युगों से वेदों की अपरिवर्तनशीलता कैसे सुनिश्चित है, यह जानने के लिए ध्यानपूर्वक इस लेख को पढ़ें | हम उन अनेक विद्वानों के आभारी  हैं, जिनके मूल स्त्रोत तो अज्ञात हैं परन्तु जिनके ज्ञान को इस लेख में प्रयुक्त किया गया है|

वेदों को उनकी आरंभिक अवस्था में कैसे संरक्षित किया गया, इस पर यहाँ कुछ विश्लेषणात्मक और निष्पक्ष सुझाव प्रस्तुत किये गए हैं | वेदों को  अपने विशुद्ध स्वरुप में बनाये रखने और उनमें किंचित भी फेर बदल की संभावना न  होने के कारणों को हम यहाँ विस्तार से देखेंगे | विश्व का अन्य कोई भी मूलग्रंथ संरक्षण की इतनी सुरक्षित पद्धति का दावा नहीं कर सकता है | हमारे पूर्वजों (ऋषियों )  ने विभिन्न प्रकार से वेद मन्त्रों को स्मरण करने की विधियाँ अविष्कृत कीं, जिनसे वेदमन्त्रों की स्वर-संगत और उच्चारण का रक्षण भी हुआ |

वेदों  का  स्वर-रक्षण
हमारे पूर्वजों ने नियमों के आधार पर यह सुनिश्चित किया कि मंत्र का गान करते हुए एक भी अक्षर, मात्रा या स्वर में फेरबदल न हो सके और मंत्र के गायन से पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके | उन्होंने शब्द के प्रत्येक अक्षर को उच्चारित करने में लगनेवाले समय को निर्धारित किया और समय की इस इकाई या समय के अंतराल को ’मंत्र’ कहा | वेद मन्त्रों को शुद्धस्वरुप में उच्चारित करने के लिए विधिवत श्वसनक्रिया के द्वारा शरीर के एक खास हिस्से में वांछित स्पंदन निर्माण करने की प्रक्रिया के विज्ञान को जिस वेदांग में बताया गया है, उसे ‘शिक्षा’ कहते हैं | यदि आप वैदिक मंत्र को संहिता में देखें तो आपको अक्षरों के पीछे कुछ चिन्ह मिलेंगे |

उदहारण के लिए निम्न छवि देखें:-

यह चिन्ह ‘स्वर चिन्ह’ कहलाते हैं | जो मन्त्रों की उच्चारण पद्धति को दर्शाते हैं | इन चिन्हों से यह पक्का हो जाता है कि वेद मन्त्रों में अक्षर, मात्रा, बिंदु, विसर्ग का भी बदलाव नहीं हो सकता है | परंपरागत गुरुकुलों में विद्यार्थी वेदमंत्रों के पठन में इन स्वरों के नियत स्थान को हाथ व सिर की विशिष्ट गतिविधि द्वारा स्मरण रखते हैं | अतः आप उन्हें वेदमंत्रों के पठन में हाथ व सिर की विशिष्ट गतिविधियाँ करते हुए देख सकते हैं | और यदि मंत्रपठन में अल्प- सी भी त्रुटी पाई गयी तो वे आसानी से ठीक कर लेते हैं | इसके अलावा अलग-अलग गुरुकुल, पठन की विभिन्न प्रणालियों में अपनी विशेषता रखते हुए भी स्वरों की एक समान पद्धति को निर्धारित करते हैं – जिससे प्रत्येक वैदिक मंत्र की शुद्धता का पता उसके अंतिम अक्षर तक लगाया जा सके |

वेदों का पाठ-रक्षण

वेदमन्त्रों के शब्दों और अक्षरों को फेर बदल से बचाने के लिए एक अनूठी विधि अविष्कृत की गयी | जिसके अनुसार वेदमन्त्रों के शब्दों को साथ में विविध प्रकारों (बानगी) में बांधा गया, जैसे- “वाक्य”, “पद”, “क्रम”, “जटा”, “माला”, “शिखा”, “रेखा”, “ध्वज”, “दंड”, “रथ” और “घन” | ये सभी एक वैदिक मंत्र के शब्दों को विविध क्रम-संचयों में पढ़ने की विधि को प्रस्तुत करते हैं |

कुछ वैदिक विद्वान “घनपठिन्” कहलाते हैं, जिसका मतलब है कि उन्होंने मंत्रगान की उस उच्च श्रेणी का अभ्यास किया है, जिसे “घन” कहते हैं | “पठिन्” का अर्थ है जिसने पाठ सीखा हो | जब हम किसी घनपठिन् से घनपाठ का गान सुनते हैं तो हम देख सकते हैं कि वे मंत्र के कुछ शब्दों को अलग-अलग तरीकों से लयबद्ध, आगे-पीछे गा रहें हैं | यह अत्यंत कर्णप्रिय होता है, मानों कानों में अमृतरस घुल गया हो | वैदिक मंत्र का माधुर्य घनपाठ में और भी बढ़ जाता है | इसी तरह, गान की अन्य विधियाँ जैसे क्रम, जटा, शिखा, माला इत्यादि भी दिव्यता प्रदान करतीं हैं  | इन सभी विधियों का मुख्य उद्देश, जैसे पहले बताया गया है, यह सुनिश्चित करना है कि, वेदमंत्रों में लेशमात्र भी परिवर्तन न हो सके | वेदमंत्र के शब्दों को साथ-साथ इस तरह गूंथा गया है, जिससे उनका प्रयोग बोलने में और आगे-पीछे सस्वर पठन में हो सके | पठनविधि के किसी विशेष प्रकार को अपनाये बिना “वाक्य पाठ” और “संहिता पाठ” में मंत्रों का गान उनके मूल (प्राकृतिक ) क्रम में ही किया जाता है | “वाक्य पाठ” में मंत्रों के कुछ शब्दों को एकसाथ मिलाकर संयुक्त किया जाता है | जिसे “संधि” कहते  हैं | तमिल शब्दों में भी संधि होती है, परन्तु अंग्रेजी में शब्द एकसाथ मिले हुए नहीं होते | तेवरम्, तिरुक्कुरल्, तिरुवच्कं, दिव्यप्रबन्धन और अन्य तमिल कार्यों में संधियों के कई उदहारण हैं | तमिल की अपेक्षा भी संस्कृत में एक अकेला शब्द कम पहचाना जाता है | संहिता पाठ के बाद आता है पदपाठ | पदपाठ में शब्दों का संधि-विच्छेद करके लगातार पढ़ते हैं | इसके पश्चात क्रमपाठ है | क्रमपाठ में मंत्र के शब्दों को पहला-दूसरा, दूसरा-तीसरा, तीसरा-चौथा और इसी तरह अंतिम शब्द तक जोड़े बनाकर (१-२, २-३, ३-४, ..) याद किया जाता है |

दक्षिण के प्राचीन लेखों से पता चलता है कि कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों से सम्बंधित स्थान के उल्लेख में “क्रमवित्तान” उपाधि को नाम से जोड़ा गया है | “क्रमवित्तान” “क्रमविद” का तमिल स्वरुप है | ठीक उसी प्रकार “वेदवित्तान”, “वेदविद” का है | इन धार्मिक लेखों से ज्ञात होता है कि अतीत में ऐसे वैदिक विद्वान, दक्षिण भारत में सर्वत्र मिलते थे | (ध्यान दें कि दक्षिण भारत का वैदिक परम्पराओं के संरक्षण में महान योगदान है | इतिहास के लम्बे संकटमय काल के दौरान, जब उत्तर भारत पश्चिम एशिया के क्रूर आक्रान्ताओं और उनके वंशजों के बर्बर आक्रमणों से अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत था, तब दक्षिण भारत ने वेदमन्त्रों का रक्षण किया | वैदिक गुरुकुलों की यह परंपरा आज भी अनवरत पाई जाती है | )

