101. सम्पूर्ण ताज परिसर में 400 से 500 कमरे बने हुए हैं। एक मकबरे में इतने बड़े पैमाने पर आवासीय व्यवस्था का होना समझ से परे है।

102. निकटस्थ ताजगंज नगरी की विशाल रक्षात्मक दीवार ताज परिसर को भी अपने में समाहित करती है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि तेजोमहालय राजमंदिर भी इस ताजगंज नगरी का ही एक भाग हुआ करता था। इस नगरी से एक रास्ता निकलकर सीधे ताज की तरफ़ जाता है। ताजगंज द्वार – लाल पत्थर से बना अष्टकोणी उद्यान द्वार – ताज का भव्य कमानीदार प्रवेशद्वार – यह तीनों दरवाजे एक के बाद एक बिलकुल सीध में खड़े हुए हैं। ताजगंज द्वार ताज राजमंदिर परिसर के मध्यवर्ती होने से महत्वपूर्ण है। पश्चिमी द्वार जहां से पर्यटक ताज में प्रवेश करते हैं – मुख्य प्रवेश द्वार नहीं है। परन्तु बहुत से पर्यटक इसी दरवाजे से प्रवेश करते हैं क्योंकि बस अड्डा और रेलवे स्टेशन इस तरफ़ पड़ते हैं।

103. ताजमहल में आमोदजनक गुम्बददार इमारतें और आनंद वाटिकाएं बनी हुई हैं। यदि ताज सच में एक कब्र ही होता तो इस तरह सार्वजनिक मनोरंजन की वाटिकाएं नहीं बनी होतीं।

104. आगरा में लाल किले के गलियारे में ताज की छवि दर्शानेवाला एक छोटा शीशा लगा हुआ है। कहते हैं कि शाहजहां ने अपने जीवन के आख़िरी आठ साल इसी गलियारे के शीशे में ताज की छवि निहारते हुए और मुमताज़ की याद में ठंडी आहें भरते हुए बिताए। यह कहानी कई झूठी बातों का मेल है। पहली बात, बूढ़े शाहजहां को उसके बेटे औरंगज़ेब ने किले के तहखाने में बंदी बनाकर रखा था न कि खुली हवादार और शानदार ऊपरी मंजिल में। दूसरी बात, शीशे का यह टुकड़ा सन् 1930 में पुरातत्व विभाग के एक चपरासी इंशा अल्लाह खान द्वारा लगाया गया था। उसने यह शीशा पर्यटकों को ये दिखाने के लिए लगाया था कि प्राचीन समय में किस तरह छोटे शीशों के टुकड़ों में ताज के हजारों प्रतिबिम्ब झलका करते थे। तीसरी बात, एक बूढा कमजोर शाहजहां जिसके जोड़ों में दर्द और आंखों में मोतिया बिन्द उतर आया था, किस तरह सारा दिन गर्दन टेढ़ी करके धुंधली नज़रों से शीशे के टुकड़े में ताज देखता होगा? वैसे भी जब आगरा किले से सम्पूर्ण ताजमहल ही दिखाई देता है तो उसे शीशे के टुकड़ों में देखने की आवश्यकता भी क्या है? परन्तु आम जनता इतनी नादान है कि धूर्त स्थलप्रदर्शकों (Guides) की इन विवेकहीन गप्पों को भी सच मान लेती है।

105. ताज के गुम्बद की बाहरी सतह पर सैंकड़ों लोहे के छल्ले लगे हुए हैं। गुम्बद की इस विशिष्टता की तरफ़ बहुत कम ध्यान दिया गया है। यह गोल कड़ियां हिन्दुओं द्वारा मिट्टी के दीपक रखने के काम आती थीं, जिनसे पूरा राजमंदिर जगमगा उठता था।

106. जो लोग शाहजहां के ताज पर स्वामित्व और मुमताज़ पर बेइंतहा प्रेम की कहानी पर विश्वास करते हैं, उन्हें लगता है कि शाहजहां-मुमताज़ का जोड़ा कोमल ह्रदय वाले रोमियो और जूलिएट जैसा होगा। परन्तु इसके विपरीत तथ्य कहते हैं कि शाहजहां अत्यंत निर्दयी, क्रूर और अत्याचारी था जिसने मुमताज़ को आजीवन प्रताड़ित ही किया।

