दलित मुस्लिमों को आरक्षण??

यह लेख इस श्रृंखला में दूसरा है. पहले लेख को पढने के लिए यहाँ जाइए. For English, visit here.

(दलित) मुस्लिम/ईसाई आरक्षण क्यों देशद्रोह है?

हम अपने पिछले लेख में सुझाए गए पांच सूत्रीय कार्यक्रम पर श्री रामदेव जी और दूसरे नेताओं की रजामंदी की प्रतीक्षा कर ही रहे थे कि हमें श्री रामदेव जी का लिखा हुआ पत्र मिला. यह पत्र हमारे उन विचारों के जवाब में आया है कि जिसमें हमने (दलित) मुस्लिमों के लिए आरक्षण को देशद्रोह करार दिया था. पर इस पत्र ने अब और ज्यादा संशय पैदा कर दिए हैं. क्योंकि अपने पहले बयान के उलट श्री रामदेव जी ने इस पत्र में धर्म या जाति के आधार पर किसी भी तरह के आरक्षण को ही सिरे से खारिज कर दिया है! इसमें उन्होंने कहा है कि आरक्षण केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर होना चाहिए. पाठक उनके इस पत्र को यहाँ पढ़ सकते हैं. अनुच्छेद ३४१ पर श्री रामदेव जी के विचार.

अब इन दो परस्पर विरोधी बयानों के बाद यह जरुरी हो जाता है कि श्री रामदेव जी सामने आकर इस मुद्दे पर अपनी स्थिति दो टूक शब्दों में स्पष्ट करें और जनता में फैल रहे अविश्वास और संशय की स्थिति को ख़त्म करें. यहाँ पर व्यक्तिगत मान अपमान का कोई महत्त्व ही नहीं है क्योंकि जब बात माता और मातृभूमि के विषय में होती है तब कोई बड़ा छोटा नहीं देखा जाता.

अब हम उन कारणों को गिनाएंगे जिनकी वजह से मुस्लिम और ईसाई धर्मों को अनुच्छेद ३४१ में शामिल करना बहुत खतरनाक और देशद्रोह है. अग्निवीर सब देशभक्तों से अपील करता है कि ऐसी मांगों का खुल कर विरोध करें.

इस्लाम और ईसाई धर्मों का अपमान

१. मुसलमान और ईसाई अपने अपने धर्मों का प्रचार करते हुए यह बात स्पष्ट करते हैं कि सब मुसलमान बराबर हैं और सब ईसाई बराबर हैं. मुसलमानों और ईसाइयों में अगड़ा या पिछड़ा का भेद करना गैर इस्लामी और ईसाईयत के विरुद्ध है. समानता की यह बांसुरी बार बार मुस्लिम और ईसाई धर्मगुरुओं द्वारा बजाई जाती है. ऐसे में अनुच्छेद ३४१ में मुसलमानों और ईसाइयों को ‘पिछड़ा’ बताकर आरक्षण देना इन धर्मों के मूल सिद्धांतों पर हमला है और इन्हें ख़त्म करने की साजिश है. कोई इमाम या पादरी यह कभी नहीं मान सकता कि मुसलमान और ईसाई भी ‘अगड़े’ या ‘पिछड़े’ होते हैं. अब सवाल उठता है कि जब खुद मुस्लिम धर्मगुरु मुसलमानों में ‘पिछड़े’ जैसे किसी भी तबके के होने से इनकार करते हैं तो फिर औरों को क्या पड़ी है कि इस अस्तित्त्वहीन पिछड़े तबके के अधिकारों की आवाज बुलंद करें?

इस तरह अनुच्छेद ३४१ में ‘अल्पसंख्यक’ समुदाय के धर्मों को पिछड़ी जाति में शामिल करना इन ‘महान’ अल्पसंख्यक धर्मों का अपमान है और पूरी तरह गैर संवैधानिक है. और भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष और सर्व धर्म समभाव रखने वाले देशों में ऐसे किसी भी कदम को मंजूरी नहीं दी जा सकती जो हमारे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के धार्मिक जज्बातों को ठेस पहुंचाएं.

हाँ एक बात हो सकती है कि पूरे के पूरे मुसलमान और ईसाइयों को ही अनुच्छेद ३४१ के तहत आरक्षण मिल जाए. यह बड़ा ही अच्छा होगा. पर फिर बेचारे हिन्दुओं का क्या कसूर है? उनको भी ३४१ में शामिल कर लिया जाए तो क्या नुकसान है? इस तरह हम सब लोगों को अनुच्छेद ३४१ के लाभ मिलेंगे! वैसे भी इस देश में नेता और अभिनेता को छोड़ कर ऐसा कौन है जो पिछड़ा और कुचला हुआ नहीं है?

पर अगर ऐसा माना जाए कि इस्लाम और ईसाईयत भी अगड़े और पिछड़े के भेदभाव करते हैं तो सवाल उठता है कि भेदभाव और जात पात का नाम आते ही सब स्कूल कालेजों की किताबों में केवल हिन्दू धर्म को ही क्यों कोसा जाता है? बजाये इसके कि जात पात और भेदभाव को हिन्दुओं की ऐतिहासिक परम्पराओं से सिद्ध किया जाए और फिर उन्हें कोसा जाए, ऐसा क्यों न किया जाए कि सब धर्मों में फैले जात पात के भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई जाए? क्यों न इस्लामी जाति प्रथा पर किताबों में अध्याय जोड़े जाएँ और लोगों को बताया जाए कि किस किस महापुरुष ने मुसलमानों में फैली इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई?

जब किसी मुसलमान या ईसाई से पूछा जाता है कि उसका धर्म हिन्दू धर्म से अच्छा क्यों है तो अपने सीने को गर्व से फुलाता हुआ वह कहता है कि हिन्दू धर्म की तरह उसके धर्म में जाति व्यवस्था का भेदभाव नहीं है. पर दूसरी तरफ ‘पिछड़े’ मुसलमानों के लिए आरक्षण मांगते समय यह गर्व न जाने कहाँ चला जाता है? क्या यह दोहरा चरित्र नहीं है?

कुछ सयाने बड़ी चतुरता से इस्लाम और ईसाई धर्मों के जात पात के भेदभाव का ठीकरा भी हिन्दू धर्म पर ही फोड़ देते हैं और कहते हैं कि इन धर्मों ने यह सब हिन्दू धर्म से ही सीखा है. जब ऐसे चतुर सयानों से पूछा जाता है कि क्या हिन्दू धर्म ईसाई और इस्लाम धर्मों का मूल है, तो ये भाग खड़े होते हैं! क्योंकि मीठा मीठा तो ये गड़प कर जाते हैं और कड़वा कड़वा थू थू करते हैं! दुनिया की हर अच्छाई ये दूसरे धर्मों की किताबों से निकाल लाते हैं और सब बुराइयां हिन्दू धर्म के सिर पर डाल देते हैं. हम यह सिद्ध कर सकते हैं कि इस्लाम और ईसाईयत के अधिकतर सिद्धांत, रीति रिवाज सब हिन्दू धर्म से लिए गए हैं. (उदाहरण के लिए, इस्लामी संगीत, क्राइस्ट की कहानी (कृष्ण का अपभ्रंश), इस्लामी मूर्ति कला, इस्लामी भवन निर्माण, मूर्ति की परिक्रमा (हज)…). भारत में शिक्षा के क्षेत्र में इस घोर हिन्दू विरोधी मानसिकता ने, जो हर बुराई की जड़ को हिन्दू धर्म में ही खोज लेती है पर हर धर्म में इसकी अच्छी शिक्षाओं के प्रभाव पर आँखें मूँद लेती है, भारत को सर्वनाश और धर्मान्धता के कगार पर खड़ा कर दिया है.

हम श्री रामदेव जी से आग्रह करेंगे कि पाठ्यक्रम की पुस्तकों में मौजूद इस जहर को ख़त्म करने के लिए अपनी उर्जा और धन लगाएं. हम इसमें तन मन धन से उनके साथ खड़े होंगे. पर (दलित) मुसलमानों को आरक्षण देने जैसी किसी भी सस्ती लोकप्रिय मांग में हम उनके विरोध में ही खड़े होंगे क्योंकि यह मांग गैर मुस्लिम, हिन्दू द्रोही और देशद्रोही है.

किसी को दोहरे लाभ और किसी को एक भी नहीं

२. भारत में ‘अल्पसंख्यक’ होना किसी वरदान से कम नहीं. कहीं विशेष ‘अल्पसंख्यक’ अधिकार, तो कहीं ‘अल्पसंख्यकों के लिए छूट’, कहीं ‘अल्पसंख्यक प्राथमिकताएं’ तो कहीं ‘अल्पसंख्यक सहायता निधि’. इसके साथ ही ओबीसी कोटे में विशेष ‘अल्पसंख्यक’ आरक्षण भी भारत के अल्पसंख्यक समुदाय को प्राप्त हैं. ऐसे में अनुच्छेद ३४१ में उन्हें शामिल करना जहां उनके लिए दोहरे लाभ लेकर आता है वहीं दूसरी तरफ एक गरीब बहुसंख्यक, जिसको कोई आरक्षण नहीं मिलता, को दोहरी मार मारता है. ऐसे में यह जरुरी हो जाता है कि आरक्षण संबंधी किसी भी मांग को करने से पहले यह निश्चय हो जाए कि किसी को भी ‘अल्पसंख्यक’ और ‘अनुसूचित जाति/जनजाति’ दोनों के लाभ एक साथ न मिल सकें.

पिछड़ेपन को उसकी जड़ों से काटना होगा

३. अनुच्छेद ३४१ का उद्देश्य कुछ समय के लिए एक काम चलाऊ व्यवस्था करना था ताकि इतने समय में देश को जात पात की बीमारी से मुक्त किया जा सके और सबको बराबरी के अवसर दिए जा सकें. पर इस देश में मनुष्यों को केवल वोटों का गुच्छा समझा गया और इसकी वजह से यह अनुच्छेद आज तक भी लागू है. अमेरिका जैसे देशों में भी यह समस्या गंभीर थी पर उन्होंने इसका समाधान किसी आरक्षण के लोलीपोप देकर नहीं किया बल्कि सामने आकर इसका मुकाबला किया और इसे ख़त्म किया. इसलिए बजाये इसके कि जात पात के मैदान में दिन ब दिन और खिलाड़ी उतारे जाएँ और योग्यता को रद्दी की टोकरी में फेंका जाए, जोर इस बात पर होना चाहिए कि शिक्षा और अवसर हर गरीब के दरवाजे पर कैसे पहुंचे. (दलित) मुसलमान प्रेमियों को यह याद रखना चाहिए कि दलित और गरीब समानार्थक नहीं होते.

देश में आज कोई इसलिए पिछड़ा नहीं है कि आज भी किसी और ने उसको पिछड़ा रहने पर मजबूर कर रखा है. मुद्दा केवल सही संसाधन और अवसर मिलने का है जो दूसरों की योग्यता को टक्कर देने लायक योग्यता पैदा करते हैं. इसलिए मांग नौकरियों में आरक्षण की नहीं बल्कि नौकरियों के योग्य बनने के लिए जरुरी संसाधन और अवसरों के एक समान बंटवारे की होनी चाहिए. और यह मांग किसी जाति या धर्म के लिए नहीं बल्कि हर गरीब के लिए होनी चाहिए.

क्या डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम देश के बड़े वैज्ञानिक और फिर राष्ट्रपति नहीं बने? क्या कभी उन्हें जाति आरक्षण या अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र की जरुरत पड़ी? हम उनके जैसे एपीजे और क्यों नहीं पैदा कर सकते?

अनैतिक धर्मांतरण का खतरा

४. मुसलमानों और ईसाइयों को अनुच्छेद ३४१ में शामिल करने का मतलब है एक पूरी हिन्दू जनसँख्या से हाथ धो बैठना. और वह दिन दूर नहीं होगा कि जब हिन्दू अपने ही देश में अल्पसंख्यक बन जायेंगे. यह कोई ढकी छुपी बात नहीं है कि इस्लाम और ईसाई धर्मान्तरक/तबलीगी सम्प्रदाय हैं. इनका अंतिम उद्देश्य दुनिया को मुसलमान/ईसाई बनाना है. किसी गैर मुसलमान या गैर ईसाई को मुसलमान या ईसाई बनाना इन धर्मों में स्वर्ग की सीढ़ी माना जाता है. यही कारण है कि देश में हजारों ऐसे समर्पित धर्मान्तारक गुट/तबलीगी जमात सक्रिय हैं जो कुछ भी करके भोले हिन्दुओं को ईसाई और मुसलमान बनाने में जुटे हैं. जिस किसी को यकीन न हो तो जाकर केरल, बंगाल, असम, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर आदि राज्यों के आज की हिन्दू जनसँख्या के आंकड़े और २० साल पहले के आंकड़े पढ़ ले.

यूरोप और अरब देशों से अरबों डॉलर भारत में हर साल हिन्दुओं के धर्मांतरण के लिए भेजे जाते हैं. और ये डॉलर अपना काम कर भी रहे हैं.

हिन्दुओं को ईसाई और मुसलमान बनाने के लिए ऐसे गुट हर जगह सक्रिय हैं. अगर यकीन न आये तो किसी भी पास के चर्च या मस्जिद में जाकर बस इतना कहो कि आप धर्म बदलना चाहते हो. और आप देखोगे कि कुछ ही मिनटों में रीति रिवाज से लेकर कानूनी कागज़ तक के सारे काम पूरे हो चुके होंगे. अब आप किसी मंदिर में जाना और कहना कि आप हिन्दू होना चाहते हो. वहां का पुजारी पहले तो कुछ समझ ही नहीं सकेगा और फिर आपको वकील से मिलने की सलाह देगा. ऐसा इसलिए है कि हिन्दुओं का उद्देश्य कभी भी धर्मांतरण करना नहीं रहा. और कुछ थोडा बहुत जो अभी कुछ समय से आपने सुना होगा वो तबलीगी गुटों के कारनामों की जवाबी कार्रवाई ज्यादा थी. हिन्दू धर्म धार्मिक आजादी में यकीन रखता है और इसलिए बाकी मजहबों की तरह दूसरे धर्मों के लोगों को जहन्नम/नर्क की धमकी नहीं देता.

आज के दिन भारत धर्मांतरण करवाने वाले तबलीगी गुटों को बहुत आकर्षित करता है. इसका बड़ा कारण हिन्दुओं का खुलापन है जो वो धर्म के मामलों में रखते हैं. हिन्दू जनसँख्या में किसी भी तरह की कमी न केवल हिन्दुओं को ले डूबेगी बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करेगी क्योंकि भारत की भौगोलिक स्थिति और जनसँख्या को कोई भी देश नजरअंदाज नहीं कर सकता. हिन्दुओं को छोड़कर भारत के पश्चिम में दुनिया पहले ही मुसलमान और ईसाई गुटों में बँट चुकी है. और इस जनसँख्या का ईसाईकरण और इस्लामीकरण तलवार की ताकत पर कैसे हुआ, इसके किस्से यूरोप और एशिया के इतिहास के पन्ने पन्ने पर दर्ज हैं.

ईसाई मिशनरी पहले ही भारत के सब आदिवासी क्षेत्रों और कम विकसित जगहों पर जबरदस्त धर्मांतरण कर चुके हैं और कुछ ही दशकों में इन जगहों की हिन्दू जनसँख्या पर बड़ा झपट्टा मार चुके हैं. पर हिन्दुओं के धर्मांतरण के इतने भीषण प्रयासों के बीच अनुच्छेद ३४१ इन तबलीगी गुटों के काम में सबसे बड़ा रोड़ा है. अनुच्छेद ३४१ क्योंकि गैर हिन्दू पर लागू नहीं होता, इसलिए वे लोग जो हिन्दू से ईसाई बन चुके हैं, वे भी सरकारी कागजों में खुद को हिन्दू ही लिखते हैं. इसलिए सरकारी आंकड़ों में ईसाई जनसँख्या असली से बहुत कम रहती है.

वहीँ दूसरी तरफ मुस्लिम तबलीगी जोशीले ‘गजवा ए हिंद’ (भारत पर कब्जा) नाम की एक भविष्यवाणी में यकीन रखते हैं जिसके अनुसार ईसा मसीह दोबारा जिन्दा होंगे उस दिन जिस दिन भारत इस्लामी देश बन जाएगा. इस भविष्यवाणी को पूरा करने के लिए उन्हें भारत के हिन्दुओं को मुसलमान बनाना जरुरी है. पर धार्मिक कट्टरता के चलते ऐसे लोग कभी किसी नए मुसलमान (जो हिन्दू से मुसलमान बना हो) को सरकारी कागजों में हिन्दू लिखने की इजाजत नहीं दे सकते. क्योंकि ऐसा करना इस्लामी शरियत के विद्वानों के अनुसार हराम है. इस कारण इतनी कोशिशों के बावजूद भी मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि का मुख्य कारण जन्म दर (जो सब धर्मों में सबसे ज्यादा है) ही रहता है. पर अगर अनुच्छेद ३४१ में मुसलमानों को शामिल कर लिया गया तो भोले पिछड़े हिन्दुओं के इस्लामीकरण को कोई नहीं रोक पायेगा.

यहाँ यह याद रहे कि हम हिन्दुओं की किसी १ या २% की नहीं बल्कि २५% जनसँख्या की बात कर रहे हैं जो अनुसूचित जाति/जनजाति के अंतर्गत आती है.

