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अग्निवीर यह घोषणा स्पष्टता से करता है कि वैदिक धर्म को ही मानवजाति का एक मात्र धर्म बनाना, उसका उद्देश्य है | इस प्रकार से आप लोग कह सकते हैं कि हम लोग धर्मांतरण का आन्दोलन चलाते हैं | हम यह चाहते हैं कि इस पृथ्वी पर प्रत्येक मनुष्य वैदिक धर्म से जुड़े, हम यह मानते हैं कि विश्व की मुक्ति तब ही संभव है जब प्रत्येक मनुष्य वैदिक धर्म को अपनाए | हम यह भी घोषणा करते हैं कि वैदिक धर्म के अलावा ऐसा कोई धर्म नहीं है जिसने सर्वशक्तिमान सत्ता को स्वीकार किया हो |

अभी या बाद में वैदिक धर्म की शरण में जाने के सिवा शांति का कोई मार्ग बचा नहीं है |  अब यह बात ऐसे लगती हो जैसे कोई धर्मांतरण करने वाला परम्परावादी ईसाई या इस्लामिक मिशनरी बोलता और लिखता है | अगर, वैदिक धर्म की जगह आपने कुरान, बाइबिल, इस्लाम, ईसाईयत आदि शब्द रख दिए तो लगेगा कि ज़ाकिर नाइक या पोप जैसे लोग सदियों से ऐसे ही बातें किया करते हैं | क्या यह अग्निवीर एक अन्य धर्मांध है जो अपने ख़ुद के धर्म को दूसरों के धर्मों से श्रेष्ठ मानता है ? और अन्य मतों की भर्त्सना करता है | जैसे कि, एक धर्मांध ईसाई किसी भी तरह बाइबिल के प्रसार का प्रयत्न करता है, एक धर्मांध मुस्लिम कुरान को प्रसारित करने के लिए तलवार के उपयोग का भी समर्थन करता है | वैसे ही, लगता है अग्निवीर वेदों के प्रसार के लिए और अपने मत के समर्थन के लिए दिव्यता के और दावेदारों की तरह बात तो नहीं करता ?

अग्निवीर यह तर्क अवश्य दे सकता है कि केवल ईसाई और मुस्लिम मतान्ध अपनी पुस्तकों को श्रेष्ठ घोषित करने का अनिवार्य अधिकार नहीं रखते हैं | अगर वे लोग बाइबिल और कुरान को प्रसारित करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं तो अग्निवीर का विरोध क्यों ? जो उसी प्रकार वेदों का प्रचार करना चाहता है | यदि अग्निवीर वैदिक धर्म को मानवता का एक मात्र धर्म घोषित करने पर तुला हुआ है और उस सीमा तक मतान्ध है तो बाकी जितने भी सम्प्रदाय हैं उन पर भी वही लांछन लगना चाहिए |

यह एक बड़ा प्रबल तर्क है जिसके आधार पर बहुत सारे सम्प्रदाय और पंथ दुनिया के सभी धर्मों में पाए जाते हैं और इतना ही नहीं प्रतिदिन नए बनते और पनपते जाते हैं |  इस लेख का उद्देश्य इस तर्क पर और जोर देकर अग्निवीर को जो कहना है उसका बचाव करना नहीं है, परंतु यह समझाना है कि वास्तव में वैदिक धर्म क्या है ? और यह बताना है कि वैदिक धर्म पर मर मिटने वाले महान आत्माओं की श्रेणी में अग्निवीर ही प्रथम नहीं है |  यह लेख यह भी बताएगा कि वेदों के नाम से सौगंध लेना, कुरान या बाइबिल या और किसी दिव्य ग्रंथ के नाम सौगंध लेने के समकक्ष नहीं है |

हमारा यह आवाहन है कि यह लेख पढने के बाद आप भी अपने अंतर्मन से वैदिक धर्म को अपनाने के लिए बाध्य हो जायेंगे ( यदि अभी तक आपने ऐसा नहीं किया है तो ) सही मायने में हम सभी लोग वैदिक धर्म के ही अनुयायी हैं | हालांकि, हम इतनी स्पष्टता से इन शब्दों में इस को स्वीकार करें या न करें | यह लेख बस यही करता है जिसको आप नकार नहीं सकते, उसको न कहने के बजाए आपको आपके सही अंतर्मन के साथ पूरे उत्साह से जोड़ता है |

 धर्म क्या है ?

