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वेदों के बारे में फैलाई गई भ्रांतियों में से एक यह भी है कि वे ब्राह्मणवादी ग्रंथ हैं और शूद्रों के साथ अन्याय करते हैं | हिन्दू/सनातन/वैदिक धर्म का मुखौटा बने जातिवाद की जड़ भी वेदों में बताई जा रही है और इन्हीं विषैले विचारों पर दलित आन्दोलन इस देश में चलाया जा रहा है |
परंतु, इस से बड़ा असत्य और कोई नहीं है | इस श्रृंखला में हम इस मिथ्या मान्यता को खंडित करते हुए, वेद तथा संबंधित अन्य ग्रंथों से स्थापित करेंगे कि -
१.चारों वर्णों का और विशेषतया शूद्र का वह अर्थ है ही नहीं, जो मैकाले के मानसपुत्र दुष्प्रचारित करते रहते हैं |
२.वैदिक जीवन पद्धति सब मानवों को समान अवसर प्रदान करती है तथा जन्म- आधारित भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं रखती |
३.वेद ही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जो सर्वोच्च गुणवत्ता स्थापित करने के साथ ही सभी के लिए समान अवसरों की बात कहता हो | जिसके बारे में आज के मानवतावादी तो सोच भी नहीं सकते |
आइए, सबसे पहले कुछ उपासना मंत्रों से जानें कि वेद शूद्र के बारे में क्या कहते हैं -
यजुर्वेद १८ | ४८
हे भगवन! हमारे ब्राह्मणों में, क्षत्रियों में, वैश्यों में तथा शूद्रों में ज्ञान की ज्योति दीजिये | मुझे भी वही ज्योति प्रदान कीजिये ताकि मैं सत्य के दर्शन कर सकूं |
यजुर्वेद २० | १७
जो अपराध हमने गाँव, जंगल या सभा में किए हों, जो अपराध हमने इन्द्रियों में किए हों, जो अपराध हमने शूद्रों में और वैश्यों में किए हों और जो अपराध हमने धर्म में किए हों, कृपया उसे क्षमा कीजिये और हमें अपराध की प्रवृत्ति से छुडाइए |
यजुर्वेद २६ | २
हे मनुष्यों ! जैसे मैं ईश्वर इस वेद ज्ञान को पक्षपात के बिना मनुष्यमात्र के लिए उपदेश करता हूं, इसी प्रकार आप सब भी इस ज्ञान को ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र,वैश्य, स्त्रियों के लिए तथा जो अत्यन्त पतित हैं उनके भी कल्याण के लिये दो | विद्वान और धनिक मेरा त्याग न करें |
अथर्ववेद १९ | ३२ | ८
हे ईश्वर ! मुझे ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और वैश्य सभी का प्रिय बनाइए | मैं सभी से प्रसंशित होऊं |
अथर्ववेद १९ | ६२ | १
सभी श्रेष्ट मनुष्य मुझे पसंद करें | मुझे विद्वान, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, शूद्रों, वैश्यों और जो भी मुझे देखे उसका प्रियपात्र बनाओ |
इन वैदिक प्रार्थनाओं से विदित होता है कि -
-वेद में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण समान माने गए हैं |
-सब के लिए समान प्रार्थना है तथा सबको बराबर सम्मान दिया गया है |
-और सभी अपराधों से छूटने के लिए की गई प्रार्थनाओं में शूद्र के साथ किए गए अपराध भी शामिल हैं |
-वेद के ज्ञान का प्रकाश समभाव रूप से सभी को देने का उपदेश है |
-यहां ध्यान देने योग्य है कि इन मंत्रों में शूद्र शब्द वैश्य से पहले आया है,अतः स्पष्ट है कि न तो शूद्रों का स्थान अंतिम है और ना ही उन्हें कम महत्त्व दिया गया है |
इस से सिद्ध होता है कि वेदों में शूद्रों का स्थान अन्य वर्णों की ही भांति आदरणीय है और उन्हें उच्च सम्मान प्राप्त है |
यह कहना कि वेदों में शूद्र का अर्थ कोई ऐसी जाति या समुदाय है जिससे भेदभाव बरता जाए - पूर्णतया निराधार है |
अगले लेखों में हम शूद्र के पर्यायवाची समझ लिए गए दास, दस्यु और अनार्य शब्दों की चर्चा करेंगे |
अनुवादक: आर्यबाला




















@AGNIVEER
BAHUT HI SUNDER but I think First priority should be Hindi translation of Article Series
on Vedic God. Eradication of caste-system will not be a hard nut to crack
when people will understand true concept of God.