अग्निवीर को भेजे गए अपने पत्र में श्री रामदेव जी ने लिखा है कि वो किसी भी तरह के अनैतिक या बलपूर्वक किये गए धर्मांतरण के खिलाफ हैं और उस पर पाबंदी की मांग करते हैं. पर वह यह स्पष्ट करने में नाकाम रहे कि नैतिक और अनैतिक धर्मांतरण की कसौटी क्या हैं? क्या कोई पादरी या पीर अगर किसी की बीमारी ठीक करता है या चमत्कार कर देता है और फिर उसका धर्म बदलता है तो यह नैतिक है या अनैतिक? अग्निवीर ने अभी हाल ही में १०,००० से ज्यादा लोगों की हिन्दू धर्म में वापसी कराई है और बहुत से दलित मुसलमान और ईसाइयों को वैदिक संस्कार सिखाकर ब्राह्मण बनाया है. पर बहुत से तबलीगी गुट अग्निवीर के खिलाफ लामबंद हो गए हैं क्योंकि उनको उन्हीं की औषधि का सेवन अग्निवीर से पहले और किसी ने इतनी बड़ी मात्रा में नहीं कराया था. खैर, हम श्री रामदेव जी से यही जानना चाहेंगे कि वे अग्निवीर द्वारा कराई गयी शुद्धियों के बारे में क्या सोचते हैं?

बात यह है कि जिस देश में किसी को अपने धर्म का पालन करने की आजादी है तो उसे फैलाने की भी आजादी है. जिस तरह अग्निवीर वेदों को और श्री रामदेव जी हठयोग को फैलाने में स्वतंत्र हैं, उसी तरह कोई पादरी या इमाम भी यहाँ ईसाइयत या इस्लाम फ़ैलाने में स्वतंत्र हैं. और ऐसा कोई तरीका नहीं जिससे हम इनमें से किसी को भी अनैतिक कह सकें भले ही हम उनके विचारों से पूरे ही असहमत क्यों न हों. उदाहरण के लिए सउदी अरब में अग्निवीर, स्वामी विवेकानंद, या कोई पादरी अपने काम के लिए वहां मुश्किल में पड़ सकता है और जैसे अमेरिका में गंभीर रोगों के लिए बिना परीक्षण की दवाई और नुस्खे बेचने पर श्री रामदेव जी को गंभीर कानूनी परिणाम भुगतने पड़ते. असल में ये काम सही हैं या गलत, इन बातों पर बहस हो सकती है और इन सब पर हम सबकी अलग अलग राय हो सकती है. इस तरह नैतिकता या अनैतिकता के पैमाने हर व्यक्ति/स्थान के लिए अलग होते हैं. और फिर जब बात धर्म के फैलाने की हो तो नैतिकता-अनैतिकता की कठिनाई और भी बढ़ जाती है.

उदाहरण के लिए, जरा गौर करें कि अब से डेढ़ हजार साल पहले तक १००% हिन्दू/बौद्ध भारतीय उपमहाद्वीप आज के दिन ३५% मुस्लिम-ईसाई कैसे बन गया? क्या इस्लाम और ईसाईयत को फैलाने में गौरी, गजनी और बाबर आदि ‘संतों’ ने नैतिकता का सहारा लिया था? क्या भारत के पिछले हजार साल का इतिहास अनैतिक और बर्बर धर्मांतरण से नहीं भरा हुआ? अगर हाँ तो आज अचानक नैतिकता को बीच में लाकर क्या इन लोगों को वापस लाने के सारे प्रयास बंद कर दिए जाएँ? अगर नहीं तो क्या किया जाए? क्या नैतिकता-अनैतिकता के नाम पर हर बार ठगे जाने का एकाधिकार इस देश में शांतिप्रिय बहुसंख्यकों को ही है? आखिर धर्मांतरण के क्षेत्र में नैतिकता-अनैतिकता के पैमाने क्या हैं?  

जो भी हो, ऐसी कोई भी मांग रद्दी की टोकरी में फेंके जाने योग्य है जिससे इस देश के शांतिप्रिय बहुसंख्यकों की जनसँख्या को ज़रा सा भी खतरा हो. और जब तक धर्मांतरण के खतरे इस देश में मंडरा रहे हैं, तब तक ऐसी कोई भी मांग देश विरोधी ही रहेगी.

देश के सब बड़े और प्रभावशाली नेताओं को ध्यान रखना चाहिए कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर बिना किसी ठोस तर्क, प्रमाण, और शोध के मुंह नहीं खोलना चाहिए. सस्ती वाहवाही बटोरने के और भी तरीके हो सकते हैं. उसके लिए पूरे देश को मजहबी जूनून की आग में झोंक देना ठीक नहीं. मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती. कल कोई भारतीय सेना में भी धार्मिक आरक्षण मांगने लगेगा तब क्या होगा?

संत महात्माओं के लिए देश सर्वोपरि होना चाहिए, और खासकर सन्यासी जिसके आदर्श स्वामी दयानंद जैसे ऊंचे महापुरुष हों, उससे इस तरह की बातों की कभी आशा नहीं की जा सकती. हमें आशा है कि श्री रामदेव जी इस विषय पर शीघ्र ही अपने पक्ष को ठीक करेंगे क्योंकि सन्यासी का धर्म सत्य है, वह असत्य पर टिक कर नहीं बैठ सकता.

बड़ी जनसँख्या को खतरा

५. भारत सरकार के जनसँख्या आंकड़ों के अनुसार ईसाई ‘दलितों’ की संख्या देश में केवल ०.७५% है और मुसलमान ‘दलितों’ की संख्या तो बस ०.१३% है.

इस तरह यदि अनुच्छेद ३४१ में ‘दलित’ मुसलमान और ईसाइयों को शामिल भी किया जाए तो भी इनकी कुल संख्या भारत में १% से भी कम है! ज़रा सोचिये, १% से भी कम संख्या के लिए २५% जनसँख्या को खतरे में डालना कहाँ की बुद्धिमानी है?

मजे की बात यह है कि अल्पसंख्यक प्रेम की होड़ में सबसे आगे रहने वाली कांग्रेस ने भी कभी यह मुद्दा नहीं उठाया था. काले धन पर कांग्रेस को झाड़ने वाले मित्र यह ध्यान रखें कि अस्तित्त्व पर ख़तरा काले धन से ज्यादा बड़ा मुद्दा है. हम चाहते हैं कि श्री रामदेव जी एक बार सामने आकर अपने अनुच्छेद ३४१ संबंधी शब्द वापस ले लें और फिर काले धन की लड़ाई पूरे जोश के साथ चालू रखें.

दलित शब्द अपमानजनक है. गरीब हर जाति और धर्म में है

६. वास्तव में दलित तो एक अपमानजनक शब्द है जो हमारे संविधान में भी कहीं नहीं मिलता. कुछ लोग जो ठोस तथ्य और तर्क से बात न करके अक्सर मुहावरों और हल्की फुल्की बातों से ही काम चलाना जानते हैं वो दलित और गरीब को एक ही समझते हैं. दलित का मतलब गरीब या गरीब का मतलब दलित नहीं होता! अमीर लोग तथाकथित नीची जातियों में भी मिलते हैं और भूख से मरने वालों में तथाकथित ऊंची जाति के लोग भी होते हैं. तो इसलिए अगर आरक्षण देना भी है तो केवल आर्थिक आधार पर होना चाहिए धार्मिक आधार पर नहीं. श्री रामदेव जी ने अपने पत्र में इस बात को स्वीकार किया है. हम आशा करते हैं कि वो अब अनुच्छेद ३४१ संबंधी अपने बयान को वापस ले लेंगे.

मुस्लिम पिछड़ापन अंतर्राष्ट्रीय समस्या है. उसकी जड़ तक जाने की जरुरत है.

७. मुसलमानों की बहुत बड़ी संख्या को ओबीसी के तहत पहले ही आरक्षण मिलता है. पर सच्चर कमेटी ने पाया कि इस आरक्षण के बावजूद भी ‘ओबीसी मुस्लिम’ अपने ‘ओबीसी गैर मुस्लिमों’ से प्रतियोगिता में पिछड़ जाते हैं. और यह केवल भारत का ही हाल नहीं है. पूरी दुनिया में ही मुस्लिम समुदाय शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में सबसे पिछड़ा हुआ है. यह हाल वहां और भी खराब है जहाँ मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक है. मानव अधिकार उल्लंघन की घटनाएं  सबसे ज्यादा इन्हीं देशों में होती हैं. इससे यह पता चलता है कि मुस्लिम पिछड़ेपन की जड़ें नौकरियों में कमी के कारण नहीं बल्कि और गहरी और बुनियादी हैं.

यह सच है कि सब मुसलमान आतंकवादी नहीं होते. यह भी सच है कि मुसलमानों में ऐसे देशभक्त भी पैदा हुए हैं जिन पर हम सब को गर्व है जैसे अशफाकुल्ला खान, हाकिम सूरी, अब्दुल हमीद, ए पी जे आदि. पर यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि दुनिया के ९९% खूंखार आतंकवादी खुद को इस्लाम का मुजाहिद/लड़ाका/गाजी कहते हैं.

अब सच्चे (दलित) मुसलमान हितैषियों को चाहिए कि समस्याओं के इन मूल बिन्दुओं का समाधान करें बजाये इसके कि सस्ती और हल्की किस्म की बातें करके अपना वोट बैंक बढाने की कोशिश करें. क्योंकि इस तरह की बातें केवल उन लोगों के ही पक्ष में जाती हैं जिन्होंने इस्लाम का अपहरण कर लिया है और जो सीधे सादे लोगों को इन गैर जरुरी मांगों के लिए उकसाते हैं और समाज में नफरत फैलाते हैं.

इससे अगले लेख में हम देखेंगे कि सामाजिक बराबरी लाने के लिए क्या क्या किया जा सकता है.

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Comments

  1. says

    in christians and muslims religion there are no caste system. hence to give any kind of reservation to particular segements of this communities would be anti christian and
    anti muslim, these communities must oppose to it since it gives rise to bifercate these communities into reserved and non reserved and ultimately it will ends in divide between
    them what today happened to Hindus.

    • shudra cant be pandit... says

      @dhanwant, y are u so much concerned about the unity of muslims? it is 27% reservation because of which dalit hindus allowed themselves to be counted as hindus otherwise they will shun hindu name…. for ur kind information some muslims get reservation under the quota of OBC???? still they are united???? so please do not oppose reservations for those hindu shudras who want to embrace islam and also reservation to uplift their financial position in society. it is hindu religion and pandits who have molested them for decades and now shudras mental level is on lowest side.. they have never allowed to learn and read anything.

  2. S kumar Parmar says

    Yes; financially weak must be given help or reservation but remaining all reservation of cast, creed, area, culture, religion must not be made scapegoat of these politicians. These politicians have only single motive to get vote by divide and rule.

  3. shudra cant be pandit... says

    @vashi, u have written//पर दूसरी तरफ ‘पिछड़े’ मुसलमानों के लिए आरक्षण मांगते समय यह गर्व न जाने कहाँ चला जाता है? क्या यह दोहरा चरित्र नहीं है?//
    kiya aap classes aur castes mein differentiate nahi kar sakte? aap IIT mein scientist hain phir bhi yeh nai samajh sakte ki muslim OBC ke saath koi chua cht aur untouchable wali kahani nahi hai??? yeh zat-pat nai hai koi bhi class taraqqi karke obc se bahar ho sakti hai par muslim ke aarakshan ke naam par aap tilmila jaate hain.
    books mein isliye parhaya jaata hai ki raja ram mohan ne hindu dharam mein pirithaon ke against kaam kiya kyunki sawarno ne shudron par zulm kiya tha, aap baba ambedkar ki books parh saktein hain. hamare areas meinaaj ki date mein bhi shudraon ke pandit bhi alag hain , agar kisi pandit ne unka koi karm kand kara diya to koi bhi sawarn us se apne yahan karm kand nai karayega isliye shudron ka pandit koi shudra hi hota hai(if u want to check i can point out the area) lekin iske against agar aap musalmanon mein dekhein to hamari masjid ke imam sahab OBC se hain and it is reality.. i hope u understand the difference between OBC and shudra. chunki muslim OBC masjid ka imam bhi ho sakta hai mulla bhi ho sakta h (and imam is the top level in muslim society) to difference sirf financial aspect ka hai samaj mein izzat ka nahi. OBC financially backward woh musalman hain jinke baap dada hindu the aur woh bunai-rangai jaise chote kaam karte thae. islam accept karne ke baad bhi woh wahi chote kaam karte gaye aur machines ke aane k baad zyada hi pichar gaye..

    • says

      Namaste Shudra….

      ———-muslim OBC ke saath koi chua cht aur untouchable wali kahani nahi hai——–

      OBC ki full form hai Other BACKWARD Classes. Kya Islam mein bhi forward or backward classes hoti hain? Sawal yah hai.

      —–hamare areas meinaaj ki date mein bhi shudraon ke pandit bhi alag hain—–

      Is article mein- Hinduon mein Caste system nahi hai- aisa koi claim hi nahi kiya gaya hai :)

      ——chunki muslim OBC masjid ka imam bhi ho sakta hai mulla bhi ho sakta h (and imam is the top level in muslim society)——

      Aap apni jankari thodi durust kar lijiye. Arab mein aap Gair Arabi Musalmanon ko Musalli, Ajami aur MAWALI kaha jata hai. Wahan ki Masjid ul Haram mein OBC chhodo, koi Hindustani Musalmaan Imam nahi ban sakta. Aur koi Gair Arabi Momin Muslim ummah ka Khalifa bhi nahi ban sakta.

      Isliye Hinduon se nafrat karna chhodo aur apne purane Dharm mein vaapas lauto mere bhai. Caste system ek burai hai jise har haalat mein khatm hona padega. Agniveer poori tarah se ismein laga hai. Ved mein kahin caste system nahi hai. Isliye doosron ke ghar mein ghumne ke bajaye apne asal ghar mein vaapas aa jaao.

      Shukriya

  4. shudra cant be pandit... says

    @Mr. vajra. dear intelligent u can read in this article “पर अगर ऐसा माना जाए कि इस्लाम और ईसाईयत भी अगड़े और पिछड़े के भेदभाव करते हैं तो सवाल उठता है कि भेदभाव और जात पात का नाम आते ही सब स्कूल कालेजों की किताबों में केवल हिन्दू धर्म को ही क्यों कोसा जाता है?”
    ki hinduaon mein jat pat par baat ki gayi hai.
    islam mein forward aur backward nai balki india ke musalmano mein backward classes hain. tum musalmano se itni nafrat kyun karte ho ki koi baat samajh hi nai sakte? agar koi hindu OBC islam accept karta hai to kiya woh ameer ho gaya? yeh reservation pichrepan ki ajah se hai, aur same baat SCs par lagu hoti hai.
    SCs ko jo reservation hai woh dharam ke adhaar par hi hai agar koi SC hindu, sikh jain ya budh hota hai to reservation hai par kalima laila ha illalah kehte hi uska reservation khatm yani dharm badalte hi khatm. to phir yeh dharm ke adhaar par hi hua na?
    //ap apni jankari thodi durust kar lijiye. Arab mein aap Gair Arabi Musalmanon ko Musalli, Ajami aur MAWALI kaha jata hai//
    aap bhi apni jankari durust kar lijiye musalli kahan kaha jaata hai? musalli ka kya meaning hai ? tum log itni nafrat kiyun karte ho musalmano se? musalli namaz parhne wale ko kaha jata hai agar chaaho to dictionary dekhlo.. vajra soch lo jab tumhari jaankari itni ghalat hai to islam ke baare mein tum kitna ghalat samajhte hoge? raha ajami to non arabi ko ajami kehte hain chahe hindu ho ya musalman, agar koi christian arab mein paida hua ho jaise ki millions arabi christian egypt main hai n to use arabi bolenge aur non arab ko jo arabi nai bol sakta use ajami bola jata hai, ismein islam ka koi role nai aur na hi musalmanon ka kyunki yeh hazrat muhammad ke time se pehle se hi arab mein bola jane wala word hai.
    mawali slave ko kehte hain aur agar tum arab jaoge to tumhein koi mawali nai kahega, jakar dekhlo agar koi na kahe to islam qubool karlena.
    for ur kind information non-arab saare islami jagat ke khalifa rahein like turkish. turky europe mein hai aur turkish peoples ne kai so saalon tak khilafat ki hai. unhone jo…

    • says

      Shudra..

      ——india ke musalmano mein backward classes hain——

      Ye kiski galti hai?

      —–agar koi hindu OBC islam accept karta hai to kiya woh ameer ho gaya? yeh reservation pichrepan ki ajah se hai, aur same baat SCs par lagu hoti hai.—–

      Bhai jara thoda daanishmandi ka sabut do. OBC/SC/ST PAIDAISH ke aadhar par hote hain, paise ke aadhar par nahi. Case closed.

      —–SCs ko jo reservation hai woh dharam ke adhaar par hi hai—–

      Hamare hisab se reservation Dharm/jaati ke aadhar par nahi balki garibi ke aadhar par hona chaahiye. But what is your point?

      —-musalli kahan kaha jaata hai? musalli ka kya meaning hai ?—–

      Musalli Hindustan mein Chuda/Bhangi/Mawali jaise ghatiya aur derogatory alfaaz ka synonym hai, Arabi ki Lugat dikhane se kuchh nahi hoga, jo matlab asal mein chalta hai uski bat karo.

      —–tum log itni nafrat kiyun karte ho musalmano se?—–

      Ye sawal Arab Musalmanon se jaakar puchho jo tumko Mawali bulate hain aur tumko apni beti bhi nahi dete shadi ke liye, na tumko apne desh ki naagrikta dete hain, na tumko vahan property kharidne dete hain aur na tumko vahan ki Masjid ul Haram mein Imam banne dete hain aur na tumko ummat ka Khalifa banne dete hain. Hindustan mein tumko Rashtrapati bhi bana dete hain Hindu. Kabhi socha nahi is par? Tab bhi nafrat ka theekra hamaare hi sar par hai?

