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इस लेख में हम महर्षि मनु की अनुपम कृति मनुस्मृति पर थोपे गए तीसरे आरोप -स्त्रीविरोधी होने और उनकी अवमानना का विश्लेषण करेंगे |

मनुस्मृति मेंकिए गए प्रक्षेपण को हम पहले लेखों में देख ही चुके हैं और हमने यह भी जानाकि इन नकली श्लोकों को आसानी से पहचान कर अलग किया जा सकता है | प्रक्षेपणरहित मूल मनुस्मृति, महर्षि मनु की अत्यंत उत्कृष्ट कृति है | वेदों केबाद मनुस्मृति ही स्त्री को सर्वोच्च सम्मान और अधिकार देती है | आज केअत्याधुनिक स्त्रीवादी भी इस उच्चता तक पहुँचने में नाकाम रहे हैं |  

मनुस्मृति ३.५६ – जिस समाज यापरिवार में स्त्रियों का आदर – सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका आदर – सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं भले ही वे कितना हीश्रेष्ट कर्म कर लें, उन्हें अत्यंत दुखों का सामना करना पड़ता है

यह श्लोक केवल स्त्रीजाति की प्रशंसाकरने के लिए ही नहीं है बल्कि यह कठोर सच्चाई है जिसको महिलाओं की अवमाननाकरने वालों को ध्यान में रखना चाहिए और जो मातृशक्ति का आदर करते हैं उनकेलिए तो यह शब्द अमृत के समान हैं |  प्रकृति का यह नियम पूरी सृष्टि मेंहर एक समाज, हर एक परिवार, देश और पूरी मनुष्य जाति पर लागू होता है |

हमइसलिए परतंत्र हुए कि हमने महर्षि मनु के इस परामर्श की सदियों तक अवमाननाकी |आक्रमणों के बाद भी हम सुधरे नहीं और परिस्थिति बद से बदतर होती गई | १९ वीं शताब्दी के अंत में राजा राम मोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्या सागर औरस्वामी दयानंद सरस्वती के प्रयत्नों से स्थिति में सुधार हुआ और हमने वेदके सन्देश को मानना स्वीकार किया |

कई संकीर्ण मुस्लिम देशों मेंआज भी स्त्रियों को पुरुषों से समझदारी में आधे के बराबर मानते हैं औरपुरुषों को जो अधिकार प्राप्त हैं उसकी तुलना में स्त्री का आधे पर हीअधिकार समझते हैं | अत: ऐसे स्थान नर्क से भी बदतर बने हुए हैं | यूरोप मेंतो सदियों तक बाइबिल के अनुसार स्त्रियों की अवमानना के पूर्ण प्रारूप काही अनुसरण किया गया | यह प्रारूप अत्यंत संकीर्ण और शंकाशील था इसलिए यूरोपअत्यंत संकीर्ण और संदेह को पालने वाली जगह थी |  ये तो सुधारवादी युग कीदेन ही माना जाएगा कि स्थितियों में परिवर्तन आया और बाइबिल को गंभीरता सेलेना लोगों ने बंद किया | परिणामत:  तेजी से विकास संभव हो सका | परंतु अब भी स्त्री एक कामना पूर्ति और भोगकी वस्तु है न कि आदर और मातृत्व शक्ति के रूप में देखी जाती है और यही वजहहै कि पश्चिमी समाज बाकी सब भौतिक विकास के बावजूद भी असुरक्षितता औरआन्तरिक शांति के अभाव से जूझ रहा है |

आइए, मनुस्मृति के कुछ और श्लोकों का अवलोकन करें और समाज को सुरक्षित और शांतिपूर्ण बनाएं –

परिवार में स्त्रियों का महत्त्व – 

३.५५ – पिता, भाई, पति या देवर कोअपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर- भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार काक्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए |

३.५७ – जिसकुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषोंसे पीड़ित रहती हैं, वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल मेंस्त्रीजन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदाबढ़ता रहता है |

३.५८-अनादर के कारण जो स्त्रियां पीड़ित और दुखी: होकर पति, माता-पिता, भाई, देवर आदि को शाप देती हैं या कोसती हैं – वह परिवार ऐसे नष्ट हो जाता हैजैसे पूरे परिवार को विष देकर मारने से, एक बार में ही सब के सब मर जातेहैं |

