प्रत्येक श्रेष्ठ और सुसभ्य मनुष्य आर्य है |

अपने आचरण, वाणी और कर्म में वैदिक सिद्धांतों का पालन करने वाले, शिष्ट, स्नेही, कभी पाप कार्य न करनेवाले, सत्य की उन्नति और प्रचार करनेवाले, आतंरिक और बाह्य शुचिता इत्यादि गुणों को सदैव धारण करनेवाले आर्य कहलाते हैं |

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र यह चार वर्ण वास्तव में व्यक्ति को नहीं बल्कि गुणों को प्रदर्शित करते हैं. प्रत्येक मनुष्य में ये चारों गुण (बुद्धि, बल, प्रबंधन, और श्रम) सदा रहते हैं. आसानी के लिए जैसे आज पढ़ाने वाले को अध्यापक, रक्षा करने वाले को सैनिक, व्यवसाय करने वाले को व्यवसायी आदि कहते हैं वैसे ही पहले उन्हें क्रमशः ब्रह्मण, क्षत्रिय या वैश्य कहा गया और इनसे अलग अन्य काम करने वालों को शूद्र. अतः यह वर्ण व्यवस्था जन्म- आधारित नहीं है|

आजकल प्रचलित कुलनाम ( surname)  लगाने के रिवाज से इन वर्णों का कोई लेना-देना नहीं है | हमारे प्राचीन धर्मग्रन्थ रामायण, महाभारत या अन्य ग्रंथों में भी इस तरह से प्रथम नाम- मध्य नाम- कुलनाम लगाने का कोई चलन नहीं पाया जाता है और न ही आर्य शब्द किसी प्रकार की वंशावली को दर्शाता है|

निस्संदेह, परिवार तथा उसकी पृष्टभूमि का किसी व्यक्ति को संस्कारवान बनाने में महत्वपूर्ण स्थान है परंतु इससे कोई अज्ञात कुल का मनुष्य आर्य नहीं हो सकता यह तात्पर्य नहीं है | हमारे पतन का एक प्रमुख कारण है मिथ्या जन्मना जाति व्यवस्था जिसे हम आज मूर्खता पूर्वक अपनाये बैठे हैं और जिसके चलते हमने अपने समाज के एक बड़े हिस्से को अपने से अलग कर रखा है – उन्हें शूद्र या अछूत का दर्जा देकर – महज इसलिए कि हमें उनका मूल पता नहीं है | यह अत्यंत खेदजनक है |

आर्य शब्द किसी गोत्र से भी सरोकार नहीं रखता | गोत्र का वर्गीकरण नजदीकी संबंधों में विवाह से बचने के लिए किया गया था | प्रचलित कुलनामों का शायद ही किसी गोत्र से सम्बन्ध भी हो |

आर्य शब्द श्रेष्टता का द्योतक है | और किसी की श्रेष्ठता को जांचने में पारिवारिक पृष्ठभूमि कोई मापदंड हो ही नहीं सकता क्योंकि किसी चिकित्सक का बेटा केवल इसी लिए चिकित्सक नहीं कहलाया जा सकता क्योंकि उसका पिता चिकित्सक है, वहीँ दूसरी ओर कोई अनाथ बच्चा भी यदि पढ़ जाए तो चिकित्सक हो सकता है. ठीक इसी तरह किसी का यह कहना कि शूद्र ब्राह्मण नहीं बन सकता – सर्वथा गलत है |

ब्राह्मण का अर्थ है ज्ञान संपन्न व्यक्ति और जो शिक्षा या प्रशिक्षण के अभाव में ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बनाने की योग्यता न रखता हो – वह शूद्र है |  परंतु शूद्र भी अपने प्रयत्न से ज्ञान और प्रशिक्षण प्राप्त करके वर्ण बदल सकता है | ब्राह्मण वर्ण को भी प्राप्त कर सकता है |

