इस लेख में हम महर्षि मनु की अनुपम कृति मनुस्मृति पर थोपे गए तीसरे आरोप -स्त्रीविरोधी होने और उनकी अवमानना का विश्लेषण करेंगे |

मनुस्मृति मेंकिए गए प्रक्षेपण को हम पहले लेखों में देख ही चुके हैं और हमने यह भी जानाकि इन नकली श्लोकों को आसानी से पहचान कर अलग किया जा सकता है | प्रक्षेपणरहित मूल मनुस्मृति, महर्षि मनु की अत्यंत उत्कृष्ट कृति है | वेदों केबाद मनुस्मृति ही स्त्री को सर्वोच्च सम्मान और अधिकार देती है | आज केअत्याधुनिक स्त्रीवादी भी इस उच्चता तक पहुँचने में नाकाम रहे हैं |  

मनुस्मृति ३.५६ – जिस समाज यापरिवार में स्त्रियों का आदर – सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका आदर – सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं भले ही वे कितना हीश्रेष्ट कर्म कर लें, उन्हें अत्यंत दुखों का सामना करना पड़ता है

यह श्लोक केवल स्त्रीजाति की प्रशंसाकरने के लिए ही नहीं है बल्कि यह कठोर सच्चाई है जिसको महिलाओं की अवमाननाकरने वालों को ध्यान में रखना चाहिए और जो मातृशक्ति का आदर करते हैं उनकेलिए तो यह शब्द अमृत के समान हैं |  प्रकृति का यह नियम पूरी सृष्टि मेंहर एक समाज, हर एक परिवार, देश और पूरी मनुष्य जाति पर लागू होता है |

हमइसलिए परतंत्र हुए कि हमने महर्षि मनु के इस परामर्श की सदियों तक अवमाननाकी |आक्रमणों के बाद भी हम सुधरे नहीं और परिस्थिति बद से बदतर होती गई | १९ वीं शताब्दी के अंत में राजा राम मोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्या सागर औरस्वामी दयानंद सरस्वती के प्रयत्नों से स्थिति में सुधार हुआ और हमने वेदके सन्देश को मानना स्वीकार किया |

कई संकीर्ण मुस्लिम देशों मेंआज भी स्त्रियों को पुरुषों से समझदारी में आधे के बराबर मानते हैं औरपुरुषों को जो अधिकार प्राप्त हैं उसकी तुलना में स्त्री का आधे पर हीअधिकार समझते हैं | अत: ऐसे स्थान नर्क से भी बदतर बने हुए हैं | यूरोप मेंतो सदियों तक बाइबिल के अनुसार स्त्रियों की अवमानना के पूर्ण प्रारूप काही अनुसरण किया गया | यह प्रारूप अत्यंत संकीर्ण और शंकाशील था इसलिए यूरोपअत्यंत संकीर्ण और संदेह को पालने वाली जगह थी |  ये तो सुधारवादी युग कीदेन ही माना जाएगा कि स्थितियों में परिवर्तन आया और बाइबिल को गंभीरता सेलेना लोगों ने बंद किया | परिणामत:  तेजी से विकास संभव हो सका | परंतु अब भी स्त्री एक कामना पूर्ति और भोगकी वस्तु है न कि आदर और मातृत्व शक्ति के रूप में देखी जाती है और यही वजहहै कि पश्चिमी समाज बाकी सब भौतिक विकास के बावजूद भी असुरक्षितता औरआन्तरिक शांति के अभाव से जूझ रहा है |

आइए, मनुस्मृति के कुछ और श्लोकों का अवलोकन करें और समाज को सुरक्षित और शांतिपूर्ण बनाएं –

परिवार में स्त्रियों का महत्त्व – 

३.५५ – पिता, भाई, पति या देवर कोअपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर- भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार काक्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए |

३.५७ – जिसकुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषोंसे पीड़ित रहती हैं, वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल मेंस्त्रीजन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदाबढ़ता रहता है |

३.५८-अनादर के कारण जो स्त्रियां पीड़ित और दुखी: होकर पति, माता-पिता, भाई, देवर आदि को शाप देती हैं या कोसती हैं – वह परिवार ऐसे नष्ट हो जाता हैजैसे पूरे परिवार को विष देकर मारने से, एक बार में ही सब के सब मर जातेहैं |

३.५९ – ऐश्वर्य की कामना करने वाले मनुष्यों को हमेशा सत्कार और उत्सव के समय में स्त्रियोंका आभूषण,वस्त्र, और भोजन आदि से सम्मान करना चाहिए |