३.५९ – ऐश्वर्य की कामना करने वाले मनुष्यों को हमेशा सत्कार और उत्सव के समय में स्त्रियोंका आभूषण,वस्त्र, और भोजन आदि से सम्मान करना चाहिए |

३.६२- जो पुरुष, अपनी पत्नी कोप्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है | और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा  परिवार खुशहाल रहता है |

९.२६ – संतान को जन्म देकर घर काभाग्योदय करने वाली स्त्रियां सम्मान के योग्य और घर को प्रकाशित करनेवाली होती हैं | शोभा, लक्ष्मी और स्त्री में कोई अंतर नहीं है | यहां महर्षि मनु उन्हें घर की लक्ष्मी कहते हैं |

९.२८- स्त्री सभी प्रकार केसुखों को देने वाली हैं | चाहे संतान हो, उत्तम परोपकारी कार्य हो या विवाहया फ़िर बड़ों की सेवा – यह सभी सुख़ स्त्रियों के ही आधीन हैं | स्त्रीकभी मां के रूप में, कभी पत्नी और कभी अध्यात्मिक कार्यों की सहयोगी के रूपमें जीवन को सुखद बनाती है |  इस का मतलब है कि स्त्री की सहभागिता किसी भी धार्मिक और अध्यात्मिक कार्यों के लिए अति आवश्यक है

९.९६ – पुरुष और स्त्री एक-दूसरेके बिना अपूर्ण हैं, अत:साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति -पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए |

४. १८० – एक समझदार व्यक्ति को परिवार के सदस्यों –  माता, पुत्री और पत्नी आदि के साथ बहस या झगडा नहीं करना चाहिए |

९ .४ – अपनी कन्या का योग्य वरसे विवाह न करने वाला पिता, पत्नी की उचित आवश्यकताओं को पूरा न करने वालापति और विधवा माता की देखभाल न करने वाला पुत्र – निंदनीय होते हैं |

बहुविवाह पाप है –

९.१०१ – पति और पत्नी दोनों आजीवन साथ रहें, व्यभिचार से बचें, संक्षेप में यही सभी मानवों का धर्म है |

अत: धर्म  के इस मूल तत्व कीअवहेलना कर के जो समुदाय – बहुविवाह, अस्थायी विवाह और कामुकता के लियेगुलामी इत्यादि को ज़ायज ठहराने वाले हैं – वे अपने आप ही पतन और विनाश कीओर जा रहे हैं |

स्त्रियों  के स्वाधिकार  –

९ .११ – धन की संभाल और उसके व्यय की जिम्मेदारी, घर और घर के पदार्थों कीशुद्धि, धर्म और अध्यात्म केअनुष्ठान आदि, भोजन पकाना और घर की पूरी सार -संभाल में स्त्री को पूर्ण स्वायत्ता मिलनी चाहिए और यह सभी कार्य उसी केमार्गदर्शन में होने चाहिए |

इस श्लोक से यह भ्रांत धारणानिर्मूल हो जाती है कि स्त्रियां वैदिक कर्मकांड का अधिकार नहीं रखतीं | इसके विपरीत उन्हें इन अनुष्ठानों में अग्रणी रखा गया है और जो लोगस्त्रियों के इन अधिकारों का हनन करते हैं –  वे वेद, मनुस्मृति और पूरीमानवता के ख़िलाफ़ हैं |  

९.१२ – स्त्रियां आत्म नियंत्रणसे ही बुराइयों से बच सकती हैं, क्योंकि विश्वसनीय पुरुषों ( पिता, पति, पुत्र आदि) द्वारा घर में रोकी गई अर्थात् निगरानी में रखी हुई स्त्रियांभी असुरक्षित हैं ( बुराइयों से नहीं बच सकती) | जो स्त्रियां अपनी रक्षास्वयं अपने सामर्थ्य और आत्मबल से कर सकती हैं, वस्तुत: वही सुरक्षित रहतीहैं |