      —-vajra soch lo jab tumhari jaankari itni ghalat hai—-

      Upar padho aur sudhar karo.

      —–raha ajami to non arabi ko ajami kehte hain—–

      Baat chal rahi hai ki is word ko Non Arab Muslims ke liye hakaarat se istemaal kiya jata hai.

      —–mawali slave ko kehte hain aur agar tum arab jaoge to tumhein koi mawali nai kahega—–

      Bilkul, Mawali slave ko hi kehte hain aur Gair Arabi Musalman ko bhi isliye Mawali kehte hain kyonki wo Arabon ke slave samjhe jaate hain. Hum unke slave nahi isliye hum Mawali nahi hain. :) Dekho

      http://en.wikipedia.org/wiki/Mawali

      —–for ur kind information non-arab saare islami jagat ke khalifa rahein—–

      Haan, wo Hadith ke…

    • says

      Shudra..

      cont.. from previous

      —–for ur kind information non-arab saare islami jagat ke khalifa rahein—–

      Haan, wo Hadith ke khilaaf hai. Kyonki HAdith ke hisaab se ISlamic Ummah ka Khalifa keval Quraish hi ho sakta hai, aur koi nahi.

  5. shudra cant be pandit... says

    @vajra, tum itna jhoot kaise bolte aur likhte ho? abhi tumne likha tha ki //Aur koi Gair Arabi Momin Muslim ummah ka Khalifa bhi nahi ban sakta. //
    aur jab maine dikha diya ki ban hi nahi sakta balki kai so salon tak bane to to tumne likha ki //aan, wo Hadith ke khilaaf hai. Kyonki HAdith ke hisaab se ISlamic Ummah ka Khalifa keval Quraish hi ho sakta hai, aur koi nahi.//
    is tarah jhoot likh likh kar tum jahilon se taali bajwa sakte ho par parhe likhe se nai.
    aur tumne kahan se kehdiya ki non arab ko musalman musalli kehte hain ya jo kuch bhi? apne support ke liye to kuch pesh karo ya laffafzi hi karoge? agar namazi kehtein hain to bura kiya hai? aur maine aaj tak nai suna ki musalli kehte hain? yeh to tum log kehto ho ki dekho musalli agaya, musai agya etc. maine kai aryasamajiyon ke video dekhein hain woh isi tarah ki jahilo wali batein kartein hain, tum gaun ke logon ko bewaqoof bana sakte ho is se zyada kuch nai.
    OBC paidaish par hote hain lekin yeh arab mein ya europe main ya usa mein kiyun paida nai ho rahe? aur jab koi class upar uth jayegi woh obc se bahar ho jayegi. alag states mein alag OBC like jaat wagherah par SC to shudra hi rahega? agar class aur caste mein koi farq nai to phir kiya hai?name alag kiyun hain? aur tumse kisne kaha ki arab mein mawali kehte hain? aur nagrikta nai dete? aur larki nai dete? sab batein ghalat hain larki bhi detein hain aur nagrikta bhi aur raha khalifa wali baat woh maine clear kardi apr tumhein moolshankar ki tarah aarop repeat karne ki aadat hai. eik choti si country mein tum kitne logon ki nagrikta lesakte ho? par phir bhi jao dubai aur that se raho kaun rokta hai tumhein?

  6. Truth Seeker says

    @shudra cant be pandit aka Faizi
    _________tum itna jhoot kaise bolte aur likhte ho_______
    Islam jhoot Bolne ko manyata deta hai to tumhe qua objection hai. Qya tumhe prophet ke words me astha nahi hai.

  7. sandeep bansal says

    shudra cant be pandit… yaar pehle to tum apna name theek karo, musalman ho kar ye kaisa name aur pehchan bana rakhi hai. kya tumhe muslim name ache nahi lagte ?

  8. naushad alam says

    jaisa ki aap oopar likhe hai ki islam talwar ke bal per faila hai pahle islam ke baare mai achchi tarah jano phir kisi baat per comment karo. talwar se sirf nafrat failai jaati hai islam nahi apne dil se pucho ki aap ke ooper talwar rakh kar aap ko kitni time tak musalman kar sakta hai koi?
    sahi muslim name common hai. hum sabhi insan ko us malik,allah, ishwar ne paida kiya hai jo baba adam se lekar paida karte chala aa raha hai hum sabhi ko usi ek malik ki pooja [ibadat] karni chahiye . aisa karne wala muslim kahlata hai. jo akhri me likha hai ki arab cuntry me indian ko aisa bolte hai waisa bolte hai aur apne desh muslim ko rastrapati bna diya. to bhai yeh kisi ne ehsan nahi kiya kya yeh desh ka sirf hindu rakshak hai. rahi baat arab ki yeh har desh ka apna kanoon hota hai kiya hum aur aap yeh chahege kisi gair hamre desh ka pradhan bane aur rahi baat kisi vyakti vishesh ki chor ya galat aadmi ho to isme majhab yani islam ka kiya dosh pahle islam ko samjho jaano haqiqat se rubaru ho phir tippadi karna.mohammad salw. duniya se daulat nahi manga balki sirf yahi kaha ki achche kaam karo etc. aur sirf ek hi paida karne wale ki ibadat karo . apne ko dekho aap logo ki baato se lagta hai ki andar me badi nafrat hai aakhir kyo? koi mslim ho ya hindu us aadmi ke bure kaam se aur us admi se nafrat karo na ki uski wajah se uske majhab se. kya aap ne usko dekh kar uske majhab ke baare me sara kuch jaan liya?

    • Ganesh says

      @naushad alam ji,

      agar aap apni mail id dene ka kasht karein to main aap ko kuch aisa pramaan bhejoon jo is baat ko “beyond doubt” prove karta ho ki islam talwaar ke hi jor par phaila hai!

      aap koi temporary id bana kar bhi de sakte hain sirf ek email bhejne ke liye!!

      Dhanyavaad

      • raj.hyd says

        manniy shri ganesh ji, ap isi sthan par bhi apni bat v prman parstut kar sakte hai jisse anek any vyakti apke prman se labh utha sakte hai ! apke prman bhi vyaktigat nahi honge , fir kyo n ap isi manch me usko pesh kar de ? ham asha karte hai ki ap hamare sujhav par avashy”manan” karenge !

        • Ganesh says

          Raj Bhai, theek hai, have a look on below information.

          Today many muslims (specially the followers of latest prophet of islam zakir naik) claim that if islam was spread by sword in India, how come some 80% of Indians are still Hindus?

          Please have a look:

          HOW SO MANY HINDUS SURVIED IN INDIA?

          Naik applies a different ploy to refute the allegation that Islam was propagated
          through violence. He counters it by arguing that if Islam was spread by the sword,
          there could not have survived so many non-Muslims in India and the Middle East.
          He writes:

          “Overall, the Muslims ruled Arabia for 1400 years. Yet today, there are 14
          million Arabs who are Coptic Christians, i.e. Christians since generations.
          If the Muslims had used the sword there would not have been a single
          Arab who would have remained a Christian.
          The Muslims ruled India for about a thousand years. If they wanted,
          they had the power of converting each and every non-Muslim of India to
          Islam. Today more than 80% of the people of India are non-Muslims. All
          these non-Muslim Indians are bearing witness today that Islam was not
          spread by the sword.”

          Al-Qaradawi counters Naik in claiming that sword was applied to create the
          atmosphere for spreading the universal message of Islam:
          …the sword may conquer lands and occupy states, it will never be able
          to open hearts and inculcate faith in people. The spread of Islam only
          occurred after a while, after the barriers between the common people of
          these countries and Islam were removed. At this point, they were able to
          consider Islam within a peaceful atmosphere, away from the disturbance
          of war and the battlefields. Thus, non-Muslims were able to witness the
          excellent morals of the Muslims…

          Dr Fazlur Rahman, a renowned Islamic scholar, who had to flee Pakistan and take
          refuge in the United States for his allegedly moderate views on Islam, also agrees
          with al-Qaradawi.

          Cont..

        • Ganesh says

          Cont..

          Rahman asserts that ‘Jihad (by the sword) becomes an absolute
          necessity’ for instituting the religio-social world-order underlined in the Quran. He
          asks: ‘How can such an ideological world order be brought into existence without
          such means?’ Quite puzzlingly, he then blasts what he calls Christian propaganda for
          popularizing the slogan that ‘Islam was spread by the sword’ or ‘Islam is a religion
          of the sword.’ He, however, candidly agrees that the sword came fi rst in creating a
          conducive environment before Islam could be propagated. He writes, ‘…what was
          spread by the sword was not the religion of Islam, but the political domain of Islam
          so that Islam could work to produce the order on the earth that the Quran seeks…
          But one can never say that Islam was spread by the sword.’

          On the question of Jihad, Abdel Khalek Hassouna, the Secretary General of
          the Arab League (1952-71), similarly said in interview (1968) that ‘Islam was not
          imposed by the sword as its enemies claim. People were converted to Islam by their
          own choice because the life it promised them was better than their previous life.
          Muslims invaded other countries to ensure that the Call (to Islam) would reach the masses
          everywhere.’
          These renowned Muslim scholars had set out to refute the allegation that Islam
          was spread by the sword. In the process, they have inadvertently agreed that the
          sword had indeed played the pivotal role in the propagation of Islam. If analyzed
          carefully, their statements clearly affirm that the sword was the primary weapon in
          the propagation of Islam: the sword was applied first; the propagation of Islam came
          next—the latter, they claim, came through peaceful means. A couple of questions
          need to be asked in this regard:
          1. How peaceful was the propagation phase of Islam?
          2. Didn’t the initial sword-phase played any role in the spread of Islam?

          Cont..

        • Ganesh says

          Cont..

          Let us now address the following two issues concerning the claims of these Muslim scholars:
          1. First, did non-Muslims rush to the umbrella of Islam upon
          realizing that the message of Islam was one of peace and justice?
          2. Second, if Islam was spread by the sword, why are there
          still fourteen million non-Muslims in the Middle East and
          80 percent of the people are Hindus in India after about
          fourteen and ten centuries of Islamic rule, respectively?

          Sultan Mahmud made seventeen devastating assaults in Northern India between 1000 and 1027 CE.
          Three decades after Sultan Mahmud’s first assault, Alberuni recorded in his book,
          Alberuni’s India (Indica, 1030 CE), that the Hindus had become ‘atoms of dust’ in the
          lands conquered by Muslims; and those, who survived, cherished ‘the most inveterate aversion towards all Muslims.’ Alberuni further wrote that the Hindus ‘frighten their children with us (Muslims), our dress and our ways and customs’ and decry us as ‘devil’s breed’ and that they regard ‘everything we do as opposite of all that is good and proper.’xxxi Th e reason for the Hindu repugnance toward Arab Muslims were the complete banishment of Buddhists from countries like Khurasan, Persia, Iraq, Mosul and Syria, fi rst by the Zoroastrians and then by Muslims. And then Muhammad bin Qasim forayed into India, conquered the cities of Brahmanabad and Multan, and went as far as Kanauj. And ‘all these events planted a deeply rooted hatred in their hearts,’ adds Alberuni. Ibn Battutah witnessed many Hindu rebels and warriors, who, instead of submitting to Muslim rules or converting to Islam, had taken refuge in inaccessible mountains near Multan and Aligarh, while Mughal Emperor Babur, late in the Muslim rule in India, noted the same in Agra. In the reign of rather kind-hearted Jahangir (d. 1627), hundreds of thousands, probably millions,
          of Hindus had taken refuge in jungles across India and taken to rebellion; Jahangir
          hunted down 200,000 of them in 1619–20 and sold them in Iran.

          Cont..

        • Ganesh says

          Alberuni proves that, some three decades after Sultan Mahmud’s first invasion,
          India’s Hindus failed to see the message of peace and justice in Islam. If they did,
          they would have rushed to embrace Islam, instead of showing ‘inveterate aversion’
          and ‘deeply rooted hatred’ against Muslims. Other Muslim scholars, travelers and
          merchants, who visited India during the early centuries of Islam, also expressed
          similar frustrations. Islamic rule came to the India proper in 712 and it appears
          that the Hindus did not grasp Islam’s appealing message of peace and justice for
          centuries, as Prof. Habibullah writes, ‘direct conversions at the beginning must have
          been rare; an early report, quoted by a tenth-century Arab geographer, complains
          that Islam had not made a single convert in India.’ Merchant Sulaiman (851),
          who traveled to India and China, stated: ‘In his time, he knew neither Indian nor
          Chinese who had accepted Islam or spoke Arabic.’ Ibn Battutah and Emperor
          Babur witnessed amongst Hindus strongly hostile feeling toward Islam more than
          six and eight centuries after Islam was implanted in India, so did Emperor Jahangir
          after nine centuries.

        • Ganesh says

          HOW CONVERSION TOOK PLACE IN INDIA?
          In light of the evidence presented above, the question should not be about how some
          80 percent of the Indians remained non-Muslims after so many centuries of Muslim
          rule. Instead, it should be asked, why and how as many as 20 percent of the Indians
          became Muslim despite their defi ant resistance against Islam. How could the Muslim
          population swell when Hindus found Islam so repugnant, as attested by the records
          of many Muslim chroniclers and rulers?

          Conversion by the sword:

          Conversion by the sword was initiated by Prophet Muhammad by giving the
          Polytheists a choice between death and conversion to Islam in compliance to Allah’s
          command in Quran 9:5. Th e Hindus, therefore, were supposed to be given a choice
          between death and Islam.
          When Muhammad bin Qasim began the conquest of Sindh, he exercised the
          policy of converting the people of a territory, which gave a fight, at the pain of death.
          He gave quarters to the people, if they submitted to his invading army without
          giving a fight. He did not force them to convert. When the report of his latter lenient
          policy reached his patron Hajjaj in Baghdad, disapproving the leniency, he wrote to
          Qasim:
          ‘…I learnt that the ways and rules you follow are conformable to the
          (Islamic) Law. Except that you give protection to all, great and small
          alike, and make no difference between enemy and friend. God says,
          ‘Give no quarter to Infidels, but cut their throats.’ Then know that this
          is the command of the great god. You should not be too ready to grant
          protection… After this, give no protection to any enemy except to those
          who are of rank (i.e., accept Islam). This is a worthy resolve, and want of
          dignity will not be imputed to you.’l

        • Ganesh says

          Having received this command from Hajjaj, Qasim followed it through in his next

          conquest of Brahmanabad, sparing none who did not embrace Islam. According to
          al-Biladuri, ‘eight, or some say twenty-six thousand, men were put to the sword.’li
          However, putting the great multitude of Hindus, who often refused to embrace
          Islam, to death was diffi cult. Instead, giving them quarters for raising taxes was a
          more lucrative alternative. Qasim later wrote to Hajjaj in this regard. In response,
          Hajjaj wrote back:
          ‘The letter of my dear nephew Muhammad Kasim has been received and
          the fact understood. It appears that the chief inhabitants of Brahmanabad
          had petitioned to be allowed to repair the temple of Budh and pursue
          their religion. As they have made submission, and agreed to pay taxes to
          the Khalifa, nothing can be properly required from them. They have been
          taken under our protection (dhimmi), and we cannot in any way stretch
          out our hands upon their lives or property.’
          Hindus were, thus, accepted as dhimmi subjects, which spared them from conversion
          by the sword. Th e Godless Umayyad rulers were more interested in fi lling the treasury
          by extracting higher taxes from non-Muslim subjects than converting them to Islam.
          For example, al-Hajjaj harshly treated those, who converted to Islam. When a group
          of non-Muslims came to him to inform their acceptance of Islam, al-Hajjaj refused to
          recognize their conversion and ordered his troops to return them to their villages.
          Th e fi rst Umayyad Caliph Muwabiya desperately wanted the Egyptian Copts not to
          convert to Islam, ‘claiming that if they all convert to the true religion (Islam), they
          will cause the treasury a great loss in income from the jizyah.’

        • Ganesh says

          The leniency, accorded to Hindus by the Godless Umayyads, was obviously a
          violation of the canonical Islamic laws of the Quran and Sunnah. This irreverent
          concession was later included in the Hanafi laws; all other Schools of Islamic laws
          demand death or conversion of Polytheists. Therefore, as far as forced conversion is
          concerned, the infidels of India suffered the mildest of persecution.
          Following the extermination of the Godless Umayyad dynasty in 750, the more
          orthodox rulers often converted Hindus at the pain of death. Saffaride ruler Yakub
          Lais captured Kabul in 870 and took the prince of Kabul prisoner. He put the king
          of Ar-Rukhaj to death, destroyed and plundered the temples and the inhabitants were
          forced to embrace Islam. He returned to his capital loaded with booty, which included heads of three kings and many statues of Indian divinities.
          In Sultan Mahmud’s conquest of Kanauj, ‘the inhabitants either accepted Islam
          or took up arms against him to become the food of Islamic swords,’ records his
          secretary Abu Nasr al-Utbi.lvii In the captured of Baran, records al-Utbi, ‘since God’s
          sword was drawn from the scabbard, and the whip of punishment was uplifted…
          ten thousand men proclaimed their anxiety for conversion and their rejection of
          idols.

        • Ganesh says

          After conquering a city, Sultan Mahmud—an educated cultured man and
          a master of Islamic jurisprudence (fiqh)—would normally slaughter the men of
          fighting age, enslave their women and children and force the remaining inhabitants
          to embrace Islam. He used to place on the throne a converted prince, who must run
          the affairs of the state according to Islamic laws and oversee the propagation of Islam
          and the suppression of idol-worship. One such converted prince was Nawasa Shah.
          After Sultan Mahmud retired from India, records al-Utbi, ‘Satan had got the better
          of Nawasa Shah, for he was again apostatizing towards the pit of plural worship…
          So the Sultan went swifter than the wind in that direction, and made the sword reek
          with the blood of his enemies. This means that Sultan Mahmud did not simply
          convert the Hindus by the sword in his campaigns in India, but he also made it sure
          that the converts did not revert to their ancestral faith after his return to Ghazni.

