वालों को एक ओर बहाना ओर मिल जायेगा की जब रामायण समर्थन करती हैं तो फिर आप कौन हैं बीच में आक्षेप करने वाले जैसे वाममार्ग द्वारा रचित कामसूत्र और खजुराओ के मंदिरों को हिन्दू धर्म के प्रतीक कह कर विदेशी मीडिया खासा बदनाम करता रहा हैं जबकि उससे पूर्व रचित वेद के संयम और ब्रहमचर्य के सन्देश की अवहेलना करना उसके लिए आम बात हैं.सत्य यह हैं की जब वन में भटकते हुए श्री राम को हनुमान और सुग्रीव द्वारा सीता माता की चूरामणि दी गयी तो श्री राम ने उन्हें पहचान लिया जबकि लक्ष्मण उसे न पहचान पाए क्यूंकि वे बोले में तो केवल सीता माता के पैरों में पहनने वाले आभूषणों को…

  5. says

    पहचानता हूँ जिन्हें मैं हर रोज प्रात: काल उनके चरण स्पर्श करते हुए देखता था मैंने कभी उनके मुख की तरफ नहीं देखा. ऐसा महान आदर्श हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया थे जो की विश्व की किसी भी मत- मतान्तर में पढने को नहीं मिलते. फिर लक्ष्मण की सीता माता पर कुदृष्टि थी ऐसा लिखने वाले कितने बड़े पापी और अज्ञानी हैं.

    रामानुजन नामक तथाकथित वामपंथी प्रोफेसर ने इस प्रकार के जितने भी असत्य परिवर्तन थे उनको एकत्र कर एक लेख के रूप में लिखा था जिसे हम ‘थ्री हंडरेड रामायण’ के नाम से जानते हैं.रामानुजम के शब्दों में केवल विचित्र, अपमानजनक शब्दों में ‘धक्का पहुंचाने वाली’ टिप्पणिया इस लेख में एकत्र की गई हैं।

    इस लेख में रामायण के सम्बन्ध में ऐसे निरर्थक और भ्रामक विचार लिखे गए थे की इसलिए विश्व विद्यालय ने अपील करने पर धार्मिक भावनायों का सम्मान करते हुए उसे अपने पाठ्यक्रम से हाथ दिया . विश्व विद्यालय के इस उचित कदम के विरुद्ध तथाकथित वामपंथी और मुस्लिम- ईसाई इतिहासकारों ने शोर मचा कर उसे विचारों की अभिव्यक्ति पर लगाम, साहित्य सृजन की स्वतंत्रता में रुकावट आदि आदि बहाने बनाकर उसे दोबारा से पाठ्य क्रम में लगाने के लिए शोर मचा रहे हैं जो की एक प्रकार से दुराग्रह के अलावा कुछ भी नहीं हैं.

    हमारा तथाकथित हिन्दू विरोधी लाबी से कुछ प्रश्न हैं. अगर साहित्य की रक्षा इतनी हे आवश्यक हैं जिसमे साहित्य किस कोटि का हैं इस तथ्य को भी नाकारा जा सकता हैं अथवा उसका उद्देश्य क्या हैं उसकी भी नाकारा जा सकता हैं तब तो इस्लाम और ईसाइयत के विषय में भी विभिन्न साहित्य की रचना हुई हैं जो इस्लाम और ईसाइयत के विभिन्न दृष्टीकौनों को समझने का प्रयास मात्र हैं उन्हें भी प्रचारित किया जाना चाहिए .

    जैसे शुरुआत आज़ादी से पहले खासी चर्चा में रही और धर्म वीर महाशय राजपाल के शहीद होने का कारण बनी पुस्तक रंगीला रसूल (Rangila Rasool)को भी इस्लाम को समझने की दृष्टी में दिल्ली विश्व विद्यालय के पाठ्यक्रम में लगाया जाये तो साहित्य के प्रचार प्रसार में उसे क्रान्तिकारी कदम माना जायेगा .

    मुस्लिम जगत के नेता और अलीगढ मुस्लिम विश्व विद्यालय की स्थापना करने वाले सर सय्यद अहमद खान द्वारा कुरान का नवीन भाष्य किया गया था जिसके विरुद्ध अरब तक से उनके विरुद्ध फतवे दिए गए थे उसे भी पाठ्क्रम में लगाया जाये तो उचित कदम कहा जायेगा.