आइए, पहले यह देखें कि हम धर्म माने क्या समझते हैं ? सर्व साधारण परिपेक्ष्य में देखा जाए तो धर्म कुछ लोगों द्वारा अनुसरण किया गया – एक रास्ता या मान्यताओं का समुदाय है जिसमें जीवन के बारे में, मृत्यु के बारे में, जीवन के बाद के बारे में, ईश्वर के बारे में और संबंधित विषयों के बारे में कुछ निश्चित विचार या विश्वास हैं |  यदि धर्म का यही अर्थ माना जाए तो वैदिक धर्म इस में नहीं गिना जा सकता |

धर्म का अर्थ है स्वाभाविक गुण ( किसी भी पदार्थ का) |  धर्म की अनेक वैकल्पिक व्युत्पत्तियां और अर्थ निर्धारण हो सकते हैं जिसकी चर्चा हम फिर कभी करेंगे |  अगर आप चाहें तो एक ही विचार को बताने के लिए दूसरा शब्द प्रयोग कर सकते हैं, पाश्चात्य भाषाओं में धर्म शब्द की अवधारणा का नितांत अभाव है इसलिए वहां इसका अर्थ  ‘ रिलीजन’ ( religion)  ग्रहण किया गया है |  हम भी समझने में आसान और प्रचलित होने के कारण धर्म का अर्थ बताने के लिए ‘रिलीजन’ (religion) शब्द का प्रयोग करेंगे |

यदि’ रिलीजन’ ( religion) शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में विचार करें तो यह शब्द – re – पुनः  +  legion – जोड़ना  या  बांधना,  इन दो शब्दों को मिला कर बनाया गया है |  अपने मूल स्रोत से जुड़ने या बंधने की प्रक्रिया को ‘रिलीजन’ ( religion) कह सकते हैं |  इस प्रकार से ‘ योग’ शब्द का जो अर्थ होता है उसके नजदीक का अर्थ धर्म माने ‘रिलीजन’ ( religion ) का हुआ |

अगर रिलीजन का अर्थ यही है तो निश्चित ही वैदिक धर्म सच्चा धर्म है, यह भी हम देखेंगे |  अब हम दूसरे धर्मों के प्रवक्ताओं पर छोड़ते हैं कि वे अपने मंतव्य के अनुसार धर्म की महत्ता को कैसे समझते और समझाते हैं | हम इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे | यह लेख वैदिक धर्म को समझाने तथा उस प्रक्रिया में आप को वैदिक धर्म में दीक्षित और प्रवृत्त करने के उद्देश्य तक ही सीमित है |

वैदिक धर्म से आप क्या समझते हैं ?

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कुछ प्रचलित गलत जवाब  –

१ वैदिक धर्म मतलब हिन्दुत्व |

२.वैदिक धर्म मतलब चारों वेदों को उसी तरह दिव्य मानना, जैसा मुसलमान कुरान और ईसाई बाइबिल को मानते हैं |

३.चारों वेदों का अनुसरण उसी तरह करना, जैसा मुसलमान कुरान के प्रत्येक अक्षर का पालन करते हैं और ईसाई बाइबिल का |

४.वैदिक धर्म मतलब आर्य समाज के अनुयायी होना |

५.वैदिक धर्म मतलब संध्या – हवन करना |

और सही जवाब है –

‘ एक  निरंतर चलने वाली प्रक्रिया में अपनी पूरी क्षमता और निष्ठा से हर क्षण असत्यता का त्याग व सत्य का ग्रहण करना ही वैदिक धर्म  है | ‘