जटापाठ में पहले शब्द को दूसरे के साथ, दूसरे को तीसरे के साथ और इसी क्रम में आगे-पीछे जाते हुए (१-२, २-३, ३-४, ..), सम्पूर्ण मंत्र को गाया जाता है | शिखापाठ में जटा की अपेक्षा, दो के स्थान पर तीन शब्द सम्मिलित होते हैं और क्रमानुसार (१-२-३, २-३-४, …) आगे-पीछे जाते हुए, सम्पूर्ण मंत्रगान होता है | इन पठन विधियों की अपेक्षा घनपाठ अधिक कठिन है | घनपाठ में चार भेद होते हैं | इसमें मंत्र के शब्दों के मूल क्रम में विशिष्ट प्रकार के फेर बदल से विविध क्रमसंचयों में संयोजित करके आगे-पीछे गाया जाता है | इन सबको विस्तारपूर्वक अंकगणित की सहायता से समझा जा सकता है |

वेदों का नाद सभी अनिष्टों से विश्व की रक्षा करता है |  जिस तरह जीवनरक्षक औषधि को संरक्षित करने के लिए प्रयोगशाला में हर किस्म की सावधानी बरती जाती है | इसी तरह  हमारे पूर्वजों ने भी  गान की विधियों का अविष्कार, श्रुतियों की ध्वनी को हेर-फेर और तोड़-मरोड़ से बचाने के लिए ही किया है | संहिता और पद पाठ, “प्रकृति पाठ”‘ (गान की प्राकृतिक विधि) कहलाते हैं | क्योंकि इसमें शब्दों का पठन एकबार ही उनके प्राकृतिक क्रम (मूल स्वरुप) में किया जाता है | अन्य विधियों का समावेश “विकृति पाठ”‘ (गान की कृत्रिम विधि) के वर्ग में होता है | क्रमपाठ में शब्दों को उनके नियमित प्राकृतिक क्रम (एक-दो-तीन) में ही प्रस्तुत किया जाता है | उसमें शब्दों के क्रम को उलटा करके नही पढ़ा जाता, जैसे पहला शब्द- दूसरे के बाद और दूसरा- तीसरे के बाद (२-१,३-२,—-) इत्यादि | अतः उसका समावेश पूर्णतया विकृति पाठ में नहीं होता है | क्रमपाठ को छोड़कर, विकृति पाठ के आठ प्रकार  हैं, जो सहजता से याद रखने के लिए, इस छंद में कहे गए हैं:-
जटा  माला   शिखा  रेखा  ध्वज  दण्डो  रथो  घनः
इत्यस्तौ -विक्र्तयः  प्रोक्तः   क्रमपुर्व  महर्षिभिः
इन सभी गान विधियों का अभिप्राय वेदों की स्वर-शैली और उच्चारण की शुद्धता को सदा के लिए सुरक्षित करना है | पदपाठ में शब्द मूल क्रम में, क्रमपाठ में दो शब्द एकसाथ और जटापाठ में शब्द आगे-पीछे जाते हुए भी, संख्या में अनुरूप होतें हैं | सभी पाठ विधियों में शब्दों की संख्या को गिनकर आपस में मिलान किया जा सकता है | और यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि शब्दों के मूल स्वरुप में कोई कांट-छांट नहीं हो सकती है  |

विविध गान विधियों के लाभ को यहाँ छंद में दिया गया है :-
संहितापाठमात्रेण यत्फलं प्रोच्यते बुधैः
पदु तु द्विगुणं विद्यत क्रमे तु चा चातुर्गुनं
वर्णक्रमे सतगुनं तयन्तु साहस्रकं

हमारे पूर्वजों ने बहुत सावधानीपूर्वक यह सुनिश्चित किया कि वेदों की ध्वनी में लेशमात्र भी परिवर्तन न हो | इसीलिए (इसको ध्यान में रखते हुए), आधुनिक शोधकर्ताओं द्वारा हमारे धर्मग्रंथों के रचनाकाल को निर्धारित करने के लिए, शब्दों की ध्वनी में कैसे बदलाव होते गए – यह पता लगाने का प्रयास करना निरर्थक ही है |
अधिक क्या कहा जाये, दक्षिण भारत में तो आज भी ऐसी विशिष्ट पाठशालाएं हैं, जहाँ वेद मंत्र विभिन्न साधनों से कंठस्थ करवाए जाते हैं | और यदि अलग-अलग पाठशालाओं में कंठस्थ करवाए गए मन्त्रों को तुलनात्मक रूप से देखें तो उन में एक भी अक्षर या शब्दांश का अंतर नहीं मिलेगा | स्मरण रखिये, हम लाखों शब्दांशों की बात कर रहे हैं !!! और फिर भी कोई अंतर नही | इसीलिए वैदिक दर्शन के तीखे आलोचक मैक्समूलर को भी यह कहना पड़ा कि संरक्षण की ऐसी विश्वसनीय और आसान पद्धति, विश्व के महानतम आश्चर्यों और चमत्कारों में से एक है |

घन पाठ का एक उदाहरण प्रस्तुत है :-
यहाँ इस बात की हल्की सी झलक मिलती है कि कैसे वेदों को उनकी विशाल विषयवस्तु  (ऋग्वेद और यजुर्वेद में क्रमशः १५३,८२६ और १०९,२८७ शब्द हैं ) के बावजूद पीढ़ी दर पीढ़ी केवल मौखिक प्रसारण से सुरक्षित रखा गया है | हम यजुर्वेद से लिए गए एक वचन को स्वरों के बिना दे रहें हैं, मूल संहिता और पदपाठ के स्वरुप में | फिर शब्दों के क्रम को घनपाठ में भी दिया गया है | जिस पंडित ने एक वेद के संपूर्ण घनपाठ का अभ्यास  कर लिया हो (इस मुकाम तक पहुँचने में पूरे तेरह वर्षों का समय लगता है), वह घन-पाठी कहलाते हैं |

घन-पठन की प्रक्रिया का नियम :-
यदि वाक्य में शब्दों का मूल क्रम  यह हो,
१ / २ / ३ / ४ / ५
तो घन पाठ इस तरह होगा :-
१ २ / २ १ / १ २ ३ / ३ २ १ / १ २ ३ /
२ ३ / ३ २ / २ ३ ४ / ४ ३ २ / २ ३ ४ /
३ ४ / ४ ३ / ३ ४ ५ / ५ ४ ३ / ३ ४ ५ /
४ ५ / ५ ४ / ४ ५ /
५ इति ५ |

इसे निम्न उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है :-
संहिता पाठ =
एषां पुरुषाणां -एषां पशूनां म भेर -म रो -मो एषां किन्चान अममत //
अर्थ: हे परमेश्वर ! आप हमारे इन पुरुषों और पशुओं को भयरहित कीजिये | ये कभी भी पीडित ना हों, ना ही इनमें स्वास्थ्य का अभाव हो |
पदपाठ =
एषां /पुरुषाणां /एषां /पशूनां /म /भेः /म /अराः /मो -इति -मो /एषां /
किं /चन /अममत /अममद -इत्य -अममत /