        • Ganesh says

          Conversion through enslavement:
          In the fi rst successful encroachment into India, Muhammad bin Qasim put large
          numbers of men to death in Debal, Brahmanabad and Multan. It appears that the
          adult men of weapon-bearing age, who fell within the reach of the Muslim army in the
          course of the assaults, were ruthlessly slaughtered. Undoubtedly, many of the grownup
          men fl ed in all directions to escape the sword, leaving the vulnerable women and
          children behind, who were carried away as slaves. Chachnama records that Qasim’s
          assault on Rawar yielded 60,000 slaves. In the fi nal stages of his conquest of Sindh,
          says Chachnama, about 100,000 women and children were enslaved.lx
          The number of women and children enslaved by Muslim invaders has not
          been recorded systematically for all the campaigns. It can be surmised that each of
          Qasim’s major assaults in Sehwan, Dhalila, Brahmanabad and Multan yielded similar
          numbers of captives. His brief exploit of three years in the Sindh frontier of India
          (712–15) had likely yielded a few hundred thousand slaves. He always forwarded
          one-fifth of the captives and other spoils—the share of the state, according to the
          Quran [8:41], prophetic traditions and Sharia—to the caliph in Damascus and
          distributed the rest amongst his soldiers. These slave women and children became
          the property of Muslims and entered the house of Islam by default. When those
          children grew up to be adult Muslims in a few years, the males were drafted into
          the Muslim army for waging new holy wars against the Hindus, who had been their
          kinfolk and coreligionists a few years earlier.

        • Ganesh says

          In other words, in the short time-span of a decade, these captured children had become the weapon for the Muslim state to wage new Jihad expeditions for extending the domain of Islam, for converting the vanquished infidels, for enslaving their women and children, and for plundering their wealth. Even during the upheaval of the Partition of India (1946–47), some 100,000 Hindu and Sikh women were enslaved, carried away and married off to Muslims.

        • Ganesh says

          Enslaved women as reproduction tools:

          Th e female captives, in compliance with Quranic sanctions and prophetic traditions,
          were used as sex-slaves by their Muslim masters (see Chapter VII on Slavery). Therefore, they did not only add to the growing Muslim population, but also became valuable tools for expanding the Muslim populace through procreation. When those women, especially the ones of childbearing age, were taken away, the Hindu men, who had fl ed, came back to find that their women and children gone. As a result, they did not have sufficient partners for the procreation. Th at means, wherever Muslims made a successful assault, procreation in the Hindu community dropped sharply. On the other hand, the few thousand Muslim soldiers who came to India with Muhammad bin Qasim had plenty of sex-partners for reproduction to the maximum capacity.
          Even Emperor Akbar had amassed 5,000 beautiful women in his harem. Sultan
          Moulay Ismail of Morocco (r. 1672–1727) had sired about 1,200 children through
          his 2,000–4,000 thousand wives and sex-slaves.lxi Th e extensive enslavement of the vanquished Hindus, particularly the women—who were engaged in the breeding of Muslim children—helped the rapid growth of the Muslim populace.

        • Ganesh says

          Hope this little information I presented here gives brief idea to our brothers like Naushad Alam ji that how islam spread in India………However it should be noted that its just the tip of the iceberg…!!

    • RBX says

      you says islam not spread thru sword..islam talwar se nahi fehla !.. This shows your tiny knowledge what you have ? i wont waste my time on this,just want to say,How & why sikhism came to the world ? .. Kaise aur kyu sikh dharam start huya ? ab jaa ke find kerle..apne app you will get the answer ki islam kaise fehla

  9. raj.hyd says

    manniy sri naushad ji jara ek khuda ki “narebaji” ke alava bhi kuch ap jante hai ? kya ek ishvar ki bat ved me nahi hai ? jara kuraniallah ki qvalitybhidekh lijiye ? dekhe kuran 38/75 jisme kurani allah “dono hatho” se adam kobanane ka dava karte hai / kurani allah ne kisi ko paida nahi kiya ? paida karne par kurani allah ki “tasir”[gun] bhi ane chshiye the jarabatlaye kisme aye the ? dekhe kuran39/67 jisme kurani allah “dayen hath” me kayamat ke bad me asman ko lapetne ka dava karte hai ? dekhe kuran 5/64 jisme kuran allah ek yhudi ko javabdene ke liye apne “dono hath ” khule hone ka dava karte hai / jis kurani allah ke “dono hath” vah” simit” kahalayega ! aur jo simit ho uski shakti bhi simit kahalayegi ! fir usko ishvar kaise kaha ja sakta hai? kurani allah ke sath 124000 rasulo ko manana padta hai farishto ki fauj ko manannapadta hai jahannum v jannat bhi manni padti hai hure v gilme bhi mnni padati hai ! sath me kaba ki disha me namaj bhi padhni padti hai aur haj ke liye us kaba ke chakkar lagane padte hai? fir kyo aise kurni allah ko mana jaye ?

  10. Ravinder Nath Watts says

    If somebody pleads to make changes in Quran, it is termed as blasphemy. But when the question castes come to get a quota the muslims get ready to make a practical change in it. Why then the question of Fatwa does not arise? This opportunist attitude is seen by Allah . Those who are asking for quota on the basis of caste those Muslims are going against the Farmaan of Allah. Are not they? What Naik type of pseudo-muslims have to say? Any person reading Vedas who soever he may be becaomes a Hindu for the time he is reading and grasping Hindu Vedic Vangmaya. His mind may be biased, prejudiced or going against the Dharma but the minutes/hours he is busy in finding out reasons to establish another religions his mind sets on Hinduism in that moment he is living a life as a Hindu. I would ask Mr. Naik aquestion. Is is not true that what a man thinks he becomes? His answer cannot be No. Why is he becoming a Hindu by reading Rig Veda and other Richas establishing something which has no releveance?

  11. Rohit Sarsar says

    “अग्निवीर ने अभी हाल ही में १०,००० से ज्यादा लोगों की हिन्दू धर्म में वापसी कराई है और बहुत से दलित मुसलमान और ईसाइयों को वैदिक संस्कार सिखाकर ब्राह्मण बनाया है.”

    धर्म परिवर्तन —-

    भारत में विदेशी धर्म के ठेकेदारों ने लूट मचा रखी है, पहले तो यहाँ मुसलमान लोग आये और तलवार की ताकत पर व सिर काटने का भय दिखाकर लाखों-करोड़ों लोगों का धर्म परिवर्तन करवा दिया।

    आज जो मुसलमान पाकिस्तान में रहते हैं और जो भारत में भी मुसलमान रहते हैं, इनके पूर्वज हिंदू ही थे और यह बात मुसलमान भाई जानते हैं। अच्छी तरह जानते हैं। ये लोग यह भी जानते है कि इनके पूर्वज हिंदू थे, उनकों बाहर से आने वाले हमलावर मुसलमानों ने बहुत यातनाएँ दे-देकर और कष्ट दे-देकर मुसलमान बनाया था। हजारों प्रकार के भय बताकर मुस्लिम धर्म स्वीकार करने के लिए उन्हें विवश कर दिया गया था। आज के मुसलमानों के हिंदू पर्वजों में से एक भी हिंदू पूर्वज अपनी स्वेच्छा से मुसलमान नहीं बना था।

    आज के मुसलमान भाईयों से मैं निवेदन करता हूँ कि उपर्युक्त बातों पर ध्यान दें, जो ऐतिहासिक सच्चाईयाँ है, अपने हिंदू पूर्वजों पर तरस खायें, विचार करें कि उनका क्या कर्तव्य हैं और क्या करना है।

    बाद में अंग्रेज लोग यहाँ आये और शासन करने लगे। अंग्रेजों ने भी हजारों-लाखों हिंदुओं को ईसाई बनाया।

    अंग्रेज लोग पादरियों को यहाँ बड़े पैमाने पर ले आये और लालच दे-देकर के व गरीब हिंदुओं को नौकरियाँ व अन्य प्रकार की सुविधाएँ देकर के उनको ईसाई बना दिया। भारत जो मूलतः हिंदू देश है, अब यहाँ ईसाई व मुसलमान भी पैदा हो गये।

    इस प्रकार से न केवल विदेशियों ने भारत लूटा और न केवल शासन किया, यहाँ के लोगों का धर्म परिवर्तन भी किया। इस प्रकार से पहले तो विदेशी मुसलमानों ने और बाद में अंग्रेजों ने हिंदुओं पर खूब अन्याय किये।

    आज हमारे देश में बहुत-सी संस्थाएँ है, जो लोगों का धर्म परिवर्तन करवाती है। इनमें मुसलमान संस्थाएँ भी है, जिनके पास विदेशों से पैसा आता है, जो गरीब हिंदुओं को कई प्रकार के प्रलोभन देकर और अनेकों प्रकार से फुसलाकर उनको इस्लाम धर्म में ले जाते हैं। इसी प्रकार ईसाई मिशनरीज भी यहाँ है, जो हिंदुओं को ईसाई बनाते हैं।

    अब इन संस्थाओं की देखा-देखी हमारे हिंदुओं में भी कुछ संस्थाएँ पैदा हो गई, जो शुद्धिकरण का काम करने लगी है।

    शुद्धिकरण का मतलब होता है, ईसाइयों और मुसलमानों…

  12. Rohit Sarsar says

    को जो किसी जमाने में हिंदू थे, उनका धर्म परिवर्तन करके हिंदू धर्म में लाना।

    यह बन्दरों की तरह से नकल करने का काम कुछ हिंदू संस्थाओं ने आरम्भ किया है। यह बहुत गलत है। हमारे शास्त्र कहते हैं,

    “मैं स्वयं ही अशुद्ध हूँ, मुझमें अशुद्धियों का सागर समाया हुआ है, मुझे स्वयं को शुद्ध बनाने की आवश्यकता है।”

    मान लो, इस शुद्धिकरण के काम में जितनी भी हिंदू संस्थाएँ संलग्न है, उन सबने मिलकर एक वर्ष के अन्दर पाँच सौ अन्य धर्म वालों का शुद्धिकरण करके उन्हें हिंदू बनाया, किंतु उसी वर्ष में पाँच हजार हिंदू इधर से उधर चले गए, तो क्या लाभ हुआ ?

    ये तो साढ़े चार हजार का नुकसान हो गया। जब मैं ये नुकसान की बात करता हूँ तो ये हिंदू संस्थाएँ कहती है कि हमने पाँच सौ का नफा किया, नहीं तो पूरे पाँच हजार का ही नुकसान हो जाता। अब उधर से इधर लाये उनके लड़के-लड़कियों के लिए जब लड़के ढ़ुंढ़ने हमारे समाज में निकलते हैं तो हम लोग पूछते हैं कि तुम्हारी जाति या गौत्र क्या है?

    तब वे कहते है कि हम तो केवल मात्र हिंदू है, अन्य कुछ नहीं और वो हम उधर से इधर शुद्धिकरण करके आये हैं। तब हम कहते हैं, भाई उधर ही जाओ, उधर ही तुमको लड़का-लड़की मिलेंगे, तुम न तो ब्राह्मण हो न राजपूत, केवल हिंदू कहने से काम नहीं चलेगा।

    फिर वे परेशान होकर धोबी व भंगी के पास जाते हैं। तब भंगी पूछता है कि,
    भाई, तुम भंगी हो क्या ?

    वो बोलता है, हम भंगी नहीं, हम हिंदू हैं। तब भंगी बोलता है कि रे भाई, तू भंगी होता तो मैं तेरे लड़के को लड़की दे देता और मेरे लड़के के लिए लड़की ले लेता।

    भंगी आगे बोलता है कि भाई, मैं तो धोबी के साथ भी बेटी व्यवहार नहीं करता, धोबी भी मुझसे नीच जाति वाला है, क्योंकि मेरे कपड़ों का मैल भी धोबी छुड़ाता है।

    इस प्रकार से जब ये शुद्धिकरण करके आये हुए लोग हिंदू समाज से निराश हो जाते हैं तब उन हिंदू संस्थाओं के पास वापस जाते हैं, जिन्होंने इनका शुद्धिकरण किया था और जमकर उनको गाली देते हैं और वापस जाकर अपने समाज में पंचायत बुलाते हैं, सबको दण्डवत् प्रणाम करते हैं और विनती करते है कि भाई हमसे बड़ी भूल हो गई थी। हम उधर चले गए थे, हम नरक में गए थे। अब हमें समझ आ गई और हम वापस आ गये। हम पर दया करिये और हमें वापस अपना लीजिये। हम आइन्दा जीवन में भटकने की गलती नहीं करेंगे।

    लो हो गया फैसला नुकसान बचाने का भी।

    इस प्रकार से ये शुद्धिकरण…

    • raj.hyd says

      manniy sri rohit ji , apki bat saty hai sabse pahale apne bhartiy samaj ka shuddhi karan hona chahiye apni kuritiya bhi dur karni chahaiye fir bhi muslim v isai ka shuddhikaran bhi hote rahana chahiye varna yah parampara bhi band ho jayegi! swami shrddha nand ji ne usko kafi kiya tha bad me unki hatya ke bad band ho gaya ab agar kuch salo se chalraha hai to iska virodh mat kijiye jo panch sau hindu samaj me vapas aye hai vah “filhal” aps me bhi vivah kar sakte hai yah unke liye filhal vikalp rahega ! dusre samuday ke manushyo ke liye rasta band kyo kiya jaye vah keval apni manmarji kyokare ! yah samayka khel hai agar apni aaj “gali ” hai unka” road “hai to kabhi apna bhi road ban jayega unki gali bhi nahi rahegi !

  13. Rohit Sarsar says

    इस प्रकार से ये शुद्धिकरण में संलग्न संस्थाएँ अपना समय, अपनी शक्ति और समाज का पैसा नष्ट कर रहे हैं।

    आज हमें शुद्धिकरण के चक्कर में न पड़कर हमारे समाज के लाखों लोग जो अपना धर्म परिवर्तन कर रहे हैं, उनको धर्म परिवर्तन से रोकने की आवश्यकता है।

    मेरा और मेरे जैसे हजारों व्यक्तियों का न तो मक्का का खलीफा और न रोम का पोप धर्म परिवर्तन करा सकता है, क्योंकि मैं अपने धर्म के बारे में पक्का हूँ और समझता हूँ।

    लाखों-करोड़ों हिंदू जो झोपड़ियों और गलिच्छ बस्तियों में रहते हैं, जो मजदूर और किसान है, जो संस्थाओं में काम करते हैं और वो लाखों लोग जो बस्तियों से दूर गाँवों और पहाड़ों में रहते हैं, जिन्हें हम आदिवासी कहते हैं, जो अर्धनग्नावस्था में रहते हैं और जो कभी भी पेट भर भोजन नहीं कर पाते, ये लाखों करोड़ों लोग निरन्तर सोते और जागते धर्म परिवर्तन के खतरे में रहते हैं।

    इन लोगों के ऊपर धर्म परिवर्तन का खतरा सदा मंडराता रहता है। इनमें जाकर और इन लोगों में धर्म प्रचार का रचनात्मक कार्य करने की आवश्यकता है।

    यदि इनमें धर्म प्रचार का काम हो गया और उन लाखों-करोड़ों लोगों को अपनी ही तरह से अपने धर्म के मामले में पक्का बना दिया तो ये ईसाई मिशनरीज वाले और ये मुस्लिम संगठन जो हमारे भोले-भाले, अशिक्षित और धर्म से अनभिज्ञ लोगों का धर्म परिवर्तन कराया करते हैं, यह सब काम स्वतः ही बन्द हो जायेगा और ये सब अपनी धर्म परिवर्तन की दुकानें बन्द करके भाग जाएंगे।

    लो हो गया फैसला नुकसान बचाने का भी।

    इस प्रकार से ये शुद्धिकरण में संलग्न संस्थाएँ अपना समय, अपनी शक्ति और समाज का पैसा नष्ट कर रहे हैं।

    आज हमें शुद्धिकरण के चक्कर में न पड़कर हमारे समाज के लाखों लोग जो अपना धर्म परिवर्तन कर रहे हैं, उनको धर्म परिवर्तन से रोकने की आवश्यकता है।

    मेरा और मेरे जैसे हजारों व्यक्तियों का न तो मक्का का खलीफा और न रोम का पोप धर्म परिवर्तन करा सकता है, क्योंकि मैं अपने धर्म के बारे में पक्का हूँ और समझता हूँ।

    लाखों-करोड़ों हिंदू जो झोपड़ियों और गलिच्छ बस्तियों में रहते हैं, जो मजदूर और किसान है, जो संस्थाओं में काम करते हैं और वो लाखों लोग जो बस्तियों से दूर गाँवों और पहाड़ों में रहते हैं, जिन्हें हम आदिवासी कहते हैं, जो अर्धनग्नावस्था में रहते हैं और जो कभी भी पेट भर भोजन नहीं कर पाते, ये लाखों करोड़ों लोग निरन्तर सोते और जागते धर्म…

  14. Rohit Sarsar says

    आज के हमारे आनन्द, महानन्द, चिन्मयानन्द और पाखण्डा नन्द इनको खुजली मची है। समाज से पैसे लेकर बड़े-बड़े आश्रम बनाते हैं और फिर वहाँ महन्त बनकर अपनी गद्दी जमाते हैं और फिर इन आश्रमों में व्यभिचार का व्यवसाय चालू होता है। वहाँ राजनीति खेली जाती है और न जाने क्या-क्या होता है।