    इस्लाम के मूर्धन्य विद्वान पंडित…

  6. says

    इस्लाम के मूर्धन्य विद्वान पंडित चमूपति द्वारा रचित चौदहवी का चाँद, वैदिक स्वर्ग और पंडित गंगा प्रसाद द्वारा रचित इस्लाम के दीपक भी पाठ्क्रम में लगाया जाये तो उचित कदम कहा जायेगा.

    पाकिस्तान में ही जन्मे और इस्लाम के विद्वान डॉ गुलाम जिलानी द्वारा रचित दो इस्लाम अर्थात (Dual Islam) को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता हैं जिसके अनुसार कुरान में वर्णित इस्लाम हदीसों से अलग हैं.

    विश्व प्रसिद्द लेखक सलमान रश्दी द्वारा रचित सतानिक वेर्सेस (satanic verses) और बंगलादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन इन दोनों के विरुद्ध भी अनेक फतवे इस्लाम को मानने वालों ने दिए हैं को भी इस्लाम को समझने की दृष्टी में दिल्ली विश्व विद्यालय के पाठ्यक्रम में लगाया जाये तो साहित्य के प्रचार प्रसार में उसे क्रान्तिकारी कदम माना जायेगा.

    ईसाई समाज द्वारा नकार दी गयी डान ब्राउन (Dan brown) द्वारा रचित ‘द डी विन्सी कोड’ (The Di Vinci Code) पर भी हमारा यही विचार हैं.

    इन सभी पुस्तकों और इन जैसी कई पुस्तकों के नाम देने का उद्देश्य उस दोहरे मापदंड को दर्शाना हैं जो हिन्दू समाज के विरुद्ध वामपंथी बुद्धिजीवी? वर्ग अपनाये हुए हैं की हिन्दुओं के विरुद्ध तो किसी भी प्रकार का कुत्स साहित्य विचारों की अभिव्यक्ति की श्रेणी में आता हैं जबकि ईसाई और इस्लाम मत के सम्बन्ध में लिखा गया कोई भी साहित्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों का दमन करने वाले और उनके विरोद्धी दक्षिणपंथी विचारधाराओं का उन्हें दबाने का प्रयास हैं.पहले भी ऐसे प्रयास सीता सिंग्स तरहे ब्लुएस (Sita Sings The Blues) के माध्यम से हो चुके हैं.

    अथवा आर्य द्रविड़ की घटिया राजनीती करने वाले तमिल नाडू के पूर्व मुख्यमंत्री करूणानिधि द्वारा भी श्री राम को रामसेतु मुद्दे पर काल्पनिक बताना अत्यंत खेदजनक था.

    मकबूल फ़िदा हुसैन द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स भी इसी श्रेणी में आती हैं क्यूंकि केवल हिन्दू देवी देवताओं के अश्लील चित्र बना कर उसे विचारों की अभिव्यक्ति कहना दोगली नीति हैं. हुसैन की इतनी हिम्मत कभी नहीं हुई की इस्लाम अथवा ईसाइयत से सम्बंधित किसी की भी ऐसी पेंटिंग्स बना सके पर सबसे बड़ी विडम्बना यही रही की उनके मरने के बाद वामपंथी जब घरियाली आंसू बहाने लगे तो मीडिया ने हुसैन के भगोड़े होने की काले पानी की सजा से तुलना करी थी.

    आज के युवा आसानी से धर्म के नाम पर परोसी जा रही इस दोगली…

  7. says

    आज के युवा आसानी से धर्म के नाम पर परोसी जा रही इस दोगली निति को समझ गए हैं और सभी मिलकर हमारी श्रेष्ठ विचारधारा को हानी पहुँचाने वाले ऐसे कुत्सित प्रयासों का मुहतोड़ जवाब दे तभी हम आर्य जाति के सच्चे सिपाही कहलाने जायेगे.