नोट :- यहाँ नौवां और अंतिम विराम बारीकी को धयान में रखते हुए विशेषज्ञों के लिए दिया गया है, जिसे चाहें तो आप अनदेखा कर सकते हैं |
सिवाय आधे विराम के , जिसे ‘ / ‘ से दर्शाया गया है, घन-पठन(स्वर-रहित; स्वरों के साथ सुनना अत्यंत हर्ष प्रदान करेगा.) निरंतर पठन है| यहाँ ‘ समास चिन्ह (-) ‘ व्याकरण के  जानकारों  के लिए दिए  हैं  | पठन पर इसका  प्रभाव नहीं होता है |

घन पाठ =
एषां -पुरुषाणां -पुरुषाणां -एषां -एषां पुरुषाणां -एषां -एषां
पुरुषाणां -एषां -एषां पुरुषाणां -एषां /
पुरुषाणां -एषां -एषां पुरुषाणां पुरुषाणां -एषां पशूनां
पशूनां -एषां पुरुषाणां पुरुषाणां -एषां पशूनां /
एषां पशूनां पशूनां -एषां -एषां पशूनां -म म पशूनां -एषां -एषां पशूनां -म /
पशूनां -म म पशूनां पशूनां -म भेर -भेर -म पशूनां पशूनां -म भेः /
म भेर -भेर -मम भेर -मम भेर -मम भेर -म /
भेर -मम भेर -भेर -मरो आरो म भेर -भेर्म अराः /
म रो आरो मम रो मोमो आरो म म रो मो /
आरो मो मो आरो आरो मो एषां -एषां मो आरो आरो मो एषां /
मो एषां -एषां मो मो एषां किं किं -एषां -मो मो एषां किं / मो इति मो /
एषां किंकिं -एषामेषं किं -चान चान किं -एषां -एषां किं -चान /
किं चान चान किं किं चानममद -अममत चान किं किं चानममत /
चानममद -आममक् -चान चानममत /
अममद -इत्यममत /

यहाँ उल्लेखनीय है कि संस्कृत में शब्दों का क्रम महत्व नहीं  रखता |यदि अंग्रेजी वाक्य को अलग-अलग क्रम से रखा जाय, जैसे –
Rama vanquished ravana
तो इसका पाठ इस तरह  होगा –
Rama vanquished vanquished Rama Rama vanquished Ravana
Ravana vanquished Rama Rama vanquished Ravana,.. और इसी तरह से …

यहाँ इसकी अनर्थकता दिखायी देती है | संस्कृत में ऐसी असंगति उत्पन्न नहीं होती | एक घनपाठ में प्रथम और अंतिम पदों को छोड़कर बाकि के प्रत्येक पद का कम से कम तेरह बार पुनरावर्तन होता है | (आप ऊपरलिखित ‘पशूनां ‘ शब्द से इसकी जाँच कर सकते हैं.)
इसी तरह, वेदों का घन पाठ वेद के प्रत्येक मंत्र का तेरह बार पाठ होने के बराबर है. और तेरह बार पाठ की पुनरावृत्ति से जो लाभ मिलता है,  उसके बराबर है.

सारांशत :

सभी वेदमंत्रों की संभाल बिना किसी कागज़ स्याही के ही की गयी है | (पाश्चात्य गणना के अनुसार, अब तक कम से कम तीन सहस्त्राब्दियाँ बीत चुकी हैं और इस से पुराणी कोई पुस्तक नहीं |) यह भारत की भाषा-विज्ञान में असाधारण महान सिद्धी है | जिसके लिए भारतवर्ष बाकायदा गर्व महसूस कर सकता है | वेद का साहित्य ‘काव्य’ और ‘गद्य’ की विविधतापूर्ण संरचनाओं से युक्त है | जिसे कंठस्थ करके याद रखा गया है | गुरु के द्वारा मौखिक रूप से प्रत्येक शब्द और शब्दों के संयोजन सहित शुद्ध मंत्रोच्चारण (सस्वर) का अभ्यास कराया गया है | गुरु से एक बार सुनकर शिष्य द्वारा उचित स्वरुप में दो बार दोहराय जाने से वे अविरत मंत्र पठन करना सीख जाते हैं | वैदिक अवतरणों के अविरत पठन का नाम संहिता पाठ है | नौ विभिन्न प्रविधियों या सस्वर उच्चारण (पठन) की पद्धतियों के कौशल को उपयोग में लाकर मूल पाठ को अक्षुण्ण (बरक़रार ,सुरक्षित ) रखा गया है | प्रथम है पदपाठ | पद का अर्थ है शब्द, और पाठ का अर्थ है पढ़ना | पदपाठ में प्रत्येक शब्द को केवल अलग-अलग पढ़ते हैं | मंत्र के संहिता पाठ को पदपाठ में परिवर्तित करते समय स्वरों में जो बदलाव होते हैं, वह अत्यंत जटिल (तांत्रिक ,technical) जरूर होते हैं, किन्तु उनका वहाँ विशिष्ट महत्त्व और मतलब है | (यहाँ संस्कृत व्याकरण महत्त्वपूर्ण होगा |) इसके अतिरिक्त सस्वर पठन की आठ अन्य प्रविधियां भी हैं | जिनका एकमात्र प्रयोजन मूल संहिताओं को एक भी अक्षर, मात्रा या स्वर की मिलावट और हटावट से बचाना है | वेदों की सभी पठन विधियों में स्वर का महत्त्वपूर्ण स्थान है | इन आठ पठन विधियों को क्रम, जटा, घन, माला, रथ, शिखा, दंड और रेखा कहा जाता है | प्रत्येक विधि में शब्दों के पठन की प्रक्रिया को मूल क्रम में विशिष्ट तरीके के परिवर्तन से क्रम-संचय करके निश्चित किया गया है | इन सब विस्तृत और प्रबुद्ध पद्धतियों ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि मानवता के प्रथम ग्रंथ- वेद संहिताएं आज भी हमें विशुद्ध मूल स्वरुप में यथावत(वैसे  की  वैसे ) उपलब्ध हैं|

(अनुवाद – सुश्री मृदुला )

This article is also available in English at http://agniveer.com/no-textual-corruption-in-vedas/

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34 COMMENTS

  1. Thank u sr ye gyan me logo tak pahuchaunga aur unko rashta bhatkne se bchaunga jo dharm parivartan krte he jai hind

  2. वेदों का App बयाया जाये तो पढ़ना ओर उसका प्रचार करना आसान रहेगा.!