    इन धर्म के ठेकेदारों को आजकल एक नयी खुजली पैदा हुई है – विदेशों में जाने की, वहाँ आश्रम बनाने की और विदेशियों को अपना शिष्य बनाकर वहाँ भी अपने को पुजवाने की।

    फिर जब ये भारत लौट कर आते हैं तो विदेशी शिष्य और शिष्याओं की टोलियाँ भी इनके साथ भारत स्थित आश्रमों में रहती है और उससे फिर वे यहाँ के पैसे वालों और राजनीतिज्ञों पर अपना रोब जमाने की कोशिश करते हैं।

    ये आनन्द, महानन्द नहीं ये तो साक्षात पाखण्डानन्द हैं।

    वास्तव में जो साधु हैं और वे लोग, जो समाज-सुधार और समाज की सेवा करना चाहते हैं, ऐसे लोगों को इन लाखों-करोड़ों लोगों के अन्दर जाकर काम करना चाहिए, जो निरन्तर धर्म परिवर्तन के खतरे में रह रहे हैं।

  15. Rohit Sarsar says

    सन् 1947 में हमें अपनी आजादी मिली और आज 64 वर्ष गुजर चुके हैं। इसके बावजूद इस कांग्रेस पार्टी की सरकार को अक्ल नहीं आई ताकि ये हिंदुओं का अन्य धर्मों में धर्मान्तरण बन्द कर दे, पाबन्दी लगा दे।

    आज इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि धर्म परिवर्तन करवाने वाली सभी संस्थाओं पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

    मुसलमानों का धर्म और ईसाइयों का धर्म केवल कब्रिस्तान तक सीमित है। कब्रिस्तान में जाकर मृत्यु के पश्चात् आदमी को दफना दिया जाता है और उसकी रूह लाखों-करोड़ों वर्षों तक महाकुम्भकरण की नींद सो जाती है और फिर जब कयामत आयेगी, तब नगाड़ा पीटा जायेगा और तब आत्माओं को जगाया जाएगा और फिर प्रभु जी दरबार में बैठकर फैसला करेंगे।

  16. Rohit Sarsar says

    हमारा धर्म पूर्ण है। हमारा धर्म केवल कब्रिस्तान और शमशान तक सीमित नहीं, बल्कि मरने के पश्चात् आत्मा का पुनर्जन्म होता है। आत्मा नया जन्म कहाँ लेगी, उसे कैसा शरीर मिलेगा, उसे माँ बाप कैसे मिलेंगे, उसको बुद्धि कैसी मिलेगी, उसको परिस्थितियाँ कैसी प्राप्त होगी, उसका विकास कितना होगा, उसको बीवी कैसी मिलेगी, अच्छे संस्कारों वाली मिलेगी अथवा झाड़ू हाथ में लेकर पड़ोसियों से निरंतर झगड़ा करने वाली मिलेगी। ये सब निर्भर होगा उसके पिछले जन्म के किये हुए कर्मों पर।

    हमारा धर्म कहता है, आत्मा के साथ संचित किया हुआ धन, सम्पत्ति, जमीन, सुन्दरता और शक्ति, विद्वता और पाण्डित्य ये सब नहीं जाता, केवल अच्छा या बुरा किया हुआ आत्मा के साथ जाता है और उसका प्रभाव लाभ या हानि आत्मा को मिलता है। इसलिए हमारा धर्म कहता है, जितने अच्छे काम कर सको कर लो, यहीं असली कमाई है।

  17. Rohit Sarsar says

    हमारी संस्कृति, हमारा धर्म, हमारा चिंतन, हमारा विचार, हमारे वेद, हमारे उपनिषद्, हमारे शास्त्र, हमारी गीता और रामायण, हमारे पुराणों की पोथियाँ और हमारे संतों की जीवनियाँ इतने गहन व परिपूर्ण है कि इनमें से किसी एक का भी मुकाबला करने के लिए और इनमें से किसी एक को पूरा पढ़ने के लिए, इस संसार में, इस धरती पर अन्य कोई धर्म ग्रन्थ नहीं है।

    हमारे उपर्युक्त धर्मग्रन्थ केवल मात्र हिंदुओं की बपोती नहीं है, इनके ऊपर केवलमात्र हिंदुओं का एकाधिकार नहीं है। ये सारी सृष्टि के मानव जाति के सभी लोगों के लिए हैं।

    इन धर्म ग्रंथों का सभी को चिंतन करना चाहिए। यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए सभी का एक साधन है।

  18. Rohit Sarsar says

    सारा संसार हिंदू धर्म को गले लगा लेगा, इसका आलिंगन करेगा, बड़े प्रेम से और श्रद्धा भाव के साथ, किंतु अपने समाज में जो अशुद्धियाँ है, उनका पहले शुद्धिकरण कर लो। दूसरों का शुद्धिकरण करने की बात भूल जाओ। यह धोबी है, यह भंगी है, यह चमार है, यह तेली है, यह बलाई है। यह जाट है, यह माली है, यह मीणा है, यह बनिया है, यह ब्राह्मण है, यह अमकना है और यह टमकना है। पहले इस झंझट को निकाल फेंकों तो सब ठीक हो जाएगा।

    • raj.hyd says

      manniy sri rahul ji “rasta band hargij mat kijiye ” balki apna” homvark” karte huye isko karte chaliye apni kamiyan bhi dur kijiye ,apne adivasi bandhu ko apna banaiye unki samasya dur kijiye ” apna apna kahane vale apna pan hai apnane me ,apne pan se apnate yadi apne hi logon ko kyo jate gairo ke ghar apne sirhane se ” ham apki bat se sahamat hote huye unko apnanane ka rasta band nahi karna chahte hai!itna apse matbhed rakhne ki anumati chahte hai ! apne apne vichar vistar se rakhe achhe rakhe uske liye kotish: dhanyvad

  19. Rohit Sarsar says

    राज महोदय,
    सर्वप्रथम तो कमेंट करने हेतु धन्यवाद,
    आपके द्वारा दिया जाने वाला तर्क की उन 500 लोगों का आपस में ही विवाह करवा दिया जाना बिल्कुल हमारी आशानुरूप ही है, बल्कि हमने तो वह जगह ही इसलिए बनाई है कि जवाब देने के लिए एक जगह की छूट तो दी ही जानी चाहिए, ताकि अधिक से अधिक विद्वानों की विद्वता का आभास हो व उनसे रूबरू हुआ जा सके।

    खैर,अब मुख्य बिंदू पर ही आते है, श्रीमान् आपके द्वारा दिया जाने वाला यह तर्क ही बेबुनियाद है कि धर्म परिवर्तन करके आये हिंदुओं का जाति प्रथा की समाप्ति तक आपस में ही विवाह करवा दिया जाना एक विकल्प के रूप में चलता रहेगा, जब तक कि जाति प्रथा का अन्त न हो जाए। हमारा प्रश्न है कि यदि उन लोगों का विवाह आपस में ही किया जाना है तो हिंदू धर्म में आने की आवश्यकता ही उन लोगों को कहाँ पड़ रही हैं। यदि आपस में ही विवाह करना है तो यह काम वह अपने-अपने धर्मों में ही रहकर क्यों न करें(यह उन धर्मावलम्बियों की मनःस्थिति होगी) ?

  20. Rohit Sarsar says

    ूसरी बात, चलो मान लिया कि वर्तमान के मुस्लिमों व ईसाइयों ने अपने हिंदू पुरखों पर तरस खाकर अथवा अपना जमीर जाग जाने पर हिंदुत्व स्वीकार कर लिया और पुनः अपने बरसों पुराने भाईयों के बीच हिंदू समाज में चले आए, परंतु यहाँ वापसी करने पर हम उन्हें क्या दे रहे हैं?
    हिंदू समाज में विवाह के नाम पर दुत्कार और उपहास?
    क्या सभी धर्म परिवर्तन में संलग्न संस्थाएँ अपने द्वारा किए जाने वाले शुद्धिकरण के द्वारा इधर आये हुए लोगों को विवाह-सम्बंधी व्यवस्था का लिखित नामा प्रदान करती है तथा इसकी जिम्मेदारी उठाती है ?

    तीसरी बात, इस बात की सम्भावनाएँ बहुत ही कम है कि ये अन्य धर्मावलम्बी हमारे धर्म ग्रंथों से प्रभावित होकर हिंदू स्वीकार करते हैं, क्योंकि यदि बात धर्म ग्रंथों की ही है तो उस हेतु हमने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि हमारे धर्म ग्रंथ केवल मात्र हिंदुओं की ही बपोती नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव जाति पर उनका हक है।

  21. Rohit Sarsar says

    चौथी बात, चलिए श्रीमान् आपके द्वारा बताए गए उस विकल्प को भी मान लेते हैं कि हिंदू धर्म में वापस आने पर उन लोगों का विवाह परस्पर रजामंदी से करवा दिया जाये, परंतु उसके पश्चात् क्या ?
    परस्पर विवाह करवा-करवा कर हम शुद्धिकरण द्वारा आए हुए हिंदुओं का एक अलग ही वर्ग खड़ा कर देंगे, जो कि जाति प्रथा से मुक्त होगा, परंतु इस वर्ग का निर्माण करते करते क्या हम इन्हीं लोगों के अंदर हमारे असली हिंदू समाज के लिए नफरत रूपी जहर के अंकुर नहीं बो देंगे ?
    शुद्धिकरण द्वारा इधर आया हुआ व्यक्ति कब ये चाहेगा कि हिंदू धर्म अपनाने के बाद भी उसे मूल हिंदुओं से पृथक रखा जाये ?
    यहाँ तक कि उसे वैवाहिक सम्बंधों के लिए भी मात्र शुद्धिकरण द्वारा इधर आये हुए लोगों पर ही निर्भर रहना पड़े ?

  22. Rohit Sarsar says

    जब उस व्यक्ति के सगे-सम्बंधी ही मात्र संस्थाओं द्वारा शुद्घिकृत हुए लोग रह जाएंगे तो मूल हिंदू जाति से उन लोगों का मेल जोल व रिश्ता-नाता कहाँ बढ़ा ?
    ऐसे व्यक्ति क्या मात्र शुद्धिकरण करवाने वाली संस्थाओं पर ही निर्भर नहीं रह जाएंगे ?
    परंतु ये सब तो तब होगा जब वह व्यक्ति अन्त तक हिंदू रहेगा, जहाँ रिश्ते-नाते नहीं
    वहाँ कोई व्यक्ति नहीं। वह सीधा धर्म परिवर्तन करवाने वाली इन संस्थाओं को दो-चार सुनाने के पश्चात् अपने पहले वाले धर्म में ही लोट जाएगा।
    इस प्रकार हमने अपना समय, अपनी शक्ति व समाज का पैसा ही नष्ट किया।
    अतः धर्म परिवर्तन के मार्ग को त्याग दिया जाना ही उचित है व अन्य धर्मों द्वारा भी किए जा रहे धर्म परिवर्तन की रोकथाम के कार्य करने चाहिए, वास्तविक समाज सेवा तो यह होगी, अपने धर्म को अन्य धर्मों से बचाना व धर्म से अनभिज्ञ लोगों को अपने धर्म का महत्व बताना, धर्म परिवर्तन के मार्ग से तो पाप की गली ही निकलती है।
    महोदय आप बताए, किसी व्यक्ति के साथ इस तरह पीठ में छुरा घोंपा जाना क्या धर्म की श्रेणी में आता है ?
    क्या यह खुले तौर पर अधर्म का मार्ग नहीं, जब हमारे शास्त्रों में ही स्वयं हमें ही अशुद्ध बताया गया है तो हम कौन होते है किसी का शुद्धिकरण करने वाले ?
    अधर्म का मार्ग सिर्फ और सिर्फ विनाश की ओर ही लेकर जाता है, आगे हम लोग स्वयं विद्वान है।
    शुद्धिकरण यदि किया ही जाना है तो सर्वप्रथम स्वयं को शुद्ध किया जाना ही उचित है। एक साथ हम दो गाड़ियों में सवार नहीं हो सकते। जब तक किसी एक जगह हम पूर्ण रूप से एकाग्र नहीं होंगे तो उस कार्य में पूर्ण रूप से सफलता मिलनी न के बराबर है।

  23. Rohit Sarsar says

    अब यदि बात हिंदुओं की संख्या बढ़ाने की ही है तो उस हेतु परिवार नियोजन का ही कुछ समय के लिए त्याग कर दिया जाना उचित है।

    परिवार नियोजन —

    यह सरकार का और भारत के मुसलमानों का हिंदुओं के विरुद्ध जबरदस्त षड़यंत्र है, परिवार नियोजन से मतलब है – हम दो, हमारे दो। इसका विस्तृत मतलब है कि देश की जनसंख्यां को नियंत्रित करना। देश की बढ़ती हुई आबादी पर रोक लगनी चाहिए। मैं इस बात से सहमत हूँ। जब देश की जनसंख्या अनाप-शनाप बढ़ जाती है, तब वर्तमान में जो समस्याएं हुआ करती है, वे आकार में बढ़ जाती है और विकराल रूप धारण कर लेती हैं, जिनकों हल करना कठिन हो जाता है और सभी राजनैतिक प्रणालियाँ अथवा सिस्टम फेल हो जाते हैं, इसलिए जनसंख्यां तो कम होनी चाहिए। हमारा इसमें विश्वास है, किंतु हम यह नहीं चाहते कि देश के मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ती जावे और हम कम होते जायें। हम कहते हैं कि परिवार नियोजन के लिए समान कानून लाओ और वह कानून हिंदू और मुसलमानों, सभी को लगना चाहिए। हम न्याय की बात करते हैं। हम कहते हैं कि हिंदू और मुसलमान दोनों को एक दृष्टि से देखो, दोनों में भेद मत करों। भेद करना, यहीं साम्प्रदायिकता है। वे भी खुदा के बन्दे हैं और हम भी खुदा के बन्दे हैं। यदि दो बच्चे प्रत्येक व्यक्ति पैदा करे, इसकी आवश्यकता है तो कानून के द्वारा यह बात हिंदू और मुसलमान दोनों पर लागू करो। हिंदू भी दो बच्चे पैदा करेगा और मियाँ भी दो बच्चे पैदा करेगा। कानून में यह प्रावधान भी होगा, यदि मियाँ जी चार पत्नियाँ रखते हैं, जैसा कि उनकों छूट हैं तो जब तक मियाँ समान कानून में नहीं आता, वह चार शादियाँ करे, पत्नियाँ रखे किंतु बच्चे केवल दो ही पैदा करेगा। अब वह किस पत्नि से दो बच्चे पैदा करना चाहता है और कौनसी पत्नियों का परिवार नियोजन करवाना चाहता है, यह बात वह स्वयं अपनी पत्नियों के साथ बैठक करके निश्चित कर ले। बच्चे दो ही पैदा होंगे, हिंदू हो या मुसलमान हो। यह न्याय की बात है, यह सच-झूठ की बात हैं, यह अन्याय के विरुद्ध न्याय के लिए संघर्ष की बात है। इसमें साम्प्रदायिकता का सवाल कहाँ पैदा होता है।

  24. Rohit Sarsar says

    इसलिए मेरा सभी हिंदू भाईयों और बहनों से निवेदन है कि जब तक सरकार जनसंख्याँ पर रोक लगाने की दृष्टि से कानून पास नहीं करती, तब तक आप लोग परिवार नियोजन के फेर में न पड़े और जितने अधिक बच्चे पैदा कर सकते हैं, करिये। खिलाने वाला, रोटी और रोजी देने वाला मालिक ऊपर बैठा है, वह सब देख लेगा। माँ के स्तनों मे दूध स्वतः ही आता है, कोई किसी का पालन-पोषण नहीं करता, सबकी परवरिश खुदा करते हैं। परम पिता परमात्मा ही लोगों को गरीब बनाते हैं, अमीर बनाते हैं, सम्पन्नता देने वाले भी वही है।

  25. raj.hyd says

    paramadarniy sri rohit ji, ham apke lagbhag sabhi vicharo se sahamat hai , durbhagyvash jinko age badhkar samaj ka uddhar karna tha vah apas me ladne me agrsar hai ! fir samaj ka kya hoga sarkari partiya janta ke vot ki lalchi hai vah apna samikaran banane me talleen hai unko desh v janta ki lesh matr chinta nahi hai yah sabhi partiya janta ka v deshka dhan lutna hi unka ek matr udeshy raha gaya hai ! ab kuch lo apne praytno se kuch samaj ki bhalai ka drishtikonapnaye huye hai , ab unke pas jitno samarty hai utna hi kary vahkar pate hai idhar udhar hath mar pate hai ! agar muslim v isai ko apne samaj me nahi joda jayega tovah rasta bhi band ho jayega isliye uske liye bhi ek “patli gali ” ko kyo band kiya jaye ? unki samasyaye ayengi unki samasyaye fil hal apna samaj hal nahi kar payega kyokivah bhi jatibvad se pidit hai vaise apki jankari me batla du bahut sal pahale ek vyakti muslim se hindu bane the unka vivah ekmadhyam vaishy parivar ne apni khubsurat kanya ka kar diya tha! bad me pata laga ki usne us patni ko jan se mar dala , vah bahut mahatv kankshi nikla “lal batti” ka shauk ho gaya, chal baji. hera feri me bhi age badhne laga ! hamara kahane ka matlab hai ki ek- do vayaktiyo ke liye to kuch log apne parivar ke bachhe uplabdh kar sakte hai lekin samuh ke dhramantrit ke liye abhi jagrukta nahi a payi hai , jo ani chahiye !