३.६२- जो पुरुष, अपनी पत्नी कोप्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है | और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा  परिवार खुशहाल रहता है |

९.२६ – संतान को जन्म देकर घर काभाग्योदय करने वाली स्त्रियां सम्मान के योग्य और घर को प्रकाशित करनेवाली होती हैं | शोभा, लक्ष्मी और स्त्री में कोई अंतर नहीं है | यहां महर्षि मनु उन्हें घर की लक्ष्मी कहते हैं |

९.२८- स्त्री सभी प्रकार केसुखों को देने वाली हैं | चाहे संतान हो, उत्तम परोपकारी कार्य हो या विवाहया फ़िर बड़ों की सेवा – यह सभी सुख़ स्त्रियों के ही आधीन हैं | स्त्रीकभी मां के रूप में, कभी पत्नी और कभी अध्यात्मिक कार्यों की सहयोगी के रूपमें जीवन को सुखद बनाती है |  इस का मतलब है कि स्त्री की सहभागिता किसी भी धार्मिक और अध्यात्मिक कार्यों के लिए अति आवश्यक है

९.९६ – पुरुष और स्त्री एक-दूसरेके बिना अपूर्ण हैं, अत:साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति -पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए |

४. १८० – एक समझदार व्यक्ति को परिवार के सदस्यों –  माता, पुत्री और पत्नी आदि के साथ बहस या झगडा नहीं करना चाहिए |

९ .४ – अपनी कन्या का योग्य वरसे विवाह न करने वाला पिता, पत्नी की उचित आवश्यकताओं को पूरा न करने वालापति और विधवा माता की देखभाल न करने वाला पुत्र – निंदनीय होते हैं |

बहुविवाह पाप है –

९.१०१ – पति और पत्नी दोनों आजीवन साथ रहें, व्यभिचार से बचें, संक्षेप में यही सभी मानवों का धर्म है |

अत: धर्म  के इस मूल तत्व कीअवहेलना कर के जो समुदाय – बहुविवाह, अस्थायी विवाह और कामुकता के लियेगुलामी इत्यादि को ज़ायज ठहराने वाले हैं – वे अपने आप ही पतन और विनाश कीओर जा रहे हैं |

स्त्रियों  के स्वाधिकार  –

९ .११ – धन की संभाल और उसके व्यय की जिम्मेदारी, घर और घर के पदार्थों कीशुद्धि, धर्म और अध्यात्म केअनुष्ठान आदि, भोजन पकाना और घर की पूरी सार -संभाल में स्त्री को पूर्ण स्वायत्ता मिलनी चाहिए और यह सभी कार्य उसी केमार्गदर्शन में होने चाहिए |

इस श्लोक से यह भ्रांत धारणानिर्मूल हो जाती है कि स्त्रियां वैदिक कर्मकांड का अधिकार नहीं रखतीं | इसके विपरीत उन्हें इन अनुष्ठानों में अग्रणी रखा गया है और जो लोगस्त्रियों के इन अधिकारों का हनन करते हैं –  वे वेद, मनुस्मृति और पूरीमानवता के ख़िलाफ़ हैं |  

९.१२ – स्त्रियां आत्म नियंत्रणसे ही बुराइयों से बच सकती हैं, क्योंकि विश्वसनीय पुरुषों ( पिता, पति, पुत्र आदि) द्वारा घर में रोकी गई अर्थात् निगरानी में रखी हुई स्त्रियांभी असुरक्षित हैं ( बुराइयों से नहीं बच सकती) | जो स्त्रियां अपनी रक्षास्वयं अपने सामर्थ्य और आत्मबल से कर सकती हैं, वस्तुत: वही सुरक्षित रहतीहैं |

जो लोग स्त्रियों की सुरक्षा केनाम पर उन्हें घर में ही रखना पसंद करते हैं, उनका ऐसा सोचना व्यर्थ है | इसके बजाय स्त्रियों को उचित प्रशिक्षण तथा सही मार्गदर्शन मिलना चाहिएताकि वे अपना बचाव स्वयं कर सकें और गलत रास्ते पर भी न जाएं | स्त्रियोंको चारदिवारी में कैद रखना महर्षि मनु के पूर्णत: विपरीत है |

स्त्रियों की सुरक्षा –

९ .६ – एक दुर्बल पति को भी अपनी पत्नी की रक्षा का यत्न करना चाहिए |

९ .५- स्त्रियां चरित्रभ्रष्टता से बचें क्योंकि अगर स्त्रियां आचरणहीन हो जाएंगी तो सम्पूर्ण समाज ही विनष्ट हो जाता है |

