वास्तव में वेद किसे माना जाए, इस पर कई तरह के मत हैं. यहां हम इस भ्रम को दूर करने का प्रयास करेंगे. वैदिक साहित्य में सम्मिलित होने वाली पुस्तकें:

१. वेद मंत्र संहिताएँ – ऋग्, यजुः, साम, अथर्व.

२. प्रत्येक मंत्र संहिता के ब्राह्मण.

३. आरण्यक.

४. उपनिषद (असल में वेद, ब्राह्मण और आरण्यक का ही भाग).

५. उपवेद (प्रत्येक मंत्र संहिता का एक उपवेद).

वास्तव में केवल मंत्र संहिताएँ ही वेद हैं. अन्य दूसरी पुस्तकें जैसे ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, ६ दर्शन, गीता इत्यादि ऋषियों द्वारा लिखी गई हैं. यह सब मनुष्यों की रचनाएँ हैं, परमात्मा की नहीं. अत: जहां तक यह सब वेद के अनुकूल हो, वहीं तक समझना और अपनाना चाहिए.

प्रश्न. कात्यायन ऋषि के अनुसार तो ब्राह्मण भी ईश्वरीय हैं तब आप ब्राह्मणों को वेदों का भाग क्यों नहीं मानते?

उत्तर.  १. ब्राहमण ग्रंथों को इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी भी कहते हैं. इन में ऋषियों ने वेद मन्त्रों की व्याख्याएँ की हैं. इसलिए ये ऋषियों की रचनाएँ हैं ईश्वर की नहीं.

२.शुक्ल यजुर्वेद के कात्यायन प्रतिज्ञा परिशिष्ट को छोड़कर (कई विद्वान कात्यायन को इस का लेखक नहीं मानते) अन्य कोई भी ग्रन्थ ब्राह्मणों को वेदों का भाग नहीं कहता.

३. इसी तरह, कृष्ण यजुर्वेद के श्रौत सूत्र भी मन्त्र और ब्राहमण को एक बताते हैं. किन्तु कृष्ण यजुर्वेद में ही मन्त्र और ब्राहमण सम्मिलित हैं. अत: यह विचार केवल उसी ग्रन्थ के लिए संगत हो सकता है. जैसे ‘ धातु’ शब्द का अर्थ पाणिनि व्याकरण में – ‘ मूल’ , पदार्थ विज्ञान में ‘धातु’ (metal) और आयुर्वेद में जो शरीर को धारण करे या बनाये रखे – रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य और ओज होता है. ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद और सामवेद की किसी शाखा में ब्राह्मणों के वेद होने का प्रमाण नहीं मिलता.

४. वेद ईश्वर का शाश्वत ज्ञान हैं. उन में कोई इतिहास नहीं है. पर ब्राहमण ग्रंथों में ऐतिहासिक व्यक्तियों का वर्णन और इतिहास मिलता है.

५. वैदिक साहित्य के सभी प्रमुख ग्रन्थ ऋग्वेद, यजुर्वेद,सामवेद और अथर्ववेद की मन्त्र संहिताओं को ही वेद मानते हैं.

वेद :

ऋग १०.९०.३, यजु ३१.७, अथर्व १९.६.१३, अथर्व १०.७.२०, यजु ३५.५, अथर्व १.१०.२३, ऋग ४.५८.३,यजु १७.९ १( निरुक्त के अनुसार १३.६ ), अथर्व १५.६.९ ,अथर्व १५.६.८, अथर्व ११.७.२४

उपनिषद् :
बृहदारण्यक उपनिषद २.४.१०, १.२.५, छान्दोग्य उपनिषद् ७.१.२, मुण्डक १.१.५, नृसिंहपूर्वतपाणि, छान्दोग्य ७.७.१, तैत्तरीय १.१, तैत्तरीय २.३

ब्राह्मण:
शतपथ ब्राह्मण ११.५.८, गोपथ पूर्व २.१६, गोपथ १.१.२९

महाभारत:
द्रोणपर्व ५१.२२, शांतिपर्व २३५.१, वनपर्व १८७.१४, २१५.२२, सभापर्व ११.३१

स्मृति:

मनुस्मृति : १.२३

पुराण :

पद्मा ५.२.५०, हरिवंश, विष्णु पुराण १.२२.८२, ५.१.३६, ब्रह्मवैवर्त १४.६४

अन्य:
महाभाष्य पाश पाशणिक,कथक संहिता ४०.७,अथर्ववेद सायन भाष्य १९.९.१२,बृहदारण्यवार्तिकसार (२.४) सायन,सर्वानुक्रमणिभूमिका,रामायण ३.२८

इत्यादि.शंकराचार्य ने भी चारों मन्त्र संहिताओं को ही वेद माना है – “चतुर्विध मंत्रजातं  ” (शंकराचार्य बृहदारण्यक भाष्य २ .४ .१ ० )

६. ब्राह्मण ग्रन्थ स्वयं भी वेद होने की घोषणा नहीं करते .

७. शतपथ ब्राह्मण के अनुसार वेदों में कुल ८.६४ लाख शब्द हैं.यदि ब्राह्मणों को भी शामिल किया जाता, तो यह संख्या कहीं अधिक होती.

८. केवल मन्त्र ही जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दंड, रथ और घन पाठ की विधियों से सुरक्षित किए गए हैं. ब्राह्मण ग्रंथों की सुरक्षा का ऐसा कोई उपाय नहीं है.

९. केवल मन्त्रों के लिए ही स्वर भेद और मात्राओं का उपयोग किया जाता है. ब्राह्मणों के लिए नहीं.

१०. प्रत्येक मन्त्र का अपना विशिष्ट ऋषि, देवता, छंद और स्वर है. ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसा नहीं है.

११. यजु: प्रतिशाख्य में कहा गया है कि मन्त्रों से पूर्व ‘ओम’ और ब्राह्मण श्लोकों से पूर्व ‘अथ’ बोला जाना चाहिए. इसी तरह की बात ऐतरेय ब्राह्मण में भी कही गयी है.

१२. ब्राह्मणों में स्वयं उनके लेखकों की जानकारी मिलती है. और मन्त्रों की व्याख्या करते हुए कई स्थानों पर कहा है “नत्र  तिरोहितमिवस्ति” – हमने सरल भागों को छोड़ कर केवल कठिन भागों की ही व्याख्या की है.

प्रश्न. पुराणों को ब्राह्मण कैसे कहा जा सकता है जब कि पुराणों का अर्थ को वेद व्यास के बनाये १८ पुराणों से है?

उत्तर. यह एक बहुत ही गलत धारणा है. पुराण का अर्थ पुरातन या पुराना है और यह नए पुराण तो बहुत आधुनिक समय में लिखे गए हैं.

तैत्तरीय आरण्यक २.९ और आश्वलायन गृह्यसूत्र ३.३.१ में स्पष्ट वर्णित है कि ब्राह्मण ही कल्प, गाथा, पुराण, इतिहास या नाराशंसी कहे जाते हैं. आचार्य शंकर भी बृहदारण्यक उपनिषद २.४.१० के भाष्य में यही कहते हैं.

तैत्तरीय आरण्यक ८.२१ की व्याख्या में सायण का भी यही मत है. काफ़ी प्राचीन माने जाने वाले शतपथ ब्राह्मण(३.४.३.१३) अश्वमेध यज्ञ के ९ वें दिन पुराणों को सुनने का विधान करते हैं. अब यदि पुराणों से मतलब नए ब्रह्मवैवर्त आदि पुराणों से है, तो श्री राम और श्री कृष्ण आदि ने अश्वमेध यज्ञ के ९ वें दिन किस का श्रवण किया था? वेद व्यास के जन्म के बहुत पहले ही ब्राह्मण ग्रंथ मौजूद थे. इन नए पुराणों को झूठे ही वेद व्यास पर थोपा गया है. ब्रह्मवैवर्त पुराण को पढने के बाद तो उसे योग दर्शन पर भाष्य करने वाले ऋषि की रचना मानना संभव ही नहीं है.

प्रश्न. वेदों में इतिहास भी है – जैसे यजुर्वेद ३.६२ में जमदग्नि और कश्यप ऋषियों के नाम मिलते हैं. कई वैदिक मंत्रों में ऐतिहासिक व्यक्तियों का भी उल्लेख है.

उत्तर. इन से भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है. वेदों में आए जमदग्नि और कश्यप शब्द ऐतिहासिक पुरुष नहीं हैं. शतपथ के अनुसार जमदग्नि का अर्थ आंखें तथा कश्यप शब्द का अर्थ प्राण या जीवनीय शक्ति है.और वेदों में यही अर्थ प्रयुक्त हुआ है.

इसी तरह, वेदों में आए हुए सभी नाम गुणवाचक हैं. बाद में मनुष्यों ने इन शब्दों को नाम के रूप में अपना लिया. जैसे, महाभारत में आए हुए लाल और कृष्ण – आडवाणी नहीं हो सकते और शंकराचार्य द्वारा वर्णित ‘माया’  का मतलब आज की मायावती से नहीं है. ऐसा ही वेदों में आये शब्दों के साथ भी है.