यजुर्वेद १.५  इसे बताते हुए कहता है कि –

” हे परमेश्वर, आप अपरिवर्तनीय नियमों से कार्य करने वाले हैं, जिन में किंचित भी बदल संभव नहीं है | मैं भी आप से ही प्रेरणा प्राप्त कर के अपने जीवन में दृढ़ सिद्धांतों का पालन करूं | अत: मैं निरंतर सत्य को पाने के लिए, अपने जीवन से हर क्षण असत्य को अपनी पूरी क्षमता, दृढ़ता और प्रयासों से दूर करने का संकल्प लेता हूं | मेरी इस सत्य प्रतिज्ञा में मुझे सफल करें | ”

यह संपूर्ण वैदिक धर्म का सार है | यह वैदिक धर्म का प्रारंभ है इस के अतिरिक्त बाकी सब दुय्यम है या इसी से निकला हुआ उप सिद्धांत है | इस मूल भावना के साथ व्यक्ति वैदिक धर्मी कहलाता है और यह भावना न हो तो वह वैदिक धर्मी नहीं है |  ध्यान दें कि असत्य का त्याग हर मनुष्य का मूलभूत गुण है जिसके बिना हम जी नहीं सकेंगे | इसी प्रेरणा से हम जीवन में सब कुछ सीखते हैं – चलना, बोलना, शिक्षा प्राप्त करना, नए अविष्कार करना, जीवन में आगे बढ़ना इत्यादि | चाहे हम अपनी चेतना में जानते हों या नहीं, चाहे हम खुले तौर पर इसे स्वीकारें या नहीं, वस्तुत: हमारा अस्तित्व इसी वैदिक धर्म के कारण से है | धर्म का अर्थ है स्वाभाविक गुण, जो किसी पर थोपा नहीं जा सकता | वह तो सहज और स्वयंस्फूर्त होता है | अत: सत्य की चाह, हम सब का स्वाभाविक गुण है और हम इस में जीते हैं  – मतलब हम सब कहीं न कहीं वैदिक धर्म को मानते हैं |

तो, वैदिक धर्म को ग्रहण करने से हमारा मतलब सिर्फ़ यह है कि जो आप करते आ रहे हैं – उसे इंकार करने से रोकना है |  हम आपको, आपके भीतर मौजूद असीम ओज, तेज, उर्जा और उत्साह का अहसास कराना चाहते हैं |

सत्य और असत्यता क्या है  ? 

इस विषय की गहराई में उतरने से पहले, आइए संक्षेप में देखें कि सत्य और असत्यता से हमारा मतलब क्या है ? यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि हर एक मत, पंथ या सम्प्रदाय सत्य पर अपना एकाधिकार जताता है |  कुछ लोग तो सत्य पर इस तरह स्वामित्व समझते हैं कि एक बार अगर आप उनके मत में शामिल हो जाएं तो आप उनके ‘सत्य ‘ को झूठला नहीं सकते वरना आपकी मौत की सज़ा का फरमान जारी हो सकता है  |

लेकिन वैदिक सत्य ऐसा कोई दावा नहीं करता | वैदिक सत्य अर्थात् सत्य की वैदिक अवधारणा सबसे अधिक प्रामाणिक है | वेद शब्द जिस धातु से बना है उसका अर्थ ही ज्ञान है | तो वैदिक सत्य का मतलब यह नहीं है कि आप लोग मुझ पर इसलिए विश्वास करें क्योंकि मैं ही सत्य पर एकाधिकार का दावा करता हूं | आप किसी भी चीज़ में सिर्फ़ इसलिए भी यकीन न करें क्योंकि वह किसी पुस्तक में लिखी है या किसी पैगंबर या ख्याति प्राप्त व्यक्ति द्वारा बताई गई है या किसी टी .वी चैनल या फ़िर किसी भीड़ इकट्ठी करने वाले ने कहा है |

वैदिक सत्य का अर्थ सिर्फ़ इतना ही है कि आप किसी भी चीज़ को जैसी यह वास्तव में हो उसी तरह स्वीकार करें और फ़िर उसी के अनुसार काम करें |