५ .१४९- स्त्री हमेशा स्वयं को सुरक्षित रखे | स्त्री की हिफ़ाजत – पिता, पति और पुत्र का दायित्व है |

इस का मतलब यह नहीं है कि मनुस्त्री को बंधन में रखना चाहते हैं | श्लोक ९.१२ में स्त्रियों कीस्वतंत्रता के लिए उनके विचार स्पष्ट हैं | वे यहां स्त्रियों की सामाजिकसुरक्षा की बात कर रहे हैं | क्योंकि जो समाज, अपनी स्त्रियों की रक्षाविकृत मनोवृत्तियों के लोगों से नहीं कर सकता, वह स्वयं भी सुरक्षित नहींरहता |

इसीलिए जब पश्चिम और मध्य एशिया के बर्बर आक्रमणकारियों ने हम परआक्रमण किए तब हमारे शूरवीरों ने मां- बहनों के सम्मान के लिए प्राण तकन्यौछावर कर दिए ! महाराणा प्रताप के शौर्य और आल्हा- उदल के बलिदान कीकथाएं आज भी हमें गर्व से भर देती हैं |

हमारी संस्कृति के इस महान इतिहासके बावजूद भी हम ने आज स्त्रियों को या तो घर में कैद कर रखा है या उन्हेंभोग- विलास की वस्तु मान कर उनका व्यापारीकरण कर रहे हैं | अगर हमस्त्रियों के सम्मान की रक्षा करने की बजाय उनके विश्वास को ऐसे ही आहतकरते रहे तो हमारा विनाश भी निश्चित ही है |  

विवाह –

९.८९ – चाहे आजीवन कन्या पिता के घर में बिना विवाह के बैठी भी रहे परंतु गुणहीन, अयोग्य, दुष्ट पुरुष के साथ विवाह कभी न करे |

९.९० – ९१- विवाह योग्य आयु होनेके उपरांत कन्या अपने सदृश्य पति को स्वयं चुन सकती है | यदि उसके माता -पिता योग्य वर के चुनाव में असफल हो जाते हैं तो उसे अपना पति स्वयं चुनलेने का अधिकार है |

भारतवर्ष में तो प्राचीन काल मेंस्वयंवर की प्रथा भी रही है | अत: यह धारणा कि माता – पिता ही कन्या केलिए वर का चुनाव करें, मनु के विपरीत है | महर्षि मनु के अनुसार वर केचुनाव में माता- पिता को कन्या की सहायता करनी चाहिए न कि अपना निर्णय उसपर थोपना चाहिए, जैसा कि आजकल चलन है |

संपत्ति में अधिकार- 

९.१३० –  पुत्र के ही समान कन्याहै, उस पुत्री के रहते हुए कोई दूसरा उसकी संपत्ति के अधिकार को कैसे छीन सकता है ?

९.१३१ – माता की निजी संपत्ति पर केवल उसकी कन्या का ही अधिकार है |

मनुके अनुसार पिता की संपत्ति में तो कन्या का अधिकार पुत्र के बराबर है हीपरंतु माता की संपत्ति पर एकमात्र कन्या का ही अधिकार है | महर्षि मनुकन्या के लिए यह विशेष अधिकार इसलिए देते हैं ताकि वह किसी की दया पर नरहे, वो उसे स्वामिनी बनाना चाहते हैं, याचक नहीं | क्योंकि एक समृद्ध औरखुशहाल समाज की नींव स्त्रियों के स्वाभिमान और उनकी प्रसन्नता पर टिकी हुईहै |

९.२१२ – २१३ – यदि किसी व्यक्ति के रिश्तेदार या पत्नी न हो तो उसकी संपत्ति को भाई – बहनों में समान रूप से बांट देना चाहिए | यदि बड़ा भाई, छोटे भाई – बहनों को उनका उचित भाग न दे तो वह कानूनन दण्डनीय है |

स्त्रियों की सुरक्षा को और अधिकसुनिश्चित करते हुए, मनु स्त्री की संपत्ति को अपने कब्जे में लेने वाले, चाहें उसके अपने ही क्यों न हों, उनके लिए भी कठोर दण्ड का प्रावधान करतेहैं |