प्रश्न. वेदों की शाखाएं क्या हैं? वेदों की ११३१ शाखाएं बतलाई जाती हैं, जो बहुत सी लुप्त हो गई हैं, तब यह कैसे माना जाए कि वेद मूल स्वरुप में ही हैं?

उत्तर. वेदों की शाखाओं का तात्पर्य मूल वेद संहिताओं से नहीं है. वेदों को समझने, उनके अध्ययन आदि तथा वेदों की व्याख्या करने के लिए शाखाएं बनाई गई हैं. समय – समय पर प्रचलित प्रणालियों के अनुसार मन्त्रों के अर्थ सरल करने के लिये शाखाएं मूल मन्त्रों में परिवर्तन करती रहती हैं. किसी यज्ञ विशेष के लिए या अन्य किन्ही कारणों से कई शाखाएं मूल मंत्रों के क्रम को आगे- पीछे भी करती हैं. इसी तरह कुछ शाखाओं में मंत्र तथा ब्राह्मण ग्रंथों का भाग मिला दिया गया है.

मूल चारों वेद संहिताएँ  – अपौरुषेय हैं. वेदों की शाखाएं तथा ब्राह्मण ग्रंथ मनुष्य कृत हैं. उन्हें वहीं तक विश्वासयोग्य माना जा सकता है जहां तक वे वेदों के अनुकूल हैं. मूल मंत्र संहिताओं का परम्परा से जतन किया गया है और विद्वानों ने भी भाष्य उन पर ही किया है.

प्रश्न. अन्य ग्रंथ  – उपनिषद, उपवेद,गीता इत्यादि क्या ईश्वरीय नहीं हैं?

उत्तर. इस का उत्तर बहुत कुछ पहले भी दिया जा चुका है. यह सब हमारे महान पूर्वजों – ऋषियों द्वारा निर्मित महान ग्रंथ हैं पर यह भी ईश्वरीय रचना वेदों की बराबरी नहीं कर सकते.

यदि इन ग्रंथों की रचना ईश्वरीय होती तो यह वेदों की ही तरह अद्वितीय रक्षा पद्धति से युक्त होते. पर वेदों के अलावा अन्य किसी भी ग्रंथ में यह लक्षण नहीं दिखता.

अत: इन ग्रंथों में भी जो बातें वेदों के विपरीत हैं उन्हें मान्य नहीं किया जा सकता क्योंकि ईश्वरीय ज्ञान सर्वोपरि है. यह बात विश्व की सभी पुस्तकों पर लागू होती है. हमारी संस्कृति के सभी ग्रंथ वेदों को ही सत्य का अंतिम प्रमाण मानते हैं.

प्रश्न.  वेदों में तो केवल कर्म कांड और ईश्वर पूजा का ही विधान है. क्या दर्शन तथा अन्य व्यवहारिक ज्ञान के लिए हमें दूसरे ग्रंथों की आवश्यकता नहीं है ?

उत्तर. ये झूठी बातें वेदों को न पढने वाले लोगों ने फ़ैला रखी हैं. हमारी संस्कृति के सभी महान ग्रंथकार अपनी रचना को वेदों पर आधारित ही बताते हैं. वे वेदों को ही सब सत्य विद्या का मूल मानते हैं.

उपनिषद ,गीता जैसे सभी दार्शनिक ग्रंथों का उद्गम भी वेद ही हैं. यह सभी ग्रंथ वेद और सत्य को समझने के लिए ही बनाये गए और इन ग्रंथों में ऐसी कोई बात नहीं है जो वेदों में पहले से ही मौजूद नहीं हो. जैसे कि हम पहले चर्चा कर चुके हैं – वेद परम प्रमाण हैं और अन्य ग्रंथ तो उस तक पहुंचने की सीढियां मात्र हैं – इसलिए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कहीं कोई सीढ़ी हमें वेदों से दूर तो नहीं ले जा रही.

वेद एकमात्र सर्वत्र व्यापक ईश्वर का ही बखान करते हैं और शाश्वत ज्ञान की निधि होने से उन में कहीं कोई कर्म कांड नहीं है. अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए ही पथभ्रष्ट लोगों ने वेदों के विषय में गलत धारणाएं फैलाईं हैं.यह हमारा परम कर्तव्य है कि हम इन सभी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर – वेद और उसके सत्य उद्देश्य का प्रचार करें.

सत्यमेव जयते!

अनुवादक- आर्यबाला

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75 COMMENTS

  1. धर्म के ठेकेदार और मानवता के दुश्मन सवर्ण अपनी दुकान को क्यो बंद करेगे I
    सारा ठगाई का व्यवसाय जो सदियो से चला रहे है उसे चौपट करोगे ?
    अरे हमारी दुकान बंद मत कराओ भाई I

  2. 1-हिन्द शब्द का प्रयोग कब से सुरु हुवा
    2-इस्लाम ,बाइबिल तथा हिन्दू धर्म में मुख्यतः बिभेद है

  3. @ raj hyd
    rshi to pahale se he zyani the . phir nirakaar ne kyu aur kaise sunaya. usme bhi itne abhugh bhasa me. agar ye manav ke klayan ke liye the to inke bhasa saral kyu nahi the.

    • shri om prakash ji , rishi koi redimed nahi bante hai uske liye koshish karni hoti hai ! jin vyaktiyo ne gambhirta se samadhi avstha me rahe unke samajhne yogy star ki bahsha me gyan [ved] mila tha ! baad me un manro ki vykhya ki gayi jo- jo vyakhya karte gaye vah rishi bhi bante gaye! aur apne apne shishyo ko gyan bhi dete hai isliye ved ko shruti bhi kaha jata hai baad me tamr patr me likhe gaye, bhoj patro me likhe gaye fir kagaj me likhe gaye ! ram charit manas saral bhasha me hai fir bhi usko aur saral karne vale kathopdeshak majud hai !

    • ved likhe nahi gye the, unko shruti kaha gaya tha artahat sunkar janana 1
      bahut bad me ved shreshth manushyo ne likhe the 1 ! aaj bhi rediyo se samachaar sune hi jate hai mobail se baat bhi suna jata hai !
      gyan ki shuruaat sunne se huyi thi n ki likhne se ? likhna padhna bahut baad me hua hai !

  4. Sir…mene aap ka post padha bohat a6a laga…par question hai..kaha jata hai ki ved ab nahi bach hai sirf ku6a s
    mantra ke bahek. kya ah baat sahi hai? ab vedo me milabat kardiya gya hai .

  5. sir my question is would you like to tak/debut with zakir naik in an open challenge about quran and vedic religion in the light of science?

    • jab ham zakir ji se e- mail ke maadhyam se apne parshn rakhte hai to varsho ho jate hai vah uska javab bhi nahi dete hai ?agar aap hamare parshno ka uttar zakir ji ya kisi any muslim vidvan se dilva sake to ham apke abhari rahenge ! dekhe quran 2/.67-73 jisme ek vishesh gaay ki hatya kar ke uske mans ke tukde se ek murda sharirsenchulane se jivit ho jata hai . apne hatyare ka nam batlakar mar jata hai kya yah baat saty hai ? ya isko ek mithya kahani samjhi jaye agar yah saty hai to anek muslim desho me kya aisa tarika apnaya jata hai ? agar yah saty nahi hai to quran me aisi kahani peshkarne se fayda hai ?

      • Bhai ispe to kabhi maine gour hi nahi kia tha :O waise kaafi aayatein padh chuka hun ……. light ki speed tak nikal di gayi hai inke dawara jo ki khoj bin karne pe manusmirit ka mantra nikla

  6. जीवात्मा की कुल संख्या का ज्ञान मनुष्य को नहीं हो सकता – अल्पज्ञ होने से । केवल सर्वज्ञ ईश्वर ही जानता है ।
    अतः ईश्वर की दृष्टि से जीवात्माओं की संख्या सान्त है, और मनुष्य की दृष्टि से असान्त या अनंत या अज्ञात है ।
    जीवात्मा अनादि-अनुत्पन्न- अविनाशी होने से न पैदा होता है, न मरता है । अतः न एक भी नया जीवात्मा उत्पन्न होगा, न एक भी जीवात्मा का कभी अभाव या नाश होगा ।
    हमारे ज्ञान का क्षेत्र अति सीमित है । इस पृथ्वी पर उपस्थित मनुष्यों या अन्य प्राणियों आदि की कुल संख्या का केवल अनुमान ही कर सकते है – निश्च्यात्मक रूप से नहीं जान सकते कि कुल कितने जीवात्मा वर्तमान में इस पृथ्वी पर विद्यमान हैं ।
    पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में विद्यमान जीवात्माएं निम्न स्थानों से आ सकती हैं –
    १. पृथ्वी की मनुष्य या अन्य योनियों की मृत्यु के बाद फिर पृथ्वी पर ही मनुष्य के रूप में जन्म लेने से
    २. अन्य ग्रहों या आकाशीय पिंडों की मनुष्य या अन्य योनियों की मृत्यु के बाद फिर पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्म लेने से
    ३. मुक्ति अवस्था पूरी कर पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्म लेने से
    उक्त तीन सम्भावनाएं पर विचार किया जा सकता है ।

  7. Bhagavat Geeta or Vedo me likha he ki Atma(Spirit) Amar he
    na to vo janm leti he or nato vo marati he.
    lekin puri duniya me population to badhati jati he to fir
    vo Atma (Spirit) kaha se aati he?