वैदिक सत्य का अर्थ है कि आप किसी भी चीज़ को तभी अपनाएं जब आप उसे तर्कसंगत, सुसंगत, नियमबद्ध पाएं और इन सब से बढ़कर जब आपका अंतस उसकी गवाही दे |  इन सभी कसौटियों पर कसे बिना अपनाई गई बातें असत्यता की श्रेणी में ही आएंगी | अब जैसे यदि मैं यह दावा करूं कि मैं एक पैगंबर हूं और दुखों से छुटकारा पाने के लिए तथा स्वर्ग की प्राप्ति के लिए मेरे लेखों का आंख मूंदकर विश्वास किया जाना चाहिए |

तो आप मेरे इस दावे की कई तरह से परीक्षा करना चाहेंगे –

– यदि कोई और भी इसी तरह से दावे करे तो यह कैसे पता चले की कौन सही है और कौन गलत ?

– क्या अग्निवीर पर दी गई सारी जानकारी एकदम अचूक है ? क्या वह समय और स्थान से प्रभावित नहीं है ?

– जो अग्निवीर के निर्माण से पहले ही इस दुनिया से चले गए, उनका क्या होगा ?

– यदि अग्निवीर ही एकमात्र स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग है तो हमारे पास स्वयं की बुद्धि होने का मतलब ही क्या रहा ? इत्यादि …

आप शायद यह परिमाण निकालें कि अग्निवीर भले ही महत्वपूर्ण और उपयोगी जानकारी देता है पर उसे ईश्वर का दूत नहीं माना जाता | तो वैदिक धर्म के चतुर अनुयायी की तरह आप अग्निवीर पर उपलब्ध अच्छाई को चुनेंगे और अन्य दावों के प्रति उपेक्षा बरतेंगे | और यदि आप अधिक चतुर हुए तो आप अन्य स्रोतों से जो आप को अग्निवीर से ज्यादा ज्ञानदायक लगते हों वहां से जानकारी प्राप्त करेंगे |

परंतु, वैदिक सत्य का मतलब यह भी नहीं कि हर बार बाल की खाल निकाली जाए और सिर्फ़ तभी किसी बात को माना जाए जब कि आप उसे प्रत्यक्ष देख सकें | यदि हम सिर्फ़ उन्हीं बातों पर यकीन करने लगेंगे जिन्हें हम अपनी इन्द्रियों से पहचान सकतें हों तो हमारा अस्तित्व टिक पाना भी मुश्किल है | हमें सही मायने में मनुष्य बनने के लिए अपनी तर्क शक्ति, विचार का विस्तार करने की शक्ति, अर्थ निर्धारण करने की शक्ति, उलट- विश्लेषण और बात की तह तक जाने की शक्ति भी काम में लेनी चाहिए |

मसलन , आप आपकी गाड़ी के रख – रखाव में रोजाना ६ घंटे नहीं बिता सकते  |  इसके बजाए आप उसका पिछला विवरण देखेंगे और उसके  मुताबिक उसकी नियमित देखभाल करेंगे जिससे आप की गाड़ी एकदम ठीक रहे और आपको बीच रास्ते में किसी परेशानी का सामना न करना पड़े | वरना, अतिशय संशयवादी होना आपको संभ्रमित करता है |

तो वैदिक धर्म के अनुसार हमें किसी सफ़ल कंपनी के कुशल प्रबंधक की तरह होना चाहिए जो ना ही किसी झांसे में फंसे और ना ही अवास्तववादी  हो | ऐसा व्यक्ति ऐसी चीज़ों से लाभ लेना चाहेगा जो हमेशा से लाभ देती रहीं हैं या फ़िर अपने विश्लेषण से लाभ देने वाली चीज़ को अपनाएगा लेकिन फ़िर भी कहीं कुछ गलत हुआ है तो वह अपने पहले के मंतव्यों और धारणाओं को परिष्कृत करने में और बेहतर चीज़ को अपनाने में हमेशा तत्पर रहेगा |