द्विज – अर्थात् जिसने दो बार जन्म लिया हो | जन्म से तो सभी शूद्र समझे गए हैं | ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्णों को द्विज कहते हैं क्योंकि विद्या प्राप्ति के उपरांत योग्यता हासिल करके वे समाज के कल्याण में सहयोग प्रदान करते हैं | इस तरह से इनका दूसरा जन्म ‘ विद्या जन्म’ होता है | केवल माता-पिता से जन्म प्राप्त करनेवाले और विद्याप्राप्ति में असफ़ल व्यक्ति इस दूसरे जन्म ‘ विद्या जन्म ‘ से वंचित रह जाते हैं – वे शूद्र हैं |

 अतः यदि ब्राह्मण पुत्र भी अशिक्षित है तो वह शूद्र है और शूद्र भी अपने निश्चय से ज्ञान, विद्या और संस्कार प्राप्त करके ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बन सकता है | इस में माता- पिता द्वारा प्राप्त जन्म का कोई संबंध नहीं है |

आइए, हम सब सत्य ग्राही बनें, मिथ्या जातिवाद की जकड़ से मुक्त होकर एकात्म और सशक्त समाज तथा राष्ट्र का निर्माण करें | विशेष विश्लेषण के लिए पढ़ें: http://agniveer.com/4034/caste-vedas-hi/

This article is also available in English at http://agniveer.com/9/arya-and-castes/ 

This article is also available in Gujrati at http://agniveer.com/5951/arya-and-castes-gu/

अनुवादक: आर्यबाला

Facebook Comments

Liked the post? Make a contribution and help revive Dharma.

Disclaimer:  We believe in "Vasudhaiv Kutumbakam" (entire humanity is my own family). "Love all, hate none" is one of our slogans. Striving for world peace is one of our objectives. For us, entire humanity is one single family without any artificial discrimination on basis of caste, gender, region and religion. By Quran and Hadiths, we do not refer to their original meanings. We only refer to interpretations made by fanatics and terrorists to justify their kill and rape. We highly respect the original Quran, Hadiths and their creators. We also respect Muslim heroes like APJ Abdul Kalam who are our role models. Our fight is against those who misinterpret them and malign Islam by associating it with terrorism. For example, Mughals, ISIS, Al Qaeda, and every other person who justifies sex-slavery, rape of daughter-in-law and other heinous acts. Please read Full Disclaimer.

29 COMMENTS

  1. aap us murti ki pooja kese kar sakte ho jab kisi brahman dwara dalit ko mandir jane se rok diya jata h or aapka bhagwan koi action nhi leta h…hum kese visvash kare bhagwan par ..? agar sarswati ghyan deti to sachool nhi hote agar bhagwan nyay krta to court nhi hoti ..?

    • shri milender ji . jin mandiro dalit bandhuo ko roka jaye un mandiro me jakar samuhik rup se virodh kijye ya un mandiro ka hi bahishakar kar dijiye!
      gyan guru se ya pustako se milta hai sarasvati adi kalpit bate hai ! inka kabhi astiv n raha hai aur n age rahega !
      ishavar ka nyaya alag tarah ka hai aur adalate ka nyaay alag tarah ka hota hai !
      ab aap bataliye ki agar kisi ne chori karli to ishvar kya saja dega jab ki adalat iski saja deti hai!

  2. Aryo me jati vyavstha.
    Are mitra…
    Jo Ap bata rahe ho vo sahi he to hamare pramukh mandiro our matho me pramukh pujari ke sthan par shudra samaj me janme mahan gyani vyakti ki niyukti kyo nahi karte. Prayatna to karko dekho aapko vahase kya jawab milta he vo fir hame batana.

    • aap hyderabab aiye ham apko kuch mandiro me gair brahaman gair savarn bhi pujari dikhla denge 1
      apki yah baat saty hai ki adhikansh sthano me janmajat brahaman hi pujari hai !