जो लोग स्त्रियों की सुरक्षा केनाम पर उन्हें घर में ही रखना पसंद करते हैं, उनका ऐसा सोचना व्यर्थ है | इसके बजाय स्त्रियों को उचित प्रशिक्षण तथा सही मार्गदर्शन मिलना चाहिएताकि वे अपना बचाव स्वयं कर सकें और गलत रास्ते पर भी न जाएं | स्त्रियोंको चारदिवारी में कैद रखना महर्षि मनु के पूर्णत: विपरीत है |

स्त्रियों की सुरक्षा –

९ .६ – एक दुर्बल पति को भी अपनी पत्नी की रक्षा का यत्न करना चाहिए |

९ .५- स्त्रियां चरित्रभ्रष्टता से बचें क्योंकि अगर स्त्रियां आचरणहीन हो जाएंगी तो सम्पूर्ण समाज ही विनष्ट हो जाता है |

५ .१४९- स्त्री हमेशा स्वयं को सुरक्षित रखे | स्त्री की हिफ़ाजत – पिता, पति और पुत्र का दायित्व है |

इस का मतलब यह नहीं है कि मनुस्त्री को बंधन में रखना चाहते हैं | श्लोक ९.१२ में स्त्रियों कीस्वतंत्रता के लिए उनके विचार स्पष्ट हैं | वे यहां स्त्रियों की सामाजिकसुरक्षा की बात कर रहे हैं | क्योंकि जो समाज, अपनी स्त्रियों की रक्षाविकृत मनोवृत्तियों के लोगों से नहीं कर सकता, वह स्वयं भी सुरक्षित नहींरहता |

इसीलिए जब पश्चिम और मध्य एशिया के बर्बर आक्रमणकारियों ने हम परआक्रमण किए तब हमारे शूरवीरों ने मां- बहनों के सम्मान के लिए प्राण तकन्यौछावर कर दिए ! महाराणा प्रताप के शौर्य और आल्हा- उदल के बलिदान कीकथाएं आज भी हमें गर्व से भर देती हैं |

हमारी संस्कृति के इस महान इतिहासके बावजूद भी हम ने आज स्त्रियों को या तो घर में कैद कर रखा है या उन्हेंभोग- विलास की वस्तु मान कर उनका व्यापारीकरण कर रहे हैं | अगर हमस्त्रियों के सम्मान की रक्षा करने की बजाय उनके विश्वास को ऐसे ही आहतकरते रहे तो हमारा विनाश भी निश्चित ही है |  

विवाह –

९.८९ – चाहे आजीवन कन्या पिता के घर में बिना विवाह के बैठी भी रहे परंतु गुणहीन, अयोग्य, दुष्ट पुरुष के साथ विवाह कभी न करे |

९.९० – ९१- विवाह योग्य आयु होनेके उपरांत कन्या अपने सदृश्य पति को स्वयं चुन सकती है | यदि उसके माता -पिता योग्य वर के चुनाव में असफल हो जाते हैं तो उसे अपना पति स्वयं चुनलेने का अधिकार है |

भारतवर्ष में तो प्राचीन काल मेंस्वयंवर की प्रथा भी रही है | अत: यह धारणा कि माता – पिता ही कन्या केलिए वर का चुनाव करें, मनु के विपरीत है | महर्षि मनु के अनुसार वर केचुनाव में माता- पिता को कन्या की सहायता करनी चाहिए न कि अपना निर्णय उसपर थोपना चाहिए, जैसा कि आजकल चलन है |

संपत्ति में अधिकार- 

९.१३० –  पुत्र के ही समान कन्याहै, उस पुत्री के रहते हुए कोई दूसरा उसकी संपत्ति के अधिकार को कैसे छीन सकता है ?