  3. आपको धन्यवाद इस प्रकार के लेख को प्रकाशित व प्रचारित करने के लिए

  4. वेदों की रक्षा
    (युगों से वेदों की अपरिवर्तनशीलता कैसे सुनिश्चित है, यह जानने के लिएध्यानपूर्वक इस लेख को पढ़ें | हम उन अनेक विद्वानों के आभारी हैं, जिनके मूलस्त्रोत तो अज्ञात हैं परन्तु जिनके ज्ञान को इस लेख में प्रयुक्त किया गया है|)

    वेदों को उनकी आरंभिक अवस्था में कैसे संरक्षित किया गया, इस पर यहाँ कुछ विश्लेषणात्मक और निष्पक्ष सुझाव प्रस्तुत किये गए हैं | वेदों को अपने विशुद्ध स्वरुप में बनाये रखने और उनमें किंचित भी फेर बदल की संभावना न होने के कारणों को हम यहाँ विस्तार से देखेंगे | विश्व का अन्य कोई भी मूलग्रंथ संरक्षण कीइतनी सुरक्षित पद्धति का दावा नहीं कर सकता है | हमारे पूर्वजों (ऋषियों ) ने विभिन्न प्रकार से वेद मन्त्रों को स्मरण करने की विधियाँ अविष्कृत कीं, जिनसे वेदमन्त्रों की स्वर-संगत और उच्चारण का रक्षण भी हुआ |

    वेदों का स्वर-रक्षण

    हमारे पूर्वजों ने नियमों के आधार पर यह सुनिश्चित किया कि मंत्र का गान करते हुए एक भी अक्षर, मात्रा या स्वर में फेरबदल न हो सके और मंत्र के गायन से पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके | उन्होंने शब्द के प्रत्येक अक्षर को उच्चारित करने में लगनेवाले समय को निर्धारित किया और समय की इस इकाई या समय के अंतराल को ’मंत्र’ कहा | वेद मन्त्रों को शुद्धस्वरुप में उच्चारित करने के लिए विधिवत श्वसनक्रिया के द्वारा शरीर के एक खास हिस्से में वांछित स्पंदन निर्माण करने की प्रक्रिया के विज्ञान को जिस वेदांग में बताया गया है, उसे ‘शिक्षा’ कहते हैं | यदि आप वैदिक मंत्र को संहिता में देखें तो आपको अक्षरों के पीछे कुछ चिन्ह मिलेंगे |

    उदहारण के लिए निम्न छवि देखें:-

    यह चिन्ह ‘स्वर चिन्ह’ कहलाते हैं | जो मन्त्रों की उच्चारण पद्धति को दर्शाते हैं | इन चिन्हों से यह पक्का हो जाता है कि वेद मन्त्रों में अक्षर, मात्रा, बिंदु, विसर्ग का भी बदलाव नहीं हो सकता है | परंपरागत गुरुकुलों में विद्यार्थी वेदमंत्रों के पठन में इन स्वरों के नियत स्थान को हाथ व सिर की विशिष्ट गतिविधि द्वारा स्मरण रखते हैं | अतः आप उन्हें वेदमंत्रों के पठन में हाथ व सिर की विशिष्ट गतिविधियाँ करते हुए देख सकते हैं | और यदि मंत्रपठन में अल्प- सी भी त्रुटी पाई गयी तो वे आसानी से ठीक कर लेते हैं | इसके अलावा अलग-अलग गुरुकुल, पठन की विभिन्न प्रणालियों में अपनी विशेषता रखते हुए भी स्वरों की एक समान पद्धति को निर्धारित करते हैं – जिससे प्रत्येक वैदिक मंत्र की शुद्धता का पता उसके अंतिम अक्षर तक लगाया जा सके |

    वेदों का पाठ-रक्षण

    वेदमन्त्रों के शब्दों और अक्षरों को फेर बदल से बचाने के लिए एक अनूठी विधि अविष्कृत की गयी | जिसके अनुसार वेदमन्त्रों के शब्दों को साथ में विविध प्रकारों (बानगी) में बांधा गया, जैसे- “वाक्य”, “पद”, “क्रम”, “जटा”, “माला”, “शिखा”, “रेखा”, “ध्वज”, “दंड”, “रथ” और “घन” | ये सभी एक वैदिक मंत्र के शब्दों को विविध क्रम-संचयों में पढ़ने की विधि को प्रस्तुत करते हैं |

    कुछ वैदिक विद्वान “घनपठिन्” कहलाते हैं, जिसका मतलब है कि उन्होंने मंत्रगान की उस उच्च श्रेणी का अभ्यास किया है, जिसे “घन” कहते हैं | “पठिन्” का अर्थ है जिसने पाठ सीखा हो | जब हम किसी घनपठिन् से घनपाठ का गान सुनते हैं तो हम देख सकते हैं कि वे मंत्र के कुछ शब्दों को अलग-अलग तरीकों से लयबद्ध, आगे-पीछे गा रहें हैं | यह अत्यंत कर्णप्रिय होता है, मानों कानों में अमृतरस घुल गया हो | वैदिक मंत्र का माधुर्य घनपाठ में और भी बढ़ जाता है | इसी तरह, गान की अन्य विधियाँ जैसे क्रम, जटा, शिखा, माला इत्यादि भी दिव्यता प्रदान करतीं हैं | इन सभी विधियों का मुख्य उद्देश, जैसे पहले बताया गया है, यह सुनिश्चित करना है कि, वेदमंत्रों में लेशमात्र भी परिवर्तन न हो सके | वेदमंत्र के शब्दों को साथ-साथ इस तरह गूंथा गया है, जिससे उनका प्रयोग बोलने में और आगे-पीछे सस्वर पठन में हो सके | पठनविधि के किसी विशेष प्रकार को अपनाये बिना “वाक्य पाठ” और “संहिता पाठ” में मंत्रों का गान उनके मूल (प्राकृतिक ) क्रम में ही किया जाता है | “वाक्य पाठ” में मंत्रों के कुछ शब्दों को एकसाथ मिलाकर संयुक्त किया जाता है | जिसे “संधि” कहते हैं | तमिल शब्दों में भी संधि होती है, परन्तु अंग्रेजी में शब्द एकसाथ मिले हुए नहीं होते | तेवरम्, तिरुक्कुरल्, तिरुवच्कं, दिव्यप्रबन्धन और अन्य तमिल कार्यों में संधियों के कई उदहारण हैं | तमिल की अपेक्षा भी संस्कृत में एक अकेला शब्द कम पहचाना जाता है | संहिता पाठ के बाद आता है पदपाठ | पदपाठ में शब्दों का संधि-विच्छेद करके लगातार पढ़ते हैं | इसके पश्चात क्रमपाठ है | क्रमपाठ में मंत्र के शब्दों को पहला-दूसरा, दूसरा-तीसरा, तीसरा-चौथा और इसी तरह अंतिम शब्द तक जोड़े बनाकर (१-२, २-३, ३-४, ..) याद किया जाता है |

    दक्षिण के प्राचीन लेखों से पता चलता है कि कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों से सम्बंधित स्थान के उल्लेख में “क्रमवित्तान” उपाधि को नाम से जोड़ा गया है | “क्रमवित्तान” “क्रमविद” का तमिल स्वरुप है | ठीक उसी प्रकार “वेदवित्तान”, “वेदविद” का है | इन धार्मिक लेखों से ज्ञात होता है कि अतीत में ऐसे वैदिक विद्वान, दक्षिण भारत में सर्वत्र मिलते थे | (ध्यान दें कि दक्षिण भारत का वैदिक परम्पराओं के संरक्षण में महान योगदान है | इतिहास के लम्बे संकटमय काल के दौरान, जब उत्तर भारत पश्चिम एशिया के क्रूर आक्रान्ताओं और उनके वंशजों के बर्बर आक्रमणों से अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत था, तब दक्षिण भारत ने वेदमन्त्रों का रक्षण किया | वैदिक गुरुकुलों की यह परंपरा आज भी अनवरत पाई जाती है | )

