अब जब कि आईआईटी में संस्कृत पढाने का प्रस्ताव आया है, बहुत से लोगों का कहना है कि यदि आईआईटी में संस्कृत पढाई जा सकती है तो उसके साथ ही उर्दू/अरबी क्यों नहीं? आखिर भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है, हिन्दू राष्ट्र नहीं.

आईए देखें कि संस्कृत ही क्यों और उर्दू/अरबी क्यों नहीं –

1. संस्कृत भारतीय भाषा है, उर्दू/अरबी नहीं.

2. संस्कृत भारत के गौरव का प्रतिक है, जबकि उर्दू/अरबी भारत पर हुए बर्बर आक्रमणों और बल पूर्वक किए गए धर्म परिवर्तन की निशानी है. संस्कृत के प्रयाग को बलपूर्वक अरबी के अलाहाबाद में बदला गया, संस्कृत की अमरावती अरबी के अहमदाबाद में बदली गई, ऐसे अनेकों उदाहरण हैं. संस्कृत का रमेश बल पूर्वक अरबी का अब्दुल्लाह बना. कहीं भी आक्रमणकारियों का स्वागत नहीं किया जाता है इसलिए – अरबी/उर्दू नहीं.

3.संस्कृत अपने उत्कृष्ट दार्शनिक, शैक्षणिक, आध्यात्मिक, ज्ञानदायक स्वभाव के लिए जानी जाती है, विशेषतः भारतीय संदर्भ में. जबकि अरबी/उर्दू में ऐसी कोई बात नहीं दिखाई देती न भारत में और न ही विश्व में कहीं.

4.संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है जो भारत की सभी और विश्व की अधिकांश भाषाओं की जननी है। संस्कृत भाषा का व्याकरण जितना विज्ञान सम्मत है उतना दुनिया की किसी भी भाषा का नहीं। व्याकरण तज्ञों के अनुसार 5000 वर्ष पूर्व पाणिनी कृत संस्कृत व्याकरण, आज से भी 5000 वर्ष आगे है. संस्कृत व्याकरण बहुत ही नियमबद्ध, अत्यंत स्पष्ट और असंदिग्ध है, जो उसे अत्यंत वैज्ञानिक भाषा बनाता है. उसकी यह काबिलीयत उसे कंप्यूटर के लिए भी बहुत उपयुक्त भाषा बनाती है. इसके विपरीत उर्दू/अरबी का विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है. संस्कृत में जो भी विद्या है, विज्ञान है वह आज भी अकाट्य और तर्क सिद्ध है, उर्दू/अरबी में कहीं कोई विज्ञान की बातें हों ऐसा नजर नहीं आता. उदाहरण के तौर पर आज भी संस्कृत में कम से कम 3000 ऐसी पुस्तकें मिलती हैं जो वास्तुशास्त्र पर हैं, अरबी/उर्दू में तीन भी नहीं मिलेंगी. इससे पता चलता है कि अरबी/उर्दू विज्ञान के लिए निकम्मी भाषाएं हैं.

5.तथ्यों के अनुसार देखा जाए जाए तो आतंकवादियों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले नफरत फैलाने वाले साहित्य का एक बडा हिस्सा जिसे वे दुनिया में तथा भारत में फैलाते हैं – अरबी/उर्दू में होता है. आईएसआईएस, अल कायदा, एलईटी, जेईएम, आईएम इत्यादि उर्दू/अरबी का प्रयोग करते हैं.

6. 1947 में भारत का विभाजन उर्दू प्रेमियों द्वारा ही हुआ था. असल में जो भारत से ज्यादा उर्दू से प्रेम करते थे, वे पाकिस्तान चले गए. अतः यह आवश्यक हो जाता है कि हम हिन्दी, संस्कृत तथा अन्य प्रादेशिक भाषाओं की भारत में वृद्धि करें.

7.और इसलिए हमारे संविधान निर्माता डा. बी.आर. अम्बेडकर संस्कृत को हमारी भाषा बनाना चाहते थे, न कि उर्दू/अरबी को.

8. अरबी विश्व के पचास देशों में है, उर्दू को दो देशों में महत्तव प्राप्त है, केवल मात्र भारत ही ऐसा देश है जो संस्कृत को आगे बढा सकता है.

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9.क्या अरब लोग सऊदी में संस्कृत को स्थान देंगे? क्या पाकिस्तान अपने यहां संस्कृत चलने देगा? (अब यह मत कहना कि भारत धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है , क्योंकि धर्म निरपेक्ष होने का यह मतलब नहीं है कि आप आत्महत्या कर लें)

10. हर राष्ट्र अपनी भाषा, इतिहास और संस्कृति का संवर्धन करता है. यूरोप में जो स्थान अंग्रेजी तथा अन्य यूरोपिय भाषाओं को प्राप्त है, वह संस्कृत या अरबी को नहीं. इसलिए भारत में अरबी/उर्दू , संस्कृत से बराबरी नहीं कर सकती.

11. यदि किसी को इस पोस्ट में कहीं हिन्दू-मुस्लिम नजर आए तो यह जान लें कि सभी भारतीय संस्कृत की संतान हैं, अरबी की नहीं. पाकिस्तान के 62% भाग पाकिस्तानी पंजाब में भी लोग साक्षरता के लिए ‘कख’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, ‘अलिफ बे’ का नहीं. यहां तक कि पंजाब शब्द में भी संस्कृत का ‘पंज’ सम्मिलित है.

अतः इस धरती के पुत्र चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम वे संस्कृत से प्रेम करेंगे और उसका समर्थन करेंगे. गुलाम मानसिकता वाले ही अरबी/उर्दू के लिए रोएंगे. अब यह आप को तय करना है कि आप इस देश की संतान हैं या आक्रमणकारियों के गुलाम.

– वाशी अग्निवीर

वाशी शर्मा एक सम्माननीय वैज्ञानिक हैं। अंतराष्ट्रीय स्तर पर उनके कई शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने आईआईटी बाॅम्बे से डाक्टरेट की उपाधी प्राप्त की है। वे नवीन एवं नवीकरणीय उर्जा मंत्रालय में वैज्ञानिक हैं। वे एन आई टी जयपुर में पढाते हैं। कान्सन्ट्रेटर ऑप्टीक्स में उन्हें महारत हासिल है। सौर उर्जा के उत्तम तरीके से उपयोग पर वह काम करते हैं।

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This Hindi translation is contributed by sister Mridula. For original article in English, visit Sanskrit is getting its recognition at IITs: Why are we not proud?

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