९.१३१ – माता की निजी संपत्ति पर केवल उसकी कन्या का ही अधिकार है |

मनुके अनुसार पिता की संपत्ति में तो कन्या का अधिकार पुत्र के बराबर है हीपरंतु माता की संपत्ति पर एकमात्र कन्या का ही अधिकार है | महर्षि मनुकन्या के लिए यह विशेष अधिकार इसलिए देते हैं ताकि वह किसी की दया पर नरहे, वो उसे स्वामिनी बनाना चाहते हैं, याचक नहीं | क्योंकि एक समृद्ध औरखुशहाल समाज की नींव स्त्रियों के स्वाभिमान और उनकी प्रसन्नता पर टिकी हुईहै |

९.२१२ – २१३ – यदि किसी व्यक्ति के रिश्तेदार या पत्नी न हो तो उसकी संपत्ति को भाई – बहनों में समान रूप से बांट देना चाहिए | यदि बड़ा भाई, छोटे भाई – बहनों को उनका उचित भाग न दे तो वह कानूनन दण्डनीय है |

स्त्रियों की सुरक्षा को और अधिकसुनिश्चित करते हुए, मनु स्त्री की संपत्ति को अपने कब्जे में लेने वाले, चाहें उसके अपने ही क्यों न हों, उनके लिए भी कठोर दण्ड का प्रावधान करतेहैं |

८.२८- २९ –  अकेली स्त्री जिसकीसंतान न हो या उसके परिवार में कोई पुरुष न बचा हो या विधवा हो या जिसकापति विदेश में रहता हो या जो स्त्री बीमार हो तो ऐसे स्त्री की सुरक्षा कादायित्व शासन का है | और यदि उसकी संपत्ति को उसके रिश्तेदार या मित्र चुरालें तो शासन उन्हें कठोर दण्ड देकर, उसे उसकी संपत्ति वापस दिलाए |

दहेज़ का निषेध – 

३.५२ – जो वर के पिता, भाई, रिश्तेदार आदि लोभवश, कन्या या कन्या पक्ष से धन, संपत्ति, वाहन या वस्त्रों को लेकर उपभोग करके जीते हैं वे महा नीच लोग हैं |

इस तरह, मनुस्मृति विवाह मेंकिसी भी प्रकार के लेन- देन का पूर्णत: निषेध करती है ताकि किसी में लालचकी भावना न रहे और स्त्री के धन को कोई लेने की हिम्मत न करे |

इस से आगेवाला श्लोक तो कहता है कि विवाह में किसी वस्तु का अल्प – सा भी लेन- देनबेचना और खरीदना ही होता है जो कि श्रेष्ठ विवाह के आदर्शों के विपरीत है | यहां तक कि मनुस्मृति तो दहेज़ सहित विवाह को दानवीया आसुरीविवाहकहती है

स्त्रियों को पीड़ित करने पर अत्यंत कठोर दण्ड – 

८.३२३- स्त्रियों का अपहरण करनेवालों को प्राण दण्ड देना चाहिए |

९.२३२-  स्त्रियों, बच्चों और सदाचारी विद्वानों की हत्या करने वाले को अत्यंत कठोर दण्ड देना चाहिए |

८.३५२- स्त्रियों पर बलात्कारकरने वाले, उन्हें उत्पीडित करने वाले या व्यभिचार में प्रवृत्त करने वालेको आतंकित करने वाले भयानक दण्ड दें ताकि कोई दूसरा इस विचार से भी कांपजाए |

इसी संदर्भ में एक सत्रन्यायाधीश ने बलात्कार के अत्यधिक बढ़ते हुए मामलों को देखते हुए कहा है किइस घृणित अपराध के लिए अपराधी को नामर्द बना देना ही सही सजा लगती है |

देखें – http://timesofindia.indiatimes.com/india/Castrate-child-rapists-Delhi-judge-suggests/articleshow/8130553.

और हम भी कानून में ऐसे प्रावधान के समर्थक हैं

८.२७५- माता,पत्नी या बेटी पर झूठे दोष लगाकर अपमान करने वाले को दण्डित किया जाना चाहिए |

८.३८९- माता-पिता,पत्नी या संतान को जो बिना किसी गंभीर वजह के छोड़ दे, उसे दण्डित किया जाना चाहिए |

स्त्रियों को प्राथमिकता – 

स्त्रियों की प्राथमिकता ( लेडिज फर्स्ट )  के जनक महर्षि मनु ही हैं |

२.१३८-  स्त्री, रोगी, भारवाहक, अधिक आयुवाले, विद्यार्थी, वर और राजा को पहले रास्ता देना चाहिए |