    • aatma sabhi jeevo mai hoti hai…sabhi jeevo ki sankhya insaan count nahi kar sakta aur dusre jeevo se atmaye aati hai….

  8. bhai ye sawal to ic web site ko padhne ke baad mene pucha tha kyoki issi me likha he ki geeta manav nirmit he mujhe hindu dharm ka ziyada gyan nahi he
    ref. 1st pera me hi likha he.
    agar eesa nahi to fir sach kya he

    • Ahmad [email protected] upar article me likha he ki Shrrmad Bhagwad Geeta ka udgam ( origin) Ved hain…..aur mene kaha k Shreemad Bhagwad Geeta me Ved ka saransh he…..kiya yeh dono bato ka meaning ek nahi hui? Although Shrremad bhagwad Geeta me ved k bato ka ullekh he, parantu us me aur bhi bahut baato ka varnan hain ! Aur haan, Shreemad Bhagwad Geeta ko Bhram Swaroop ne apne kanth se manav shreer me avtaar le k manushya jaati a sammukh gyaan diya he….
      Yeh baat bahut jagah par boli he Shree Krishn ne ki woh he parmeshwar hain!
      for eg: 9.11 : Jo moorkh vyakati he, woh mere is manushya avraar ko nahi pechante, woh mere param bhav ko nahi pehchante, aur woh yeh nahi jaan paate ki me he samasth praaniyo ka parmeshwar hu!

      • @madhukar : kuch samay purva kuch prashn kiye the maine aapse parantu aapne un sabka uttar nahi diya, shri krishn ke iswar hone ke bare mein, kripya unka uttar dena ka kasth karen.
        jis prakar se aap geta ke vachno ka prayog karke swayam geeta ko shri krishn ke iswarbswaroop ka praman batlate hin isse aapmei aur kattar islamiyeon mei kya antar raha jo ki kuran ke vachno ka prayog karke hi kuran ko allah ki vani batate hain.

      • Ankur bhai…Plz once again let me knw which question i am supposed to answer u, if i knw it, i will try to answer, otherwise others can help us in getting your answer…..I guess u mean to ask y did God revealed the true knowledge only at the time of Mahabharat and not before…the answer is that God said he has already reveled the knowledge to manking in the starting….but with time, that knowledge got lost, so he repeated it to Arjun…And dear bro, i am not trying to b kattar….thr are many places in Shreemad Bhagwad Geeta, whr Lord evn did not favour to worship any other demigods like sun, moon etc , except him, because only he is the almighty….all the other things…materialistic, or spritual, works under him…..God
        Shree Krishn reveled at many places, he is the Godhead…..under which every thing works. Mene toh 9.11 isliye diya, because only at this place God revelead abt his human body of Krishna…..And its not abt extremism (kattarwad)….he said in Shreemad Bhagwad Geeta that sab sampraday dharm (communal religions) ko tyaag ke meri sharan me aa jao kyunki me hi Parmeshwar hu !
        You knw every religion beleives in one God…..but ultimatly he is the only one power….and it is the same Power who was giving preaching to Arjun and his name is Shree Krishn….so u can call him Ram, Krishn, almighty, lord or whtever….they all are pointing to the same person….the almighty ….Diffrent religions beleive in diffrent Gods, but they are not diffrent…they are all one…only human in diffrent religion see him diffrent……
        Me kattarvaad nahi ban raha, but me yeh bol raha hu ki sab dharam k log jis ko iswar maante hain, woh Shree Krishn he they Mahabharat ke time pe, jo k Arjun ke sammukh upastith they…kintu manav k avtar me !

      • sanatan [email protected] bhai aapne jo question poocha he, meri samajh me woh valid nahi he..kyunki bhagwan toh ek he hain, samay se pehle aur samay k baad bhi….woh toh kaal ke pare hain, woh toh ajanma he….samay toh materialistic world ki property he, bhagwan to almighty he…isliye yeh poochna ki Shree Krsihn se pehle bhagwan kun tha, yeh prashan hi nahi banta!
        Aur waise bhi Shree Krishan toh Bhagwan ka avtaar hain…avtaar matlab ki jab woh physical form me hamare saamne prakat hote hain…..but yeh hamari weekness he k hum unko avtaar roop se pehle aur baad me nahi dekh paate kyunki us ke liye unconditional devotion chahiye hain….Shree Krishn ne kaha he ki woh har yug me burai ka naash karne aur dharma ( the truth) k raksha karne k liye avtaar lete hain.

        fir bhi me aapko ek bahut simple example deta hu samjhe k liye, although yeh example ka koi comparision nahi he bhagwan ke saath…ur question is like shahnshaah se pehle amitabh kun tha?

        Isliye Bhagwan toh ek hi hain, but unke ek avtaar roop Shree Krishn hain!
        Jai Shree Krishna!

      • For sanatan dharm -श्री कृष्ण भी सुबह चार बजे उठकर गायत्री मंत्र का जाप किया करते थे ! क्यों
        उन्हे तो सभी ईश्वर मानते है फ़िर ईश्वर ने गीता मे क्यों बताया की वो भी जप करते थे.
        ईश्वर निराकार है .

      • @Madhukar
        _______________Aur waise bhi Shree Krishan toh Bhagwan ka avtaar hain____________
        Bhagwan Ajanma hai ya janm lene wala hai? Janm lene ka qya arth hai?

      • Sanatan [email protected] one of yhe verse frm Shreemad Bhagwad Geeta : 10.3: he who among the mortals, knw me as unborn, beginning less and the Lord of all worlds, is undeceived and liberated frm sins .

      • Sanatan [email protected] one of the verse frm Shreemad Bhagwad Geeta : 10.3: he who among the mortals, knw me as unborn, beginning less and the Lord of all worlds, is undeceived and liberated frm sins .

      • @ Madhukar
        ____________he who among the mortals, knw me as unborn, beginning less and the Lord of all worlds, is undeceived and liberated frm sins________
        But Krishna said he takes birth then how can he be called unborn? If one is born he can not be unborn and unborn can not be born?

  9. Aur haan, Shree Krishna ne yeh bhi ujagar
    kiya he ki woh hi parampita he, jo k is
    SAMAY manav roop me maanav k samaksh
    upasthith he!

  10. Ahmad bhai, Shreemad Bhagwadgita Sakshat bhram swaroop (Shree Krishn) k kanth se utkrisht hui he…..isliye isko song of God bhi bolte hain….isme Ishwar ne sansaar ka sabse anmol gyaan manav ko diya he…..isme ved ka saar he..yeh gyan Ishwar ne manavta ki utpatti pe bhi diya tha, kintu samay k sath yeg gyan lupt ho gaya… isliye Bhramswaroop ne fir se is gyan ko repeat kiya (Geeta 4.1,.2).
    Aur haan, Shree Krishna ne yeh bhi ujagar kiya he ki woh hi parampita he, jo k is sayay manav roop me maanav k samaksh upasthith he!

  11. vedo k alawa baki granth manav nirmit he ? (intrasting)

    bhagwat geeta ko to log shree krishn ji ki vani k rop me mante he
    agar ye manav nirmit he to fir ise bhagwaan ki vani k roop me kiyo mante he?
    shaleenta se jawab deejiye agar puchne me mujhse koi galti ho gayi ho to maff kare.

  12. ॐ!ॐ!ॐ!ॐ!ॐ!

    अपनी नापाक कुरान की सुरक्षा ये मतान्ध मुल्ले तो कर नहीँ पाये क्योँकि मुसलमानोँ को तोहफे के रूप मेँ प्राचीन कुरान के सारे धृष्टताओँ को झुठलाते हुए एक नयी कुरान नाजिल हो चुकी है। जिसका नाम है “अल फुरकान”। जिसे दुबई मेँ प्राथमिक शिक्षा वाले बच्चोँ को पढ़ाई भी जा रही है। Youtube पर search करेँ।

    नयी कुरान बनाने वाले मुसलमान भाई स्वयं स्वीकार भी कर चुके हैँ कि कुरान ईश्वरकृत नहीँ बल्कि मुहम्मद की बनाई है।

    फिर बाईबिल तो अनुवाद के अनुवाद के रूप मेँ हमारे सम्मुख है। क्योँकि बाइबिल के मूल प्रति की भाषा English थी ही नहीँ।

    बाकि धर्मोँ के कपोल शास्त्रोँ के बारे मेँ आप तो जानते ही होँगे।

    लेकिन पुरी दुनिया मेँ “वेद” ही ऐसी ज्ञानकृति है जो ईश्वरकृत है। इसमेँ कोई परिवर्तन नहीँ हो सकता।
    प्रकृति भी इसकी सुरक्षा करती है।

    मेरा निवेदन उन भटके हुए भाईयोँ व बहनोँ से है जो सदियोँ पूर्व हमसे बिछड़ गये,कि वे वापस सत्य सनातन वैदिक धर्म मेँ वापस आ जायेँ, क्योँकि इसको छोड़ मानवता और कहीँ नहीँ मिलेगी!

