करना है प्रयाण मुझे अभी युद्ध क्षेत्र को
है शत्रु जहाँ युद्ध की है दुन्दुभी बजा रहा
कर भेड़िए इकट्ठे बढ़ा चला है भीड़ में
दिखा के सैन्य भेड़ियों का सिंह को डरा रहा
कहता है सर्वश्रेष्ठ हूँ कि सैन्य है बढ़ा हुआ
हैं लाख मेरी तरफ अकेला तू खड़ा हुआ
है सूचना इसे क्या सिंह एक हो तो क्या
घातक है लाख भेड़ियों से सिंह सोया हुआ
घसीटेंगे तेरे सैन्य से तुझको ही धरा पर
तू चढ़ जा आसमान में आ जा या जमीं पर
झुंडों से घिरा काँपेगा करता हुआ थरथर
जिस दिन दहाड़ेंगे हम इस नींद से उठ कर
कहना है आज हर किसी वैरी से ये हमें
ये धर्म सिंहों का है जो है प्राण सम हमें
देखा जो इसकी ओर यदि गिद्ध दृष्टि से
टुकड़ों में गिना जाएगा इतिहास पृष्ठों में
राणा नहीं तो राणा का भाला तो अभी है
कटार म्यान में हैं पर पानी तो अभी है
अब तक तो हो गया जो होना था अनाचार
आरम्भ है ये युद्ध का प्रतिशोध अभी है
जागो अभी! सुनो मेरे सोते हुए सिंहों
मैं जा रहा हूँ रण को मिल पाऊं ना कहीं
उठ जाओ दहाड़ो और अम्बर को गुंजा दो
सबसे ही ये गूंजेगा किसी एक से नहीं
– आर्य मुसाफिर
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Namaste Arya Musafir,
Bohot hi achhi aur prerna denewali kavita likhi hai.. is kavita mein Veer Ras kut kut ke bhara hai… Rana Pratap ka Khagad firse uthega aur is baar kisi Mohammad ghori ko kshama nahi milegi!!!
Dhanyavaad
NAMASTE ANJAN DOSTO N BOHUT HI ACHHI KAVITA HE BUT HAM AAJ BHI GULAM HE DYAN SE SOCNA
Salute _/\_