३.११४-  नवविवाहिताओं, अल्पवयीन कन्याओं, रोगी और गर्भिणी स्त्रियों को, आए हुए अतिथियों से भी पहले भोजन कराएं |

आइएमहर्षि मनु के इन सुन्दर उपदेशों को अपनाकर समाज,राष्ट्र और सम्पूर्ण विश्व को सुख़-शांति और समृद्धि की तरफ़ बढ़ाएं

संदर्भ- डा.सुरेन्द्र कुमार, पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय और स्वामी दयानंद के कार्य |

This translation in Hindi has been contributed by sister Aryabala. Original post in English is available at http://agniveer.com/manu-smriti-and-women/

Beyond Flesh there lies a human being

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Author:
Series: Discover Hinduism, Book 3
Genres: Religion, Society

Compilation of Ved Mantra singing glory of Vedic woman.

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हिन्दू धर्म में नारी की महिमा

हिन्दू धर्म में नारी की महिमा

नारी का महिमा गान करते हुए वैदिक मन्त्रों का संकलन|

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  • Very nice cover up work, would you like to enlighten us over the following also

    1. “Swabhav ev narinam …..” – 2/213. It is the nature of women to seduce men in this world; for that reason the wise are never unguarded in the company of females.

    2. “Avidvam samlam………..” – 2/214. Women, true to their class character, are capable of leading astray men in this world, not only a fool but even a learned and wise man. Both become slaves of desire.

    3. “Matra swastra ………..” – 2/215. Wise people should avoid sitting alone with one’s mother, daughter or sister. Since carnal desire is always strong, it can lead to temptation.

    4. “Naudwahay……………..” – 3/8. One should not marry women who has have reddish hair, redundant parts of the body [such as six fingers], one who is often sick, one without hair or having excessive hair and one who has red eyes.

    5. “Nraksh vraksh ………..” – 3/9. One should not marry women whose names are similar to constellations, trees, rivers, those from a low caste, mountains, birds, snakes, slaves or those whose names inspires terror.

    6. “Yasto na bhavet ….. …..” – 3/10. Wise men should not marry women who do not have a brother and whose parents are not socially well known.

    7. “Uchayangh…………….” – 3/11. Wise men should marry only women who are free from bodily defects, with beautiful names, grace/gait like an elephant, moderate hair on the head and body, soft limbs and small teeth.

    8. “Shudr-aiv bharya………” – 3/12.Brahman men can marry Brahman, Kshatriya, Vaish and even Shudra women but Shudra men can marry only Shudra women.

    9. “Na Brahman kshatriya..” – 3/14. Although Brahman, Kshatriya and Vaish men have been allowed inter-caste marriages, even in distress they should not marry Shudra women.

    10. “Heenjati striyam……..” – 3/15. When twice born [dwij=Brahman, Kshatriya and Vaish] men in their folly marry low caste Shudra women, they are responsible for the degradation of their whole family. Accordingly, their children adopt all the demerits of the Shudra caste.

    11. “Shudram shaynam……” – 3/17. A Brahman who marries a Shudra woman, degrades himself and his whole family ,becomes morally degenerated , loses Brahman status and his children too attain status of shudra.

    12. “Daiv pitrya………………” – 3/18. The offerings made by such a person at the time of established rituals are neither accepted by God nor by the departed soul; guests also refuse to have meals with him and he is bound to go to hell after death.

    13. “Chandalash ……………” – 3/240. Food offered and served to Brahman after Shradh ritual should not be seen by a chandal, a pig, a cock,a dog, and a menstruating women.

    14. “Na ashniyat…………….” – 4/43. A Brahman, true defender of his class, should not have his meals in the company of his wife and even avoid looking at her. Furthermore, he should not look towards her when she is having her meals or when she sneezes/yawns.

    15. “Na ajyanti……………….” – 4/44. A Brahman in order to preserve his energy and intellect, must not look at women who applies collyrium to her eyes, one who is massaging her nude body or one who is delivering a child.

    16. “Mrshyanti…………….” – 4/217. One should not accept meals from a woman who has extra marital relations; nor from a family exclusively dominated/managed by women or a family whose 10 days of impurity because of death have not passed.