    {क्योँकि मैँने भी इस्लाम त्यागकर सनातन हिन्दूत्व को स्वीकार किया है।}

    ॐ!ॐ!ॐ!ॐ!ॐ!

    • @priyasi. ved k barein mein kiya sidh karsakte ho ki yeh ishwar krit h?

      Al furqan likhne se kiya hota h? Aise to koi bhi likhde lekin kiya tumhein maloom h ki Quran nein kiya khas h? Aur al furqan is challenge ko kahan tak poora karta h. eik baar surah insaan surah 76 arbi mein parho phir mein eik do batein bataunga. quran.com par transliteration bhi mil jayega.

      • @anti-agni
        Please let me know why do you think Quran is given by God? Which is THE knowledge in Quran not in Veda? How worshiping God / Allah not enough without believing & reciting Mohammed name all 5 times in a day? Who will be the consultant/ADVISOR of Allah from the side of Indian on the Day of Judgment because Mohammed would stand only for Arabs.

      • Agniveer, thr r many things in kuran which are not taught in ved. For example, it dont contains many things like hating and killing ppl who dnt beleive in hinduism, it dnt give any materialistic pleasures as reward to spirit (which dnt feel physical pleasure) aftr this life, it dnt consider woman lower thn man, it dnt give right to man to beat woman and ask to hide women and treat them as sex toys……it dnt ask to mistreat slaves, it dnt ask to keep sticking to illogical and irrational thinking, it dnt stop man to think and put up questions, it dnt ask fr cutting reproductive body parts, it dnt allow man to openly practise polygamy, it dnt teach hatred fr the ppl who follow othr religions , it provides no cruel punishment by God fr ppl of other religion. etc etc

  13. Dear Sushil

    puri jankari ke baad hi apman janak shabd likhe.aap bahut bhole hain.sach ko swikariye.aarya samaj ladki ko jalane waala nahi apitu jalati hui ladkiyo ko bachane waala samaj hai.tumhe kuch bhi pata nahi.thodi mehnat to karo!

  14. kiyo dharam ka parchar kar rahe ho ? arya smaj vidhya mandir me maine shiksha lee hai. fir bhi yahi kahunga ki qyan prapti ke liye vedo ko padna kaha tak uchit hai ? hamara desh dharam- nirpeksh hai jisme kisi be dharam ke parchar ki manayee hai lakin fir bhi kuch log isay failane me lage hue hai …
    maine bachpan me pada tha swami dyanad sarsvati ji ke bare me, arya samaj ke sasthapak, lakin aaj sochta hu kiya hawan karne se lakdi jalane se shudhata aate hai ??? shudhta apne man ko saf rakhne se aati hai, pyar me bahut takat hoti hai karke dekhna gyan apne aap mil jata hai (gopiyo ne koi ved nahi pade fir bhee shri krishna ji mile)

    • @Kamal/Madhukar: In that case why would God not reveal the same at the time of first knowledge impart, why would he let people for Milena to be on a shorter bliss path and be ignorant of the ultimate truth, and only reveal it to Arjuna on the field of kurukhshetra only 5000 years ago?

      • Dear Ankurji
        Thanks for the reply. Few more questions need your help
        1. Agree with you but now thought comes into my mind that may be knowledge was revealed earlier also but mankind couldn’t preserve it. So lord krishna came to give the knowledge again.
        2. In Bhagwat geeta lord krishna declair himself as supreme being, so is it correct as per veda ? If not then the Bhagwat geeta is not correct ?
        3. If i like listening songs of worshipping for lord rama/krishna or shiva and feel very relax and calm, is it ok to do so as per veda. Does veda says that we shouldn’t worship or pray or listen the prayer of god other then vedic god.

        Thanks
        Kamal

      • Dear Kamal,
        I am just a seeker and always try to do path correction as and when required, and that is what has brought me to where i am in life and i would expect that as long as i exist i am always refining myself and moving further close to the truth.

        1) This is an Assumption .veda were revealed at the inception of creation , please read through the articles on the veda on this site.
        2) Bhagvat geeta was read by Shri Krishna to Arjun on the field of kurushshetra and who has written it and where was that writer present ? not on the battle field (he was not samaksha of krishna)
        3)veda says what is worship and how to worship,how to elevate ones consciousness to the levels of enlightenment; precisely, its a guide of how to live a blissful life and how to reach the supreme.(not swarga )
        Even as as per Mahabharata, it was not Arjun who achieved salvation (who supposedly saw “GOD” and then heard bhagvat geeta from him ) but Yudhistra , that says it all.

        Why dont your read the veda your self ?

        Om Shanti.

      • Dear Ankur,
        ur query is valid that y did Lord Krishna gave this holy preaching to Arjun many years after the mankind existed. Please refer shlok 4.1,4.2 to find your answer.
        Lord Krishna speaks that he gave this knowledge to sun who gave it to first man- Manu. Manu further gave it to Ikwashu. But gradually with time, this knowledge was lost and he is giving that knowledge again to Arjun.
        So we see that the preachings of Lord Krishna was given even before anything existed. So it is the earliest form of knowledge imparted by God.
        I have nt read ved, but as far as i have lil understanding about it, Ved teaches to live a good life and make this place a heaven to live. But again as Krishna had said that less intelligent ppl gets struck to the flowery results of Ved which is not correct. Instead, they should aim only for me. A person who knows me completely, he dnt require to go as per Ved.
        Jai Shree Krishna.

  15. yah” sarve bhavantu sukhin ……..:” ka vaky kis granth ka hai uska prman hamko chahiye tha! kya koi vaidik vidvan batla sakenge ?

  16. Agniveer, I strongly believe in Shreemad bhagwad Geeta.
    Now my query is:

    In Shreemad Bhagwad Geeta, the absolute truth is revealed by God. All the things stated are spiritually perfect. There is no point in denying it frm any angle. But it openly declares that Ved are not the ultimate truth, there is path even above Ved. God is ultimate truth. At many places, It even do not encourage ved as perfect. For an example, read 9.20, 9.21 of Shreemad bhagwad Geeta.
    Kindly explain me and help me to remove this confusion keeping in mind that i strongly believe in Shreemad bhagwad Geeta. I do not doubt it at all, but i need to understand that y you are considering Ved as above all. Plz help me.

    • @Sampath kumar .
      I also beleave bhagwat geeta my friend. But krishna had said clearly in Geeta that I and you have got many birth i know that but you do not know. Arjun asked to krishna you are my guru tell me what is right for me because you are my guru.

      ek jagah krishn ne ye kaha hai ki ek mere parayan hoke om ka jaap karo . unhone ye nahi kaha ki krishna ka jaap karo .

      ek jagah pe kaha hai ki jo insan muje ajanma janta hai wahi gyani hai .
      Bhagwat geeta mai ved ka hi bat kaha gaya hai
      kai jagah krishn ne kaha hai ki tum mera sisay hai ,
      krishn ne kaha ki murkho ki budhi anek shakhawo wali hoti hai aur jo samjhdar hote hai wo kewal ek mat yani ek ishwar ki prarthna karte haii
      krishn ne kaha ki jo log pitro ki puja karte hai wo pitro ko prapt hote hai jo devtawo ki puja karte hai wo devtawo ko aur jo bhuto ki wo bhuto ko prapt hote hai lakin jo kewal muje chahta hai wo muje prapt hota haii
      bhagwat geeta se spast ho jata hai ki ved ki hii bate kahi gai hai mul roop se .
      unhone to chapter 4 mai yahan tak kaha haii ki kai tarah ke karne wale kaam ved mai batayen gaye hai unko tu man karm se kar

  17. वेदों की विषय में प्रचलित कुछ भ्रांतियों का निवारण

    डॉ विवेक आर्य

    वेदों की विषय में कुछ ऐसी भ्रांतियां भी प्रचारित करी गयी हैं जो पाठकों को वेदों के विषय में शंका उत्पन्न कर भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर देती हैं. कुछ भ्रांतियों के जनक सायण, महीधर आदि के भाष्य हैं जबकि कुछ के जनक पाश्चात्य विद्वान जैसे मेक्समूलर, ग्रिफ्फिथ, ब्लूमफिल्ड आदि हैं.

    ऐसी कुछ भ्रांतियां इस प्रकार हैं

    १. क्या वेद तीन हैं और क्या अथर्ववेद बाद में सम्मिलित किया गया था?

    २. क्या वेदों की शाखाएं भी वेद हैं?

    ३. क्या यजुर्वेद में कृष्ण और शुक्ल यह दो भेद हैं?

    ४. क्या वेदों में पुनरुक्ति दोष हैं?

    ५. क्या वेदों में पुनर्जन्म का सिद्धांत विदित नहीं हैं?

    हम एक एक कर इन भ्रांतियों का निवारण करेगें.

    १. क्या वेद तीन हैं और क्या अथर्ववेद बाद में सम्मिलित किया गया था?