  3. अधुरा ज्ञान उस शस्त्र के सामान है जिसकी धार बहुत पेनी होती है और उस से किसी व्यक्ति विशेष का नाश नहीं होता बल्कि पुरे समाज का नाश होता है जो मुझे यहाँ दिखाई दे रहा है ….

    • adhura aur nasht hone yogy to bahut kuch hai purn kaun hai ?
      ishvar me bhi dosh nikale ja skate hai? jaise karmo ka fal bahut der se milna
      bagair shaskiy vyavstha ke insano me prem hon bhi mushkil hai ! badle ki baat aam janta sochti hai usko nyaya nahi mil pata
      aoaradhiyo ko der se dand milta hai /
      isliye jo jayda achha ho vah svikar hone yogy hona chahiye !

  4. जाति-जाति चिल्लाओगे तो जाति कभी समाप्त नहीं कर पाओगे । यदि जाति को समाप्त करना है तो जाति सूचक शब्दों का कभी भी नाम न लें । ये राजननीतिक नेता जाति के नाम पर वोट मांगकर जाति को बढावा देते हैं। इसको समाप्त कराओ। जाति सबकी मनुष्य है, पर आप वर्ण को जाति कहते हो। सभी जन अपने -अपने परिवार को सुधारें। सामाज सुधार के कार्य करें और सभी जनों को प्रेरित करें। जाति अपने आप समाप्त हो जायेगी। एक कटु सत्य कहूँ पर आप मानेंगे नहीं। पुनरपि कहता हूँ- मुगलों के आगमन के पूर्व भी वर्ण व्यवस्था (जाति) थी परन्तु कोई

  5. HAR HAR MAHADEV
    Sri AGNIVEER G, Sadar Pranam
    Mai Janm se KASI ke Puny Kshetra ka rahne wala hu, DHARM ke visay me jo Antardwnd ya DARSAN bahar kahi v chalti hogi uski Uchchatam Parakasdha ki lakir Sadarantaya har KASI vasi ke man me hamesa rahti hai, jo hum pe BABA VISVNATH KI asim Anukampa hai.
    SATY SANATAN DHARM me manushya ke marne k bad ke KRIYA-KARMO par apki kya rai hai.

    DHANYWAD

  6. time k sath reeti rivaazo me bhi parivartan aaya hai
    aaj aap kisi k naam se uski jaati ya dharam ka pata nahi laga sakte
    aaj kisi bhi samaj k liye koi bhi seemayen nahi hain
    puraane samay me jo vibhjan tha woh unke karya kusalta par nirbhar karta tha
    jiske aadhar pe ek karya ek hi samaj k dwara kiya jata tha
    par aaj aisa nahi hai