    17. “Balya va………………….” – 5/150. A female child, young woman or old woman is not supposed to work independently even at her place of residence.

    18. “Balye pitorvashay…….” – 5/151. Girls are supposed to be in the custody of their father when they are children, women must be under the custody of their husband when married and under the custody of her son as widows. In no circumstances is she allowed to assert herself independently.

    19. “Asheela kamvrto………” – 5/157. Men may be lacking virtue, be sexual perverts, immoral and devoid of any good qualities, and yet women must constantly worship and serve their husbands.

    20. “Na ast strinam………..” – 5/158. Women have no divine right to perform any religious ritual, nor make vows or observe a fast. Her only duty is to obey and please her husband and she will for that reason alone be exalted in heaven.

    21. “Kamam to………………” – 5/160. At her pleasure [after the death of her husband], let her emaciate her body by living only on pure flowers, roots of vegetables and fruits. She must not even mention the name of any other men after her husband has died.

    22. “Vyabhacharay…………” – 5/167. Any women violating duty and code of conduct towards her husband, is disgraced and becomes a patient of leprosy. After death, she enters womb of Jackal.

    23. “Kanyam bhajanti……..” – 8/364. In case women enjoy sex with a man from a higher caste, the act is not punishable. But on the contrary, if women enjoy sex with lower caste men, she is to be punished and kept in isolation.

    24. “Utmam sevmansto…….” – 8/365. In case a man from a lower caste enjoys sex with a woman from a higher caste, the person in question is to be awarded the death sentence. And if a person satisfies his carnal desire with women of his own caste, he should be asked to pay compensation to the women’s faith.

    25. “Ya to kanya…………….” – 8/369. In case a woman tears the membrane [hymen] of her Vagina, she shall instantly have her head shaved or two fingers cut off and made to ride on Donkey.

    26. “Bhartaram…………….” – 8/370. In case a women, proud of the greatness of her excellence or her relatives, violates her duty towards her husband, the King shall arrange to have her thrown before dogs at a public place.

    27. “Pita rakhshati……….” – 9/3. Since women are not capable of living independently, she is to be kept under the custody of her father as child, under her husband as a woman and under her son as widow.

    28. “Imam hi sarw………..” – 9/6. It is the duty of all husbands to exert total control over their wives. Even physically weak husbands must strive to control their wives.

    29. “Pati bharyam ……….” – 9/8. The husband, after the conception of his wife, becomes the embryo and is born again of her. This explains why women are called Jaya.

    30. “Panam durjan………” – 9/13. Consuming liquor, association with wicked persons, separation from her husband, rambling around, sleeping for unreasonable hours and dwelling -are six demerits of women.

    31. “Naita rupam……………” – 9/14. Such women are not loyal and have extra marital relations with men without consideration for their age.

    32. “Poonshchalya…………” – 9/15. Because of their passion for men, immutable temper and natural heartlessness, they are not loyal to their husbands.

    33. “Na asti strinam………” – 9/18. While performing namkarm and jatkarm, Vedic mantras are not to be recited by women, because women are lacking in strength and knowledge of Vedic texts. Women are impure and represent falsehood.

    34. “Devra…sapinda………” – 9/58. On failure to produce offspring with her husband, she may obtain offspring by cohabitation with her brother-in-law [devar] or with some other relative [sapinda] on her in-law’s side.

    35. “Vidwayam…………….” – 9/60. He who is appointed to cohabit with a widow shall approach her at night, be anointed with clarified butter and silently beget one son, but by no means a second one.

    36. “Yatha vidy……………..” – 9/70. In accordance with established law, the sister-in-law [bhabhi] must be clad in white garments; with pure intent her brother-in-law [devar] will cohabitate with her until she conceives.

    37. “Ati kramay……………” – 9/77. Any women who disobey orders of her lethargic, alcoholic and diseased husband shall be deserted for three months and be deprived of her ornaments.

    38. “Vandyashtamay…….” – 9/80. A barren wife may be superseded in the 8th year; she whose children die may be superseded in the 10th year and she who bears only daughters may be superseded in the 11th year; but she who is quarrelsome may be superseded without delay.