    जटापाठ में पहले शब्द को दूसरे के साथ, दूसरे को तीसरे के साथ और इसी क्रम में आगे-पीछे जाते हुए (१-२, २-३, ३-४, ..), सम्पूर्ण मंत्र को गाया जाता है | शिखापाठ में जटा की अपेक्षा, दो के स्थान पर तीन शब्द सम्मिलित होते हैं और क्रमानुसार (१-२-३, २-३-४, …) आगे-पीछे जाते हुए, सम्पूर्ण मंत्रगान होता है | इन पठन विधियों की अपेक्षा घनपाठ अधिक कठिन है | घनपाठ में चार भेद होते हैं | इसमें मंत्र के शब्दों के मूल क्रम में विशिष्ट प्रकार के फेर बदल से विविध क्रमसंचयों में संयोजित करके आगे-पीछे गाया जाता है | इन सबको विस्तारपूर्वक अंकगणित की सहायता से समझा जा सकता है |

    वेदों का नाद सभी अनिष्टों से विश्व की रक्षा करता है | जिस तरह जीवनरक्षक औषधि को संरक्षित करने के लिए प्रयोगशाला में हर किस्म की सावधानी बरती जाती है | इसी तरह हमारे पूर्वजों ने भी गान की विधियों का अविष्कार, श्रुतियों की ध्वनी को हेर-फेर और तोड़-मरोड़ से बचाने के लिए ही किया है | संहिता और पद पाठ, “प्रकृति पाठ”‘ (गान की प्राकृतिक विधि) कहलाते हैं | क्योंकि इसमें शब्दों का पठन एकबार ही उनके प्राकृतिक क्रम (मूल स्वरुप) में किया जाता है | अन्य विधियों का समावेश “विकृति पाठ”‘ (गान की कृत्रिम विधि) के वर्ग में होता है | क्रमपाठ में शब्दों को उनके नियमित प्राकृतिक क्रम (एक-दो-तीन) में ही प्रस्तुत किया जाता है | उसमें शब्दों के क्रम को उलटा करके नही पढ़ा जाता, जैसे पहला शब्द- दूसरे के बाद और दूसरा- तीसरे के बाद (२-१,३-२,—-) इत्यादि | अतः उसका समावेश पूर्णतया विकृति पाठ में नहीं होता है | क्रमपाठ को छोड़कर, विकृति पाठ के आठ प्रकार हैं, जो सहजता से याद रखने के लिए, इस छंद में कहे गए हैं:-

    जटा माला शिखा रेखा ध्वज दण्डो रथो घनः

    इत्यस्तौ -विक्र्तयः प्रोक्तः क्रमपुर्व महर्षिभिः

    इन सभी गान विधियों का अभिप्राय वेदों की स्वर-शैली और उच्चारण की शुद्धता को सदा के लिए सुरक्षित करना है | पदपाठ में शब्द मूल क्रम में, क्रमपाठ में दो शब्द एकसाथ और जटापाठ में शब्द आगे-पीछे जाते हुए भी, संख्या में अनुरूप होतें हैं | सभी पाठ विधियों में शब्दों की संख्या को गिनकर आपस में मिलान किया जा सकता है | और यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि शब्दों के मूल स्वरुप में कोई कांट-छांट नहीं हो सकती है |

    विविध गान विधियों के लाभ को यहाँ छंद में दिया गया है :-

    संहितापाठमात्रेण यत्फलं प्रोच्यते बुधैः

    पदु तु द्विगुणं विद्यत क्रमे तु चा चातुर्गुनं

    वर्णक्रमे सतगुनं तयन्तु साहस्रकं

    हमारे पूर्वजों ने बहुत सावधानीपूर्वक यह सुनिश्चित किया कि वेदों की ध्वनी में लेशमात्र भी परिवर्तन न हो | इसीलिए (इसको ध्यान में रखते हुए), आधुनिक शोधकर्ताओं द्वारा हमारे धर्मग्रंथों के रचनाकाल को निर्धारित करने के लिए, शब्दों की ध्वनी में कैसे बदलाव होते गए – यह पता लगाने का प्रयास करना निरर्थक ही है |

    अधिक क्या कहा जाये, दक्षिण भारत में तो आज भी ऐसी विशिष्ट पाठशालाएं हैं, जहाँ वेद मंत्र विभिन्न साधनों से कंठस्थ करवाए जाते हैं | और यदि अलग-अलग पाठशालाओं में कंठस्थ करवाए गए मन्त्रों को तुलनात्मक रूप से देखें तो उन में एक भी अक्षर या शब्दांश का अंतर नहीं मिलेगा | स्मरण रखिये, हम लाखों शब्दांशों की बात कर रहे हैं !!! और फिर भी कोई अंतर नही | इसीलिए वैदिक दर्शन के तीखे आलोचक मैक्समूलर को भी यह कहना पड़ा कि संरक्षण की ऐसी विश्वसनीय और आसान पद्धति, विश्व के महानतम आश्चर्यों और चमत्कारों में से एक है |

    घन पाठ का एक उदाहरण प्रस्तुत है :-

    यहाँ इस बात की हल्की सी झलक मिलती है कि कैसे वेदों को उनकी विशाल विषयवस्तु (ऋग्वेद और यजुर्वेद में क्रमशः १५३,८२६ और १०९,२८७ शब्द हैं ) के बावजूद पीढ़ी दर पीढ़ी केवल मौखिक प्रसारण से सुरक्षित रखा गया है | हम यजुर्वेद से लिए गए एक वचन को स्वरों के बिना दे रहें हैं, मूल संहिता और पदपाठ के स्वरुप में | फिर शब्दों के क्रम को घनपाठ में भी दिया गया है | जिस पंडित ने एक वेद के संपूर्ण घनपाठ का अभ्यास कर लिया हो (इस मुकाम तक पहुँचने में पूरे तेरह वर्षों का समय लगता है), वह घन-पाठी कहलाते हैं |

    घन-पठन की प्रक्रिया का नियम :-

    यदि वाक्य में शब्दों का मूल क्रम यह हो,

    १ / २ / ३ / ४ / ५

    तो घन पाठ इस तरह होगा :-

    १ २ / २ १ / १ २ ३ / ३ २ १ / १ २ ३ /

    २ ३ / ३ २ / २ ३ ४ / ४ ३ २ / २ ३ ४ /

    ३ ४ / ४ ३ / ३ ४ ५ / ५ ४ ३ / ३ ४ ५ /

    ४ ५ / ५ ४ / ४ ५ /

    ५ इति ५ |

    इसे निम्न उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है :-

    संहिता पाठ =

    एषां पुरुषाणां -एषां पशूनां म भेर -म रो -मो एषां किन्चान अममत //

    अर्थ: हे परमेश्वर ! आप हमारे इन पुरुषों और पशुओं को भयरहित कीजिये | ये कभी भी पीडित ना हों, ना ही इनमें स्वास्थ्य का अभाव हो |

    पदपाठ =

    एषां /पुरुषाणां /एषां /पशूनां /म /भेः /म /अराः /मो -इति -मो /एषां /

    किं /चन /अममत /अममद -इत्य -अममत /

    नोट :- यहाँ नौवां और अंतिम विराम बारीकी को धयान में रखते हुए विशेषज्ञों के लिए दिया गया है, जिसे चाहें तो आप अनदेखा कर सकते हैं |

    सिवाय आधे विराम के , जिसे ‘ / ‘ से दर्शाया गया है, घन-पठन(स्वर-रहित; स्वरों के साथ सुनना अत्यंत हर्ष प्रदान करेगा.) निरंतर पठन है| यहाँ ‘ समास चिन्ह (-) ‘ व्याकरण के जानकारों के लिए दिए हैं | पठन पर इसका प्रभाव नहीं होता है |