107. स्कूल और कॉलेजों में पढाए जाने वाले इतिहास में शाहजहां के शासनकाल को स्वर्णिम युग कहा जाता है – जहां शांति और संपन्नता की भरमार थी। शाहजहां को कई इमारतों का निर्माता और साहित्य का जतन करनेवाला भी बताया जाता है। यह सब मनगढ़ंत बातें हैं। जैसा कि हमने ताजमहल के निर्माण की इस गहरी छान-बीन में देखा – शाहजहां ने एक भी भवन या इमारत का निर्माण नहीं किया बल्कि बनी हुई इमारतों को लूटा और उन्हें नष्ट ही किया। अपने तीस वर्षों के शासनकाल में शाहजहां ने 48 युद्ध अभियान चलाए, इससे पता चलता है कि शाहजहां का शासनकाल शांति और समृद्धि का काल कदापि नहीं था।

108. मुमताज़ की कब्र पर बने गुम्बद के अंदरूनी भाग में सुनहरे रंगों से सूर्य और नाग के चित्र बने हुए हैं। हिन्दू योद्धा स्वयं को सूर्यवंशी कहते हैं अतः सूर्य उनके लिए बहुत महत्व रखता है, जबकि इस्लामिक मकबरे में सूर्य का चित्र होना कोई मायने नहीं रखता और नाग का सम्बन्ध हमेशा से ही भगवान शिव से रहा है।

नकली दस्तावेज

109. ताज में कब्र की देखभाल करनेवाले मुस्लिम “तारीख–ए-ताजमहल” नामक एक दस्तावेज रखते हैं। इतिहासकार एच।जी।कीन उसे ‘संदिग्ध प्रामाणिकता वाला’ दस्तावेज घोषित कर चुके हैं। उनका कथन बिलकुल सही है क्योंकि जब शाहजहां ने ताजमहल बनवाया ही नहीं तो शाहजहां को ताज का निर्माता कहनेवाला कोई भी दस्तावेज सीधे तौर पर जालसाजी ही है। इन नकली दस्तावेजों के अतिरिक्त ताज पर इतिहास के पूरे वृत्तांत भी मिलते है जो इसी तरह से झूठ के पुलिंदे हैं।

110. ताज के बारे में बहुत से इतिहासकार, पुरातत्वविद् और वास्तुकार भी वाद-विवाद, कुतर्क और भ्रामक बातों के कपट जाल में पड़े हुए हैं। वे यह आरम्भ से ही मानकर चलते हैं कि ताज पूरी तरह से मुस्लिम रचना है। लेकिन जब ताज की कमलाकार गुम्बद और चारों कोनों पर मौजूद स्तंभ इत्यादि हिन्दू चिन्हों की तरफ़ उनका ध्यान आकृष्ट कराया जाता है तब वह पाला बदल कर कहते हैं कि संभवतः ऐसा इसलिए है क्योंकि ताज का निर्माण करनेवाले कारीगर हिन्दू थे और इसलिए उन्होंने अपनी हिन्दू शैली को यहां प्रस्तुत कर दिया है। यह दोनों ही दावे गलत हैं क्योंकि मुस्लिम दस्तावेजों के अनुसार ताज का रचनाकार एक मुस्लिम ही था और कारीगर तथा मजदूर हमेशा अपने मालिकों के अनुसार ही चलते हैं। वैसे भी क्या एक मुस्लिम तानाशाह के राज में कारीगर अपनी मनमानी कर सकते थे?

भारत में कश्मीर से लेकर केप कोमोरिन (कन्याकुमारी) तक हिन्दू मूल की सभी ऐतिहासिक इमारतों पर किसी न किसी मुस्लिम शासक या मुस्लिम दरबारी का नाम मढ़ा हुआ है। ताज इसका एक आदर्श उदाहरण है।

आशा है कि विश्व के वे सभी लोग जो भारतीय इतिहास का अध्ययन करते हैं – इस ख़ोज से जागृत होंगे और अपने पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों से मुक्त होकर इस सच्चाई को स्वीकारेंगे।

Original English article is available here: TAJ MAHAL IS A SHIVA TEMPLE – 100 EVIDENCES (PART 13)

From: Works of P.N. Oak

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