81. एक सोचने वाली बात यह भी है कि शाहजहां जिसने मुमताज़ के जीते जी उसके लिए एक महल भी नहीं बनवाया, वह मरने के बाद उसकी निर्जीव देह के लिए इतना आलिशान मकबरा बनवाएगा?

82. एक तथ्य यह भी है कि मुमताज़ की मृत्यु शाहजहां के बादशाह बनने के दो-तीन वर्षों के भीतर ही हो गई थी। तो क्या इतने कम समय में ही शाहजहां ने इतनी अपार संपत्ति बना ली थी कि वह उसे एक भव्य मकबरे के निर्माण में लुटा सके?

83. शाहजहां और मुमताज़ के अनन्य प्रेम की कहानी इतिहास में कहीं नहीं मिलती। परन्तु हां अन्य स्त्रियों के साथ शाहजहां की अवैध कामलिलाओं का वर्णन अवश्य उस काल के इतिहास में छाया हुआ है। जिनमें बांदियां, रखैलें और यहाँ तक कि उस की स्वयं की बेटी जहांआरा का नाम भी शामिल है। जिसने अपनी बेटी तक को नहीं छोड़ा उस अनाचारी, लम्पट शाहजहां का मुमताज़ के शव पर इस तरह पैसा बहाना क्या अब भी समझ में आता है?

84. शाहजहां एक कंजूस और लोभी बादशाह था। अपने सारे विरोधियों को क़त्ल करके उसने गद्दी हासिल की थी। इसलिए उसे कोमल हृदयी, मुहब्बती और खुले दिल से खर्च करनेवाला बताना सरासर झूठ और छल है।

85. कहा जाता है कि मुमताज़ की मृत्यु से ग़मगीन शाहजहां ने एकाएक ताज के निर्माण का फैसला लिया। यह एक मनोवैज्ञानिक असंगति है। क्योंकि इस तरह का मानसिक क्लेश मनुष्य को अवशता और कृति शून्यता की ओर ले जाता है।

86. ऐसा कहते हैं कि शाहजहां मुमताज़ के लिए इस कदर दिवाना था कि उसने मृत मुमताज़ की याद में ताज का निर्माण किया। परन्तु इस तरह का कामुक, दैहिक या लैंगिक प्रेम भी मनुष्य को निर्बल, उदास, अयोग्य और कर्तव्यविहीन ही बनाता है। एक व्यभिचारी व्यक्ति किसी भी रचनात्मक कार्य के लायक नहीं रहता। जब व्यक्ति वैषयिक प्रेम से अवश हो जाता है तो या तो वह किसी की हत्या कर देता है या फ़िर स्वयं आत्महत्या कर लेता है। परन्तु, ऐसा व्यक्ति ताज महल जैसी इमारत नहीं बना सकता। ताज जैसी इमारत तो वहीँ बन सकती है जहां ईश्वर, जननी और मातृभूमि के प्रति असीम प्रेम, निष्ठा, बल तथा गौरव जैसी उच्च भावनाएं विद्यमान हों।

87. सन् 1973 में ताज के सामनेवाले बगीचे में खुदाई की गई। वहां वर्तमान फव्वारों के 6 फीट नीचे दूसरे प्राचीन फव्वारे निकले। इससे दो बातें पता चलती हैं – 1. शाहजहां द्वारा लगाये गए वर्तमान फव्वारों से पूर्व वहां फव्वारे मौजूद थे, जो कि खुदाई में जमीन के अन्दर से मिले। 2. अन्दर से निकले फव्वारों का रुख़ भी ताज की ओर ही था अतः यह इस बात का साफ़ संकेत है कि ताज भी शाहजहां से पूर्व ही अस्तित्व में था। साफ़ है कि बगीचा और उसके फव्वारे सदियों तक मुगलकाल में रख-रखाव की कमी के कारण और हर साल आने वाली बरसाती बाढ़ में डूब कर बरबाद हो गए थे।

88. शाहजहां ने ताज की ऊपरी मंजिल के शानदार कमरों से संगमरमर उखड़वा कर ताज परिसर में जगह–जगह कब्रें बनाने के काम में लिया। इसलिए निचली मंजिल के कमरे जिन में संगमरमर पूरा लगा हुआ है – उन के मुकाबले ऊपरी मंजिल के कमरे जिनकी दिवारों के निचले हिस्से और फ़र्श से संगमरमर उखाड़ा जा चुका है – भग्न और लूटे हुए नजर आते हैं। क्योंकि ऊपरी मंजिल में किसी प्रेषक के प्रवेश पर पाबन्दी है इसलिए शाहजहां की इस डकैती का रहस्य लोगों से अभी तक छिपा रहा है। लेकिन अब मुगलों का जमाना बीते दो सौ वर्ष से ऊपर हो चुके हैं इसलिए अब कोई कारण नहीं कि शाहजहां की इस ऊपरी मंजिल की संगमरमरी लूट को जनता से छिपाया जाए।

89. एक फ्रेंच प्रवासी बर्नियर लिखता है कि ताज के गुप्त निचले कक्षों में किसी भी गैर-मुस्लिम को जाने की मनाही थी क्योंकि वहां कुछ चमकता–दमकता सामान था। अगर वह सामान शाहजहां ने वहां रखवाया होता तो वह बड़ी शान से जनता को दिखाया जाता। किन्तु वह तो हडपी हुई हिन्दू संपत्ति थी जिससे शाहजहां अपना ख़जाना भरना चाहता था इसलिए इसे लोगों से छिपाया गया।  

Original English article is available here: TAJ MAHAL IS A SHIVA TEMPLE – 100 EVIDENCES (PART 11)

 

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