  26. Rohit Sarsar says

    राज महोदय,

    देर से कमेंट करने हेतु क्षमा, आपका यह विचार कि मुस्लिम व ईसाई को हिंदू धर्म में सम्मलित करने वाले धर्म परिवर्तन के मार्ग को प्रशस्त करने वाली उस पतली गली को क्यों बंद किया जाए, के संदर्भ में हमारे विचार इस प्रकार है ——

    मुसलमान व ईसाई के धर्म परिवर्तन द्वारा शुद्धिकरण किये जाने के विषय में हमारा प्राचीन हिंदू धर्म क्या कहता है, पहले उसे जान लेना आवश्यक होगा, इसके साथ ही हम यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि हिंदुओं की पराजय व भारत में इस्लाम के फैलने का मुख्य कारण क्या था, क्योंकि यह सभी बिंदू परस्पर अंतर्सम्बन्ध रखते हैं।

    प्रस्तुत विषय पर, हमारे द्वारा लिखित वक्तव्य व तथ्य हिंदू भाईयों को विचलित कर सकते हैं, परंतु उनका आधार सत्य ही हैं, अतः इस सत्य को जानने हेतु हमें अपन् प्राचीन इतिहास की ओर रुख करना होगा।

  27. Rohit Sarsar says

    “मुसलमान सैनिक लड़ता था तो उत्साह से और मरता था तो आशा और संतोष के साथ। लेकिन हिंदू सैनिक लड़ता था चिंताग्रस्त होकर और मरता था मजबूर होकर, अछूत का सा निंदित जीवन जीने की यातना से बचने के प्रयास में।”

    ऐसे में हिंदू लोग मुसलमानों के मुकाबले में टिक ही कैसे सकते थे ?

    आज इस कटु तथ्य पर पर्दा डालने के प्रयास में कई लोग इस अप्रिय घटनाचक्र पर मुलम्मा चढ़ा कर यह बताना चाह रहे हैं कि हिंदूओं ने कभी कोई कमी उठा न छोड़ी थी, वे बड़ी बहादुरी से लड़ते रहे और बाकी सब कुछ ठीक था।

    लेकिन यह दूसरों को धोखा देने के साथ-साथ अपने से भी धोखा करना है। और तो और हमारे यहाँ शहीद के समकक्ष कोई शब्द तक नहीं है।

  28. Rohit Sarsar says

    असल में हिंदू सैनिक मुस्लिम आक्रमणकारियों के विरुद्ध कभी जी जान से लड़ा ही नहीं, पूरे मन से कभी डटा ही नहीं। वह सदा चिंतित मन से और अंधे भविष्य की मनहूस छाया से ग्रस्त हो कर यंत्रचालित सा ही लड़ा।

    इसका कारण क्या था ?

    मुस्लिम इतिहासकारों ने इस के दो कारण लिखे है —

    या तो वे जिंदगी से इतने ज्यादा चिपटे हुए थे कि शहीद की मौत मरने की उनमें इच्छा ही नहीं थी या उन्हें यह ज्ञात हो जाता था कि हिंदू धर्म झूठा और पतनकारी है।

    हमारा कहना है कि ये दोनों कारण ही एकदम गलत है।

    हिंदू को न तो जीवन की ललक थी और न हिंदू धर्म पर अविश्वास।

    आत्मा को अजर, अमर मानने वाले और धर्म के लिए, स्वर्ग प्राप्ति के लिए, काशी आदि में आत्महत्या करने वाले हिंदू को जीवन के मोह ने मैदान से भागने को नहीं उकसाया। उसके धर्म के प्रति अविश्वास की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। उसे यदि किसी ने मैदान से भागने को विवश किया तो वह था, उस का हिंदू धर्म पर दृढ़ विश्वास।

  29. Rohit Sarsar says

    बात कुछ अटपटी सी लग सकती है, लेकिन है बिल्कुल सच्ची कि हिंदू सैनिक हिंदू धर्म के प्रति अटूट विश्वास के कारण टूटा।

    दुनिया में सब जगह जब युद्धबंदी शत्रु के यहां से वापस आता है तो उस देश के लोग, उसके वंश और कबीले के लोग, उसके मित्र और परिचित लोग, यहां चक कि अपरिचित भी उसका स्वागत करते हैं, प्रसन्न होते हैं और बांहें फैला कर उसे गले से लगाते हैं। लेकिन हिंदू धर्म का कहना है कि जो भी विधर्मियों अर्थात् मुसलमानों की कैद में रह ले, वह अपवित्र हो जाता है।

    न उस के हाथ से कोई खाएगा, न उस से कोई रोटी बेटी का सम्बन्ध रखेगा। उसे जातिच्युत और जाति-बहिष्कृत हो कर उपेक्षित, घृणित एवं निंदनीय जीवन जीना होगा। इस रोमहर्षक अंधे भविष्य की कल्पना मात्र से हिंदू सैनिक के पसीने छूट जाते थे और वह या तो मैदान से भाग खड़ा होता था या अपने को गाजर-मूली की तरह कटवा कर छुटकारा पा लेता था।

    जो इन दोनों में असफल हो जाने के बाद बंदी बना लिया जाता था, वह जानता था कि यदि कभी वह छूट भी गया तो समाज का उसके साथ कैसा व्यवहार होगा। इसलिए वह हिंदू समाज की ओर वापस आने की अपेक्षा इस्लाम को ही कबूल करना अच्छा समझता था।

  30. Rohit Sarsar says

    अलबेरूनी ने हिंदू धर्म के इस छुईमुई पर टिप्पणी करते हुए 11 वीं शताब्दी में लिखा था —

    “जो वस्तु किसी विदेशी के जल या अग्नि को छू जाए, उसे भी वे (हिंदू) भ्रष्ट समझते हैं…… इस के अतिरिक्त उन्हें कभी इस बात की इच्छा ही नहीं होती कि जो वस्तु एक बार भ्रष्ट हो गई है, उसे शुद्ध करके पुनः ग्रहण कर ले, जैसा कि सामान्य अवस्था में जब कोई पदार्थ अपवित्र हो जाता है, तो फिर पवित्र अवस्था को प्राप्त करने की चेष्टा करता है। जो व्यक्ति उनमें से नहीं (अर्थात् जन्मजात हिंदू नहीं), चाहे वह उनके धर्म की ओर कितना ही झुका हुआ क्यों न हो और उसकी अभिलाषा कितनी ही पवित्र क्यों न हो, उन्हें उसे अपने में मिलाने की आज्ञा नहीं है।”

    – (अलबेरूनी का भारत, अनुवादक संतराम बी० ए०, द्वितीय संस्करण 1926, भाग पहला, पृष्ठ 24-25)

  31. Rohit Sarsar says

    कठोर प्रायश्चित्त ——-

    अलबेरूनी अपने यात्रा विवरणों में अन्यत्र लिखता है,

    “मैंने कई बार सुना है कि जब मुस्लिम देशों से हिंदू दास भाग कर अपने देश और धर्म में वापस जाते हैं, तब हिंदू उन्हें प्रायश्चित्त के रूप में उपवास करने का आदेश करते हैं, फिर वे उन्हें गाय के गोबर, मूत्र और दूध में दिनों की नियत संख्या तक दबाए रखते हैं, यहां तक कि उन का खमीर उठ आता है। तब वे उन को खींच कर उस मैल में से बाहर निकाल लेते हैं और वैसा ही मैल खाने को देते हैं।”

    “मैंने ब्राह्मणों से पूछा है कि क्या यह सत्य है, परंतु वे इस से इनकार करते हैं और कहते है कि ऐसे व्यक्ति के लिए कोई प्रायश्चित्त सम्भव नहीं और उस को जीवन की उन स्थितियों में लौट आने की कभी आज्ञा नहीं दी जाती, जिनमें वह बंदी के रूप में ले जाने से पहले था और यह कैसे सम्भव है ? यदि ब्राह्मण शूद्र के घर में कई दिन तक खाता है तो वह अपने वर्ण से निकाल दिया जाता है और फिर कभी उसे प्राप्त नहीं कर सकता।”

    (वही, भाग 3, प्रथम संस्करण 1928, पृष्ठ 208)

  32. Rohit Sarsar says

    अलबेरूनी ने ये बाते न तो कल्पना के सहारे लिखी है और न किसी दुराग्रहवश। हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक और भूतपूर्व क्रांतिकारी यशपाल ने भी अपने उपन्यास “झूठा सच” में यही दर्शाया है।

    उसे पढ़ने पर पता चलता है कि 1947 के काले और साम्प्रदायिकता के घातक विष से भरे दिनों में अपहृत युवतियों को कैसे उनके हिंदू मातापिताओं ने अपने घरों की तब देहरीयाँ तक लांघने नहीं दी थी, जब वे अपहरणकर्ता विधर्मियों के चंगुल से जैसे-तैसे छूट कर वापस आई थी।

    न अलबेरूनी झूठा है और न यशपाल। न हिंदू समाज की बंदी बन चुके सैनिक से शत्रुता थी, न उन मातापिताओं में संतान के प्रति प्रेम का अभाव था। यह सारा खेल था हिंदू धर्म और धर्म ग्रंथों का।

  33. Rohit Sarsar says

    नीचे इस विषय में धर्मशास्त्रों के कुछ कथन प्रस्तुत है ——

    देवल स्मृति (रचनाकाल 600 ई० से 900 ई० में कहीं) का कहना है :

    गृहीतो यो बलान् म्लेछैः पंच षट् सप्त वा समाः, दशादि विंशतिं यावतस्य शुद्धिर्विधियते। (53)

    प्रजापत्यद्वयं तस्य शुद्धिरेषा विधीयते, अतः परं नास्ति शुद्धिः कृच्छ्रमेव सहोषिते। (54)

    म्लेच्छैः सहोषितो यस्तु पंचप्रभृति विंशतिं वर्षाणि शुद्धिरेषोक्तो तस्य चान्द्रायणद्वयम्। (55)

    कक्षागुह्यशिरः श्मश्रू भ्रूलोमपरिकृन्तनम्, प्राहृत्य पाणिपादानां नखलोम ततः शुचिः। (56)

    शुद्धि की साधना ——-

    अर्थात् जो व्यक्ति म्लेच्छों द्वारा बलपूर्वक पकड़ा गया हो और पाँच, छः या सात वर्षों तक या 10 से 20 वर्षों तक उन के पास रहा हो, लेकिन वह वर्जित व्यवहार, आचार-विचार और खान-पान में उनसे अलग रहा हो, वह शुद्ध हो सकता है(53)। (इस से ज्यादा समय बीत जाने पर किसी भी प्रकार से वह शुद्ध नहीं हो सकता) वह व्यक्ति दो बार प्राजापत्य व्रत करके शुद्ध होता है।

    (वसिष्ठ स्मृति (23/43) ने इस व्रत का विधान ऐसे किया है : पहले दिन केवल दिन में भोजन, दूसरे दिन केवल रात में, तीसरे दिन बिना मांगे मिल जाए तो खाना अन्यथा भूखे रहना, चौथे दिन पूर्ण व्रत, इसी क्रम के मुताबिक तीन बार चलना।)

  34. Rohit Sarsar says

    यदि बिना विवश किए अथवा सहमति से व्यक्ति म्लेच्छों के साथ रहता हुआ भी वर्जित आचार और खान-पान के मामले में उन से अलग रहा हो तो वह कृच्छ्र व्रत करे।

    (विधान : प्रथम तीन दिनों में दिन में एक बार भोजन करना, अगले तीन दिनों में केवल रात्री में भोजन करना, आगे के तीन दिनों में बिना मांगे खाना अर्थात् मिल जाए तो खाना, नहीं तो भूखे रहना और आगे के तीन दिनों में पूरी तरह भूखे रहना)। (54)

    यदि पूर्वोक्त व्यक्ति म्लेच्छों के साथ पाँच से 20 वर्ष तक रहा हो, वह दो चांद्रायण व्रत करे। (इस 30 दिन के व्रत के पाँच भेद मिलते हैं। इसका यवमध्य नामक भेद ज्यादा प्रचलित है, जो इस प्रकार है : मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन एक ग्रास भोजन किया जाता है। इसके बाद कृष्ण पक्ष के प्रथम दिन 14 ग्रास, दूसरे दिन 13 ग्रास और 15 वें दिन अमावस्या को पूर्ण उपवास)। (55)

    इसके साथ ही उस व्यक्ति की बगलों, गुप्तेन्द्रियों, सिर, मूंछों, दाढ़ी, भौंहों तथा शरीर के अन्य रोओं को काट दिया जाये। उसके पैरों और हाथों के नखों को काफी बीच तक काट दिया जाए। तभी वह शुद्ध होगा।

  35. Rohit Sarsar says

    शुद्धि भी जाति के अनुसार ——-

    म्लेच्छैर्हृतानां चौरेवां कान्तारेषु प्रवासिनाम्,

    भुक्तवा भक्ष्यमभक्षयं वा क्षुधार्तेन भयेन वा। 45

    पुनः प्राप्य स्वकं देशं चातुर्वर्णस्य निष्कृतिः,

    कृच्छ्रमेव चरेद् विप्रः तदर्धं क्षत्रियः चरेत् पादोनं च चरेद् वैश्यः शूद्रः पादेन शुध्यति। 46 (देवल स्मृति)

    अर्थात् जब म्लेच्छों या आक्रमणकारियों, चोरों या जंगलियों द्वारा अपहृत व्यक्ति वहाँ भूख या भय के कारण वर्जित भोजन करने के बाद अपने देश को लौटे तो उसे अपनी जाति के अनुसार प्रायश्चित्त करना पड़ेगा। ब्राह्मण पूरा कृच्छ्र व्रत करे, क्षत्रिय आधा कृच्छ्र, वैश्य पौना कृच्छ्र और शूद्र एक चौथाई कृच्छ्र व्रत करे।

    म्लेच्छैर्हृतानां चौरैर्वा कान्तारे वा प्रवासिनाम्, भक्ष्याभक्ष्यविशुद्ध्यर्थं तेषां वक्षयामि निष्कृतिम्, पुनः प्राप्य स्वदेशं च वर्णानामनुपूर्वशः, कृच्छ्रसंयार्धे ब्राह्मणस्तु पुनः संस्कारमर्हति। पादोनांते क्षत्रियस्तु अर्धार्धे वैश्य एव च। पादं कृत्वा तथा शूद्रों दानं दत्वा विशुध्यति। (विष्णुधर्मोंत्तर पुराण 2/73/203-06)

    अर्थात् म्लेच्छों, चोरों और जंगलियों द्वारा अपहृत एवं वर्जित भोजन करने वाला व्यक्ति जब वापस अपने देश आये तो निम्नलिखित के अनुसार प्रायश्चित्त करे यथा, ब्राह्मण आधा कृच्छ्र एवं फिर से यज्ञोपवीत करे, क्षत्रिय तीन चौथाई कृच्छ्र और फिर यज्ञोपवीत करे, वैश्य चौथाई कृच्छ्र करे एवं शूद्र चौथाई कृच्छ्र करे तथा दान दे।

  36. Rohit Sarsar says

    चाण्डालानां सहस्रैस्तु सूरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः,

    एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः। (पं० शिवदत्त सत्ती शर्मा रचित “शुद्धि विवेचन” 1914 ई० के पृ० 10 पर उद्धृत)

    अर्थात् तत्वों को जानने वाले विद्वानों ने कहा है कि यवन 1000 चाण्डालों के समान होता है। यवन से नीच और कोई हो ही नहीं सकता।

    बलाद् दासीकृता ये च म्लेच्छचाण्डालदस्युभिः, अशुभं कारिताः कर्म गवादिप्राणिहिंसनम्। (17)

    उच्छिष्टमार्जनं चैव तथा तस्यैव भोजनम्, खरोष्ट्रविड्वराहाणामामिषस्य च भक्षणम्। (18)

    तत्स्त्रीणां च तथा संगं ताभिश्च सह भोजनम्, मासोषिते द्विजातौ तु प्राजापत्यं विशोधनम्। (19)

    चान्द्रायणं त्वाहिताग्नेः पराकस्त्वथ वा भवेत्, चान्द्रायणं पराकं च चरेत् संवत्सरोषितः। (20)

    संवत्सरोषितः शुद्रो मासाध यावकं पिबेत्, मासमात्रोषितः शुद्रः कृच्छ्रपादेन शुध्यति। (21)

    ऊर्ध्व संवत्सरात् कल्प्यं प्रायश्चित द्विजोत्मैः, संवत्सरैश्चतुर्भिश्च तद् भावमधिगच्छति। (22) (देवल स्मृति)

  37. Rohit Sarsar says

    अर्थात् जब लोग म्लेच्छों, चाण्डालों एवं दस्युओं (डाकुओं) द्वारा बलात् दास बना लिए जायें और उनसे गन्दे काम कराये जायें – यथा गो आदि पशुओं की हत्या, म्लेच्छों द्वारा छोड़ी गई जूठन को साफ करना, उनका जूठा खाना, गधे, ऊंट एवं गावों में मिलने वाले सुअर का माँस खाना, म्लेच्छों की स्त्रियों से सम्भोग या उनके साथ भोजन करना आदि; तो इस अवस्था में एक मास तक रहने वाले द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) के लिए प्रायश्चित केवल प्राजापत्य व्रत है।

    वैदिक अग्नि में हवन करने वालों का, यदि वे एक मास या कुछ समय तक इस स्थिति में रहे हों, चांद्रायण अथवा पराक व्रत (इस में 12 दिनों तक बिना भोजन किये रहना पड़ता है) करने से प्रायश्चित्त होता है। एक वर्ष उक्त स्थिति में रह जाने वाला चान्द्रायण एवं पराक दोनों व्रत करे, एक मास तक रहने वाला शूद्र कृच्छ्र पाद व्रत (इसमें व्यक्ति पहले दिन केवल एक बार, अगले दिन केवल रात में, तीसरे दिन बिन मांगे मिल जाये तो भोजन कर ले, अन्यथा नहीं, चौथे दिन पूर्ण व्रत) रखे।