@ Truthseeker. It is both ways. In fact understanding of true concept of God demands not only knowledge but practice and mastery of Yoga. We all represent different phases of that understanding. But if caste system be dented, and intellectuals start rejecting those texts which support casteism, than understanding of God becomes much simpler from remaining texts. After all Vedas state that unless we consider entire humanity as one family – we cannot understand the truth. And eradication of caste system seems to be easiest nut to crack at this juncture, if we are willing to put same level of actions that were put by Swami Shradhanand etc not many decades ago.
Admin
jab kisi bhi vyakti ke pair chukar uska samman kiya jata hai ,aur usse ashirvad liya jata hai tab pair ko shudr ki sangya kyo di jati hai! kya agar pair me kanta ya koi takleef hogi tab kya pureshareer ko takleef nahi hogai kya pair ki takleefko dimag vanchit rah sakta hai ? usi tarah se samaj ke sabhi vyakti ek dusre ka dard samajhe tabhi sara samuday pragati kar sakega ! bhala karo ;bhala karo bhagvan ,sab ka bhla karo ,koi n ho jag me dukhiyari , jab yah bhavna sabhi ke dimag v dil hogi tab matbhed hote huye bhi “manbhed “nahi ho sakenge !
as per vedas kshudra is not that who can born in kshudras house,kshudra is that who are illiteracy,un educated,and who are going to against of nature that person should be kshudra,if he is born at pandit home or kshtriya home that is the kshudra,and example ,like valmiki muni he is kshudra but after he became bhrahm rishi,,then,,vasishth muni he born in vaishyas home but he became a bhrahm rishi,then vishwamitra he born as kshtriya after that he becam a bhrahm rishi,,,,so that mince person has make his self as per his karma not on his born…..,
नमस्कार दोस्तो,
मैंने आप सभी के विचार पढे़ और अच्छा लगा । मेरे विचार से जाति प्रथा को हमारे आज के समाज में जीवित रखने वाले राजनितज्ञ है जो हम सब को बेवकुफ बनाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं और सब से ज्यादा कसूरवार हम सब हैं जो उनके हाथों उल्लू बन रहें हैं । राजनितज्ञ हमें बटाना चाहते हैं ताकि हम कभी एक न हो सकें क्योकिं अगर हम एक हो गये तो उन सब की कुर्सियां चली जाएगी और सबसे महत्वापूर्ण यह कि हम अपने अधिकारों जैसे कि अच्छी एवं सस्ती शिक्षा, रोजगार के साधन, आर्थिक सुरक्षा, उच्च स्तर का जीवन की मांग न करने लगें जिन्हे पाकर हमारी सोचने-समझने की समक्षता बढेगी और जागरूकता आएगीं । इसलिए राजनितज्ञ चाहते है कि शिक्षा को महंगे से महंगा करो ताकि हममें जागृति न आ सके और बची हुई कसर हमें जाति धर्म जैसे मसलों में लडाकर पूरा करते है इसलिए दोस्तों मेरी आप सभी से अर्ज है कि उस एकता को बढावा दो जिसे असफाक उला खान, भगत सिहँ, राम प्रसाद बिसमिल, सुभाष चन्द्रि बोस जैसे शहीदों ने भारत को आजाद कराने के समय बनाई थी
aap ki bat bilkul sahi hai
me us ved ko nhi manuga jisme sudra or brahman ki bat ho inshaniyat bhi koi chij hoti he ek pagal ne likkhha sab usi ke pichhe bhag khade huye kyu apki budhhi or meri budhhi kya kam nhi karti jo kisi ki bhi bat mann lu