    39. “Trinsha……………….” – 9/93. In case of any problem in performing religious rites, males between the age of 24 and 30 should marry a female between the age of 8 and 12.

    40. “Yambrahmansto…….” – 9/177. In case a Brahman man marries Shudra woman, their son will be called ‘Parshav’ or ‘Shudra’ because his social existence is like a dead body.

  • श्रीमान अपने जो मनुस्मृति में सजा के प्रावधान दिए है उसे कृपया श्लोक के साथ मेंशन किया करें

  • Agar etani aachhi Manusmruti hoti to jab Babasaheb Ambedkar ne bhich chaurahe pe jalaya tha to unke uppar koi kyu casemkiya gaya…kyun ki unko maloon tgha ki manusmruti kshudra aur Naari ke kheelap rachi gaye..hai…esleeye….

  • Ye Sab Adbhi Samvidhan Ke sahare Bataya gaya hai….Vaise tu stree ko barso se apmaneet hee kiya ja raha hai…agar aisa nahi hota to….drupadi ka vastr-Haran na hota….seeta ke upper kalank na lagata….drupadi ko daav pe nahi lagaya jata….zutha makkar Anveer….abhi samjane ki baat kar raha hai………aise kahi saval ka agar tu javab de sakta hai kya…..abhi bhi stree ko kaloota . kyun bataya jata hai….abhi tu samvidhan ka sahar leke ye baaten ghusadne ki koshish kar raha hai ,,,,

  • Is desh ko barbad karne wali manusmrati hi hai isi k according log ise follow karte the maine apne bujurgo se unki ap biti suni hai ,karuna nam ki koi chiz nahi hai .varn vyavastha hi samajik ,dharmik ,arthik ,saikshnik asamanta ka karan hai .brahman ,vaishy,chatriya ,shudra .janm k adhar par use varna me anka jata tha or hai. In sabke janm lene ki koi alag prakriya hai kya.kya jarurat hai jati banane ki ,dhrm banane ki ,.
    Manusmrati ka jamana gaya log pher badal kar rahe hai .bhartiya samvidhan ko mano or kuch manne ki jarurat hi nahi hai .bcoz ham cahe jo bhi hai hame follow to samvidhan ko hi karna hoga .

  • hello agni veer gi kya app na sab kuch sahi lika hai.kya aaj istriya paap ka dal dal mai nahi hai.yaa aap bohut jada samjdaar hai.ya to pagal hai. kya aaj jiss istari ki chawi dekha raha kyawpwakayi sahi hai.

  • Desh ka vertman halat….. Nam Bada Darshan Chhote…1. Sanskar ……khatam….kuch parwari Sanskar ke sath chalene ke kosis kar rahe…..hai…. Manu Samuriti me ladies ko Boy friend banane ki wakalat to nahi ki, B.friend ke sath wo sab karne ki to anumati nahi di ….jo kewal sadi ke bad pati ke sath ….B.friend Koyi, Sadi Kisi aur se..Wah Educate India.. 2. Filmi style life 3. Desh ki kamjor Kanoo 4.Bharshtachar ki Nadi-neta&karmchari
    5.Hai. Rupiya. Bada..Baki Sab bekar..Ye Sab…

    • sachhi baat hai desh ki halat behad kharab hai uska mool doshi arya samaj hai
      jiske paas gyaan ho agar vahi sust ho jaye to kaise kaam chalega aaj sabbhi ke “devta ” filmi abhineta -netri ban chuke hai n ki koi granth 1

    • Namaste Shailesh brother

      Haan ye baat shi he k brahmino ne dalito pr atyachar kia but iske peeche whi so called cast system tha…
      Ab ye hamari duty he k hm apne bhai aur bheno ko samjaye k vedon k anusar koi chota ya bda ni h…. hume ved vaani ka prachar krna hoga…. aur isi se hum dharam parivartan rok skte h

    • jo bhi anyaya kare uska jamkar virodh kare
      dharm parivaratan karne ki jarurat nahi hai
      ho kamjor hai garib hai ashaay hai
      vah bharman jati me bhi janm bhi kyo n liya ho
      anek chaprasi aapko braman jati me janm lene vale mil jayenge unko bhi anavshjajk apmaan daant ,maar adi mil jati hai un par bhi julm hote hai !