    इस स्थिति में एक वर्ष तक रहने वाला शूद्र यावक पान (गोबर में से जौं ढूंढ़ कर, उन्हे उबालकर सात या 15 या 30 दिन तक खाना) व्रत करे।

    यदि उपर्युक्त स्थितियों में म्लेच्छों के साथ रहते एक वर्ष से ज्यादा समय बीत जाये तो विद्वान ही निर्णय दे सकते हैं।

  38. Rohit Sarsar says

    प्रायश्चित-विवेक (लेखक का समय 1375/1440 ई०) में कहा गया है :

    “चार वर्ष बीत जाने पर मृत्यु ही पवित्र कर सकती है। (पृ० 456)

  39. Rohit Sarsar says

    यहाँ यह बताने की जरूरत नहीं है कि हर हिंदू को यह पूरी तरह स्पष्ट था कि आक्रमणकारी मुसलमान उन्हें पकड़े जाने पर बुरी तरह जलील करेंगे, उन्हें दास बनाएंगे या आगे बेच देंगे, उनसे अपनी जूठन उठवाएंगे और उसे खिलवाएंगे भी। इस बात का तो कोई पागलपन की सीमा तक आशावादी भी स्वप्न नहीं ले सकता था कि उसके लिए गोबर का चौका लगा कर, साफ धोती और जनेऊ पहन कर रसोइया शुद्ध हिंदू भोजन बनाएगा और वह उसे धार्मिक क्रिया-कलापों से खा कर अपने धर्म की रक्षा कर सकेगा।

    अतः हर हिंदू युद्धबंदी बनने की अपेक्षा मृत्यु को प्राथमिकता देता था और युद्ध में बंदी बन कर हिंदू वापसी पर, यदि वह कभी सम्भव हो, हिंदू धर्म और हिंदू समाज के हाथों जलील होता था, क्योंकि उपर्युक्त प्रायश्चितों के बावजूद उसका सामाजिक बहिष्कार यथापूर्व बना रहता था। न उस के साथ किसी हिंदू का रोटी-बेटी का सम्बन्ध रहता था, न कोई उस के दुःख का साथी बनता था, न सुख का; क्योंकि निम्नलिखित प्रकार की धर्मशास्त्रीय उक्तियाँ सदा हिंदुओं का मार्गदर्शन करती रही —–

    कृतेऽपि प्रायश्चित्त न व्यवहार्यता। (कालराम शास्त्री रचित ‘शुद्धि निर्णयं’ [1926 ई०] के पृ० 7 पर उद्धृत)

    अर्थात् प्रायश्चित्त कर लेने पर भी व्यवहार बंद रहेगा।

    विशुद्धानपि धर्मतः त संवसेत् (मनु 11/190)

    अर्थात् जिन्होंने प्रायश्चित्त कर लिया हो, उन से भी किसी प्रकार का सम्पर्क न रखे।

    संवसेन्न तु चीर्णव्रतानपि (याज्ञवल्क्य स्मृति 3/298)

    अर्थात् प्रायश्चित्त कर लेने से जिन के पाप कमजोर पड़ गए हों, उन लोगों से भी सामाजिक सम्बन्ध न रखें।

  40. Rohit Sarsar says

    उपर्युक्त धर्म-सम्बन्धी नियमों को अध्ययन करने के उपरान्त जो तथ्य हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है, वह यह है कि हिंदू धर्म में शुद्धता को बहुत अधिक महत्व दिया गया है। बात चाहे नाना प्रकार के व्रतों द्वारा ‘विधर्मी सम्पर्क से दूषित’ हिंदुओं के शुद्धिकरण की हो (जिसमें भी शुद्धिकरणोपरांत सामाजिक व्यवहार से वंचित रखने के नियमों का उल्लेख किया गया है) अथवा देवी को प्रसन्न करने हेतु दी जाने वाली नर बलि से सम्बंधित हो (शारीरिक रूप अशुद्ध मनुष्य स्वीकार्य नहीं), हिंदू धर्म की पवित्रता को बरकरार रखा गया है।

    यदि हम पुनः हमारे धार्मिक ग्रंथों पर दृष्टिपात करते है तो यह तथ्य भी प्रकाश में आता है कि शुद्धिकरण व्यवस्था का निर्माण भी हमारे हिंदू धर्म में सिर्फ उन हिंदुओं के लिए किया गया है, जो कि विधर्मियों द्वारा बलात् बन्दी बना लिए गए हो व हिंदू धर्म में पुनः लौटने की अभिलाषा रखते हो। इस प्रकार ‘अशुद्ध’ हिंदुओं के लिए उपर्युक्त शुद्धि-व्रतों (यथा प्राजापात्य व्रत, कृच्छ्र व्रत आदि) की व्यवस्था की गई, वह भी निर्धारित समय सीमा के अनुसार। समय सीमा के निकल जाने पर किसी भी प्रकार की शुद्धि सम्भव नहीं, जैसा कि उपर्युक्त वर्णित प्रायश्चित्त-विवेक (लेखक का समय 1375/1440) में कहा गया है —-

    “चार वर्ष बीत जाने पर मृत्यु ही पवित्र कर सकती है।” (पृ० 456)

  41. Rohit Sarsar says

    ध्यान देने योग्य एक और बात यह भी है कि इन धर्म ग्रंथों में ‘विधर्मी सम्पर्क से दूषित’ हिंदुओं के लिए तो निर्धारित समय सीमा में शुद्धिकरण की व्यवस्था है, परंतु दूषित हिंदुओं की संततियों हेतु किसी प्रकार के शुद्धिकरण का उल्लेख नहीं मिलता है व समय-सीमा की समाप्ति पर मृत्यु को ही पवित्र किये जाने का अंतिम स्रोत माना गया है।

    अतः वर्तमान समय में कई प्रकार की हिंदू संस्थाओं द्वारा किया जाने वाला शुद्धिकरण व उसके पश्चात् धर्म परिवर्तन हिंदू धर्म के विरूद्ध है व अधार्मिक है।

    इस कारण विश्व हिंदू परिषद् ने जिस प्रकार अयोध्या के राम मंदिर के पक्ष में जिस प्रकार हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों का हवाला देकर राम जन्म भूमि को कानूनी रूप से मान्यता दिलवाई, ठीक उसी प्रकार आज वर्तमान में हम सभी हिंदू भाई धर्म परिवर्तन में संलग्न सभी हिंदू संस्थाओं व तत्पश्चात् धर्म परिवर्तन के मुस्लिम व ईसाई संस्थाओं/मिशनरियों पर भी पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगवाने का आग्रह करते हैं और चाहते है कि विश्व हिंदू परिषद् जल्द से जल्द इस हेतु अपनी कार्यवाहियाँ निष्पक्ष रूप से संचालित करे व सभी हिंदु संघटन इसमें अपना योगदान देवे तथा धर्म परिवर्तन की इस “पतली गली” को सदा के लिए बंद कर दिया जाए।

  42. Rohit Sarsar says

    राज महोदय धर्म परिवर्तन के उपरांत हिंदू-मुस्लिम विवाह का उदाहरण जो आपने प्रस्तुत किया, यह कोई नयी घटना नहीं है, ऐसे बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं, जिसमें मुस्लिम सम्प्रदाय के अनुयायियों ने हिंदू लड़कियों से विवाह किया व बाद में तलाक दिया है, इस के विस्तृत अध्ययन हेतु प्रस्तुत लेख को पुनः देखे —

    http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1155

    इस लेख में यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार मुस्लिम लोग हिंदू लड़कियों से विवाहोपरांत इस प्रकार की स्थितियाँ उत्पन्न करते है कि बात तलाक तक पहुँच जाती है। नीचे कमेंट मे सुबोध कुमार महोदय ने इसका कारण मुस्लिम संस्कार में प्रचलित खतने को बताया है, उस कमेंट को पूरा पढ़ने के उपरांत हम उसे भी इन सबके के पीछे एक कारण के रूप में ले सकते हैं।

    अतः मुस्लिम-हिंदू विवाह भारतीय समाज के लिए खतरा हैं, हमारे यहाँ स्त्रियाँ उपभोग की वस्तु नहीं है, जो खाया और नीरस होने पर फैंक दिया। बल्कि हमारे समाज में स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है व पूजनीय माना जाता है,

    ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवाः।

  43. Rohit Sarsar says

    उपर्युक्त धर्म सम्बन्धी नियमों को पढ़ने के उपरान्त आइये अब हमारे हिंदू इतिहास पर नजर डाले —–

    1527 ईसवी में जब राणा सांगा की शक्ति के विषय में तरह-तरह की कहानियाँ और मुसलमानों की पराजय के विषय में मुहम्मद शरीफ नामक ज्योतिषी की भविष्यवाणी सुन कर बाबर की सेना का मनोबल गिर गया था, तब हिम्मत तोड़ चुकी सेना ने इस्लाम से प्रेरणा पा कर ही 10 घंटे की लड़ाई में राणा सांगा को मैदान से भाग कर जान बचाने को मजबूर कर दिया था और विजय प्राप्त की थी।

    बाबर ने अपने सैनिकों को कहा था,

    “खुदा का शुक्र है कि यदि युद्ध में हम लोग मृत्यु को प्राप्त होंगे तो हम शहीद कहलाएंगे और यदि जीवित रहेंगे तो इस संसार का उपभोग करेंगे। आइए, हम सब कुरान की शपथ ले कर प्रतिज्ञा करें कि हम उस समय तक युद्ध करते रहेंगे, जिस समय तक हमारे शरीर में प्राण है।”

    इस पर सेना ने कुरान की शपथ खा कर कहा था,

    “आलीजाह’ जब तक हमारे शरीर में जान है, हम किसी प्रकार के बलिदान से मुँह नहीं मोड़ेंगे।” (देखें, बाबर नामा, पृ० 556-57, अंग्रेजी अनु० एनेट सुसनाह बेरेरिज)

    लेकिन हिंदुओं के धर्म ने इसके बिल्कुल विपरीत भूमिका निभाई। जब हिंदू सैनिक मुस्लिम सेना के विरुद्ध लड़ता था तो उसे जब यह लगता कि अब विपक्षी सेना का पलड़ा भारी हो रहा है तो वह भाग खड़ा होता ताकि वह कहीं बंदी न बना लिया जाए। ऐसे में उसने जम कर लड़ने की तो कभी सोची ही नहीं। मुस्लिम सैनिक को युद्ध के दौरान संतोष होता था कि वह इस्लाम के लिए कुछ कर रहा है, लेकिन हिंदू सैनिक को सदा यह चिंता रहती थी कि कहीं वह बंदी बन कर हिंदू धर्म से भ्रष्ट न हो जाए।

  44. Rohit Sarsar says

    मुस्लिम सैनिक जान हथेली पर रख कर इसलिए लड़ता था कि इस्लाम के लिए शहीद होने पर उसे उन्नति मिलेगी, वह पुरस्कृत होगा। हिंदू सैनिक अपने को इसलिए मरवा-कटवा लेता था कि कहीं वह बंदी न बन जाए और अपने हिंदू धर्म में अछूत का सा निंदनीय व नारकीय जीवन जीने से बच जाए।

    मनोबल का अभाव अन्य बलों की उपस्थिति के बावजूद, पराजय लाता है और व्यक्तिगत वीरता के बावजूद हिंदू सेना में यह मनोबल सबसे कम होता था।

    पिछले एक हजार वर्ष के युद्धों के दौरान हिंदुओं के व्यवहार पर समय-समय पर टिप्पणियाँ करते हुए तात्कालिन मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि हिंदू सैनिकों को जब यह लगता था कि मुस्लिम सेना अब विजय की ओर बढ़ रही है तो वे मैदान से भाग खड़े होते थे। ऐसे ही जब कोई महत्वपूर्ण चौकी रोंद दी जाती, जब प्रतिरक्षा का घेरा टूट जाता या राजा गम्भीर रूप से घायल हो जाता या मर जाता तो सेना अव्यवस्थित होकर भाग खड़ी होती थी।

    इसके साथ ही मुस्लिम इतिहासकारों ने यह भी लिखा है कि युद्ध में बन्दी बनाया गया प्रायः हर राजा अपनी रानियों एवं दासियों सहित इस्लाम कबूलने को सदा तत्पर दिखाई देता था।

    इस तरह की टिप्पणियों के पीछे काम कर रहे उन इतिहासकारों के पूर्वाग्रहों की सम्भावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यह बात भी उतनी ही स्पष्ट है कि ऐसा सब कुछ होता रहा है।

  45. Rohit Sarsar says

    991 ई० में सुबुक्तगीन ने हिंदू राजा जयपाल पर हमला किया, जिसका पंजाब के एक बड़े भाग के अलावा अफगानिस्तान के कुछ भाग पर भी राज था। लंघम नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में टक्कर हुई। शुरू में ही सुबुक्तगीन का पलड़ा भारी हो गया।

    इस पर हिंदू सैनिक मैदान छोड़ कर भाग खड़े हुए और अपने शस्त्र, रसद, यहां तक कि वाहन भी, छोड़ भागे ताकि विजेता विधर्मी तुर्कों से वे कहीं छू न जाए।

    इस युद्ध का वर्णन करते हुए इतिहासकार अलउत्बी ने लिखा है —

    “हिंदू भयभीत कुत्तों की तरह दुम दबाकर भाग खड़े हुए और उनके राजा ने अपने दूर-दराज तक फैले प्रदेशों को सर्वोत्तम विजेता को भेंट किया और कहा कि हमारे सिरों के केशों को न मुंड़ाया जाए।

    “इस तरह आस-पास का इलाका सुबुक्तगीन के सामने खुला और साफ था। उसने वहाँ जी भर कर धन लूटा” (देखे, सर एच० एम० एलियट और जान डासन लिखित “द हिस्ट्री आफ इण्डिया ऐज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस, पृ० 23)

    यह बात सर्वविदित है कि जयपाल ने सुबुक्तगीन से दो बार मुँह की खाई और दोनों बार बहुत-सा धन एवं हाथी देकर अपनी जान बचाई थी। तीसरी बार जयपाल ने सुबुक्तगीन के पुत्र महमूद गजनवी के हाथो हाथ हार खा कर अग्नि में कूद कर आत्महत्या कर ली थी और महमूद गजनवी लगभग पाँच लाख भारतीय नर-नारियों को गुलाम बना कर गजनी ले गया था।

  46. Rohit Sarsar says

    इससे 28 वर्ष बाद के एक अन्य युद्ध को ले। 1018 ई० में महमूद गजनवी ने मथुरा के राजा कुलचन्द पर हमला किया। कुलचन्द बहुत शक्तिशाली राजा था, जिसने इस हमले से पहले के वर्षों में अनेक हिंदू राजाओं को पराजित किया था। उसकी राजधानी बहुत सशक्त, धनधान्यपूर्ण एवं अनेक वीर योद्धाओं से सज्जित थी। उसमें मजबूत किले और बहुत-से हाथी थे।

    यह हर दृष्टि से शत्रु की पहुँच से बाहर थी, परंतु जब युद्ध हुआ तो वही कुछ दोहराया गया, जो पहले लंघम में घटित हुआ था। शहर के बाहरी दरवाजे पर दोनों ओर की छोटी-छोटी टुकड़ियों में झड़पें हुई, जिन में मुस्लिम विजयी हुए।

    अब भी बहुसंख्यक हिंदू सैनिक किले के सम्भाल-बचाव का कार्य कर रहे थे। कुलचन्द ने मार खा रहे सैनिकों की मदद और आक्रमणकारियों पर प्रत्याक्रमण के लिए सेना को नहीं कहा होगा, इसकी जरा भी सम्भावना नहीं। परंतु कुछ परिणीम नहीं निकला। बाहर शहर के किनारों पर हुई झड़पों में उखड़ जाने के शीघ्र ही बाद सारी हिंदू सेना ने घुटने टेक दिए।

    इतिहासकार अलउत्बी ने लिखा है —-

    “हिंदुओं ने जब देखा कि उनके प्रयत्न असफल हो रहे हैं, तो वे किले को छोड़कर भागे और किले की एक ओर बह रहे दरिया को पार करने का यत्न करने लगे, शायद यह सोचते हुए कि इसे पार करने के बाद कोई भय नहीं रहेगा।

    “परन्तु उनमें से अनेक कतल कर दिए गए, पकड़ लिए गए या डूब गए, लगभग 50 हजार आदमी मरे और डूबे और पशुओं एवं मगरमच्छों का शिकार हुए। उधर कुलचन्द ने कटार से पहले अपनी पत्नी को कतल किया और बाद में आत्महत्या कर ली।” (देखे, पूर्वोक्त पुस्तक, पृ 43)

  47. Rohit Sarsar says

    300 साल बाद जब मुगल सेना को लेकर बाबर ने उत्तर भारत पर हमला किया, तब भी हिंदू सेना मे उसी तरह का आचरण किया, जैसा उसके पूर्ववर्तीं कर चुके थे। मार्च 1527 ई० में मेवाड़ के राणा सांगा की पराजय के बाद केवल एक राजपूत शत्ति बची थी — चंदेरी का मेदिनीराव।

    बाबर ने उस पर भी आक्रमण किया। 28 जनवरी, 1528 ई० को दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हुई। घेराबन्दी के दूसरे ही दिन राजा मेदिनीराव इस निर्णय पर पहुँच गया कि मुगलों का मुकाबला करना बेकार है, अतः उसने लड़ाई बन्द करने का फैसला किया।