    घन पाठ =

    एषां -पुरुषाणां -पुरुषाणां -एषां -एषां पुरुषाणां -एषां -एषां

    पुरुषाणां -एषां -एषां पुरुषाणां -एषां /

    पुरुषाणां -एषां -एषां पुरुषाणां पुरुषाणां -एषां पशूनां

    पशूनां -एषां पुरुषाणां पुरुषाणां -एषां पशूनां /

    एषां पशूनां पशूनां -एषां -एषां पशूनां -म म पशूनां -एषां -एषां पशूनां -म /

    पशूनां -म म पशूनां पशूनां -म भेर -भेर -म पशूनां पशूनां -म भेः /

    म भेर -भेर -मम भेर -मम भेर -मम भेर -म /

    भेर -मम भेर -भेर -मरो आरो म भेर -भेर्म अराः /

    म रो आरो मम रो मोमो आरो म म रो मो /

    आरो मो मो आरो आरो मो एषां -एषां मो आरो आरो मो एषां /

    मो एषां -एषां मो मो एषां किं किं -एषां -मो मो एषां किं / मो इति मो /

    एषां किंकिं -एषामेषं किं -चान चान किं -एषां -एषां किं -चान /

    किं चान चान किं किं चानममद -अममत चान किं किं चानममत /

    चानममद -आममक् -चान चानममत /

    अममद -इत्यममत /

    यहाँ उल्लेखनीय है कि संस्कृत में शब्दों का क्रम महत्व नहीं रखता |यदि अंग्रेजी वाक्य को अलग-अलग क्रम से रखा जाय, जैसे –

    Rama vanquished ravana

    तो इसका पाठ इस तरह होगा –

    Rama vanquished vanquished Rama Rama vanquished Ravana

    Ravana vanquished Rama Rama vanquished Ravana,.. और इसी तरह से …

    यहाँ इसकी अनर्थकता दिखायी देती है | संस्कृत में ऐसी असंगति उत्पन्न नहीं होती | एक घनपाठ में प्रथम और अंतिम पदों को छोड़कर बाकि के प्रत्येक पद का कम से कम तेरह बार पुनरावर्तन होता है | (आप ऊपरलिखित ‘पशूनां ‘ शब्द से इसकी जाँच कर सकते हैं.)

    इसी तरह, वेदों का घन पाठ वेद के प्रत्येक मंत्र का तेरह बार पाठ होने के बराबर है. और तेरह बार पाठ की पुनरावृत्ति से जो लाभ मिलता है, उसके बराबर है.

    सारांशत :

    सभी वेदमंत्रों की संभाल बिना किसी कागज़ स्याही के ही की गयी है | (पाश्चात्य गणना के अनुसार, अब तक कम से कम तीन सहस्त्राब्दियाँ बीत चुकी हैं और इस से पुराणी कोई पुस्तक नहीं |) यह भारत की भाषा-विज्ञान में असाधारण महान सिद्धी है | जिसके लिए भारतवर्ष बाकायदा गर्व महसूस कर सकता है | वेद का साहित्य ‘काव्य’ और ‘गद्य’ की विविधतापूर्ण संरचनाओं से युक्त है | जिसे कंठस्थ करके याद रखा गया है | गुरु के द्वारा मौखिक रूप से प्रत्येक शब्द और शब्दों के संयोजन सहित शुद्ध मंत्रोच्चारण (सस्वर) का अभ्यास कराया गया है | गुरु से एक बार सुनकर शिष्य द्वारा उचित स्वरुप में दो बार दोहराय जाने से वे अविरत मंत्र पठन करना सीख जाते हैं | वैदिक अवतरणों के अविरत पठन का नाम संहिता पाठ है | नौ विभिन्न प्रविधियों या सस्वर उच्चारण (पठन) की पद्धतियों के कौशल को उपयोग में लाकर मूल पाठ को अक्षुण्ण (बरक़रार ,सुरक्षित ) रखा गया है | प्रथम है पदपाठ | पद का अर्थ है शब्द, और पाठ का अर्थ है पढ़ना | पदपाठ में प्रत्येक शब्द को केवल अलग-अलग पढ़ते हैं | मंत्र के संहिता पाठ को पदपाठ में परिवर्तित करते समय स्वरों में जो बदलाव होते हैं, वह अत्यंत जटिल (तांत्रिक ,technical) जरूर होते हैं, किन्तु उनका वहाँ विशिष्ट महत्त्व और मतलब है | (यहाँ संस्कृत व्याकरण महत्त्वपूर्ण होगा |) इसके अतिरिक्त सस्वर पठन की आठ अन्य प्रविधियां भी हैं | जिनका एकमात्र प्रयोजन मूल संहिताओं को एक भी अक्षर, मात्रा या स्वर की मिलावट और हटावट से बचाना है | वेदों की सभी पठन विधियों में स्वर का महत्त्वपूर्ण स्थान है | इन आठ पठन विधियों को क्रम, जटा, घन, माला, रथ, शिखा, दंड और रेखा कहा जाता है | प्रत्येक विधि में शब्दों के पठन की प्रक्रिया को मूल क्रम में विशिष्ट तरीके के परिवर्तन से क्रम-संचय करके निश्चित किया गया है | इन सब विस्तृत और प्रबुद्ध पद्धतियों ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि मानवता के प्रथम ग्रंथ- वेद संहिताएं आज भी हमें विशुद्ध मूल स्वरुप में यथावत(वैसे की वैसे ) उपलब्ध हैं|

  5. great article i dont know why some of these fantc muslims are trying to attack agniveer when they cant refute bigger sites like faithfreedom,answering islam,answering muslims,islamexposed,theintolerantreligion,thereligionofpeace,wikislam,islamwatch,jihadwatch who dedicate themselves to proving islam wrong what wrong did agniveer do trying to expose famous people like zakir naik and peace tv who are trying to convert non muslims to islam by falsehood and deciet in a dominately hindu country? would agniveer be able to do lectures about hinduism and other religions in muslim countries?

  6. आपको धन्यवाद इस प्रकार के लेख को प्रकाशित व प्रचारित करने के लिए

  7. @ Faizan: Game over…
    ——————————————–
    Mushafiq,

    Hmmm, it is getting interesting. So, you have come up with a modified premise,based on my response. No problem,Sir.

    Let me first address what Nirukta 7:8 says and MAY BE you misunderstood it. I am quoting Nirukta 7:8 VERBATIM.

    ” There is a joint oblation offered to BUT NO JOINT “PANEGYRIC” ADDRESSED TO Agni and Vishnu in the ten books of Rig Veda. Moreover there is a joint oblation offered to BUT NO JOINT “PANEGYRIC” ADDRESSED TO Agni and Pusan in the ten books of Rig Veda.” PANEGYRIC means eulogy.

    The example that is then quoted in Nirukta 7:9 is this: May Pusan, the wise, the guardian of the universe, whose cattle are never lost,cause thee to move forthwith this world. May he hand over thee to these manes and may Agni entrust thee to the beneveloent Gods.

    And the above verse is similar to what I quoted from Rig Veda 2/1/3,where you find Agni and Vishnu in one verse together but not in conjoint manner.

    So Mushafiq, what this means in simple English is that Nirukta 7:8 is making a FACTUAL statement. Nowehere in the Vedas,are Agni/Vishnu and Agni/Pusan called conjointly, though they may be seen in the same verse.