८.२८- २९ –  अकेली स्त्री जिसकीसंतान न हो या उसके परिवार में कोई पुरुष न बचा हो या विधवा हो या जिसकापति विदेश में रहता हो या जो स्त्री बीमार हो तो ऐसे स्त्री की सुरक्षा कादायित्व शासन का है | और यदि उसकी संपत्ति को उसके रिश्तेदार या मित्र चुरालें तो शासन उन्हें कठोर दण्ड देकर, उसे उसकी संपत्ति वापस दिलाए |

दहेज़ का निषेध – 

३.५२ – जो वर के पिता, भाई, रिश्तेदार आदि लोभवश, कन्या या कन्या पक्ष से धन, संपत्ति, वाहन या वस्त्रों को लेकर उपभोग करके जीते हैं वे महा नीच लोग हैं |

इस तरह, मनुस्मृति विवाह मेंकिसी भी प्रकार के लेन- देन का पूर्णत: निषेध करती है ताकि किसी में लालचकी भावना न रहे और स्त्री के धन को कोई लेने की हिम्मत न करे |

इस से आगेवाला श्लोक तो कहता है कि विवाह में किसी वस्तु का अल्प – सा भी लेन- देनबेचना और खरीदना ही होता है जो कि श्रेष्ठ विवाह के आदर्शों के विपरीत है | यहां तक कि मनुस्मृति तो दहेज़ सहित विवाह को दानवीया आसुरीविवाहकहती है

स्त्रियों को पीड़ित करने पर अत्यंत कठोर दण्ड – 

८.३२३- स्त्रियों का अपहरण करनेवालों को प्राण दण्ड देना चाहिए |

९.२३२-  स्त्रियों, बच्चों और सदाचारी विद्वानों की हत्या करने वाले को अत्यंत कठोर दण्ड देना चाहिए |

८.३५२- स्त्रियों पर बलात्कारकरने वाले, उन्हें उत्पीडित करने वाले या व्यभिचार में प्रवृत्त करने वालेको आतंकित करने वाले भयानक दण्ड दें ताकि कोई दूसरा इस विचार से भी कांपजाए |

इसी संदर्भ में एक सत्रन्यायाधीश ने बलात्कार के अत्यधिक बढ़ते हुए मामलों को देखते हुए कहा है किइस घृणित अपराध के लिए अपराधी को नामर्द बना देना ही सही सजा लगती है |

देखें – http://timesofindia.indiatimes.com/india/Castrate-child-rapists-Delhi-judge-suggests/articleshow/8130553.

और हम भी कानून में ऐसे प्रावधान के समर्थक हैं

८.२७५- माता,पत्नी या बेटी पर झूठे दोष लगाकर अपमान करने वाले को दण्डित किया जाना चाहिए |

८.३८९- माता-पिता,पत्नी या संतान को जो बिना किसी गंभीर वजह के छोड़ दे, उसे दण्डित किया जाना चाहिए |

स्त्रियों को प्राथमिकता – 

स्त्रियों की प्राथमिकता ( लेडिज फर्स्ट )  के जनक महर्षि मनु ही हैं |

२.१३८-  स्त्री, रोगी, भारवाहक, अधिक आयुवाले, विद्यार्थी, वर और राजा को पहले रास्ता देना चाहिए |

३.११४-  नवविवाहिताओं, अल्पवयीन कन्याओं, रोगी और गर्भिणी स्त्रियों को, आए हुए अतिथियों से भी पहले भोजन कराएं |

आइएमहर्षि मनु के इन सुन्दर उपदेशों को अपनाकर समाज,राष्ट्र और सम्पूर्ण विश्व को सुख़-शांति और समृद्धि की तरफ़ बढ़ाएं

संदर्भ- डा.सुरेन्द्र कुमार, पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय और स्वामी दयानंद के कार्य |

This translation in Hindi has been contributed by sister Aryabala. Original post in English is available at http://agniveer.com/manu-smriti-and-women/

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21 Comments on "मनुस्मृति और स्त्री"

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Anant Mohite

Agar etani aachhi Manusmruti hoti to jab Babasaheb Ambedkar ne bhich chaurahe pe jalaya tha to unke uppar koi kyu casemkiya gaya…kyun ki unko maloon tgha ki manusmruti kshudra aur Naari ke kheelap rachi gaye..hai…esleeye….