  7. परम आदरणीय श्री श्रावक जी व श्री ट्रुथ सीकर जी , आपको हमारे विचार पसंद आये उसके लिए कोटिश: धन्यवाद ! माननीय श्रावक जी , हमें तो दुःख अपने ही भाइयो से है वर्ना गैरों में कहाँ दम था हमसे टकराने का, हमारी किश्तीवहां डूबी जहाँ पानी कम था ! आपने जो भी बाते यहाँ लिखी है वह बिलकुल सत्य है ! अगर गणेश जी के नाम पर चंदा नहीं दे तो जबरदस्ती करते है ! और बदनाम करने की भी कोशिश करते है इसके बावजूद कोई हमसे किसी भी प्रकार का चंदा नहीं ले पाता !अनेक बार इस तरह के कार्यक्रमों में पचासों व्यक्ति देश भर में मर जाते है ! फिर उनके परिवार की भी कोई देखभाल करने वाला भी नहीं होता ! वह जीवन भर के लिए पिछड़ जाते है ! फिर से उनको नए तरीके जीवन पथ पर चलना पड़ता है ! अपने देश में बर्बाद करने वाले अनेको तरीके ईजाद कर लिए गए तब भी आश्चर्य होता है हमारा देश जिन्दा कैसे है ? अभी दुर्गा पूजा का कार्यक्रम चल रहा है विशेष कर बंगाल में अरबो रुपये खर्च किये जायेंगे ! एक तरफ विजयादशमी में नगर नगर में लाखो रावण के पुतले हर साल फूंके जायेंगे, और घरघर में नए रावण तैयार होते जायेंगे , जो हर गली में किसी न किसी की कन्या से छेड़खानी करते होंगे ! दीपावली कई अरब रुपये पठाखे जलाकर खाक कर दिए जाते है लेकिन किसी मजदूर -गरीब के घर भी एक दिया जल जाये इसकी चिंता नहीं की जाती ! धनतेरस कई अरब रुपये के बर्तन व सोना -चाँदी उत्तर भारत में खरीदी जाती है ! जिससे दीपवली शुभ हो जाये उसी में करोडो रुपये दुर्घटनावश आग लग जाती है और बर्बाद हो जाते है हर साल दीवाली अति है लेकिन देश की गरीबी नहीं मिट पाती ! सौ अरब से ज्यादा की शराब हमारे देश के नागरिक पी जाते है ! न जाने कितने परिवार बर्बाद हो जाते है ! कोई नहीं देखने वाला कोई नहीं सुनने वाला ! अब इनको कौन ठीक कर सकता है ? जो अपने को ज्यादा समझदार व जिम्मेदार समझता है ! उसका यह परम कर्तव्य है की वह हवन की “समिधा” बन जाये ! जो बाबा रामदेव जी से ज्यादा अच्छा नागरिक हो या संगठन बने वही देश का कल्याण कर सकेगा ? अन्यथा नहीं !

  8. @raj.hyd
    लेकिन मुझे आपके विचार अच्छे लगते है1 ऐसे ही लिखकर सबका मार्ग दर्शन करते रहिये.!

  9. परम आदरणीय श्री अखिला जी , हम भी जन्मना जातिपाति का ही विरोध कर रहे है ,हमने स्वयम अपने नाम के साथ जन्मना जातिसूचक चिन्ह का प्रयोग बहुत साल पहले कर दिया था , तब हम यह आवाज यहाँ पर उठा रहे है ! रही बात पूजा पद्धति की उसको भी एक क्यों न किया जाये , कुछ अलगाव करना है तो कोई ओम का जप कर सकता है कोई संध्या कर सकता है ,कोई गायत्री मन्त्र का जप कर सकता है , अनेक वेद मन्त्र है उन मंटो का भी उपयोग किया जा सकता है लेकिन मूर्तिपूजा क्यों?, रथ यात्रा क्यों ? यह तो अपने सामाजिक क्षेत्रो में भी साधक नहीं बल्कि बाधक है ,! हम सब मनुष्यों कीबनाई मूर्ति को सम्मान देते है लेकिन ईश्वर की बनाई मूर्ति मनुष्य का कोई ख्याल नहीं करते है कितने मनुष्य अति गरीबी जीवन में जी रहे है उनकी मदद नहीं की जाती लेकिन गणेश उत्सव, रथ यात्रा , मंदिरों के निर्माण में अपना कमाया हुआ मेहनत का धन इन बेकार के कार्यो में खर्च कर देते है ! अगर देश में इसके विरुद्ध एक अच्छा माहौल बनाया जाये तो इनसे छुटकारा मिल सकता है लेकिन बहुत से मनुष्यों को इससे ख़ुशी मिलती है लेकिन गरीब कन्याओ की पढाई, उनके विवाह आदि में धन खर्च करने के लिए नहीं सोच पाते !कुछ मंदिरों में अरबो रुपया दबा हुआ पड़ा है लेकिन इनकी व्यवस्था में कायाकल्प हो , इस पर विचार नहीं किया जाता ! इन बातो में कायाकल्प हो इसके लिए हमने अपनी बात रखी थी ! हमें अफ़सोस है की आपको हमारी बात पसंद नहीं आ पाई !