    The inference is that you did not read Nirukta 7:8 properly or in your rush you misunderstood what it meant,in the first place. I am not sure if you did really look up all the verses in the Rig Veda (a tall order)LOOKING for SOMETHING that, Nirukta 7:8, clearly states DOES NOT EXIST in the Rig Veda.

    Again, your premise has no legs to stand. And let me repeat this for what may the 5th time in our conversations. Please re-read all our conversations pertaining to the Origin of Vedas (post). Prajapati,Skambha and the Great Being are one and the same. It is a poetic way of saying that the Vedas were breathed out or shaved off or carved out from an entity.

    Like I said, if you do not try to understand this premise of the oneness of the above three entities, all your posts on vedic hymns are gonna be out of place.

    And on the Shakas….presence or absence or missing of Shakas mean nothing to the Vedas.Why??The Shaakhas of the Vedas are explantions and / or editions of the original Samhitas (Vedas). They ARE NOT the original Vedas. They may be even mixed up with the Brahmanas.Like the Brahamanas or Upanishads, the shakas are creations of later day sages. Would you worry about the Quran or missing parts of Ibn Kathir’s tafsir?? You know the answer, right?

    And Mushafiq, the initiative you have taken up is different from a high school student writing an exam and despite fairing poorly in an exam, he still gets his mandatory pass percentage. If you are researching and presenting certain things as facts (backed up by evidences), the evidences ought to hold. If the evidence is nullified (like what happened with Nirukta 7:8), your entire post is nullified too. We cannot go down the road of,oh this is wrong but may be this is correct and so on…So why do you even expect to read other passages of your posts when you did not even understand what Nirukta 7:8 meant??

    Time & again, I have been exposing your lack of understanding of the basic premise of the Vedas and the absolute lack of rigor in your research of the Vedas. Good Luck.

    Good Luck.

    • Brother Mushafiq has responded to your comment. It is game over for you i think.

      In Nirukt 7:9 the verse that quoted is NOT an example of joint oblation, for your kind information. Towards the end of 7:8, Yaska clearly says that

      “With regard to this, the following stanza is cited (in order to show their)separate praise.”

      The verse 2:1:3 you provided is an example of ‘separate praise’, not joint oblation. What then is a joint oblation?? An oblation is an offering (Late Latin oblatio, from offerre, oblatum, to offer), a term, particularly in ecclesiastical usage, for a solemn offering or presentation to God. You seriously need to think. Where is a offering jointly made to Agni and Vishnu? Why do you not care to explain to the readers on this website the difference between a joint oblation and a joint panegyric, giving examples of both? Do you think that truth can hide behind your eloquent words?

      Please re-read this passage.

      Prajapati is a created being and hence cannot be a cosmic support. Lord Brahma from the Purans is called Prajapati in Vedic literature. If Prajapati is God, then why no temple in India is dedicated to Prajapati? Or is it because he is not good enough to be God, because of some silly mistake of his? My article on the rigin of Vedas has not been refuted even a bit, by the grace of God.

      I am surprised at your bogus claim that Shaakha is an explanation. I already discussed that in the article itself. It seems you did not read properly. You are playing with words here. How can you write explanations/editions? It shows the confusion within you regarding the true nature of the Vedas. Let me repeat what I said in the article.

      “If someone will say that the Shakhas are not Vedas but only the explanations/commentaries that would be erroneous. The presently known Vedas are also Shakhas. So are these commentaries or actual Vedas? To say that Shakhas are not the Vedas will be to undermine the present Vedas (read Shakhas) also. Considering the two opposing Shakhas of Yajurveda we may ask, “Is Madhyandina Shakha (Shukla Yajurveda) the original or Taittirīya Shakha (Krishna Yajurveda)?”.”

      Care to educate the readers, which of the two Yajurvedas is the real and which one is the explanation/edition? Which of the two Rigvedas, Shaakal or Bashkal is the actual Rigveda and which is the explanation? Samaveda has mantras from both Shaakal and Bashkal. So do you mean, Samaveda has been interpolated by explanations? The interesting things regarding your strange claim is that the present Vedas are themselves Shaakhas. Therefore, according to you, they are explanations/editions (like Ibn Kathir). Where is the actual Veda, whose explanations/editions they are? Lost forever??

      Then you said, “Shakhas are creations of the later day sages”. Ok. So Shaakhal Shaaka i.e. the present Rigveda is a later day creation. Case closed.

      Our facts are backed up by evidences. You are cherry picking few points from the article and imagine that you have refuted it. If you want to shut your eyes to the truth light beaming on your face, you make yourself intellectually dishonest. Quddus is intelligent enough to understand that you refuted nothing and are confirming my viewpoint with every new comment of yours.

      Peace.

      • @ Faizan, he he…pls don’t try to claim a fake victory and run away. Please see my responses on that page.

      • Thanks IA. You are one awsome guy. I read your work on ZN and science more than twice and enjoyed. I am a student of the Vedic scriptures that too inspiration from Agniveer. By the way, the one running the site (where I am eagaged in a debate) shot himslef on the foot and called islam a cult by quoting from a European author. I couldnot help but rub more salt on the wound.

      • Apollo Reach Sir,

        नमस्कार आर्य ! आप निस्सन्देह ऐसे मूर्खो को सत्य का पाठ पढा सकते है। परंतु मुझे नही लगता कि सुल्तान समान प्राणी अपनी भूलो द्वारा सीखने वाले है। उन्हे वेदो का अपमान तथा अधर्मपुस्तक क़ुरान का सम्मान करना अपना धर्म लगता है। आपने यह शायद नही देखा कि वह क़ुरान में निहित हिंसा को धर्मसंमत बताने का इच्छुक है।

        अभी उसने एक नया कार्य शुरु किया है कि क़ुरान की महानता बढा ली जाए। उसने क़ुरान में लिखित अधर्म को भी धर्म ही बताया है। अब आप ऐसे मूर्खो को समझाए।

        People like Faizan, this is for you
        http://www.answering-islam.org/Hoaxes/salamislam.html

      • @Faisan

        Namaste Faisan,

        the mentor whom you are talking about, it was game over for him long time back when he failed to refute the points mentioned in all the articles of this site.

  8. @ Faizan, I told you. I have already punched a gaping hole on the article you pointed. Your friend,based on Nirukt 7:8 made a claim that unlike what is mentioned in Nirukt, there is no verse in the entire Rig Veda that praised Agni & Vishu jointly. Here is what I posted on your friend’s website.

    Mushafiq,

    There you go again.

    You make a grand claim that in the entire Rig Veda, there is not ONE instance where Agni and Vishnu are offered a joint obalation. I donot care what Nirukt says. But here is the verse in Sanskrit and in English….

    Rig Veda 2/1/3: Hymns to Agni

    तवमग्न इन्द्रो वर्षभः सतामसि तवं विष्णुरुरुगायो नमस्यः |
    तवं बरह्मा रयिविद बरह्मणस पते तवं विधर्तःसचसे पुरन्ध्या ||

    Hero of Heroes, Agni! Thou art Indra, thou art Visnu of the Mighty Stride, adorable:
    Thou, Brahmaṇaspati, the Brahman finding wealth: thou, O Sustainer, with thy wisdom tendest us.

    So Mushafiq, your claim stands exposed. Please do your own research instead of depending on Nirukt,Panini etc to trash the Vedas. It is not to worth to read the rest of your post. This sampling alone is good enough to understand the rigor in your research. Good Luck.