Anant Mohite
Ye Sab Adbhi Samvidhan Ke sahare Bataya gaya hai….Vaise tu stree ko barso se apmaneet hee kiya ja raha hai…agar aisa nahi hota to….drupadi ka vastr-Haran na hota….seeta ke upper kalank na lagata….drupadi ko daav pe nahi lagaya jata….zutha makkar Anveer….abhi samjane ki baat kar raha hai………aise kahi saval ka… Read more »
trackback

[…] मनुस्मृति और स्त्री […]

pradeep
Is desh ko barbad karne wali manusmrati hi hai isi k according log ise follow karte the maine apne bujurgo se unki ap biti suni hai ,karuna nam ki koi chiz nahi hai .varn vyavastha hi samajik ,dharmik ,arthik ,saikshnik asamanta ka karan hai .brahman ,vaishy,chatriya ,shudra .janm k adhar… Read more »
manish

hello agni veer gi kya app na sab kuch sahi lika hai.kya aaj istriya paap ka dal dal mai nahi hai.yaa aap bohut jada samjdaar hai.ya to pagal hai. kya aaj jiss istari ki chawi dekha raha kyawpwakayi sahi hai.

Akanksha

Sundar lekh.

Surendra Kumar Jangid
Surendra Kumar Jangid
Desh ka vertman halat….. Nam Bada Darshan Chhote…1. Sanskar ……khatam….kuch parwari Sanskar ke sath chalene ke kosis kar rahe…..hai…. Manu Samuriti me ladies ko Boy friend banane ki wakalat to nahi ki, B.friend ke sath wo sab karne ki to anumati nahi di ….jo kewal sadi ke bad pati ke… Read more »
raj.hyd

sachhi baat hai desh ki halat behad kharab hai uska mool doshi arya samaj hai
jiske paas gyaan ho agar vahi sust ho jaye to kaise kaam chalega aaj sabbhi ke “devta ” filmi abhineta -netri ban chuke hai n ki koi granth 1

Shailesh Kumar

brahmin daliton ko pair ki juti samjhte h. is liye dharma parivartan ho raha h

raj.hyd
jo bhi anyaya kare uska jamkar virodh kare dharm parivaratan karne ki jarurat nahi hai ho kamjor hai garib hai ashaay hai vah bharman jati me bhi janm bhi kyo n liya ho anek chaprasi aapko braman jati me janm lene vale mil jayenge unko bhi anavshjajk apmaan daant ,maar… Read more »
SARATHI
Namaste Shailesh brother Haan ye baat shi he k brahmino ne dalito pr atyachar kia but iske peeche whi so called cast system tha… Ab ye hamari duty he k hm apne bhai aur bheno ko samjaye k vedon k anusar koi chota ya bda ni h…. hume ved vaani… Read more »
Naval kishor Chorotia

manusmriti aadhaya 2 pli ans. me

raj.hyd

sath me ji manusmriti ke bhakt hai unko apne acharan me lane ke baad vyapakta se uska prahcaar bhi karna chahiye .

Grajpaty Pragsh

यदि पूरे समाज और विश्व को सुंदर, संपन्न और सुरक्षित बनाना है तो हमें मनुस्मृति के नियम को अपनाना होगा ।

raj.hyd

niyam apnane ke saath saath manusmriti ki achhi bato ka vyapakta se prachaar bhi karna hoga

Grajpaty Pragsh

यदि पूरे समाज और विश्व को हमेशा सुंदर, संपन्न और सुरक्षित बनाए रखना है तो इस नियम (मनुस्मृति के नियम) को अपनाना होगा ।

shivkaran
Bibha Sinh ki facebook wall se sabhar मनुस्मृति के अनुसार, स्त्री व पशु के कोई संस्कार नहीं होते. जाहिर है स्त्री को पशु की श्रेणी में रखा गया है जबकि स्त्री के गर्भ से ही पुरुष का प्रादुर्भाव होता है. स्त्री के अंश से पैदा पुरुष संस्कार लायक है, वहीं… Read more »
raj.hyd

apni baat ke paksh me manusmriti ka udaharn bhi saath me dijiye

ANIL
bhai mere upar bataya gaya hai ki log pujniya manu smirti ko galat pracharit karte hain, ve jo iski bematlab alochana karte hain.Isliye phele swayam padhe aur shamje pir sochiye. aur apne baat ki caste system ki tho dharm galat nahi hota, samaj galat hota hai aur use samaj ko… Read more »
sunny
Yes agree,The thing is book is concept of life,how to live,how to behave,how to demonstrate social life with respect and integrity.It also talks about the culture and civilization walk hand in hand.A society which has no culture is doesn’t develop in true manner.The book is concept.To follow or not to… Read more »
raj.hyd

manusmriti me milavt bhi shamil hai hamare dharmadhikari un milavto ko dur nahi karte hai

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