    संस्कृत वांग्मय में कई स्थानों पर ऐसा प्रतीत होता हैं की क्या वेद तीन हैं? क्यूंकि वेदों को त्रयी विद्या के नाम से पुकारा गया हैं और त्रयी विद्या में ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद इन तीन का ग्रहण किया गया हैं.

    उदहारण में शतपथ ब्राह्मण ६.१.१.८, शतपथ ब्राह्मण १०.४.२.२२, छान्दोग्य उपनिषद् ३.४.२, विष्णु पुराण ३.१६.१

    परन्तु यहाँ चार वेदों को त्रयी कहने का रहस्य क्या हैं?

    इस प्रश्न का उत्तर चारों वेदों की रचना तीन प्रकार की हैं. वेद के कुछ मंत्र ऋक प्रकार से हैं, कुछ मंत्र साम प्रकार से हैं और कुछ मंत्र यजु: प्रकार से हैं. ऋचाओं के सम्बन्ध में ऋषि जैमिनी लिखते हैं पादबद्ध वेद मन्त्रों को ऋक या ऋचा कहते हैं (२.१.३५), गान अथवा संगीत की रीती के रूप में गाने वाले मन्त्रों को साम कहा जाता हैं (२.१.३६), और शेष को यजु; कहा जाता हैं. (२.१.३७)

    ऋग्वेद प्राय: पद्यात्मक हैं, सामवेद गान रूप हैं और यजुर्वेद मुख्यत: गद्य रूप हैं और इन तीनों प्रकार के मंत्र अथर्ववेद में मिलते हैं. इस प्रकार के रचना की दृष्टि से वेदों को त्रयी विद्या कहाँ गया हैं.

    इसका प्रमाण भी स्वयं आर्ष ग्रन्थ इस प्रकार से देते हैं

    ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ये चारों वेद श्वास- प्रश्वास की भांति सहज भाव से परमात्मा ने प्रकट कर दिए थे- शतपथ ब्राह्मण १४.५.४.१०

    मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ये चारों वेद, ये चारों वेद भी पढ़े हैं- छान्दोग्य उपनिषद् ७.१.२ और छान्दोग्य उपनिषद् ७.७.१

    इसी प्रकार बृहदअरण्यक उपनिषद् (४.१२), तैत्रय उपनिषद् (२.३), मुंडक उपनिषद (१.१.५), गोपथ ब्राह्मण (२.१६), आदि में भी वेदों को चार कहाँ गया हैं.

    २. क्या वेदों की शाखाएं भी वेद हैं?

    पतंजलि ऋषि के महाभाष्य में ऋग्वेद की २१, यजुर्वेद की १०१, सामवेद की १००० और अथर्ववेद की ९ शाखायों का वर्णन आता हैं. जिनकी कुल संख्या ११३१ बनती हैं. स्वामी दयानंद ४ वेदों के अलावा ११२७ शाखाएँ मानते हैं. अब यह सभी शाखाएँ उपलब्ध नहीं हैं. ऋग्वेद की शाकल और बाष्कल, यजुर्वेद की वाजसनेयी मध्यनिन्दनी तथा काण्व शाखा,सामवेद की राणायनीय, जैमिनीय तथा कोथुम और अथर्ववेद की पैप्पलाद तथा शौनकीय शाखा उपलब्ध हैं. वेदों की शाखाओं का विशेष रूप से वर्णन करने की पीछे हमारा उद्देश्य वेदों की विषय में एक भ्रान्ति का समाधान करना हैं . वह भ्रान्ति हैं की असली वेद अब लुप्त हो चुके हैं अर्थात जो वेद अब विद्यमान हैं वे असली नहीं हैं.

    सत्य यह हैं की वेदों की शाखाएँ लुप्त हुई हैं नाकि वेद. वेद तो श्रुति परम्परा से सुरक्षित हैं इसलिए उनके लुप्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता. वेदों की शाखाएँ परमेश्वर कृत नहीं अपितु ऋषि- मुनि कृत हैं जो की एक प्रकार से वेदों के व्याख्यान भर हैं.

    इस विषय में यह प्रमाण भी वेद केवल चार हैं की पुष्टि करते हैं-

    १. न्रसिंह पुर्वार्तापिनी उपनिषद् में कहा गया हैं की ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चारों वेद अपने अंगों सहित तथा अपनी शाखाओं सहित चार पद बनते हैं (१.२)

    २. बृहज्जाबालोपनिषद में कहाँ गया हैं की जो इस बृहज्जाबालोपनिषद को नित्य पढता हैं वह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इन चारों को पढता हैं और इनके साथ ही शाखाओं और कल्पों को भी पढता हैं.८.५

    अन्य प्रमाण भी इस तर्क की पुष्टि करते हैं जिससे यह सिद्ध होता हैं की वेद चार हैं और वेद की शाखाएँ उससे विभिन्न हैं.

    ३. क्या यजुर्वेद में कृष्ण और शुक्ल यह दो भेद हैं?

    स्वामी दयानंद के आगमन से पूर्व यजुर्वेद के दो भेद एक कृष्ण और एक शुक्ल हैं ऐसी मान्यता प्रचलित थी. यजुर्वेद के दो भेद कैसे हो गया इसके पीछे विष्णु पुराण के तृतीय अंक के चतुर्थ अध्याय के वेद विभक्ति नामक शीर्षक से यह वर्णन आता हैं. ऋषि वैशम्पायन का, देवरात का पुत्र याज्ञवल्क्य नामक एक शिष्य था जोकि बड़ा धर्मज्ञ और गुरु सेवापरायण था, एक बार किसी बात से नाराज होकर वैशम्पायन ने कहा की मेरे से पढ़े को त्याग दो. याज्ञवल्क्य ने योगविद्या से सब उलटी करके फैक दिया, रुधिर से सने हुए उन मंत्रो को कुछ शिष्यों ने तितर बन कर चुग लिया जिससे वे तैतिरीय कहलाये, बुद्धि की मलिनता से वे मंत्र कृष्ण हो गए. इसके पश्चात याज्ञवल्क्य ने सूर्य की आराधना करके उनसे शुक्ल यजुर्वेद के मंत्र प्राप्त किये जो शुक्ल कहलाये.

    इस कथा में अनेक अविश्वसनीय बातें हैं जैसे की कोई विद्या को वमन कर नहीं निकाल सकता, कोई तितर बन कर विद्या को नहीं चुग सकता, इसलिए यह एक गप मात्र हैं.

    वस्तुत: यजुर्वेद का नाम शुक्ल यजुर्वेद और तैतरीय संहिता का नाम कृष्ण यजुर्वेद होने का कारण कुछ और ही हैं.

    वह हैं इन दोनों की अपनी शुद्धता और अशुद्धता. मूल वेद शुक्ल यजुर्वेद ही हैं उसकी शुद्धता के कारण उसका नाम श्वेत अथवा निर्मल से दिया गया था जबकि तैतरीय संहिता में मिश्रण होने के कारण उसका नाम अशुद्ध अर्थात कृष्ण हो गया.

    कृष्ण यजुर्वेद में अनेक स्थानों पर यजुर्वेद के मन्त्रों के स्वरुप में परिवर्तन कर दिया गया हैं. कुछ के क्रम में परिवर्तन हैं (१.१.३), कुछ स्थानों पर एक मंत्र के अनेक मंत्र बना दिए गए हैं, कई स्थानों पर दो मंत्र का एक बना दिया गया हैं (१.१.३ ).

    इस प्रकार के परिवर्तन से यजुर्वेद के अपने शुद्ध रूप का लोप होने से ततित्र्य संहिता ही कृष्ण यजुर्वेद कहलाता हैं.

    इसलिए कृष्ण यजुर्वेद मान्य और प्रमाणिक नहीं हैं.

    ४. क्या वेदों में पुनरुक्ति दोष हैं?

    वेदों का स्वाध्याय करते हुए हमारा ध्यान इस तरफ जाता हैं की एक ही मंत्र को एक से अधिक वेदों में दोहराया गया हैं अथवा एक ही मंत्र में एक ही शब्द एक बार से अधिक आया हैं. अथर्ववेद के बीसवें कांड के १४३ सूक्तों का करीब ९५८ मन्त्रों में से कुंताप सूक्त के १४६ मन्त्रों को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद में भी हैं. इसी प्रकार सामवेद के १८७५ मन्त्रों में से १०४ मन्त्रों को छोड़ कर शेष सभी ऋग्वेद में भी हैं.लोग इसे पुनरुक्ति कह कर वेदों के रचियता का दोष सिद्ध करने का प्रयास करते हैं.

    निरुक्त के रचियता यास्काचार्य ने निरुक्त १०.२१.१५ में वेदों में पुनरुक्ति विषय पर विचार किया हैं.

    ऋग्वेद ४.५७.२ मंत्र में मधुमन्तं और मधुश्चुतम यह दो समानान्तर शब्द प्रयुक्त होने के कारण पुनरुक्ति प्रतीत होते हैं परन्तु इसका अर्थ होता हैं जो मधुयुक्त होगा वह मधु बरसाने वाला होगा. अर्थ के भाव से विषय स्पष्ट हो जाता हैं.