    किले के अन्दर की सब स्त्रियों को मेदिनीराव के कहने पर उसके आदमियों ने कतल कर दिया। खुद मेदिनीराव और उसके सब सैनिक अपने वस्त्र उतार कर नंगे हो गए तथा बाबर के रक्तपिपासु सैनिकों की पंक्तियों की ओर दौड़ पड़े, क्योंकि इन धर्मभीरू हिंदू सैनिकों की नजरों में बंदी बन कर मुसलमानों के हाथों धर्मभ्रष्ट होने की अपेक्षा मृत्यु श्रेष्ठ थी। बाबर को अनायास ही विजयश्री प्राप्त हो गई। बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है —

    “मैंने बिना अपना झण्डा उठाए, बिना रणभेरी बजाए और बिना अपने सम्पूर्ण शस्त्रों का प्रयोग किए, यह प्रसिद्ध दुर्ग जीत लिया।

  48. Rohit Sarsar says

    इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि हिंदू-सैनिक मुसलमानों का पलड़ा जरा सा भी भारी होता देख कर सिर पर पैर रख कर भाग जाते थे या मुकाबला करने की अपेक्षा वे अपने अंधेरे भविष्य को अपनी ओर सरकता महसूस कर के निराशा से भर कर आत्मघात पर उतारू हो जाते थे।

    स्त्रियों आदि को खुद ही कत्ल कर देते थे अथवा उन्हें आग में कूदकर आत्महत्या के लिए उकसाते थे। (आज तक इस रीति का उल्लेख ‘जौहर’ के सम्मानित शब्दों के साथ किया जाता है।) बाद में या तो वे आत्महत्या कर लेते थे या फिर आक्रमणकारियों के हाथों गाजर-मूलियों की तरह कट जाते थे। उनकी भरसक कोशिश होती थी कि बंदी बनने से जैसे भी हो, बच जाएं, चाहे मैदान से भाग कर या आत्मघाती कदम उठाकर।

    जो हिंदू सैनिक या राजा बन्दी हो जाते थे, वे छूट कर वापस हिंदुओं में आने के स्थान पर इस्लाम कबूल कर लेना बेहतर समझते थे। 1018 में जब महमूद गजनवी ने 12 वां हमला किया, तब की घटना है। बरन शहर पर हरदत्त नामक हिंदू राजा का राज्य था। महमूद गजनवी ने उस पर हमला किया और विजयी रहा। राजा ने हथियार डाल दिए।

    जब उसे इस्लाम कबूलने को कहा गया तो उसने न केवल खुद उसे कबूल कर लिया, बल्कि अपने 10 हजार आदमियों से भी ऐसा ही करवाया। अलउत्बी लिखता है कि हरदत्त को हरदत्त को इसी में अपना और अपने आदमियों का भला दिखाई दिया।

  49. Rohit Sarsar says

    जैसे उदाहरण ऊपर दिए गए हैं, वैसे शायद इतिहास के पृष्ठों से और भी इकट्ठे किए जा सकें, लेकिन सारे इतिहास में शायद ऐसा उदाहरण एक भी न मिले, जिसमें किसी युद्ध में बंदी बने राजा ने मुस्लिम विजेताओं की कैद से छूटने के बाद फिर से शक्ति-संग्रह कर के आक्रमण किया हो या ऐसे राजा को हिंदुओं ने फिर से अपना नायक माना हो, हिंदू धर्म ने उसे पुनः स्वीकार किया हो।

    इसके विपरीत ऐसे उदाहरण अवश्य मिलते हैं कि किसी हिंदू राजा ने मुस्लिम विजेताओं की कैद से निकल कर जब पुनः शक्ति-संग्रह करना चाहा, उसे पग-पग अपमानित किया गया, क्योंकि वह धर्मभ्रष्ट हो चुका था।

    977 ई० में महमूद गजनवी ने जयपाल को पराजित कर कैद कर लिया और बाद में उसे इस शर्त पर छोड़ दिया कि वह (जयपाल) उसे (महमूद को) वार्षिक कर दिया करेगा एवं उसे अपना मालिक समझेगा। लेकिन ‘विधर्मी सम्पर्क से दूषित’ जयपाल को इस कदर जलील किया गया कि उसे तंग आ कर अन्त में आग में कूद कर आत्महत्या करनी पड़ी।

    इसका क्या कारण है ?

    कारण है धर्म।

    कहा जा सकता है कि धर्म तो मुसलमानों के साथ भी था, फिर हिंदुओं की शोचनीय स्थिति के लिए उन के धर्म को उत्तरदायी ठहराना कैसे उचित है ?

    इस पर हमारा निवेदन है कि दोनों धर्मों के स्वभाव एक-दूसरे से भिन्न है। इस कारण देनों के अनुयायियों के इतिहास भी भिन्न-भिन्न दिशाओं में गए।

  50. Rohit Sarsar says

    इस्लाम धर्म ने अपने अनुयायियों को प्रेरित किया, उत्साहित किया और उनके हौसले बुलंद रखे। जब हम मुस्लिम इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि हजरत मुहम्मद की मृत्यु के केवल 10 साल बाद के समय में कबायली मुसलमानों ने अरब में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था और हजरत मुहम्मद साहब की मृत्यु के 100 साल बाद की अवधि में स्पेन, सिसिली, उत्तरी अफ्रिका, मिस्र, फिलस्तीन, सीरिया, इराक, ईरान, खुरासान और सिंध तक उसकी सीमाएं फैल गई थी।

    इतने थोड़े समय में जीत पर जीत का क्या कारण था ?

    इसका उत्तर देते हुए एक मुस्लिम इतिहासकार ने लिखा है —-

    “मुसलमानों की फारस (वर्तमान ईरान) और रोम पर विजय का मुख्य कारण उनका धार्मिक साहस और दृढ़ता थी। वे अपनी पूरी शक्ति से अपने धर्म अर्थात् इस्लाम के लिए लड़े और इसके लिए वे मर मिटने को सदा तैयार रहते थे। उनका विश्वास था कि इस्लाम ते लिए एक विशेष योग्यता है। यह पुण्य हर एक को प्राप्त नहीं होता। जो मुसलमान इस्लाम के लिए मरता है, अगली दुनिया में पुरस्कृत होता है। अतः वे शत्रु के हाथों पड़ने की अपेक्षा इस्लाम के लिए मरने को प्राथमिकता देते थे, जब कि उन के शत्रुओं के पास भविष्य के विषय में इस तरह के उत्साहदायी विचार नहीं थे।”

    – (ए स्टडी आफ इस्लामिक हिस्ट्री, (प्रो० के० अली) पृष्ठ 101, तीसरा संशोधित संस्करण, 1974)

  51. Rohit Sarsar says

    इस प्रकार, जब हम भारत के प्राचीन इतिहास पर एक विहंगम दृष्टि डालते हैं तब पाते है कि यह पराजयों, घुटने टेकने, निराशा और विवशता की एक लम्बी मगर दुःखदायी दास्तान है, जिसके लिए काफी हद तक खुद भारतीय ही दोषी थे।

    दर असल असली दोष था उनका धर्म, जिसने उन्हे पहले तो एक (मानव) से चार (वर्ण) बनाया, फिर हजारों उपजातियों में विभक्त किया, सबको अपने-अपने दायरों में रहने को धार्मिक आदेशों एवं आज्ञाओं से विवश किया, शस्त्र उठाने का काम केवल एक वर्ण के जिम्मे सौंपा, उस वर्ण के भी केवल युवाओं के, जो कि बहुत ज्यादा नहीं हो सकते थे। इस जाति विभाजन ने परस्पर फूट और एक-दूसरे के प्रति उदासीनता के विष-बीज बोए, क्षुद्र स्वार्थों से हर एक को अभिभूत किया।

    जो क्षत्रिय वर्ण शस्त्र उठाने का अधिकारी था भी, वह भी धर्म एवं धर्म और धर्म शास्त्रों के कारण पैदा व पुष्ट की गई रूढ़िवादिता के कारण कदम-कदम पर पिटता रहा, मगर उस सारे आत्मघाती धार्मिक तानेबाने से मुक्त होने को कभी मानसिक तोर पर पूरी तरह तैयार नहीं हुआ। यही कारण है कि चतुरंगिणी सेना के नाम पर यह वर्ण हाथियों से चिपटा रहा, जो अनेक बार विजय को पराजय में बदलते रहे, जो शत्रु सेना का मुकाबला करने के स्थान पर अपने ही सैनिकों को पैरों तले रौंदते रहे और यह क्रम तब तक बराबर चलता रहा, जब तक कि हिंदू धर्म के अनुयायी 1565 ई० में अंतिम युद्ध में हार कर पूर्णतया दास नहीं बन गए।

    उपर्युक्त वर्णित ऐतिहासिक घटनाओं में हिंदुओं की पराजय का पूरा दोष हिंदू धर्म पर थोपे जाने का विरोध करते हुए हम कहना चाहेंगे कि जो कुछ भी तात्कालिक समय में हुआ, वह होना तय था और आगे जो होगा वह भी तय है, अधोलिखित लेख पर नजरें जमाए ———-

  52. Rohit Sarsar says

    जब मोहम्मद गौरी दूसरी बार फौज लेकर आया तो पृथ्वीराज ने चित्तोड़ के राजा समरसिंह से सहायता माँगी । समरसिंह पृथ्वीराज का मित्र था । समरसिंह ने कहलवा भेजा कि वह दिल्ली के लिये रवाना हो रहे हैं । जब समरसिंह दिल्ली पहुँचे तब महाराज पृथ्वीराज अपने महलों से बाहर आकर समरसिंह को अंदर ले गए और बड़ा दरबार किया । प्रजा ने पृथ्वीराज व समरसिंह को बराबर बैठाकर बहुत प्रसन्नता जाहिर की । जब इस तरह से उत्सव मनाया जा रहा था तो दरबार चौक की बिचली शिला फटी और उसमें से शंकर भगवान के वीरभद्र नाम के गण प्रकट हुए ।

  53. Rohit Sarsar says

    इसका वर्णन कवि चंद्र ने निम्न प्रकार से किया है —

    “इस समय जो यह शिला फट गई थी, य़ह अस्सी हाथ लम्बी, पच्चीस हाथ चौड़ी और दस हाथ मोटी थी । इस शिला के नीचे एक गुफा थी । उस गुफा से रूद्राक्ष की माला धारण किये, हाथ में खड़ग और नरकपाल लिये ‘शम्भू शम्भू’ उच्चारण करता हुआ वीरभद्र निकला । पृथ्वीराज ने उस भयंकर मूर्ति वाले पुरूष को आगे बढ़कर प्रणाम किया, परंतु वह पुरुष कुछ भी न बोला । तब सदाशिव के भक्त महाराणा समरसिंह रावल ने उसको आगे बढ़कर प्रणाम किया । उस समय चंद्र ने वीरभद्र से कहा कि अब आगे क्या-क्या होगा सो महाराज को बताइये ।
    तब वीरभद्र सबके सम्मुख इस प्रकार से कहने लगा,
    “मैंने दक्ष प्रजापति का यज्ञ विध्वंस करके अपने पिता महादेव जी का क्रोध शांत किया, फिर उनकी आज्ञा लेकर यहाँ निश्चिंत हो विश्राम लेने के लिये आया, इस समय में गाढ़ी नींद में सो रहा था परंतु आज इस तुम्हारी विलक्षण गड़बड़ी और कोलाहल से मेरी नींद टूटी तथा मैं बड़ा दुःखी हुआ । महादेव जी ने मुझे वर दिया था कि जो कोई तुम्हारी निद्रा भंग करेगा, उसका नाश हो जाएगा । इसी कारण से अब तुम्हारा नाश होगा । अब आगे मलेच्छ लोग प्रबल होकर दिल्ली को जीत लेंगे, पृथ्वीराज की पराजय होगी । इस समय सबल समरसिंह बहुत काम आवेंगे, चामुण्डराय और रामगुरू युद्ध में मर जायेंगे, पृथ्वीराज पराजित होकर ६ मास तक बंदी रहेगा और दुःख पावेगा । शहाबुद्दीन गौरी प्रबल होकर हिंदुस्तान में अत्यंत उपद्रव मचाएगा, हिंदू राजाओं के किले व मंदिर छिन्न-भिन्न करेगा । इस प्रकार एक वर्ष तक बड़ा भारी अनर्थ रहेगा । अनन्तर मुगलों की चढ़ाई हिंदुस्तान पर होगी और यह भी अत्यंत उपद्रव करेंगे । वे राजा लोगों के घरों में घुस-घुसकर उनकी बेटियों के साथ विवाह करेंगे । फिर दक्षिण से कुछ सेना उनकों परास्त करने के लिये आवेगी । इस सेना में उसका कुछ प्रबंध न हो सकेगा । टोपी वाले आवेंगे, उनके राज की मालिक रानी होगी जो कि सब हिंदू एवं मुसलमानों को अपने वश में कर लेगी । वह दिल्ली के तख्त पर अपनी स्थापना करके राज्याभिषिक्त होगी, उसके राज्य में सबकों सुख मिलेगा । वह धर्मानुसार राज्य करके न्यायपूर्वक प्रजा का प्रतिपालन करेगी, परंतु आगे जैसे ही उसकी न्यायरीति का बंधन छूटेगा, वैसे ही टोपी वालों को निकालकर काबुल और बलखवाले तथा एक भट्टीराजा एकत्र होकर दिल्ली पर अपना अधिकार जमावेंगे । इनकी अमलदारी ६ माह तक दिल्ली में रहेगी,…

  54. Rohit Sarsar says

    फिर उदयपुर के शिशोदिया वंश वाले राजा होंगे । वह ३५ वर्ष तक राज करेंगे, फिर अजमेर का पीर उठेगा तत्पश्चात् तुवर और तुवर के पीछे कठोर वंश का राजा होकर वह धर्मनीति की स्थापना करेगा ।”

  55. Rohit Sarsar says

    उपर्युक्त घटना को यदि हम सत्य माने, तो हमें यह भी मानना होगा कि 1000 वर्षों से लेकर अब तक भारत में हिंदुओं व हिंदू धर्म के साथ जो-जो अमानवीय घटनाएँ हुई, उन सब का कारण वीरभद्र को शिव जी द्वारा दिया गया वरदान था। न वीरभद्र को शिव जी का वरदान मिलता और न पृथ्वीराज की पराजय होती और न ही तुर्क, मुगल, अंग्रेजों का विस्तार भारत में होता और न ही हमारी दुर्गति होती।

    इस प्रकार हम कह सकते है कि हमारे नाश के जिम्मेदार अप्रत्यक्ष रूप से शिव जी ही हैं। ऐसे में हमारे प्राचीन पुराण, जिनकों आधुनिक विद्वान अप्रामाणिक मानते हैं, सत्य प्रतीत होते हैं, जिनमें ब्रम्हा को सृष्टिकर्ता, विष्णु को पालनकर्ता व शिव को सृष्टि का नाश करने वाला बताया गया है।

    अब वह बात कुछ समझ में आती है, जिसमें विष्णु जी द्वारा शिव जी को बार-बार यह क्यों कहा जाता है —

    “भगवन वरदान सोच-समझ कर देवे, क्योंकि वरदान तो आप दे देते हैं, परंतु उसको सम्भालना हमें पड़ता हैं।”

  56. Rohit Sarsar says

    अग्निवीर के इस मंच पर उपस्थित सभी विद्वानों से हमारा अनुरोध है कि हमारे द्वारा उपर्युक्त वर्णित सभी प्रकार के तथ्यों व तर्कों के समर्थन/विरोध में अपने-अपने विचार व दृष्टिकोण यहाँ प्रस्तुत करे, ताकि भविष्य में वेदों व धर्म से परिपूर्ण समाज की स्थापना की पृष्ठभूमि तैयार की जा सके व सम्पूर्ण विश्व को पुनः वैदिक धर्म से परिपूर्ण किया जा सके।

  57. riyasat ahmad khan says

    musalmano me islami tor par sabhi barabar he
    par hum me bhi kai alag alag upjaniya hoti he
    kuran shreef me is kazikr he “koi bhi musalman kisi dusre musalman se jat rang jagah etc. k adhar par bada ya chota nahi he par ye fark banaya gaya he taki aap ek dusre ko pehchan sako”(ye anuvaad mene pada tha aur apni zaban me likh diya he isme jo bhi galti agar ho to wo mere gyan ki kami ki wajah se hogi) ab inme se kuch jatiya agar pichad gayi to un k aage badne k liye alag se madad karna kiyo galat he?

  58. raj.hyd says

    jo jatiya pichdgayi vah apne karmo se pichdi fir vah apne karmo se age bhi badh jayengi fir mdad kisiliye ? agar muslim sab barabar hote to batlaiye kitne sunni m,uslim shiya masjid me jakar namaz padhte hai kitne sunni muslimapni kanyao ka nikah shiya muslim se karte hai aur kitne shiya muslimsunni muslim se apni kanyao ka nikahkarte hai isliye islam me sab barabara hai iski” narebaji “chod dijiye !

  59. riyasat ahmad khan says

    bhai kuran shareef me saf likha he kisi bhi musalman ko dusre musalman se jati rang etc k aadhar par badaii hasil nahi
    per agar virodha bhaas he to ye insano ki galti he aap islam ko isme dosh nahi de sakte
    nikah k liye muslim ko azadi he ki wo ek momin ladki se ya ladke se nikah kar sakti/te he

    jo pichad gayi wo apne karmo se pichad gayi ye aap kis aadhar par kah rahe he
    aur apne karmo se aage bhi bad jayegi ye kis aaghar par kah rahe he
    espast kare

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