    • राज जी

      हम हिन्दू इतने समझदार होते तो ‘मंदिर’ से पैसा मांगने की आज यह नौबत ही न आती| जयचंदों से भरी हुई है अपनी कौम| गणेश उत्सव जिस उद्देश्य के लिए शुरू किया गया था उस उद्देश्य का आज कहीं ठिकाना नहीं है| भक्तजन शराब पीकर फूहड़ गानों पे नाचते हुए, एक-दुसरे से लड़ते हुए, नारी का अपमान करते हुए जी भर के हिन्दू धर्म की धज्जिया उड़ाते है|

      जिस त्याग और सत्यता की नीव पर यह सनातन धर्मं खड़ा है, उसी नीव को तोड़ने पर उतारू है हमारे अपने लोग| चरित्र के बारे में पूछते है तोह कहते है ‘What is charachter’ 😉

  10. हिन्दू कहलाने वालो ने तो अपने पैत्रक पूजा पद्धति व जाति सूचक चिन्हों को वैसे का वैसा ही अपना लिया है ! काफी पढाई- लिखाई के बावजूद इनसे जरुर चिपके हुए है , प्याज खा लेंगे, अंडे खा लेंगे, मांस खा लेंगे शराब आदि की कुरीतियाँ भी अपना लेंगे ! लव मैरिज भी कर लेंगे , लेकिन अपनी पूजा पद्धति व जाति सूचक चिन्हों मारे हुए बन्दर के बच्चे की तरह उससे जरुर चिपके रहेंगे ! अपने अभिभावकों से क्यों नहीं पूछते की इस को अपनाने से क्या लाभ है ! और जो वेदों के प्रचार का बीड़ा उठाये हुए थे , वह आपस में ही संघर्षरत है ! तब यह देश क्यों नहीं बर्बाद होगा ! किसी को तो इस समाज को झकझोरना होगा ! जब लाखो साल पुराने योग को “अकेले ” बाबा रामदेव जी कुशलता सेउसका प्रचार कर लेते है १ कई करोड़ लोग उसको अपना भी लेते है !तब जन्मना जाति सूचक चिन्हों का परित्याग के लिए कोई अभियान क्यों नहीं चलाया जाता ? मूर्ति पूजा, पाखंड व अंधविश्वास आदि के विरुद्ध भी अभियान चलाना चाहिए क्या कोई व्यक्ति या संघठन इस दिशा में ध्यान देगा ?

    • राज जी, में आपके बातों से बिलकुल भी सहमत नही हू. अप केसे पूजा पद्धति के बिरुध ये लिखा हे कृपा कर के बोले. जहा तक में देखता हू, वैदिक रीती में कही भी किसी जाती वाचक शब्धो का प्रयोग नही होता.

      मेने उदहारण दिया, केसे श्राद्ध विवाह आदि कर्म में नाम, गोत्र और ३ पुरुषों क नाम के साथ एक व्यक्ति का परिचय दिया जाता हे. ये ३ पुरुष केवल पिता का ही मही, बल्कि माता के व् होते हे, यानि पुरुष का जितना महत्व, उतना ही नारी को भी दिया जाता हे. येही वैदिक पूजा पद्धति हे जो आज भी प्रचलित हे.

      जन्माना जातिवाद के बिरुध मुहीम कौन चलाएगा ? हम में से ही कोई एक, क्यों न हम से ही प्रारंभ हो. आज ये शपथ लीजिए के अपने बचो को हम किसी एक वर्ना विशेष का नही कहेंगे, हम अपने बचो को वेदों का सठिक अर्थ समझायेंगे,

      मूर्ति पूजा का में बिरोध नही करता. ये सच हे के वेदों में मूर्ति पूजा का मोई ब्यबस्था नही हे, परन्तु इस में कुछ बुरे भी तो नही हे.