    इसी प्रकार ऋग्वेद २.३५.१० में हिरण्यरूप और हिरण्यसंद्र्क यह दो सामानांतर शब्दों का जो स्वर्ग जैसे सुंदर रूप वाला होगा वह स्वर्ग जैसा सुंदर दिखाई देने वाला होगा ही अर्थ किया हैं.

    ऋषि दयानंद नें वेदों का भाष्य करते हुए एक ही मंत्र में दिए गए एक ही शब्द के अलग अलग अर्थ किये हैं अथवा एक ही मंत्र के दुसरे वेद में भी प्रसंग अनुसार अलग अलग अर्थ किये हैं.

    यजुर्वेद के ३७.८ मंत्र में मख शब्द १५ बार प्रयुक्त हुआ हैं. इस शब्द का अर्थ स्वामी दयानंद ने ब्रहमचर्य रुपी यज्ञ, विद्या ग्रहण अनुष्ठान, ज्ञान, मनन, गार्हस्थ व्यवहार, गृह, गृहस्थकार्य संगतीकारण, सद व्यवहार सिद्धि, योग्याभ्यास, संग-उपांग योग तथा ऐश्वर्या प्रद यह अर्थ किये हैं.इस प्रकार एक शब्द के अनेक अर्थ प्रसंग अनुसार हो जाते हैं.

    एक अन्य उदहारण ॐ अग्नये नय सुपथा मंत्र जोकि यजुर्वेद में ५.३६, ७.४३, ४०.१६ तीन स्थानों पर आता हैं. स्वामी दयानंद हर स्थान पर उसका अर्थ विभिन्न विभिन्न किया हैं.इसका कारण प्रकरण भेद हैं.

    इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता हैं की पुनरुक्ति मन्त्रों के प्रकरण भेद से विभिन्न विभिन्न अर्थ हो जाते हैं नाकि यह वेदों के रचियता का दोष हैं.

    ५. क्या वेदों में पुनर्जन्म का सिद्धांत विदित नहीं हैं?

    कुछ पाश्चात्य विद्वानों की यह धारणा रही हैं की वेद पुनर्जन्म के सिद्धांत का समर्थन नहीं करते हैं.इसका एक कारण तो वेदों के अर्थो को सूक्षमता से नहीं समझना हैं और दूसरा कारण मुख्यत: रूप से सभी पाश्चात्य विद्वान ईसाई मत के थे इसलिए पूर्वाग्रह से ग्रसित होने के कारण चूँकि ईसाई मत वेदों में वर्णित कर्म फल व्यस्था और पुनर्जन्म को नहीं मानता इसलिए वेदों में भी पुनर्जन्म के न होने का समर्थन करते रहे. आज इस्लाम मत से सम्बन्ध रखने वाले अपने प्रचार माध्यमों से यहीं जोर देने पर लगे हुए हैं की वेदों में पुनर्जन्म के सिद्धांत का समर्थन नहीं हैं. स्वामी दयानंद अपने प्रसिद्द ग्रन्थ ऋग्वेददि भाष्यभूमिका में पुनर्जन्म के वेदों से स्पष्ट प्रमाण देते हैं.

    वे इस प्रकार हैं

    १. हे सुखदायक परमेश्वर आप कृपा करे पुनर्जन्म में हमारे बीच में उत्तम नेत्र आदि सब इन्द्रिया स्थापित कीजिये – ऋग्वेद ८.१.२३.६

    २. परमेश्वर कृपा करके सब जन्मों में हमको सब दुःख निवारण करने वाली पथ्य रूप स्वस्ति को देवे- ऋग्वेद ८.१.२३.७

    ३. परमेश्वर सब बुरे कामों और सब दुखों से पुनर्जन्म में दूर रखे- यजुर्वेद ४.१५

    ४. हे जगदीश्वर आपकी कृपा से पुनर्जन्म में मन आदि ग्यारह इन्द्रिया मुझे प्राप्त हो – अथर्ववेद ७.६.६७.१

    ५. जो मनुष्य पुनर्जन्म में धर्म आचरण करता हैं उस धर्म आचरण के फल से अनेक उत्तम शरीरों को धारण करता हैं- अथर्ववेद ५.१.१.२

    ६. जीव पाप- पुण्य के आधार पर अगले जन्म में मनुष्य या पशु आदि बनते हैं- यजुर्वेद १९.४७

    ७.इसी प्रकार अथर्ववेद १०.८.२७-२८, ऋग्वेद १.२४.१-२, अथर्ववेद ११.८.३३ में भी पुनर्जन्म के सिद्धांत का प्रतिपादन हैं.

    इस प्रकार वेदों की विषय में पुनर्जन्म के विषय में अनेक प्रमाण होने से इस भ्रान्ति का भी निवारण हो जाता हैं.

    http://agniveerfans.wordpress.com/2011/09/14/misconceptions-about-vedas/

    • बहुत ही सरल भाषा में सुंदरता के साथ वेदों के ज्ञान का वर्णन किया इसके लिये आप धन्यवाद के पात्र हे. आप जैसे विद्वान को कोटि शह प्रणाम

  18. This is for your kind Information that the Most Powerfull and Real Gayatri Mantra of Holy Vedas is ….

    Real Gayatri Mantra

    ” Om Stuta Maya Varda Vedmaataa Prachodayantam Pavmani Dwijanam Awyuh Praanam .Prajam Pasum Kirtim Dravinam Brahmavarchasam, Mahyam Datva Vrajat Brahma Lokam ”
    (Atharva Ved)

    The Boon -giving Veda-Mother is Praised by the Intellectual Persons.Bestowing on me Long Life,Vital Breath,Progency,Cattle,Glory,Matterial Prosperity and Intellectual lustre ,may she go to the World of the Divine Supreme

  19. —–ॐॐॐॐॐ—–

    श्री अग्निवीर जी!
    प्रणमाम्यहम्‌!

    आपके समस्त लेखोँ से प्रेरित होकर मेरा वर्तमान अब स्वर्गमय होने की ओर अग्रसर है। आपको सहृदयेन धन्यवाद्‌!

    महामानव,
    आप कहते हैँ कि उपनिषद्‌ कृत्रिम रचनायेँ हैँ तो कृपया इस बात का प्रत्युत्तर देने का कष्ट करेँ-
    “लोग कहते हैँ कि यजुर्वेद के ही 40 वेँ अध्याय को ‘ईशोपनिषद्‌’ के नाम से जाना जाता है।”

    तो क्या यजुर्वेद के साथ-साथ ईशोपनिषद्‌ ईश्वरकृत नहीँ हैँ?

    एक प्रश्न और कि ऋग्वेद संहिता मेँ वर्णित ‘सोमरस’ से क्या तात्पर्य है?

    आपसे विनम्र निवेदन एवं हृदयेन आशा है कि आप मेरी जिज्ञासा को तृप्त करने का प्रयास करेँगे॥

    “सर्वे भवन्तु सुखिनः”
    “सभी सुखी होँ”

    ——ॐॐॐॐॐ—–

    • http://agniveerfans.wordpress.com/2011/09/01/dayanand-vedas-6/

      क्या वेदों में वर्णित सोमरस के रूप में शराब (alcohol) अथवा अन्य मादक पद्यार्थ के ग्रहण करने का वर्णन हैं?