    • Brother Mushafiq has responded to your comment.

      @Apolloreach

      Brother, thanks for commenting. I think you misunderstood this point. May be my choice of words was not that good. That is why I decided to correct this point and explain it in details lest someone else misunderstands like you. What is meant by joint oblation here? Several times two deities are conjointly addressed as a dual deity. For example, in Rigveda 1:17 Indra-Varuna (इन्द्रावरुण) are conjointly addressed; in Rigveda 1:21 Indra-Agni (इन्द्राग्नी) are conjointly addressed; in Rigveda 1:152 Mitra-Varuna (मित्रावरुणा) are conjointly addressed; in Rigveda 1:135 Indra-Vayu (इन्द्रवायू)are jointly addressed. Similarly, as per Nirukt 7:8 there is a conjoint address to Agni and Vishu like this . This is a clear evidence that the Rigveda at the time of Yaska Muni had the joint oblation of Agni and Vishu, but it is not found in today’s Rigveda, demonstrating corruption of the text.

      Hope it is clarified.

      In other words, the Devata of the hymn must be Agni-Vishnu.

      Besides, the reference you have provided, the Devata of that hymn is Agni and not Vishnu.

      I am surprised at your irresponsible statement that you do not care about Nirukt, Panini, etc. When Muslims comment on agniveer, he is so quick to jump to Panini’s dhatupath, ashtadhyayi, etc to give his own new meanings of the mantras. Your entire Vedas will be meaningless without these books on etymology, philology and semantics.

      By the way, you attempted to respond to one point of my article. What about the other points?

      • @Vajra

        That website is a response website started only 3 months back. Slowly he will refute all your articles. But why are you helpless to refute his exposing of Vedas?

        can you answer this question which he asks in his article?

        Comparing the Yajurveda of Gayatri Parivar and Arya Samaj, there are many mantras missing in one or another of the versions. For example, the 25th Chapter of Gayatri Parivar Yajurveda has 47 mantras. Even the Yajurveda of Ralph Griffith has 47 mantras. But, the Arya Samaj version has and additional Mantra 48.

        Why does Arya Samaj have the extra mantra? why is it missing from other versions?

        Shaakal Rishi is called as the collector of Rigveda. He had a number of students, who later expressed many differences and compiled their own versions of Rigveda. numbering upto 21. There are major differences between the Shaakal and Baskal samhitas of Rigveda. The Śākala recension has 1,017 regular hymns, while the Bāṣkala samhita has a total of 1025 hymns. Thus, around some 50 mantras are missing in Śākala samhita. There are differences even over the total number of mantras.

        * According to Anuvakanukramani Rigveda has 10,580 mantras
        * According to Gayatri Parivar Rigveda has 10,552 mantras
        * According to Sayanacharya it has 10,000 mantras
        * According to Swami Dayanand Saraswati it has 10,589 mantras

        As per these figures, some 500 mantras are doubtful or interpolated. However, the story does not end here. Pandit Ram Govind Trivedi, mentions another surprising fact in the preface to his Hindi translation of the Rigveda. He says,

        “According to one Mantra of Rigveda (Page 1403, Mantra 8), we come to know that it has 15,000 Mantras. However, when we count the total Mantras, we get 10,469 Mantras. It is possible that like a large portion of the books of Vedic literature and Vedas were destroyed by the anti-religious, similarly, Mantras too suffered destruction for many reasons.”

        The Mantra he is talking about is Rigveda 10:114:8.

        The 1127 versions of Vedas have been lost. There are so many mistakes and interpolations in the Vedas.

        Read his full article.

    • @faizan
      तुमने जो लिंक दी है , उसमे जो लेख है उसके निचे कमेंट बॉक्स कहाँ है ? यदि कोई उसे पढ़ कर कोई प्रतिक्रिया देना चाहे तो?
      यही तुम्हारी दुष्टता है अपनी बात थोप दो (कोई शक की गुंजाईश नही है इस लेख में).
      मुहम्मद ने भी ऐसा ही किया था
      ज़ालिकल किताबु ला राइ बफिः–अर्थ – कोई शक कि गुन्जाईश नहीं इस किताब में.
      ذا لك الكتاب لا ريب فيه
      ये कह कर उसने भी कमेंट बॉक्स हटा दिया अर्थात यदि कुरान में कोई गड़बड़ हो तोभी कोई प्रतिक्रिया न दे सके..

      वाह!!

      • Quraan me kuch bhi galat nhi h. Ye baat kewal uss per imaan lanewale ke liye h . baki log to sawal utha sakate h or uthate bhi h. Unhe jabab bhi milta h.tum he bhi milega ager aap answer ki nazar se janana chahoge . ek swal ka jawab de ki hindu india se bahar q nhi gya.

      • duniya ke bahut se desho me hindu hai .
        quran to mul ki bhul hai
        qurani alaah ko mananne uske kalpitasankhy farishto aur kalpit124000 nabi rasool ko bhi mana anivary hai yah baat bahut galat hai !
        quran 2/54 me bachde ki puja karne ke karan apas me hatya karne ke adesh deta hai isliye bhi quran galat hai

  9. ऐसा विज्ञान मानव आविष्कृत नहीं ईश्वर प्रद्दत वेदों में प्राकृतिक है. हमारे विद्वान पूर्वजों ने उस विज्ञान को भली-भाति समझा है और अनुसरण किया है किन्तु आज अधिकतर हिंदू लोग भी वेदों को ईश्वरकृत ज्ञान न मानकर विद्वानों कृत मानते हैं जोकि न केवल इस भारत भूमि वरन समस्त मानव जाति का दुर्भाग्य है.

  10. Shree Sir !
    Thanks. You have expressed this appeciated facts.The ancient Vedic Hindu religion is the genesis of civilization. Vedic traditional Hinduism of the old age is the devotee of the Panchadeva (five Gods). ‘Omkar Jagat (followers of OM) is the devotee of Vedic Hindu traditions. The worship of Gods and Goddess- Ganesh (an lephant headed God), Bhagawati (Goddess), Surya (Sun), Shiva (Lord Shiva) and Bishnu (the creator of the world), is compulsory for one who is facing crisis. We confer respect to one another on account of the ancient Vedic Hindu religion. We want Nepal to remain a stable Hindu and
    Buddhist nation. Nepal is the birth place of both these two religion-Hindu and Buddha. First of all, we should be convinced that the religion is realization; not talk, not doctrine, nor theories, however beautiful they may be. It is being and becoming, not hearing or acknowledging; it is the whole soul becoming changed into what it believes. So, religion is the manifestation of the Divinity already in man. Then, we should understand that the Hindu religion is very ancient, practical and democratic in the way of human life. So, every Hindu in all over the world must feel proud to be born a Hindu. But it also gives every Hindu a responsibility of ensuring that Hindu society moves in a positive direction.

    A Scholor V.S. Sardesai writes- ”Hindu” does not come from Sindhu’. The country lying between the Himalayan mountain and Bindu Sarovara (Cape Comorin sea) is known as Hindusthan by combination of the first letter ‘hi’ of ‘Himalaya’ and the last compound letter ‘ndu’ of the word ‘Bindu.’ The historian Yogi Naraharinath also has written- ‘Himalaya, Him’ indicates ‘Hindu.’
    Thank you.
    Dirgha Raj Prasai
    Nepal

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