      • मुर्ती पूजा का विरोध सर्वप्रथम आवश्यक है अखिल जी क्यूंकी मूर्तीपूजा से अंधविश्वाश को बढ़ावा मिलता है जिसका फायदा उठाकर कुछ लोग भोले भाले लोगो को बेवकूफ बनाकर अपना धंधा चलाते हैं

  11. जिस युग में वैदिक वर्ण-व्यवस्था का प्रचलन रहा होगा उस युग में शासन की ओर से अपने देश या राज्य के सभी नागरिकों के नाम, पता आदि का विवरण रखा ही जाता होगा ऐसा हम अनुमान कर सकते हैं । क्या कोई प्रमाणपूर्वक यह बता सकने कि कृपा करेंगे कि उस काल में शासक की या अन्य सामाजिक व्यवस्था की ओर से प्रत्येक नागरिक का पूरा नाम कैसे लिखा जाता था ?
    = भावेश मेरजा

    • namaskar !
      देखिये वैदिक व्यवस्था के समय कभी भी गोत्र अथवा surname का प्रचलन नहीं था . केवल मुख्य नाम को ही पूरा नाम मन जाता था , और व्यक्ति अपने कार्यो से पहचान प्राप्त होती थी |
      जैसे क्या आपने कभी सुना कहीं लिखा हो “राम सूर्यवंशी” ? अथवा “कृष्ण यदुवंशी ” ? ये नाम के पीछे surname लगाने की रीत बाद ही से शुरू हुई है |
      हाँ ये संभव है की किसी के कोई कार्य साधने के बाद उसके नाम के साथ उपमा लगा दी जाती थी जैसे , मर्यादा पुरुषोत्तम , अथवा द्वारिकाधीश आदि |

    • बहोत ही उचित प्रश्न पूछा आपने..

      क्या आपने कभी किसी मंदिर पे पूजा करवाया हे ? या किस श्राद्ध आदि कर्मो के दौरान ब्राह्मणों द्वारा बोले गए श्लोक को ध्यान से सुना हे ?

      नाम क साथ, गोत्र और ३ पुरुष क नाम के साथ एक ब्यक्ति का परिचय दिया जाता हे. लेकिन वहा वर्ण का कुछ वि उल्लेख नही किया जाता.

      वेदिक काल में व् इसे ही सबका लेख रखा जाता था, जो ब्यबस्था आज वि बहत जगा पाया जाता हे. कुछ लोग अपने नाम के साथ अपने पिता का नाम और गोत्र के नाम लिखते हे. दखिण भारत में नाम के साथ जन्म स्थान का नाम भी लिखा जाता हे.

  12. पिछले दिनों हमने एक सर्वे कियाथा, ये जानने केलिए क गोत्र से क्या जाती की पता चलता हे . हमारा प्रयास ये दिखाना था के कोई जन्मा से अगर एक जाती के होता, तो एक बिशेष गोत्र क सभी लोग एक जाती के ही होते.

    हमने पाया, भरद्वाज गोत्र में ब्राह्मण, वैश्य, खत्रिय ये सभी पाए जाते हे, वेसे ही वाशिष्ठ गोत्र में ब्राह्मण और ख्यात्रिया हे, गौतम गोत्र में भी हमे ३नो वर्णों के लोग मिले. इससे एक बात तो साफ हे के वेदिक काल में, जन्म से कोई किसी बिशेष जाती का नही बनता था.

    कुछ गोत्र इसे व् थे, जो वैश्य और शुद्र में साधारण हे, कुछ शुद्र और ख्यात्रिया में साधारण हे.

    येही सबसे बड़ा प्रमाण हे की जन्म से जाती का पहले कुछ सम्बन्ध नही था.

    अगर शेष नाम की बात करे तो, ओडिशा में पात्र, मोहापात्र. दास, ये कुछ इसे शेष नाम हे जिस में हर जाती क लोग हे, शुद्र भी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here