      डॉ विवेक आर्य
      पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों में सोम रस की तुलना एक जड़ी बूटी से की हैं जिसको ग्रहण करने से नशा हो जाता हैं. वैदिक ऋषि सोम रस को ग्रहण कर नशे में झूम जाते थे. इस प्रकार से विधर्मी लोग वेदों में सामान्य जन की श्रद्धा को कम करने के लिए वेदों में सोम अर्थात शराब पीने का प्रावधान कहकर अज्ञान में भटकतें रहते हैं.
      ऋषि दयानंद ने अपने वेद भाष्य में सोम शब्द का अर्थ प्रसंग अनुसार ईश्वर, राजा, सेनापति, विद्युत्, वैद्य, सभापति, प्राण, अध्यापक, उपदेशक इत्यादि किया हैं. कुछ स्थलों में वे सोम का अर्थ औषधि, औषधि रस और सोमलता नमक औषधि विशेष भी करते हैं, परन्तु सोम को सूरा या मादक वास्तु के रूप में कहीं ग्रहण नहीं किया हैं.
      ऋग्वेद ९/११४/२ में सोम को लताओं का पति कहाँ हैं.
      ऋग्वेद ९/९७/३३ में सोम के लिए सुपर्ण विशेषण प्रयुक्त हैं.
      ऐतरेय ब्राह्मन के अनुसार चंद्रमा को सोम का पर्याय बताया गया हैं .
      ऋग्वेद १०/८५/१ में सोम की स्थिति धुलोक में बताई हैं. यह भी कहाँ गया हैं की वह १५ दिन तक बढता रहता हैं और १५ दिन तक घटता रहता हैं.
      ऋग्वेद १०/८५/२ और ऋग्वेद १०/८५/४ में भी सोम की तुलना चंद्रमा से की गयी हैं.
      परन्तु जो सोम की तुलना शराब से करते हैं वे शतपथ ५/१/२ के अनुसार सोम अमृत हैं तो सुरा विष हैं पर विचार करे.
      तैतरीय उपनिषद् के अनुसार वास्तविक सोमपान तो प्रभु भक्ति हैं जिसके रस को पीकर प्रभुभक्त आनंदमय हो जाता हैं.
      ऋग्वेद ८/४८/३ इस कथन की पुष्टि करते हुए कहता हैं – हमने सोमपान कर लिया हैं, हम अमृत हो गए हैं, हमने ज्योति को प्राप्त कर लिया हैं, विविध दिव्यताओं को हमने अधिगत कर लिया हैं. हे अमृतमय देव मनुष्य की शत्रुता या धूर्तता अब हमारा क्या कर लेगी?
      ऋग्वेद ६/४७/१ और अथर्ववेद १८/१/४८ में कहाँ गया हैं परब्रह्मा की भक्ति रूप रस सोम अत्यंत स्वादिष्ट हैं, तीव्र और आनंद से युक्त हैं, इस ब्रह्मा सोम का जिसने पण कर लिया हैं, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता.
      ऋग्वेद ८/९२/६ – इस परमात्मा से सम्बन्ध सोमरस का पान करके साधक की आत्मा अद्भुत ओज, पराक्रम आदि से युक्त हो जाती हैं ,वह सांसारिक द्वंदों से ऊपर उठ जाता हैं.
      इस प्रकार वेद मन्त्रों से यह सिद्ध होता हैं की सोमरस कोई मादक पद्यार्थ नहीं हैं .
      फिर भी अगर किसी के मन में वेदों में शराब अथवा नशीली वास्तु ग्रहण करने को शंका हैं तो वेद भगवन स्पष्ट रूप से शराब पीने की मनाही करते हैं तो निम्न्किखित वेद मन्त्र में सोमरस और सूरा को विपरीत बताया गया हैं.
      सोमरस पुष्टि, अह्र्लाद तथा बुद्धि वर्धकता आदि उत्तम गुण उत्पन्न करता हैं, सुरापान के समान दुर्मद उत्पन्न नहीं करता अर्थात जैसे सूरा (शराब) बुद्धिनाशक तथा शरीरगत बलनाशक होती हैं वैसा सोमरस नहीं, इसलिए हे कर्म योगिन . स्तोता लोग उक्त रसपान के लिए आपसे प्रार्थना करते हैं की कृपा करके इसको ग्रहण करे. ऋग्वेद ८.२.१२.
      इस प्रकार वेदों के ही प्रमाणों से यह स्पष्ट सिद्ध होता हैं की सोम रस शराब आदि मादक पदार्थ नहीं हैं.
      विधर्मियों द्वारा वेदों की अपकीर्ति फैलाने के लिए एक दुष्ट निरर्थक प्रयास मात्र हैं.

    • veda me bahut hi high level ka gyan code ke roop me likha gaya hai……kahte hai jab swayam bramha ji..ne manusyo ko veda diya tha to har ek veda ko padne me 1000 saal lag rahe the….manishiyo ke aagrah par bramha ne sanchhipt..short…kar diya…taki har ek veda ke liye 25 saal lage…..Kahte hai….jab manushya ka chetna..consiceness…shudda ho jata hai…to veda swayam…manushya ke hriday me bolne lagte hai..shristi ka sara gyan…jo veda me coded hai…apne aap antar.aatma…uncoded kar deta hai………………..VEDA ME PRAYUKT “SOMA RAS” KA TATPARYA KOI BHUTIK PEY PADARTH NAHI HAI::::::YAHA SOMA KA MATLAB AKHIL BRAMHAND ME VYAPT US ISHVARIYA BRAMHANDIYA ENERGY SE HAI, JISKI VAJAH SE IS AKHIL BRAMHAND ME BHOUTIK AUR PARABHUTIK PARIWARTAN VYAPT HAI::::YAHA DYAN DENA CHAHIYE KI VEDA KAHTA HAI KI:::::AKHIL BRAMHAND BAHAR BHI HAI AUR JEEVO KE ANDAR BHI::::SOMA RAS DEVTAU KO PRIYA HAI:::SOMA RAS SE DEVTA PRASANNA HOTE HAI PRISKRIT HOTE HAI PUST HOTE HAI PRABAL HOTE HAI AUR DEVTA WO HAI JO SADAIVA HAMARE KLYAN KE LIYE SADAIVA TATPAR VYAST RAHTE HAI:::NA KEVAL IS BRAMHAND ME VYAPT DEVO KO SOMA PRIYA HAI BALKI TUMHARE SHARIR>> BODY>> ME STHIT 33 prakar ke devo ko bhi ye priya hai……atah jab tum soma prapta karoge to tumhare andar sthit devo ko soma milega…aur ve pust honge aur antatah tumhara kalyan hoga…bhotik aur parabhoutik kalyan………AB VEDA PAD HI RAHE HAI TO YE PATA KIJIYE KI SOMA KO GRAHAN KAISE KIYA JAI>>>>>

  20. very good article. This is real prachar of Vedas / Arya samaj
    90% population of the world is ignorant about Vedas, is it not the duty of God to make this knowledge available to the mankind.
    I think, till the next birth of earth, this knowledge will not be given. Why this knowledge is given once only…during starting of the life on the earth.I was at Vietnam for 10 months, 99% population is killing animals & eating..no feeling of shame..hesitation etc. rather they surprise how vegitarians survive..whether they get punishment for eating animals ? but they dont know that they are doing any wrong thing…like other animals..

    • @ P.C. Shrimali says:
      “I think, till the next birth of earth, this knowledge will not be given. Why this knowledge is given once only…during starting of the life on the earth.”

      vedas are not gonna walk and talk to you and say hello do you want to grasp me I am knowledge. it’s we who have to learn sanskrit and learn vedas, it is fault of society that they have forgot sanskrit,

      “90% population of the world is ignorant about Vedas, is it not the duty of God to make this knowledge available to the mankind.”

      God has done his part by giving that knowledge. it’s upto us if we want to take it or not

  21. मै वैदिक साहित्य के बारे में जानने के लिए गूगल और विकी का सहारा लिया, जिसमे इस लेख का केवल प्रश्न वाला हिस्सा मिला, उत्तर वाले हिस्से से परिचित कराने के लिए धन्यवाद.

  22. Gyan Vedo mai hai ya nahin mujhe nahin pata, kyunki wo smajne aasan nahin, aur shayad isliyen hi wo aise banaye gaye ki koi bhi, i mean koi bhi use samajh na sake, aur for jise jaise explain karna ho wo kar sake….definitely inhe kisi parmatama ne nahin likha balki insaan ne hi likha hai, its just a praise and praise, but surely gyan un explainations mai hai jo vedo ke naam par banaya gaya…and definitely the name of ved helps get wider audience…..kuch acha gyan hai kuch bakwaas…isliyen acha gyan jahan kahin se bhi mile…vedic se, ya a-vedic se use le lo, aur jo khud ko smajh aaye logically us par hi viswaas karo na ki kisi bhi ulti seedhi bakwaas par…understand the deep rooted meaning i.e., the gyan and not just kahaniyan…

    • veda me bahut hi high level ka gyan code ke roop me likha gaya hai……kahte hai jab swayam bramha ji..ne manusyo ko veda diya tha to har ek veda ko padne me 1000 saal lag rahe the….manishiyo ke aagrah par bramha ne sanchhipt..short…kar diya…taki har ek veda ke liye 25 saal lage…..Kahte hai….jab manushya ka chetna..consiceness…shudda ho jata hai…to veda swayam…manushya ke hriday me bolne lagte hai..shristi ka sara gyan…jo veda me coded hai…apne aap antar.aatma…uncoded kar deta hai………………..VEDA ME PRAYUKT “SOMA RAS” KA TATPARYA KOI BHUTIK PEY PADARTH NAHI HAI::::::YAHA SOMA KA MATLAB AKHIL BRAMHAND ME VYAPT US ISHVARIYA BRAMHANDIYA ENERGY SE HAI, JISKI VAJAH SE IS AKHIL BRAMHAND ME BHOUTIK AUR PARABHUTIK PARIWARTAN VYAPT HAI::::YAHA DYAN DENA CHAHIYE KI VEDA KAHTA HAI KI:::::AKHIL BRAMHAND BAHAR BHI HAI AUR JEEVO KE ANDAR BHI::::SOMA RAS DEVTAU KO PRIYA HAI:::SOMA RAS SE DEVTA PRASANNA HOTE HAI PRISKRIT HOTE HAI PUST HOTE HAI PRABAL HOTE HAI AUR DEVTA WO HAI JO SADAIVA HAMARE KLYAN KE LIYE SADAIVA TATPAR VYAST RAHTE HAI:::NA KEVAL IS BRAMHAND ME VYAPT DEVO KO SOMA PRIYA HAI BALKI TUMHARE SHARIR>> BODY>> ME STHIT 33 prakar ke devo ko bhi ye priya hai……atah jab tum soma prapta karoge to tumhare andar sthit devo ko soma milega…aur ve pust honge aur antatah tumhara kalyan hoga…bhotik aur parabhoutik kalyan………AB VEDA PAD HI RAHE HAI TO YE PATA KIJIYE KI SOMA KO GRAHAN KAISE KIYA JAI>>>>>

  23. मैंने ऋग्वेद का प्रथम भाग पढना आरम्भ किया परन्तु समझने में कठिनाई हो रही है, कुछ बातें जैसे ऋषि मुनियों का ये कहना की “सोमरस” इन्द्र देव को पुष्ट करता है जो की किसी महर्षि ने अपने हाथों से मींज कर बनाया है.