  8. says

    Need of the hour! In the era of mushrooming schools, an absolute need of Vedic Mathematics, Vedic Education that makes the Indian true to his backbone is never required more than now. Above all, the whole of Education must be made Open Source so as to retain quality and get rid of business-minded approach. We at GnanaBoomi.com is on a wild search for such a framework. Agniveer/SSUN, please come up with such a framework.

    PS: I found most of the articles there in SSUN site are in Hindi. It would be nice to have it in English for a wide spread.

    Regards
    Admin, GnanaBoomi.com

  9. Guru says

    Thanks Agniveer Ji for your enlightening article. I am a great fan of all the constructive work done for Hinduism by you. But I wanted to ask you something. I am annoyed by many Muslims who have even put up videos on YouTube claiming that Rig Veda 1:176:4 preaches violence. Please explain the true meaning so that I can rebuff those Islamists.

    • says

      @Guru
      Idea of Rigveda mantra 1/176/4 – The king should punish the people who are against humanity, like the learned who showers happiness on everyone, similarly king and everyone should try to give pleasure to others at their level best.
      These people who should be punished are like rapist, looter, thieves, pedophilia, kidnapper, child abuser (who indulge in sex with child) etc.

    • Roshan Karia says

      Rig 1:176:4:-
      Its a Prayer to “Indra”(The Force which controls our Senses) that:- ” The Person who first promised to offer Soma to you in a Yagna(remember yagna is not compulsory its our choice),, But doesnt do so when the Yagna is actually happening,
      You should Punish such a Lazy Person ,, and the benefits which he was going to avail should be Given to Hard working People like Us.”

      And it doesnt say “SLAY EVERYONE” ,, its a Prayer to our inner senses that a Lazy Person should not get Benifits,, Such a Persons Senses will eventually die due to laziness,,
      Instead the benefits should be transferred to a Person who is Hard Working and Sacrifices Soma Juice in the Yagna.
      Moral:- Dont be Lazy or ur senses will eventually Die

  10. says

    @All : Islamic sites has banned me when I asked this question
    what kind of God allah is that he allows a rapist, terrorist, looter to enter inside the Kaaba but not non-believers like (Budhha, Jesus, Mother Teressa, mahatama Gandhi etc. i) however they good & call them worst creatures.

    अल्लाह कैसा खुदा है जो एक आतंकवादी, बलात्कारी, लुटेरे, चोर, डाकू आदी को तो काबे के अन्दर प्रवेश की आज्ञा देता है उन्हें अपना सेवक मानता है परन्तु एक संत जैसे स्वाभाव के व्यक्ति को नहीं जैसे ( ईशा मसीह, मदर टेरीसा, महात्मा गाँधी, सुकरात आदि) और ऐसे व्यक्ति को सबसे घटिया पैदाइश, कुफ्र , मुशरिक आदि नामो से पुकारता है !

  11. Deepak says

    Dear Agniveer ji,

    aapke sabhi lekh bauhat hi gyanvardhak aur shashtr sammat hote hai, aapka yogdan desh aur dharm ke liye amulya hai. Shiksha ke kshetr me aapa yeh pryas sach me bauhat achha hai. lekin aaj hamari sarkar jo education provide kar rahi , woh hamare desh ke naujwano ko bhramit kar rahi hai, usko rokne ke liye kargar upay karna nihayat jaroori hai. hamare desh ke itihas ko dushit kiya jaa raha hai, Shree Ram aur Shri krishan ji ko kalpnik patr bataya ja raha hai, Jai chand ko desh bhakt aur prithivi raj chohan ko bhagoda parhaya ja raha hai,,,,,,,,,,,

  12. srinivas rao r says

    nice to see comments of work done by friends .. but reality lies more deep inside then seen by only few..

    i have experienced and seen few students till today our younger generation belief is more in a teacher than thier
    parents.

    most govt.. non govt schools hire teachers who have studied subjects left over by our british masters passed by few generations , change is needed for the teachers..
    who still patronise english culture.. more christianised

    we can see this in our students eyes .. glowing when they see a church as a more civilised state and temple with disblief..as moreuncivilised..

    check yourself

  13. dipshi says

    its really a great!in my opinion,i will suggest that there should be,like ancient india,an educational system like brahmacharya ashram,where the student have to spent atleast 24 years in the ashram devoting only in studies,without having any connection with the wordly affairs.

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