  • यदि पूरे समाज और विश्व को सुंदर, संपन्न और सुरक्षित बनाना है तो हमें मनुस्मृति के नियम को अपनाना होगा ।

  • यदि पूरे समाज और विश्व को हमेशा सुंदर, संपन्न और सुरक्षित बनाए रखना है तो इस नियम (मनुस्मृति के नियम) को अपनाना होगा ।

  • Bibha Sinh ki facebook wall se sabhar
    मनुस्मृति के अनुसार, स्त्री व पशु के कोई संस्कार नहीं होते. जाहिर है स्त्री को पशु की श्रेणी में रखा गया है जबकि स्त्री के गर्भ से ही पुरुष का प्रादुर्भाव होता है. स्त्री के अंश से पैदा पुरुष संस्कार लायक है, वहीं स्त्री दुत्कारने लायक? इसे विडंबना ही कहेंगे कि जहां एक ओर स्त्री को सृजनकर्ता का दरजा प्राप्त है वहीं मनु ने उसे निकृष्ट प्राणी माना है.
    मानवीय आपदा हो या मानवाधिकार, सब से पहले पश्चिम ही सामने आता है. कोढि़यों की सेवा हो या दुखियों की मदद, ईसाई मिशनरियां ही उन्हें हाथोंहाथ लेती हैं. दूसरी तरफ हम छूना तो दूर, घृणा से मुख मोड़ लेते हैं. यही हमारे संस्कार हैं जिन का होहल्ला मचा कर हम ‘आर्यपुरुष’ बनते हैं. पाखंड हमारे खून में है. जन्म से ले कर मृत्यु तक के 16 संस्कारों का सिर्फ नगाड़ा बजाते हैं, जो ढोंग के अलावा कुछ नहीं. देखा जाए तो सब से ज्यादा अशुद्ध हम भारतीय हैं. जिस नारी के गर्भ से निकलते हैं, जगतगुरु शंकराचार्य उसे नरक का द्वार कहते हैं.
    बालक को पालपोस कर बड़ा करने वाली जननी के साथ ऐसा बरताव? गंगाजल को माथे से लगा कर मां के रूप में पूजते हैं, वहीं दूसरी तरफ गंगा में मलमूत्र विसर्जित करते हैं. वृद्ध मांबाप को बिना अन्नजल मारते हैं, पितृपक्ष में चील- कौओं को अन्नजल देते हैं. यही संस्कार हैं हमारे. इन्हीं की दुहाई देते हैं हम.
    पशु हम से श्रेष्ठ हैं, उन में बलात्कार जैसी घटना नहीं होती. एक हमारा समाज है, जहां तमाम संस्कारों के बाद भी पुरुष जातियों में शुद्ध रक्त संचारित नहीं हो पाता. फिर ऐसे संस्कारों से क्या फायदा? क्यों हम संस्कारों के नाम पर नौटंकी करते हैं तथा पंडेपुजारियों की जेबें भरते हैं. जो संस्कार हमारे भीतर इंसानियत की एक चिंगारी. न पैदा कर सकें उन्हें दफन कर देना ही ठीक रहेगा

    • bhai mere upar bataya gaya hai ki log pujniya manu smirti ko galat pracharit karte hain, ve jo iski bematlab alochana karte hain.Isliye phele swayam padhe aur shamje pir sochiye.
      aur apne baat ki caste system ki tho dharm galat nahi hota, samaj galat hota hai aur use samaj ko khud hi sahi karna hota hai.Darma kabhi bal vivhah ko nahi manta lekin samaj me ye tha lekin RAJA RAM MOHAN RAI aur ek jan andholan se ye bahut kam ho gaya.
      Isliye samaj ko sudar karna padega,dharm keval rasta dikhata…

      • Yes agree,The thing is book is concept of life,how to live,how to behave,how to demonstrate social life with respect and integrity.It also talks about the culture and civilization walk hand in hand.A society which has no culture is doesn’t develop in true manner.The book is concept.To follow or not to follow depends on us.That makes you human or un-human,not the book. Manusmriti shows you a culture a path to walk on and make society happy and prosperous.But its we who has to take the zest.