    अब इस “सोमरस” की क्या व्याख्या की जा सकती है?
    मुझे स्वयं से समझने में कठिनाई हो रही है कृपया मेरी जिज्ञासा शांत करें.

    धन्यवाद्

    • problem hai ki ved prose mein nahin poetry mein likhe gae hain, vedon me use hui sanskrit aam bolchaal waali sanskrit nahin hai, iska sirf matlab dhoondana padta hai.

      for example, gaana le lete hain, “suraj hua madham chaand jalne laga”

      literally is line ka koi matlab nahin hai, magar matlab hai ki suraj dal raha hai aur, chaand ki roshni bad rahi hai.”

      main khud bhi ved padne ki koshish kar raha hu, problem ye hai ki muje sanskrit sirf padni aati hai samajni nahin, jab tak muje sanskrit nahin aa jati, tab tak main ved kaise samaj sakta hu, aur sanskrit seekhne ke liye kam se kam 5 saal lijiye,

      iske tark mein log kahte hain ki, jab sanskrit samajni itni mushkil hai to ved sanskrit mein kyu likhi gayee, answer ye hai ki pahle sabgi sanskrit hi bolte the, ye to hum logon ne hi sanskrit bolna chod diya. e.f chinese seekhna bhi bahut mushkil hai, par chinese logon ko aati hai

    • क्या वेदों में वर्णित सोमरस के रूप में शराब (alcohol) अथवा अन्य मादक पद्यार्थ के ग्रहण करने का वर्णन हैं?

      http://agniveerfans.wordpress.com/2011/09/01/dayanand-vedas-6/
      डॉ विवेक आर्य
      पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों में सोम रस की तुलना एक जड़ी बूटी से की हैं जिसको ग्रहण करने से नशा हो जाता हैं. वैदिक ऋषि सोम रस को ग्रहण कर नशे में झूम जाते थे. इस प्रकार से विधर्मी लोग वेदों में सामान्य जन की श्रद्धा को कम करने के लिए वेदों में सोम अर्थात शराब पीने का प्रावधान कहकर अज्ञान में भटकतें रहते हैं.
      ऋषि दयानंद ने अपने वेद भाष्य में सोम शब्द का अर्थ प्रसंग अनुसार ईश्वर, राजा, सेनापति, विद्युत्, वैद्य, सभापति, प्राण, अध्यापक, उपदेशक इत्यादि किया हैं. कुछ स्थलों में वे सोम का अर्थ औषधि, औषधि रस और सोमलता नमक औषधि विशेष भी करते हैं, परन्तु सोम को सूरा या मादक वास्तु के रूप में कहीं ग्रहण नहीं किया हैं.
      ऋग्वेद ९/११४/२ में सोम को लताओं का पति कहाँ हैं.
      ऋग्वेद ९/९७/३३ में सोम के लिए सुपर्ण विशेषण प्रयुक्त हैं.
      ऐतरेय ब्राह्मन के अनुसार चंद्रमा को सोम का पर्याय बताया गया हैं .
      ऋग्वेद १०/८५/१ में सोम की स्थिति धुलोक में बताई हैं. यह भी कहाँ गया हैं की वह १५ दिन तक बढता रहता हैं और १५ दिन तक घटता रहता हैं.
      ऋग्वेद १०/८५/२ और ऋग्वेद १०/८५/४ में भी सोम की तुलना चंद्रमा से की गयी हैं.
      परन्तु जो सोम की तुलना शराब से करते हैं वे शतपथ ५/१/२ के अनुसार सोम अमृत हैं तो सुरा विष हैं पर विचार करे.
      तैतरीय उपनिषद् के अनुसार वास्तविक सोमपान तो प्रभु भक्ति हैं जिसके रस को पीकर प्रभुभक्त आनंदमय हो जाता हैं.
      ऋग्वेद ८/४८/३ इस कथन की पुष्टि करते हुए कहता हैं – हमने सोमपान कर लिया हैं, हम अमृत हो गए हैं, हमने ज्योति को प्राप्त कर लिया हैं, विविध दिव्यताओं को हमने अधिगत कर लिया हैं. हे अमृतमय देव मनुष्य की शत्रुता या धूर्तता अब हमारा क्या कर लेगी?
      ऋग्वेद ६/४७/१ और अथर्ववेद १८/१/४८ में कहाँ गया हैं परब्रह्मा की भक्ति रूप रस सोम अत्यंत स्वादिष्ट हैं, तीव्र और आनंद से युक्त हैं, इस ब्रह्मा सोम का जिसने पण कर लिया हैं, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता.
      ऋग्वेद ८/९२/६ – इस परमात्मा से सम्बन्ध सोमरस का पान करके साधक की आत्मा अद्भुत ओज, पराक्रम आदि से युक्त हो जाती हैं ,वह सांसारिक द्वंदों से ऊपर उठ जाता हैं.
      इस प्रकार वेद मन्त्रों से यह सिद्ध होता हैं की सोमरस कोई मादक पद्यार्थ नहीं हैं .
      फिर भी अगर किसी के मन में वेदों में शराब अथवा नशीली वास्तु ग्रहण करने को शंका हैं तो वेद भगवन स्पष्ट रूप से शराब पीने की मनाही करते हैं तो निम्न्किखित वेद मन्त्र में सोमरस और सूरा को विपरीत बताया गया हैं.
      सोमरस पुष्टि, अह्र्लाद तथा बुद्धि वर्धकता आदि उत्तम गुण उत्पन्न करता हैं, सुरापान के समान दुर्मद उत्पन्न नहीं करता अर्थात जैसे सूरा (शराब) बुद्धिनाशक तथा शरीरगत बलनाशक होती हैं वैसा सोमरस नहीं, इसलिए हे कर्म योगिन . स्तोता लोग उक्त रसपान के लिए आपसे प्रार्थना करते हैं की कृपा करके इसको ग्रहण करे. ऋग्वेद ८.२.१२.
      इस प्रकार वेदों के ही प्रमाणों से यह स्पष्ट सिद्ध होता हैं की सोम रस शराब आदि मादक पदार्थ नहीं हैं.
      विधर्मियों द्वारा वेदों की अपकीर्ति फैलाने के लिए एक दुष्ट निरर्थक प्रयास मात्र हैं.

      • kripya krke Rigved ke dashm mandal m aaye shbd jese Jua…shrab se bchne ke nirdesh aadi baton pe prkash daliye…..kya ye buraiyan pahle se vidhman thi ? kripya margdrsn kren…..m ek Vedbhkt hu…..

    • veda me bahut hi high level ka gyan code ke roop me likha gaya hai……kahte hai jab swayam bramha ji..ne manusyo ko veda diya tha to har ek veda ko padne me 1000 saal lag rahe the….manishiyo ke aagrah par bramha ne sanchhipt..short…kar diya…taki har ek veda ke liye 25 saal lage…..Kahte hai….jab manushya ka chetna..consiceness…shudda ho jata hai…to veda swayam…manushya ke hriday me bolne lagte hai..shristi ka sara gyan…jo veda me coded hai…apne aap antar.aatma…uncoded kar deta hai………………..VEDA ME PRAYUKT “SOMA RAS” KA TATPARYA KOI BHUTIK PEY PADARTH NAHI HAI::::::YAHA SOMA KA MATLAB AKHIL BRAMHAND ME VYAPT US ISHVARIYA BRAMHANDIYA ENERGY SE HAI, JISKI VAJAH SE IS AKHIL BRAMHAND ME BHOUTIK AUR PARABHUTIK PARIWARTAN VYAPT HAI::::YAHA DYAN DENA CHAHIYE KI VEDA KAHTA HAI KI:::::AKHIL BRAMHAND BAHAR BHI HAI AUR JEEVO KE ANDAR BHI::::SOMA RAS DEVTAU KO PRIYA HAI:::SOMA RAS SE DEVTA PRASANNA HOTE HAI PRISKRIT HOTE HAI PUST HOTE HAI PRABAL HOTE HAI AUR DEVTA WO HAI JO SADAIVA HAMARE KLYAN KE LIYE SADAIVA TATPAR VYAST RAHTE HAI:::NA KEVAL IS BRAMHAND ME VYAPT DEVO KO SOMA PRIYA HAI BALKI TUMHARE SHARIR>> BODY>> ME STHIT 33 prakar ke devo ko bhi ye priya hai……atah jab tum soma prapta karoge to tumhare andar sthit devo ko soma milega…aur ve pust honge aur antatah tumhara kalyan hoga…bhotik aur parabhoutik kalyan………AB VEDA PAD HI RAHE HAI TO YE PATA KIJIYE KI SOMA KO GRAHAN KAISE KIYA JAI>>>>>

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