यही वैदिक धर्म का सत्य है और इस के विपरीत काम करना असत्यता है |

सार रूप में, वैदिक धर्म अर्थात् ज्ञान या बुद्धि के अनुसार कार्य करना |

वैदिक धर्म के उप सिद्धांत – 

ऊपर बताई गई कसौटियां वैदिक धर्म का शाश्वत नियम है | एक बार यह समझ लिया जाए तो बाकी उप सिद्धांत स्वतः ही आत्मसात होने लग जाते हैं | यह ऐसे ही है जैसे गणित का एक जो शाश्वत सिद्धांत एक बार प्रस्थापित हो गया तो बाकी अपने आप अनुसरण करते हैं | सिद्धान्तः देखा जाए तो कोई भी व्यक्ति स्वयं ही गणित के सभी प्रगत सिद्धांतों का अन्वेषण कर सकता है उन्हें आत्मसात कर सकता है | परंतु यह बहुत ही धीमी प्रक्रिया होगी | इसलिए हम शाला जाकर सीखते हैं ताकि जिस बात के लिए हजार या उससे भी ज्यादा जीवन देने पड़ जाएं उसे हम शीघ्रता से सीख सकें | लेकिन सिर्फ़ सूत्र रट कर ही कोई गणित का विशेषज्ञ नहीं बन जाता, जैसा किसी फ़िल्मी क्विज़ में होता है | गणित में दक्षता हासिल करने के लिये आप ऐसा कर सकते हैं पर यह कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है | एक गणितज्ञ यह जानता है कि  (अ +ब )^2 = अ ^2 + ब ^2 + २अ ब कैसे आया है |

लेकिन यदि आप को पाठ्य पुस्तक के गणितीय सूत्र में किसी भी तरह की कोई गलती नज़र आए तो  उसका खंडन कर सकने की आज़ादी आप के पास है |

ऐसा करने के लिए आप को चाहिए कि जो निष्कर्ष या अंतिम सूत्र आप निकालना चाहते हों – उसके प्रत्येक पायदान पर आप उसे खरे या खोटेपन के लिए जांचते जाएं |  इससे यही होगा कि आप को बुनियादी अंक गणित ही नहीं पर बहुत पेचीदगी वाला गणित भी समझ में आएगा |

और इस तरह किसी निष्कर्ष की सत्यता की कदम दर कदम जांच करते हुए आगे बढ़ना ही वैदिक धर्म का अनुसरण करना है |

इस के अलावा वेद या वैदिक धर्म के बारे में जो सामान्य प्रचलित समझ है वह सिर्फ़ इस का विस्तार है | जरूरी नहीं कि आप उस पर विश्वास करें ही |  इसे आप सापेक्षता के सिद्धांत या गति के नियमों की तरह जानिए, जिस का आप सर्वश्रेष्ट उपयोग ले सकते हैं पर उसे आंखें मूंदकर मानना जरूरी नहीं है |  यदि आप अपनी योग्यता और समझ से उसे असत्य पाएं तो आप उसे नकार सकते हैं, उसका प्रतिवाद कर सकते हैं | ऐसा कर के भी आप वैदिक धर्म का ही अनुसरण कर रहे होंगे |

इन विस्तारों के विभिन्न स्तर है  – कुछ प्रत्यक्ष हैं, जिन्हें हम अपने सहज ज्ञान से जान सकते हैं | कुछ के लिए अधिक विश्लेषण और अंतस के अवलोकन की आवश्यकता होती है | कुछ का अभी अनुसन्धान किया जाना बाकी है | यह सब ऐसे हैं जैसे कक्षा १ से लेकर पी. एच . डी तक के विषय हों |

इन के कुछ उदाहरण –

– सुख़ सत्य से मिलता है | असत्यता दुःख की जड़ है |

– असत्यता से सुख़ पाने की कोशिश से अंततः दुःख ही मिलता है जो अतिरिक्त हरजाने के साथ हमें भुगतना पड़ता है |

– हमें अपनी पूरी सकारात्मकता से दुनिया से ख़ुशी प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए | ख़ुशी बांटने से बढती है |

– कर्म फल का सिद्धांत अपरिवर्तनीय है जो हर क्षण काम कर रहा है | वास्तव में आप जो हो उसका आकार, आपके विचारों से बनता है |

– आत्मा अमर है और कर्म फल के सिद्धांत के अनुसार अपने कर्मों के फल भुगतता रहता है |

– एक सर्वोच्च शक्ति इस जगत की नियंता है जो अपरिवर्तनीय नियमों से जगत का संचालन कर रही है |

– चारों वेदों में सूक्ष्म ज्ञान बीज रूप में है |

– विकास की प्रक्रिया समग्र होनी चाहिए एक तरफ़ा नहीं |

इस तरह यह सब बहुआयामी विषय हैं |

( वैदिक धर्म के स्वाभाविक विस्तार की अधिक जानकारी के लिये देखें http://agniveer.com/1634/religion-vedas/.स्थूल विस्तारों के विस्तृत विश्लेषण के लिए पढ़ें – http://agniveer.com/category/methods/vedas/ और स्वयं को जोश से भरें )

यह सब विस्तार या उप सिद्धांत हैं और आप अपने वर्तमान ज्ञान, अनुभव, समझ, आदतों से उस पर विश्वास न कर सकें तो इसकी कोई सजा आपको नहीं मिलेगी | लेकिन यदि आप सत्य को जानते हुए भी उसे दबाएँ या अपने ज्ञान, अच्छे कर्म और चिंतन में जान बूझकर बढ़ोतरी न करें तो आप सजा के भागी हैं |

आप गलत सिर्फ़ तभी होते हैं जब आप अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को अनसुना करते हुए जानबूझ कर गलत करते हैं | भ्रष्ट नेता, गलत व्यापर करने वाले, बलात्कारी, खूनी इस के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं |  और अधिक अच्छे उदाहरण हम स्वयं ही हैं – जब हम प्रलोभन, लालसा, निराशा या क्रोध के आगे अपने वचन, कर्म या मन में समर्पण कर देते हैं, भले ही कोई जाने या न जाने |

हर दिन हम जीवन के विभिन्न क्षेत्रों या आयामों में वैदिक धर्म का अनुसरण कम या अधिक स्वरुप में करते ही हैं | पर अगर कभी हम अनुसरण पूरी तरह से नहीं कर पाए या बहुत कम कर पाए तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम वैदिक धर्मी नहीं हैं | जब तक हम गिर कर उठाने का प्रयास करेंगे हम वैदिक धर्मी ही रहते हैं | नीचे गिरना या गलतियां करना अपराध नहीं है, हम अपने पिछले कर्म, अपने विचार और आदतों से नीचे गिरते हैं |

पर, यह हम पर है कि हम नीचे गिरते ही रहें या ऊपर उठाने का संकल्प लेकर आगे बढ़ें |

हो सकता है कि आप आज व्यायाम न कर पाएं हों लेकिन आप के पास विकल्प है कि आप या तो करने से ही इंकार कर दें और एक सशक्त शरीर पाने का अवसर खो दें या फ़िर आज आप दण्ड – बैठक  लगायें और स्वयं को एक बलिष्ट व्यक्ति बनाएं !

यह दूसरा विकल्प ही आपको वैदिक धर्म का अनुयायी बनाता है |

This translation in Hindi is contributed by sister Mridula. For original post,  visit What is Vedic Religion

 

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Agniveer aims to establish a culture of enlightened living that aims to maximize bliss for maximum. To achieve this, Agniveer believes in certain principles: 1. Entire humanity is one single family irrespective of religion, region, caste, gender or any other artificial discriminant. 2. All our actions must be conducted with utmost responsibility towards the world. 3. Human beings are not chemical reactions that will extinguish one day. More than wealth, they need respect, dignity and justice. 4. One must constantly strive to strengthen the good and decimate the bad. 5. Principles and values far exceed any other wealth in world 6. Love all, hate none
  • Respected”Agniveer”
    Jai shree Radhe&Vande matram.
    I have interest in Vedic dhrm, ved,and all types of Vedic gayan.Who built us a “Truth Manav”?
    “Radhe radhe”.